सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

कहीं हम आत्मघाती संकट की ओर तो नहीं बढ़ रहे ?



।।ॐ।।


-डॉ. नितिन सहारिया ,महाकौशल


                  जुस्टस लिविंग यूनिवर्सिटी ऑफ़ गिसेन के प्रोफेसर डॉ. एच. सी. बर्नहार्ड ग्रीमेक के अनुसार- " प्राकृतिक पर्यावरण की संकटावस्था की शुरुआत, जब से मनुष्य ने जन्म लिया, तब से है। इसका एक सशक्त कारण जनसंख्या में लगातार वृद्धि है, जिसके कारण प्राकृतिक भू- दृश्यों का विनाश हो रहा है और पर्यावरण- संकट उपस्थित हो रहा है।"
         वुल्फगेंग क्लाजविस 'एनवायरमेंट क्राइसिस' नामक पुस्तक में लिखते हैं कि- 'पैल्योलिथिक रिवॉल्यूशन' के समय से, जब से कृषक समाज अपनी अस्तित्व में आया, वन, कृषि योग्य भूमि में अधिक- से- अधिक परिवर्तन हुए हैं। जब से वनो की उपयोगिता निर्माण- कार्यों के लिए समझी गई, तब से वनों को काटना एवं जालना बड़ी निर्दयता और अदूरदर्शीता पूर्वक तथा तीव्र गति से हुआ है। इस कारण विस्तृत प्राकृतिक क्षेत्र परिवर्तित हो गए हैं एवं पर्यावरण के असंतुलन का संकट सामने आ रहा है।
        मनुष्य के द्वारा प्राकृतिक पर्यावरण कैसे बदल दिया जाता है, यदि यह देखना है तो मेडिटरेनियन रीजन (भूमध्यसागरी क्षेत्र) को देखा जा सकता है। यहां तराइयों की नैसर्गिक रूपाकृति इसका प्रमुख शिकार है। एक समय वहां पर विशाल वन क्षेत्र था। यह वन पश्चिमी अफ्रीका के समुद्री तट से सुदूर पूर्व दक्षिणी यूरोप के तीन प्रायद्वीपों तक विस्तृत था। *जब मानवीय सभ्यता भू सागरी क्षेत्र में सर्वत्र फैल गई, तब मनुष्य ने लापरवाही पूर्वक वनों को काट डाला और उन्हें झाड़ियां में बदल दिया एवं क्षेत्र को मरुभूमि के रूप में बदलकर लाइम-स्टोन की बंजर भूमि बना दिया । यह आश्चर्यजनक सत्य है कि 4000 वर्ष पूर्व 'सहारा' मरुस्थल अपने वर्तमान स्वरूप में नहीं था। 2000 वर्ष से कम वर्ष पूर्व लीबिया की वर्तमान मरुभूमि 'रोम' का अन्न्नागार थी।* 
         विशेषज्ञों के अनुसार *आज जहां सिंध और राजस्थान के रेगिस्तान हैं, वहां कभी घनी आबादी थी, किंतु मोहनजोदड़ो के सभ्यता काल में कृषि संबंधी गलत नीतियों के कारण अब वह क्षेत्र मरुस्थल में परिवर्तित हो गया।* मनुष्य तथा पशुओं की संख्या में लगातार वृद्धि के कारण उन प्रदेशों की जमीन पर दबाव बढ़ने लगा। निरंतर कृषि द्वारा भूमिगत जल का दोहन होता रहा किंतु उस जल भंडार को संरक्षित रखने के लिए *वृक्षारोपण जैसे किसी उपाय पर कभी विचार नहीं किया गया। परिणामत: वंहा की मिट्टी लगातार सूखती चली गई। जैसे-जैसे वह सूखती गई तदनुरूप हल्की भी होती गई। हल्की होने के कारण मिट्टी हवा में उड़ -उड़ कर वातावरण में सन्व्याप्त होने लगी। वातावरण में धूल की अधिकता के कारण वर्षा कम होने लगी, जिससे वे क्षेत्र रेगिस्तान में परिवर्तित हो गए।* इसी भय से जापान में अब कृषि और वनीकरण की मिश्रित व्यवस्था अपनाई गई है। वहां जिन क्षेत्रों में कृषि की जाती है, वहां पेड़ भी बड़े परिमाण में लगाए जाते हैं, ताकि खेती एवं अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भूमिगत जल की आपूर्ति होती रहे।
          इसके अतिरिक्त औद्योगिक क्रांति ने मानवी पर्यावरण और स्वास्थ्य को अपार क्षति पहुंचाई है। इस संबंध में सुप्रसिद्ध पर्यावरण विद्द कोनराड लॉरेंज कहते हैं- " *मनुष्य जाति यह लगभग भूल गई है कि जीवित निकायों से किस प्रकार व्यवहार किया जाए। मनुष्य जीवित निकायों के लिए विचार और क्रिया पद्धति का तकनीकी व्यवहार ही अपनाता है।* इस प्रकार की नीति एवं क्रिया पद्धति अकथनी क्षति का कारण बनती है।"
        आजकल पृथ्वी पर ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं है जो मनुष्य के द्वारा किसी न किसी प्रकार प्रदूषित न हो रहा हो। डब्ल्यू क्लास बिज लिखते हैं कि- 100 से 150 वर्ष से मध्य यूरोप और नॉर्थ अमेरिका के स्वरूप बदल गए हैं। वहां न केवल मेट्रोपॉलिटन नगर और औद्योगिक क्षेत्र का व्यापक विस्तार हो रहा है, बल्कि भूमि नालों और नदियों के रूप में व्यापक रूप से विस्तृत हो रही है। औद्योगीकरण का व्यापक विस्तार पठारी प्रदेश की ओर निरंतर होता जा रहा है। *दक्षिणी अमेरिका का 'अमेजन रीजन' 'जॉन्स ऑफ वर्जिन फॉरेस्ट' के नाम से जाना जाता है। वह वन क्षेत्र अभी भी बड़े भूभाग में विस्तृत रूप से फैला है। पर्यावरण विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगले 10 या 20 वर्ष में अमेजॉन के वन क्षेत्र विराट कृषि भूमि में बदल जाएंगे और वन काट डाले जाएंगे। लगभग 100 वर्ष की अंतराल में ये वनभूमि मरुभूमि में बदल सकती है।* पर्यावरण विशेषज्ञों का कथन है- " *आधुनिक मानव अपनी तकनीकी उपलब्धियां के प्रलोभन के कारण वही करता है, जिससे उसको प्रकृति से खुशी मिले और कुछ प्राप्त हो सके। इससे वह अपने नैसर्गिक पर्यावरण को पूर्णत: बदल देता है। जल, वन और भूमि के स्रोतों का दोहन करता है तथा क्रमशः कृत्रिम मशीनी दुनिया का निर्माण करता है।* 
        पर्यावरण को मनुष्य मात्र ही नहीं बदलता, वायु ,जल, मिट्टी और पृथ्वी में पाए जाने वाले सभी जैविक प्राणी भी पर्यावरण को बदलने वाले घटक हैं। यह *सभी घटक आधुनिक मानवीय सभ्यता की प्रगति के कारण दूषित हो गए हैं औद्योगीकरण के कारण ठोस, गैस और तरल पदार्थ के रूप में जो भी गंदे पदार्थ निस्सृत होते हैं, उनमें से कुछ जहरीले होते हैं। यह पदार्थ पर्यावरण के प्रदूषक तत्व कहे जाते हैं* । जर्मनी के रेनहार्ड डेयोल का कहना है। " *पर्यावरण को सुरक्षित रखकर ही मनुष्य अपने आप को बचा सकता है।"*
        *अमेरिकी 'राकेल कार्सन'* नामक महिला को 'एनवायरमेंटल जॉन ऑफ आर्क' की उपाधि से अलंकृत किया गया है। *वे पर्यावरण को प्रदूषित करने वाली आधुनिक सभ्यता को मानवी सभ्यता और जीवन के लिए घातक समझती हैं।* उनके अनुसार पर्यावरण संबंधी जो *वर्तमान संकट जो चन्हुओर दिखाई पड़ता है, वह विभिन्न क्षेत्रों में वर्तमान मानव सभ्यता की गलत नीतियों का ही दुष्परिणाम है।* वे कहती हैं कि यदि *आगे इन नीतियों में परिवर्तन नहीं हुआ तो अन्य सभ्यताओं की भांति वर्तमान मानव सभ्यता का सर्वनाश समीप ही उपस्थित होना असंभव भी नहीं।*

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