सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

रामलला के चरणों में रखी श्रद्धा और हमारा आचरण





✍️दीपक कुमार द्विवेदी

अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के दानपात्र से संबंधित कथित चोरी का समाचार सामने आने के बाद स्वाभाविक रूप से करोड़ों श्रद्धालुओं के मन में पीड़ा, क्षोभ और आक्रोश उत्पन्न हुआ है। यह केवल कुछ लाख रुपये अथवा कुछ कर्मचारियों की कथित बेईमानी का विषय नहीं है। यह उस समाज की आत्मा को उद्वेलित करने वाली घटना है, जिसने पाँच शताब्दियों तक संघर्ष किया, अपने आराध्य के लिए अपमान सहा, असंख्य ज्ञात-अज्ञात बलिदान दिए, लाखों कारसेवकों को सड़कों पर उतरते देखा और करोड़ों परिवारों को अपनी श्रद्धा, तपस्या और समर्पण के साथ रामकाज में सहभागी होते देखा। जिस मंदिर के निर्माण को हिंदू समाज ने अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के पुनर्जागरण के रूप में स्वीकार किया हो, वहाँ भगवान श्रीराम के चरणों में अर्पित दानराशि के संबंध में चोरी का आरोप सामने आना केवल एक आपराधिक घटना नहीं है; यह हमारे समय का नैतिक प्रश्न है।

इस विषय पर चर्चा करते समय भावनाओं के साथ तथ्यों का भी सम्मान होना चाहिए। सबसे पहले यह स्पष्ट कर लेना आवश्यक है कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास कोई सरकारी विभाग नहीं है। 9 नवम्बर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय के उपरांत 5 फ़रवरी 2020 को भारत सरकार ने संसद में स्वतंत्र श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के गठन की घोषणा की थी। 5 अगस्त 2020 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उपस्थिति में भूमिपूजन सम्पन्न हुआ और 22 जनवरी 2024 को श्रीरामलला के विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा हुई। विभिन्न सार्वजनिक विवरणों के अनुसार मंदिर निर्माण हेतु देशभर के लगभग 12.7 करोड़ परिवारों तक पहुँच बनाई गई और जनसहभागिता से पाँच हजार करोड़ रुपये से अधिक की राशि का समर्पण प्राप्त हुआ। यह किसी सरकार का प्रकल्प नहीं था; यह समाज की श्रद्धा का विराट स्वरूप था।

ऐसी स्थिति में यदि दानराशि की गणना और सुरक्षा से जुड़े कर्मचारियों पर चोरी के आरोप लगते हैं तो निश्चित रूप से निष्पक्ष जाँच और कठोर दण्ड होना चाहिए। उत्तर प्रदेश सरकार ने आरोप सामने आने के बाद तीन सदस्यीय विशेष अन्वेषण दल (एसआईटी) गठित कर निर्धारित समयावधि में प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। यह आवश्यक भी है, क्योंकि श्रद्धालुओं का विश्वास किसी भी स्थिति में खंडित नहीं होना चाहिए।

किन्तु इसी के साथ एक दूसरा प्रश्न भी उठता है। कुछ लोग कह रहे हैं कि यदि राममंदिर सरकारी नियंत्रण में होता तो ऐसी घटना नहीं होती। क्या वास्तव में ऐसा है? क्या सरकारी नियंत्रण अपने आप पवित्रता और पारदर्शिता की गारंटी है?

देश के अनेक बड़े मंदिर दशकों से सरकारी नियंत्रण में हैं। तमिलनाडु का हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग लगभग 44,000 से अधिक मंदिरों का प्रशासन देखता है। वर्षों से मंदिरों की भूमि, आय, संपत्तियों और प्रबंधन को लेकर प्रश्न उठते रहे हैं। मंदिरों की हजारों एकड़ भूमि पर अतिक्रमण, अत्यल्प मूल्य पर पट्टे और प्रशासनिक अनियमितताओं की चर्चा समय-समय पर सार्वजनिक जीवन का विषय बनती रही है।

आंध्र प्रदेश का तिरुमला तिरुपति देवस्थानम्, जो वैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत संचालित होता है, वर्ष 2024 में लड्डू प्रसाद में प्रयुक्त घी को लेकर राष्ट्रीय विवाद का विषय बना। पशु वसा मिश्रण के आरोपों ने करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं को आहत किया। न्यायिक और वैज्ञानिक जाँच की माँग उठी और विषय सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा। यह घटना इस बात का संकेत है कि सरकारी नियंत्रण भी विवादों और अनियमितताओं से मुक्त नहीं है।

केरल के पद्मनाभस्वामी मंदिर की संपत्तियों से जुड़े विवाद हों, विभिन्न राज्यों में मंदिरों की भूमि पर अतिक्रमण के प्रश्न हों अथवा मंदिरों की आय के उपयोग को लेकर उठने वाले प्रश्न—ये सब इस तथ्य की ओर संकेत करते हैं कि केवल नियंत्रण की व्यवस्था बदल देने से समस्या का समाधान नहीं होता। यदि समाज का आचरण विकृत हो जाए तो व्यवस्था भी उसी दिशा में चल पड़ती है।

यहीं से अयोध्या की घटना एक गहरे आत्ममंथन का विषय बन जाती है।

जिन लोगों की ड्यूटी प्रतिदिन दानपात्र खोलने, श्रद्धालुओं द्वारा समर्पित धन की गणना करने और उसे सुरक्षित रखने की थी, यदि वही उस धन में हाथ डालने लगें, तो यह केवल चोरी नहीं रह जाती। तब प्रश्न यह उठता है कि हम समाज के रूप में कहाँ पहुँच गए हैं? करोड़ों लोगों की श्रद्धा, हजारों लोगों के बलिदान और पाँच सौ वर्षों के संघर्ष से निर्मित पवित्र स्थल पर भी यदि कुछ लोगों के हाथ नहीं काँपते, तो दोष केवल किसी न्यास का नहीं है। यह उस सामाजिक प्रवृत्ति का दर्पण है जिसमें अवसर मिलते ही कर्तव्य पीछे छूट जाता है और स्वार्थ आगे आ खड़ा होता है।

और इससे भी अधिक गंभीर बात यह है कि जिन लोगों के नाम इस प्रकरण में चर्चा में आए, वे समाज के तथाकथित प्रतिष्ठित और उच्च कुलों से जुड़े बताए जा रहे हैं। हम प्रायः यह मान लेते हैं कि कुल, जाति, वंश और सामाजिक प्रतिष्ठा नैतिक श्रेष्ठता का प्रमाण हैं। किंतु इतिहास और वर्तमान दोनों यह बताते हैं कि आचरण से बड़ा कोई परिचय नहीं होता। ऊँचे कुल में जन्म लेने वाला व्यक्ति भी पतित आचरण कर सकता है और साधारण परिवार में जन्मा व्यक्ति भी सत्यनिष्ठा और कर्तव्यपरायणता का आदर्श बन सकता है।

हमारे समाज की सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि हम नैतिकता की चर्चा सबसे अधिक करते हैं और उसके पालन में सबसे अधिक समझौते भी करते हैं। धर्म, संस्कार, सदाचार और आदर्शों पर लम्बे-लम्बे भाषण दिए जाते हैं, परन्तु जब उन्हें जीवन में उतारने का अवसर आता है तो हम सुविधानुसार अपने मानदण्ड बदल लेते हैं।

धर्म को हमने जीवन का अनुशासन नहीं, वाणी का अलंकार बना दिया है।

रामराज्य को हमने उद्घोष का विषय बना दिया है।

मर्यादा को हमने दूसरों के लिए अपेक्षा और अपने लिए अपवाद बना लिया है।

समाज का नैतिक पतन किसी एक दिन अचानक नहीं होता। उसका आरम्भ बहुत छोटी-छोटी बातों से होता है। जब माता-पिता अपने बच्चों से असत्य कहलवाते हैं, जब विद्यालयों में नकल को सामान्य माना जाने लगता है, जब प्रतियोगी परीक्षाओं में अनुचित साधनों से सफल होने वाले लोगों का सम्मान किया जाता है, जब छोटी रिश्वत देकर कार्य करवाना व्यवहारकुशलता माना जाता है, जब करचोरी को चतुराई कहा जाता है, जब सार्वजनिक संपत्ति को किसी की संपत्ति न मानकर उसका दुरुपयोग किया जाता है और जब अनुचित लाभ उठाने वाला व्यक्ति सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करता है, तब समाज का नैतिक पतन आरम्भ हो जाता है।

आज स्वयं से एक सरल प्रश्न पूछने की आवश्यकता है। यदि किसी सार्वजनिक स्थान पर हजार रुपये के नोटों से भरे दस लिफ़ाफ़े रख दिए जाएँ, तो कितने लोग उनके वास्तविक स्वामी को खोजने का प्रयास करेंगे? कितने लोग पुलिस के पास जमा कराएँगे? और कितने लोग उन्हें अपनी जेब में रखकर यह सोचेंगे कि उन्हें बिना परिश्रम लाभ प्राप्त हो गया? यह प्रश्न किसी सर्वेक्षण का विषय नहीं है; यह समाज की आत्मा की परीक्षा है।

दुःखद सत्य यह है कि आज बहुत बड़ी संख्या में लोग बिना किसी आत्मग्लानि के उसे अपना अधिकार समझ बैठेंगे।

दो सौ वर्ष पूर्व भारत आने वाले अनेक विदेशी यात्रियों और कुछ अंग्रेज अधिकारियों ने भारतीय समाज की सत्यनिष्ठा और सामाजिक उत्तरदायित्व की प्रशंसा की थी। व्यापार विश्वास पर चलता था। ग्रामीण समाज में लोग बिना भय के अपना घर छोड़ देते थे। इसका अर्थ यह नहीं कि उस समय कोई दोष नहीं था, लेकिन इतना अवश्य था कि बेईमानी सम्मान का विषय नहीं थी। आज स्थिति बदल गई है। अब गलत कार्य करने वाला व्यक्ति लज्जित होने के स्थान पर उसके समर्थन में तर्क देता है।

आज अनेक युवाओं के बीच यह धारणा सुनाई देती है कि सरकारी सेवा का सबसे बड़ा आकर्षण लोकसेवा नहीं, बल्कि नौकरी की सुरक्षा और अतिरिक्त आय की संभावना है। कुछ लोग तो यह तक कह देते हैं कि माता-पिता ने उनकी शिक्षा पर लाखों रुपये व्यय किए हैं, इसलिए उच्च पद प्राप्त करने के बाद सार्वजनिक संसाधनों से उसकी भरपाई करना उनका अधिकार है। यह सोच केवल विधि-विरुद्ध नहीं है; यह लोकधर्म, कर्तव्यबोध और सामाजिक उत्तरदायित्व के क्षरण का संकेत है।

विडम्बना यह भी है कि यही समाज अंबानी और अदानी जैसे उद्योगपतियों को सहजता से "चोर" कह देता है, किन्तु सुविधा शुल्क लेने वाले कर्मचारियों, सार्वजनिक संसाधनों का दुरुपयोग करने वाले अधिकारियों और मंदिरों की संपत्तियों को क्षति पहुँचाने वालों के प्रति उतना मुखर नहीं होता। सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में होने वाली अनियमितताओं पर कई बार मौन साध लिया जाता है, लेकिन स्वतंत्र न्यासों के विषय में अचानक नैतिकता का शंखनाद होने लगता है। चयनात्मक आक्रोश भी नैतिक पतन का एक रूप है।

और यहाँ एक प्रश्न और भी है। यदि अयोध्या का राममंदिर पूर्णतः सरकारी नियंत्रण में होता और यही घटना घटती, तो क्या समाज को इतनी शीघ्र जानकारी मिल पाती? क्या तत्काल विशेष अन्वेषण दल गठित होता? क्या उतनी ही तीव्रता से उत्तरदायित्व तय होता? इन प्रश्नों पर भी विचार होना चाहिए। क्योंकि पारदर्शिता केवल नियंत्रण से नहीं, उत्तरदायित्व और सामाजिक सजगता से आती है।

इसलिए इस पूरे प्रकरण में दोषियों को कठोर दण्ड मिलना चाहिए, निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए और श्रद्धालुओं का विश्वास पुनर्स्थापित होना चाहिए। लेकिन यदि हम केवल इतना करके संतुष्ट हो जाएँ और यह न पूछें कि आखिर हम समाज के रूप में किस दिशा में जा रहे हैं, तो हम मूल समस्या से मुँह मोड़ लेंगे।

दानपात्र से धन निकालने वाले लोग किसी अन्य लोक से नहीं आए। वे इसी समाज की उपज हैं। वे हमारे ही घरों, विद्यालयों, मोहल्लों और सामाजिक परिवेश में पले-बढ़े हैं। यदि समाज छोटी बेईमानियों को सामान्य मान लेगा, तो वही प्रवृत्ति आगे चलकर बड़े पदों, बड़े संस्थानों और पवित्र स्थलों तक पहुँच जाएगी।

हम विश्वगुरु बनने की बात करते हैं। हम कहते हैं कि भारत ने संसार को धर्म, सत्य और कर्तव्य का संदेश दिया है। यह तभी सार्थक होगा जब हम स्वयं उन मूल्यों को अपने जीवन में स्थान देंगे। धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं है। धर्म वह है कि जो दायित्व हमें सौंपा गया है, उसका निर्वहन पूर्ण निष्ठा, उत्तरदायित्व और लोकहित की भावना से किया जाए। जिसे दानराशि की गणना का कार्य सौंपा गया है, वह उसे भगवान के चरणों में समर्पित समाज की श्रद्धा माने। जिसे शिक्षा का दायित्व मिला है, वह चरित्रवान पीढ़ी तैयार करे। जिसे शासन का दायित्व मिला है, वह न्याय करे। जिसे समाज का नेतृत्व मिला है, वह उदाहरण प्रस्तुत करे।

रामराज्य केवल भौतिक समृद्धि का नाम नहीं था। उसका आधार सत्य, मर्यादा, उत्तरदायित्व और लोककल्याण था। श्रीराम ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि अधिकार से पहले कर्तव्य और स्वार्थ से पहले धर्म का स्थान है। यदि हम राम का नाम तो लें, परन्तु राम के आदर्शों को अपने जीवन में स्थान न दें, तो हमारे मंदिरों की ऊँचाई बढ़ती जाएगी और समाज की आत्मा सिकुड़ती जाएगी।

अयोध्या के दानपात्र से जुड़ा यह कथित चोरी का प्रकरण अंततः हमें स्वयं से प्रश्न करने के लिए बाध्य करता है। क्या हम अपने बच्चों को सत्यनिष्ठा, कर्तव्यबोध और लोकधर्म का संस्कार दे रहे हैं? क्या हम छोटी बेईमानियों को भी उतनी ही गंभीरता से लेते हैं जितनी बड़े घोटालों को? क्या हम सार्वजनिक जीवन में निष्ठा को सम्मान देते हैं या अवसरवाद को सफलता मानते हैं?

यदि इन प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक है, तो समस्या किसी एक न्यास की नहीं, पूरे समाज की है।

धर्म केवल मुख से बोले जाने वाले शब्द नहीं है। धर्म वह है जो अवसर मिलने पर भी अनुचित कार्य से रोक ले। रामराज्य घोषणाओं से नहीं आता, उसे आचरण में उतारना पड़ता है। अन्यथा आने वाली पीढ़ियाँ यह अवश्य पूछेंगी कि जिस समाज ने श्रीराम का भव्य मंदिर तो बना लिया, क्या वह श्रीराम के आदर्शों के अनुरूप समाज भी बना सका? यही इस घटना का सबसे गहरा, सबसे पीड़ादायक और सबसे आवश्यक प्रश्न है, जिससे अब बचा नहीं जा सकता।

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