सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

सोशल मीडिया पर क्रांति और जमीन पर सन्नाटा



✍️ दीपक कुमार द्विवेदी

6 जून 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर में आयोजित “काकरोच जनता पार्टी” का प्रदर्शन केवल एक छात्र आंदोलन नहीं था। यह उस लंबे वैचारिक, डिजिटल और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की नई प्रस्तुति था, जो पिछले कई वर्षों से भारत में हर मुद्दे को सरकार विरोधी, हिंदू विरोधी और अंततः भारत विरोधी नैरेटिव में बदलने का प्रयास करता रहा है। इस पूरे घटनाक्रम को केवल एक धरने के रूप में देखना बहुत बड़ी भूल होगी। इसकी पृष्ठभूमि, इसमें शामिल चेहरे, लगाए गए नारे, समर्थन देने वाले संगठन, अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सक्रियता, दिल्ली दंगों के आरोपियों के समर्थन में उठी आवाजें, और सोशल मीडिया के माध्यम से तैयार किया गया डिजिटल भ्रम इन सभी को एक साथ जोड़कर देखने पर पूरी तस्वीर स्पष्ट होती है।

सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि “काकरोच जनता पार्टी” अचानक पैदा नहीं हुई। कुछ ही दिनों में इंस्टाग्राम पर एक मीम पेज बनाया जाता है। देखते-देखते लाखों फॉलोवर्स दिखाई देने लगते हैं। मीम संस्कृति, एंटी-एस्टैब्लिशमेंट भाषा और युवाओं के भीतर पहले से मौजूद व्यवस्था-विरोधी मानसिकता का उपयोग करके यह प्रचारित किया जाता है कि देश का युवा अब “क्रांति” के लिए तैयार है। लेकिन जब 6 जून को जंतर-मंतर की वास्तविक तस्वीर सामने आई तो पूरा डिजिटल नैरेटिव ध्वस्त होता दिखाई दिया।

जिस आंदोलन को सोशल मीडिया पर “युवा जनविद्रोह” की तरह प्रस्तुत किया गया, वहाँ वास्तविक भीड़ सीमित थी। कई वीडियो और तस्वीरों में साफ दिखाई दे रहा था कि प्रदर्शनकारियों से अधिक संख्या मीडिया और पुलिसकर्मियों की थी। लेकिन सबसे अधिक प्रश्न तब खड़े हुए जब बड़े मीडिया संस्थानों ने इस छोटे धरने को एक विशाल राष्ट्रीय आंदोलन की तरहै प्रस्तुत करना शुरू कर दिया।


दैनिक भास्कर जैसे बड़े समाचार पत्र ने इस आंदोलन को जिस प्रकार प्रस्तुत किया, वह अपने आप में गंभीर अध्ययन का विषय है। अखबार में “काकरोच ने दिखाई शक्ति” जैसा बड़ा शीर्षक लगाया गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि जो प्रमुख तस्वीर प्रकाशित की गई, वह सामान्य ग्राउंड फोटोग्राफी जैसी प्रतीत नहीं होती, बल्कि स्पष्ट रूप से AI जनरेटेड विजुअल शैली में तैयार की गई दिखाई देती है। तस्वीर में भीड़ का घनत्व, चेहरों की संरचना, फ्रेमिंग, प्रकाश संतुलन और विजुअल ट्रीटमेंट वास्तविक समाचार फोटोग्राफी की अपेक्षा AI इमेज जनरेशन टूल्स से निर्मित प्रतीत होता है।

विशेष रूप से भीड़ के चेहरों की समानता, बैकग्राउंड की अस्वाभाविक गहराई, कुछ आकृतियों का धुंधलापन, और एक सिनेमाई “मास मूवमेंट” जैसा प्रभाव यह संकेत देता है कि यह दृश्य Midjourney, DALL·E, Stable Diffusion या किसी अन्य AI आधारित इमेज जनरेशन टूल की सहायता से तैयार किया गया हो सकता है। यद्यपि सार्वजनिक रूप से यह घोषित नहीं किया गया कि तस्वीर किस टूल से बनाई गई, लेकिन विजुअल संरचना और डिजिटल पैटर्न इसे AI जनरेटेड शैली के अत्यंत निकट ले जाते हैं। सीमित भीड़ को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया मानो जंतर-मंतर पर कोई ऐतिहासिक जनसैलाब उमड़ पड़ा हो।

यही नहीं, अखबार में यह भी दिखाने का प्रयास किया गया कि यह आंदोलन देशभर के युवाओं की व्यापक बेचैनी और राजनीतिक असंतोष का प्रतीक बन चुका है। दैनिक भास्कर में प्रकाशित रिपोर्ट में यह तक लिखा गया कि “विपक्ष की कमी से पैदा राजनीतिक खालीपन को काकरोच आंदोलन भर रहा है।” यह केवल समाचार प्रस्तुति नहीं थी, बल्कि एक वैचारिक फ्रेमिंग थी जिसमें एक छोटे धरने को राष्ट्रीय वैकल्पिक राजनीतिक आंदोलन के रूप में स्थापित करने का प्रयास स्पष्ट दिखाई देता है।

अखबार में प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाओं को भी इसी प्रकार प्रस्तुत किया गया। The Telegraph के हवाले से इसे भारत में बढ़ती बेरोजगारी और परीक्षा घोटालों से उपजे राजनीतिक असंतोष का प्रतीक बताया गया। Washington Post के हवाले से यह दिखाने का प्रयास किया गया कि सोशल मीडिया आधारित यह आंदोलन “नाराज युवाओं की नई राजनीतिक आवाज” बन सकता है। Reuters ने इसे भारत के 15-29 आयु वर्ग के युवाओं की बेरोजगारी और सरकारी भर्ती व्यवस्था के प्रति असंतोष से जोड़कर प्रस्तुत किया।

यहीं सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है। जिस आंदोलन में वास्तविक भीड़ सीमित थी, वहाँ अचानक अंतरराष्ट्रीय मीडिया की इतनी गहरी रुचि क्यों दिखाई दी? आखिर कुछ सौ लोगों के धरने को वैश्विक स्तर पर “भारतीय युवाओं के विद्रोह” की तरह प्रस्तुत करने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई? यही वह पैटर्न है जो शाहीन बाग, सीएए विरोध, किसान आंदोलन और दिल्ली दंगों के दौरान भी दिखाई दिया था, जहाँ भारत के आंतरिक मुद्दों को तुरंत वैश्विक वैचारिक विमर्श में बदलने का प्रयास किया गया।

The Guardian की पत्रकार हन्ना एलिस का जंतर-मंतर तक पहुँचना भी इसी बड़े इकोसिस्टम की ओर संकेत करता है। Al Jazeera जैसे मंचों द्वारा इसे प्रमुखता देना भी सामान्य घटना नहीं थी। यही अंतरराष्ट्रीय मीडिया नेटवर्क दिल्ली दंगों के समय इस्लामी कट्टरपंथी तत्वों की भूमिका को गौण करके सरकार, हिंदू संगठनों और बहुसंख्यक समाज को कठघरे में खड़ा करता दिखाई दिया था। बाद में यही मीडिया कुंभ मेले, राम मंदिर और सनातन प्रतीकों को लेकर लगातार नकारात्मक नैरेटिव खड़ा करता रहा।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प बात यह रही कि आरफा ख़ानम शेरवानी जैसी पत्रकार, जिन्हें लंबे समय से वामपंथी-इस्लामिक जिहादी मानसिकता से प्रभावित माना जाता है, स्वयं जंतर-मंतर में मौजूद थीं। उन्होंने जंतर-मंतर से अपने वीडियो में कहा कि जिस संगठन के सोशल मीडिया पर ढाई करोड़ के आसपास फॉलोवर्स बताए जा रहे थे, उसके धरने में 200 लोग भी नहीं पहुँचे। यह टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि यह उसी वैचारिक खेमे के भीतर से आई थी, जो सामान्यतः ऐसे आंदोलनों के समर्थन में खड़ा दिखाई देता है। एक ओर सोशल मीडिया और मीडिया नैरेटिव के माध्यम से इसे “युवा क्रांति” की तरह प्रस्तुत किया जा रहा था, वहीं दूसरी ओर जंतर-मंतर की वास्तविकता स्वयं वहाँ मौजूद लोग ही उजागर कर रहे थे।

यहीं सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है। एक ओर दैनिक भास्कर AI शैली की तस्वीरों के माध्यम से हजारों लोगों का वातावरण निर्मित कर रहा था, दूसरी ओर जंतर-मंतर में मौजूद पत्रकार स्वयं सीमित भीड़ की बात कर रहे थे। यह पूरा अंतर दिखाता है कि डिजिटल प्रोपेगेंडा, AI आधारित विजुअल निर्माण और मीडिया नैरेटिव के माध्यम से एक कृत्रिम जनआंदोलन खड़ा करने का प्रयास किया गया।

प्रश्न यह है कि भारत के हर ऐसे आंदोलन में यही अंतरराष्ट्रीय मीडिया अचानक इतना सक्रिय क्यों हो जाता है? कारण स्पष्ट है। पिछले कई वर्षों से भारत के भीतर एक ऐसा वैचारिक इकोसिस्टम सक्रिय है जो देश के भीतर हर असंतोष को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर “लोकतंत्र बनाम तानाशाही” की लड़ाई के रूप में प्रस्तुत करता है। इस नेटवर्क में वामपंथी एक्टिविस्ट, विदेशी फंडिंग से जुड़े NGO नेटवर्क, पश्चिमी मीडिया संस्थान, डिजिटल प्रोपेगेंडा प्लेटफॉर्म और भारत के भीतर सक्रिय शहरी वामपंथी समूह शामिल हैं।

यदि यह आंदोलन वास्तव में NEET पेपर लीक और छात्रों के भविष्य के लिए था, तो फिर मंच से उमर खालिद और शरजील इमाम की रिहाई की मांग क्यों उठ रही थी? आखिर छात्रों के आंदोलन में UAPA के तहत जेल में बंद लोगों को “लोकतंत्र का नायक” क्यों बताया जा रहा था?

यह वही शरजील इमाम है जिसने “चिकन नेक” काटने की बात कही थी। उसने खुले मंच से कहा था कि यदि भारत के उत्तर-पूर्व को देश से अलग करना हो तो सिलिगुड़ी कॉरिडोर अर्थात “चिकन नेक” को अवरुद्ध करना होगा। यह केवल विवादित बयान नहीं था, बल्कि भारत की संप्रभुता और अखंडता को सीधी चुनौती थी।

उमर खालिद का नाम भी जेएनयू विवाद, “भारत तेरे टुकड़े होंगे” जैसे नारों और दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों में लगातार सामने आता रहा है। दोनों लंबे समय से UAPA के तहत जेल में हैं। ऐसे लोगों की रिहाई की मांग उस आंदोलन में क्यों उठ रही थी जिसे छात्रों के भविष्य के लिए आयोजित बताया गया? यही वह बिंदु है जहाँ यह आंदोलन छात्रों के मुद्दे से हटकर वैचारिक और राजनीतिक एजेंडे का मंच बन जाता है।

6 जून के प्रदर्शन से वायरल एक वीडियो में एक युवक खुलकर कहता दिखाई दिया कि “भारत के सात टुकड़े होने चाहिए।” यह कोई आकस्मिक बयान नहीं था। यह वही मानसिकता है जो पिछले कई वर्षों से हर बड़े आंदोलन में किसी न किसी रूप में सामने आती रही है। आखिर हर आंदोलन में “भारत तेरे टुकड़े होंगे” जैसी सोच क्यों दिखाई देती है? इसका उत्तर भारत में वामपंथी राजनीति के इतिहास में छिपा हुआ है।

बहुत कम लोग जानते हैं कि 1945 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया ने मुस्लिम लीग के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया था जिसमें भारत को 14 राष्ट्रीयताओं में विभाजित करने की अवधारणा रखी गई थी। यह वही समय था जब मुस्लिम लीग पाकिस्तान की मांग कर रही थी। कम्युनिस्ट नेतृत्व उस समय “राष्ट्रीयताओं के आत्मनिर्णय” के सिद्धांत के नाम पर भारत के विभाजनकारी मॉडल का समर्थन कर रहा था। इसके बाद 1956 में कम्युनिस्ट पार्टी ने अलग सिख राज्य के समर्थन में भी प्रस्ताव पारित किया। इतिहास के ये तथ्य आज सार्वजनिक विमर्श से लगभग गायब कर दिए गए हैं, लेकिन भारत विरोधी अलगाववादी राजनीति और वामपंथी वैचारिक समर्थन का संबंध नया नहीं है।

इसी वैचारिक पृष्ठभूमि को समझे बिना “भारत तेरे टुकड़े होंगे” जैसे नारों को नहीं समझा जा सकता। विश्वविद्यालयों, एक्टिविस्ट समूहों और तथाकथित सांस्कृतिक संगठनों के माध्यम से वर्षों से यह नैरेटिव बनाया गया कि भारत एक “दमनकारी राष्ट्र संरचना” है जिसे तोड़ना आवश्यक है। यही कारण है कि हर आंदोलन में राष्ट्र, सेना, हिंदू परंपरा, पुलिस और भारतीय राज्य व्यवस्था को निशाना बनाया जाता है।

दिल्ली दंगों की सबसे मार्मिक और विचलित करने वाली तस्वीरों में से एक आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की थी, जिनका शव बाद में नाले से बरामद हुआ था। उनकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट में शरीर पर 51 से अधिक चोटों का उल्लेख सामने आया था। फरवरी 2020 में हुए उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों में कुल 66 लोगों की मृत्यु हुई थी। हेड कांस्टेबल रतन लाल शहीद हुए थे, जबकि डीसीपी अमित शर्मा गंभीर रूप से घायल हुए थे। कई स्थानों पर पहले से पत्थर, पेट्रोल बम, एसिड पाउच और हथियार जमा पाए गए थे। बहुमंजिला इमारतों की छतों से हमले हुए थे, बड़ी गुलेलों और स्लिंगशॉट का प्रयोग किया गया था।

इसी कारण 6 जून 2026 को जंतर-मंतर में आयोजित “काकरोच जनता पार्टी” आंदोलन के दौरान जब दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम के समर्थन में नारे लगाए गए तथा उनकी रिहाई की मांग उठी, तो इसने पूरे आंदोलन की वास्तविक दिशा को उजागर कर दिया। दोनों लंबे समय से यूएपीए के तहत जेल में बंद रहे हैं। शरजील इमाम वही व्यक्ति है जिसने “चिकन नेक” को काटकर उत्तर-पूर्व को भारत से अलग करने जैसी बातें कही थीं। वहीं उमर खालिद का नाम जेएनयू विवाद, “भारत तेरे टुकड़े होंगे” जैसे नारों और दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों में लगातार सामने आता रहा है।

6 जून के प्रदर्शन में LGBTQ झंडे, डफली गैंग, वामपंथी पोस्टर और वही परिचित एक्टिविस्ट समूह दिखाई दिए, जो पिछले कई वर्षों से लगभग हर सरकार विरोधी आंदोलन में सक्रिय रहे हैं। इस आंदोलन को केवल एक स्वतःस्फूर्त छात्र प्रदर्शन बताना इसलिए भी कठिन है क्योंकि इसके पीछे संगठित राजनीतिक और वैचारिक समर्थन स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था।

अभिजीत दीपके के दिल्ली पहुँचने के बाद वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेता बृंदा करात से उनकी बातचीत की चर्चा सामने आई थी। इसके बाद वामपंथी हलकों से इस आंदोलन को खुला वैचारिक समर्थन मिलने लगा। यही नहीं, राजद नेता प्रोफेसर मनोज झा द्वारा कॉकरोच जनता पार्टी के तीन प्रवक्ताओं के लिए कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कराने हेतु पत्र लिखे जाने की बात भी सामने आई। यह सामान्य घटना नहीं थी। किसी नए सोशल मीडिया आधारित समूह को इतनी जल्दी स्थापित राजनीतिक दलों और वैचारिक नेटवर्क का समर्थन मिलना यह दर्शाता है कि यह केवल सोशल मीडिया पर अचानक उभरा युवा आंदोलन नहीं था, बल्कि उसके पीछे पहले से सक्रिय राजनीतिक और वैचारिक संरचना कार्य कर रही थी।

आज दुनिया में सक्रिय वामपंथी-उदारवादी नेटवर्क केवल अपने देशों तक सीमित नहीं हैं। NGOs, डिजिटल प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया नेटवर्क, मानवाधिकार समूह और अंतरराष्ट्रीय मीडिया मिलकर अलग-अलग देशों में सरकार विरोधी नैरेटिव तैयार करते हैं। भारत में भी पिछले कई वर्षों से यही मॉडल दिखाई देता है। शाहीन बाग, सीएए विरोध, किसान आंदोलन और अब “काकरोच जनता पार्टी” हर जगह वही वैचारिक संरचना दिखाई देती है।

भारत में स्थिर और राष्ट्रवादी सरकारों से इस पूरे नेटवर्क को समस्या इसलिए है क्योंकि एक मजबूत भारत उनकी वैचारिक राजनीति के विपरीत खड़ा होता है। राम मंदिर, सनातन चेतना, सांस्कृतिक पुनर्जागरण, राष्ट्रीय अस्मिता और मजबूत नेतृत्व ये सभी उस वैश्विक वामपंथी राजनीति के लिए चुनौती हैं जो राष्ट्र और सभ्यता आधारित पहचान को कमजोर करना चाहती है।

इसलिए 6 जून का जंतर-मंतर प्रदर्शन केवल एक धरना नहीं था। यह उस लंबे वैचारिक संघर्ष की एक और कड़ी था जिसमें छात्रों के मुद्दों को आगे रखकर भारत विरोधी राजनीति को स्थापित करने का प्रयास किया गया। वहाँ उमर खालिद और शरजील इमाम के समर्थन की मांग थी। वहाँ भारत के सात टुकड़े करने की बातें थीं। वहाँ डफली गैंग और वामपंथी एक्टिविज्म था। वहाँ AI आधारित मीडिया नैरेटिव था। वहाँ अंतरराष्ट्रीय मीडिया की असामान्य सक्रियता थी। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि यह सब एक बार फिर उसी पुराने वैचारिक ढांचे के भीतर हो रहा था, जो भारत को भीतर से अस्थिर करने का प्रयास करता है।

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