सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

महाविनाश पर उतारू मानव समुदाय

।।ॐ।।

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-डॉ. नितिन सहारिया, महाकौशल

                    इन दिनों पर्यावरण असंतुलन के कारण मौसम बड़ी तीव्र गति से विश्व के प्राय: हर हिस्से में अपना रंग बदलता दिखाई पड़ रहा है। वैज्ञानिक, शिक्षाविद्व, पर्यावरण प्रेमी सभी ने मनुष्य और वर्तमान समाज- व्यवस्था को इसके लिए दोषी ठहराया और कहा है कि इनकी गलत नीतियों का ही यह दुष्परिणाम है। उन *सभी ने एक स्वर से इसे स्वीकारा है कि अब यदि आगे भी इस स्थिति को और अधिक गंभीर बनने से रोका नहीं गया तो मानवीय विनाश सुनिश्चित है।* 
         इस संदर्भ में *लॉर्ड रिची काल्डर 'फॉरेन अफेयर्स' पत्रिका Vol-48 , 2* , 1970 ,पृष्ठ- 207 -220 में लिखते हैं- " *पुरातनकाल में अति विकसित सभ्यताएं अपनी ही गलतियों के कारण बर्बाद हो गई । उनने या तो लालच या लापरवाही दिखाई अथवा अशक्तता अपनाई । इस प्रकार उनकी स्वयं की कमजोरी ही उन्हें ले डूबी।"* 
           उनका कहना है कि *यदि वर्तमान परिपेक्ष (पर्यावरण असंतुलन) में वही भूलें दोहराई गई तो हमारी सभ्यता का भी परिणाम पूर्व जैसा ही होगा।* वे इस संदर्भ में सावधान करते हुए पहले से ही किसी उपयुक्त रोक-थाम पर विचार करने की सलाह देते हैं।
         ऐसे ही विचार *स्विस वैज्ञानिक जीन डोर्स्ट* के हैं वे कहते हैं- " इस धरती पर मनुष्य के अवतरण के साथ ही प्रकृति का संतुलन बिगड़ना आरंभ हो गया। सुदूर भूत के अपने पूर्वजों ने इसका श्रीगणेश अपनी ध्वंसात्मक प्रवृत्तियों के साथ किया। उनकी यह प्रवृत्तियां बड़ी तो तरह-तरह के संकट खड़े होने लगे। भूक्षरण और भूस्खलन की घटनाएं आरंभ हुई। प्रकृति धीरे-धीरे अप्राकृतिक बनने लगी। इन सबके लिए आदिम मानवों को दोषी ठहरना और यह कहना कि उन्होंने यह सब जान-बूझकर अपने और अपनी संतानों के अस्तित्व के लिए किया है, उचित न होगा। *निश्चय ही उन्होंने प्रकृति को क्षति पहुंचाई है, पर इसमें उनकी अज्ञानता और अव्यवस्था की ही प्रमुख भूमिका रही है।"* 
           उनका कहना है- "आदिमकाल में इसकी शुरुआत हुई तो आज तक यह चलती आ रही है। *अंतर बस इतना है कि उन दिनों यह पूर्वजों की अज्ञानता का परिणाम था किंतु अब जान-बूझकर किया जा रहा है।"* 
            डोर्स्ट आगे कहते हैं - "उन दिनों आदिमानव ने प्रकृति को इतना नुकसान पहुंचाया कि आज हम जंतुओं की कई महत्वपूर्ण प्रजातियों से वंचित बने हुए हैं। *विनाश के वही बीज मनुष्य आज भी अपने साथ लिए चल रहा है और इससे न सिर्फ प्रकृति का विनाश, वरन् स्वयं अपने विनाश की भी परिस्थितियां जुटा रहा है।"*
          मूर्धन्य इतिहासवेत्ता अर्नोल्ड टायनबी 'इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ एनवायरमेंटल स्टडीज' (1972, Voll- 3 , पृस्ठ- 141 ) नामक पत्रिका के 'द रिलीजियस बैकग्राउंड ऑफ़ द प्रेजेंट एनवायर्नमेंटल क्राइसिस' नामक निबंध में वर्तमान पर्यावरण असंतुलन का मुख्य कारण धर्मिक बताते हुए कहते हैं कि प्राकृतिक वातावरण के प्रति मनुष्य की अभिरुचि धर्म ने ही जगाई है। उनके अनुसार पपौर्वात्य देशो, ग्रीस और रोम के सर्वेश्वरवाद ने प्राचीनकाल में मनुष्य और प्रकृति के बीच के संबंध को समझा था एवं उनके बीच सामंजस स्थापित किया था- यह मानकर की दोनों एक दूसरे के लिए समान रूप से आवश्यक हैं, किंतु *एकेश्वरवाद की मान्यता ने सर्वेश्वरवाद की अवधारणा और व्यवस्था पर तुषारापात कर दिया।* एकेश्वर के अनुसार मनुष्य प्रकृति का स्वामी है। भगवान द्वारा उसे यह अनुदान इसलिए प्रदान किया गया है, ताकि वह इसका निरंतर उपभोग करें और समृद्ध बने। *'टॉययनबी*' कहते हैं कि- *इकेश्वरवादी मातावलंबियों कि उक्त अवधारणा एवं विश्व में उसका द्रुत गति से विकास व विस्तार ही आज के पर्यावरण संकट का प्रमुख कारण है।*
         जे. ड़व्ल्यू फॉरेस्टर , डी. एच. मिडोज, एम. मेजारोबिक एवं अन्य शोधकर्ताओं का विश्वास है कि- प्राकृतिक पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव का मूल कारण मनुष्य की वह मूलभूत इच्छा है, जिसके अंतर्गत वह अपने विकास और विस्तार की बात सोचता है। एक ऐसा विकास, जो अनंत हो ;ऐसा विस्तार ,जो अपरिमित हो। उसकी इसी इच्छा का परिणाम है कि आज वस्तुओं का उत्पादन और उपभोग आकाश चूम रहा है तथा जनसंख्या- वृद्धि एवं पर्यावरण असंतुलन की भयंकरता प्रत्यक्ष है। *शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि विकास का यह तरीका बदला नहीं गया तो यह संपूर्ण मानव जाति के लिए सर्वनाश उपस्थित कर सकता है।* 
         अमेरिका की ' *बैरी काम्नर* ' इस संकट को सामाजिक बताते हुए अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ' *दी क्लोजिंग सर्कल'* 1979 ,पृष्ठ 178 में लिखते हैं- " वर्तमान संकट न तो किसी प्राकृतिक विपत्ति का परिणाम है और न मनुष्य के गलत- क्रियाकलाप का। पर्यावरण प्रदूषण इसलिए नहीं फैला कि मनुष्य गंदगी पसंद जीव है, न इस कारण की आबादी की इन दिनों असाधारण वृद्धि हुई है, वरन् इसका *मूल कारण मानवीय समाज में सन्निहित है । जिस ढंग से समाज ने इस धरती के संसाधनों से उपलब्ध संपदा पर अधिकार जमाना चाहा, उनका वितरण और उपयोग किया, वही आज की पर्यावरण- समस्या के प्रधान कारण हैं।"*
            आखिर यह समस्या इतनी तीव्र गति से क्यों बढी और इस ख़तरनाक स्तर तक क्यों आ पहुंची ? इसका विश्लेषणात्मक अध्ययन बैरी काम्नर ने अमेरिका में किया और इसके माध्यम से उन कारकों को जानना चाहा, जिनके कारण पिछले 30- 40 वर्ष में वहां का प्राकृतिक वातावरण अप्राकृतिक और अस्वस्थ बना। उपयुक्त पुस्तक के पृष्ठ-( 144, 145, 146 ) में उनने लिखा है - "सन 1946 के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था में जो वृद्धि हुई, आश्चर्य की बात है कि उसका अत्यंत न्यून प्रभाव लोगों की मौलिक आवश्यकताओं के परिमाण पर पड़ा। तब लोगों की प्रोटीन और अन्य भोजन की जितनी कैलोरी की आवश्यकता थी, आज भी वे उन्हें उसी परिमाण में ले रहे हैं। प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष तब जितने कपड़े की आवश्यकता पड़ती थी, आज भी वह यथावत है। सन 1946 में आवास के लिए जितनी जमीन अभीष्ट समझी जाती थी, वर्तमान में भी उसकी उतनी ही मांग है। जितना माल परिवहन उस समय प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष होता था, उसकी मात्रा इन दिनों भी लगभग वही है। हां ,इतना जरूर है कि तब और अबकी वस्तुओं के स्तर में परिवर्तन आ गया है। अब खेतों में रासायनिक खादों और दवाइयां का प्रयोग अपेक्षाकृत अधिक हो रहा है। आज के वस्त्र सूती और ऊनी के स्थान पर कृत्रिम धागों के बनने लगे हैं। कपड़े धोने में सामान्य साबुन की तुलना में वर्तमान समय में कृत्रिम डिटर्जेंटों का प्रयोग किया जा रहा है। परिवहन गाड़ी के रूप में रेल की अपेक्षा ट्रैकों का प्रयोग बहुतायत से हो रहा है। अब हर कार्यालय वातानुकूलित होता है और नौकरी करने वाले प्रायः प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे ही वातावरण में काम करना पड़ता है। आज के लोग ड्राइविंग भी 1946 की तुलना में दुगनी कर रहे हैं। इसमें प्रति मील गैसोलीन की खपत भी अधिक हो रही है, जिसमें सीसे की मात्रा पहले की तुलना में अधिक पाई जाती है।"
         इन आरंभिक परिवर्तनों के प्रभाव दूसरे क्षेत्रों में भी दिखाई पड़े। काम्नर कहते हैं की जनसंख्या में 40% और प्रति व्यक्ति नई वस्तुओं का उपभोग में 6% की वृद्धि से अमेरिका में कुल प्रदूषण में लगभग 10% और प्रति व्यक्ति प्रदूषण में 7% की वृद्धि होती है। इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि *पर्यावरण- असंतुलन बढ़ाने में मुख्य भूमिका जनसंख्या वृद्धि की नहीं, वरन् उत्पादन तकनीक में परिवर्तन की रही है, जिसे अधिक लाभ कमाने की दृष्टि से अपनाया गया था।* 
           उपयुक्त पुस्तक में 'काम्नर' आगे लिखते हैं कि- जब एक बार पर्यावरण- असंतुलन का आधारभूत कारण ज्ञात हो गया तो *इस सामाजिक प्रवृत्ति में आवश्यक सुधार संशोधन कर हम इसका निवारण भी कर सकते हैं, पर साथ ही चेतावनी भी देते हैं कि यदि ऐसा नहीं हो सका तो मानवीय अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।*
         संयुक्त राष्ट्र के भूतपूर्व सेक्रेटरी जनरल ' *यूथांट* ' ने संयुक्त राष्ट्र में अपने कार्यकाल के दौरान इस गंभीर समस्या पर काफी विचार किया था। उन्होंने सन *1969 में एक रिपोर्ट ( 'प्रॉब्लम ऑफ़ दि हुमन एनवायरमेंट इकोनामिक एंड सोशल काउंसिल- 26-05- 1969 ,पृष्ट- 8)* में कहा था- *"वर्तमान पर्यावरण असंतुलन के तीन आधारभूत कारण है-1. जनसंख्या वृद्धि ,2. शहरीकरण और 3. टेक्नोलॉजी में अभिनव परिवर्तन।* इनमें वृद्धि हुई तो उनके साथ-साथ इससे संबद्द आवश्यकताओं यथा -स्थान ,भोजन और प्राकृतिक संसाधनों की मांग भी बढी । इनमें से कोई भी आवश्यकता ऐसी नहीं थी, जिससे पर्यावरण को क्षति पहुंचने का खतरा हो, पर *आबादी को बसाने में औद्योगीकरण और शहरीकरण योजना व नियंत्रण में, भूमि एवं संसाधनों के उपयोग में वह सतर्कता और दक्षता नहीं दिखाई गई, जो अभीष्ट थी, परिणामस्वरुप संपूर्ण विश्व में आज यह खतरा गंभीर रूप धारण करता जा रहा है। यदि आगे स्थिति यही बनी रही तो नतीजा दुख:दाई होगा।"*

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