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डॉलर के साम्राज्य में घुटता रुपया

डॉलर के साम्राज्य में घुटता रुपया

✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

आज जब सामान्य नागरिक समाचारों में यह सुनता है कि “एक डॉलर की कीमत 95 रुपये से अधिक हो गई”, तब उसके मन में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्या भारतीय रुपया इतना कमजोर हो गया है? क्या कभी ऐसा समय आ सकता है जब एक डॉलर और एक रुपया बराबर हो जाएँ? यदि नहीं, तो क्यों? गिरते रुपये से आम आदमी पर क्या प्रभाव पड़ता है? सरकार इसे रोकने के लिए क्या कर रही है? और क्या भविष्य में दुनिया फिर से सोना आधारित मुद्रा व्यवस्था अर्थात “गोल्ड स्टैंडर्ड” की ओर लौट सकती है?

इन प्रश्नों को समझे बिना वर्तमान वैश्विक अर्थव्यवस्था को समझना कठिन है। क्योंकि आज केवल भारत ही नहीं, बल्कि लगभग पूरी दुनिया डॉलर आधारित आर्थिक व्यवस्था के प्रभाव में जी रही है।

मानव सभ्यता के प्रारंभिक काल में मुद्रा जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी। उस समय वस्तु विनिमय प्रणाली प्रचलित थी। यदि किसी किसान के पास गेहूँ है और उसे कपड़ा चाहिए, तो वह गेहूँ देकर कपड़ा प्राप्त करता था। धीरे-धीरे यह व्यवस्था कठिन होने लगी, क्योंकि प्रत्येक वस्तु का मूल्य अलग था। इसके बाद धातुओं के सिक्के आए। सोना, चाँदी और ताँबा वास्तविक संपत्ति माने जाते थे। बाद में कागज़ी मुद्रा आई और आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था विकसित हुई।

एक समय भारतीय रुपया केवल भारत तक सीमित मुद्रा नहीं था। ब्रिटिश काल में पूर्वी अफ्रीका, खाड़ी देशों और दक्षिण एशिया के अनेक क्षेत्रों में भारतीय रुपया प्रचलित था। उस समय भारत विश्व व्यापार का बड़ा केंद्र था। किंतु द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका आर्थिक और सैन्य दृष्टि से सबसे शक्तिशाली देश बनकर उभरा और यहीं से डॉलर का वैश्विक वर्चस्व प्रारंभ हुआ।

1944 में ब्रेटन वुड्स समझौते के अंतर्गत विश्व की आर्थिक व्यवस्था बनाई गई। अमेरिका ने घोषणा की कि उसका डॉलर सोने से जुड़ा रहेगा। उस समय 35 डॉलर के बदले एक औंस सोना देने की गारंटी थी। दुनिया की अन्य मुद्राओं को डॉलर से जोड़ा गया। इस कारण डॉलर पर वैश्विक विश्वास बढ़ा। किंतु 1971 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने डॉलर को सोने से अलग कर दिया। इसके बाद दुनिया पूरी तरह “फ़िएट करेंसी” व्यवस्था में प्रवेश कर गई। अर्थात अब मुद्रा का मूल्य किसी वास्तविक संपत्ति पर नहीं, बल्कि सरकार और केंद्रीय बैंक के भरोसे पर आधारित हो गया।

यहीं से डॉलर का असली वैश्विक साम्राज्य प्रारंभ हुआ। अमेरिका ने तेल उत्पादक देशों, विशेषकर सऊदी अरब के साथ समझौते किए कि दुनिया में तेल का व्यापार केवल डॉलर में होगा। इसे “पेट्रो डॉलर” व्यवस्था कहा गया। परिणाम यह हुआ कि दुनिया के प्रत्येक देश को तेल खरीदने के लिए डॉलर की आवश्यकता पड़ने लगी। चाहे भारत हो, चीन हो या जापान सभी को तेल खरीदने के लिए डॉलर चाहिए। यहीं से डॉलर विश्व की सबसे शक्तिशाली मुद्रा बन गया।

भारत जैसे देशों के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का लगभग 85 प्रतिशत तेल आयात करता है। जब तेल महँगा होता है, तब भारत को अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। यही कारण है कि पश्चिम एशिया में कोई भी तनाव सीधे भारतीय रुपये को प्रभावित करता है।

वर्तमान समय में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव तथा होरमुज़ जलडमरूमध्य में पैदा हुए संकट ने वैश्विक तेल बाज़ार को प्रभावित किया। होरमुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल व्यापार का प्रमुख समुद्री मार्ग है। ईरान द्वारा इस मार्ग पर दबाव बढ़ने से तेल आपूर्ति को लेकर भय पैदा हुआ और कच्चे तेल की कीमतें तेज़ी से बढ़ीं। तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुँच गया। इसका सीधा प्रभाव भारत पर पड़ा, क्योंकि भारत को अधिक महँगे दामों पर तेल खरीदना पड़ा और इसके लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़े।

यहीं से रुपये पर दबाव बढ़ता है। इसे एक बहुत सरल उदाहरण से समझिए। मान लीजिए किसी गाँव में पानी केवल एक कुएँ से मिलता है और पूरा गाँव उसी पर निर्भर है। यदि पानी की माँग बढ़ जाए और उपलब्धता कम हो जाए, तो पानी का महत्व बढ़ जाएगा। ठीक इसी प्रकार पूरी दुनिया तेल खरीदने के लिए डॉलर चाहती है। जब डॉलर की माँग बढ़ती है, तो डॉलर महँगा होता है और रुपया कमजोर होता जाता है।

रुपये के गिरने का एक दूसरा बड़ा कारण विदेशी निवेशकों की निकासी है। पिछले कुछ वर्षों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाज़ार से अरबों डॉलर निकाले हैं। जब विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बेचकर बाहर जाते हैं, तब वे अपना पैसा डॉलर में बदलते हैं। इससे डॉलर की माँग और बढ़ जाती है। रिपोर्टों के अनुसार पश्चिम एशिया संकट बढ़ने के बाद विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाज़ार से लगभग 20 अरब डॉलर से अधिक निकाले।

यहाँ एक रोचक लेकिन गंभीर आर्थिक स्थिति भी बनती है। भारत में पिछले कुछ वर्षों में SIP और म्यूचुअल फ़ंड में निवेश बहुत बढ़ा है। हर महीने लाखों भारतीय नियमित रूप से म्यूचुअल फ़ंड में पैसा डाल रहे हैं। यही पैसा शेयर बाज़ार को गिरने से बचा रहा है। किंतु कई अर्थविशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारतीय जनता का यही पैसा विदेशी निवेशकों को ऊँचे दामों पर शेयर बेचकर बाहर निकलने का अवसर दे रहा है। अर्थात एक प्रकार से भारतीयों का रुपया ही अप्रत्यक्ष रूप से रुपये की कमजोरी में योगदान दे रहा है।

अब सबसे बड़ा प्रश्न क्या एक डॉलर और एक रुपया बराबर हो सकते हैं?

सैद्धांतिक रूप से कुछ भी संभव कहा जा सकता है, किंतु व्यवहारिक रूप से यह अत्यंत कठिन है। मुद्रा का मूल्य केवल नोट छापने से तय नहीं होता। यह उस देश की उत्पादन क्षमता, वैश्विक व्यापार, तकनीकी शक्ति, सैन्य प्रभाव, विदेशी निवेश और अंतरराष्ट्रीय विश्वास पर निर्भर करता है। अमेरिका विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। विश्व व्यापार का बड़ा भाग डॉलर में होता है। दुनिया का तेल डॉलर में बिकता है। अंतरराष्ट्रीय ऋण डॉलर में दिए जाते हैं। इसलिए डॉलर की माँग हमेशा बनी रहती है।

इसे एक साधारण उदाहरण से समझिए। यदि किसी शहर में दो व्यापारी हों और उनमें से एक का व्यापार पूरी दुनिया में फैला हो, जबकि दूसरे का व्यापार केवल स्थानीय बाजार तक सीमित हो, तो स्वाभाविक रूप से पहले व्यापारी की मुद्रा अधिक मूल्यवान मानी जाएगी। यही स्थिति डॉलर और रुपये के बीच है।

भारत ने भी कई बार अपनी मुद्रा का अवमूल्यन किया है। 1966 में भारत ने पहली बार बड़े स्तर पर रुपये का अवमूल्यन किया। उस समय एक डॉलर लगभग 4.76 रुपये का था, जिसे घटाकर लगभग 7.50 रुपये के आसपास कर दिया गया। इसके बाद 1991 में आर्थिक संकट के समय भारत के पास केवल कुछ सप्ताह का विदेशी मुद्रा भंडार बचा था। तब तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार ने रुपये का अवमूल्यन किया। इसका उद्देश्य निर्यात बढ़ाना और विदेशी निवेश आकर्षित करना था।

सरकारें कभी-कभी अपनी मुद्रा को जानबूझकर कमजोर होने देती हैं, क्योंकि कमजोर मुद्रा से निर्यात सस्ता हो जाता है। उदाहरण के लिए यदि भारतीय वस्तुएँ डॉलर के मुकाबले सस्ती होंगी, तो विदेशी देश भारत से अधिक खरीदेंगे। चीन ने भी वर्षों तक इसी रणनीति का उपयोग किया। किंतु अत्यधिक कमजोर मुद्रा आयात को महँगा बना देती है। इसलिए संतुलन आवश्यक होता है।

आज गिरते रुपये का सबसे बड़ा प्रभाव आम आदमी पर पड़ रहा है। पेट्रोल-डीज़ल महँगा होता है। परिवहन महँगा होता है। खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ती हैं। विदेशों में पढ़ाई करने वाले छात्रों का खर्च लाखों रुपये बढ़ जाता है। छोटे उद्योग, जो आयातित कच्चे माल पर निर्भर हैं, वे भारी संकट में आ जाते हैं।

भारत सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक रुपये को स्थिर रखने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार वर्तमान में लगभग 697 अरब डॉलर के आसपास है। रिज़र्व बैंक बाजार में डॉलर बेचकर रुपये को अत्यधिक गिरने से रोकने का प्रयास कर रहा है। सरकार निर्यात बढ़ाने, घरेलू उत्पादन को मजबूत करने और आयात कम करने की दिशा में कार्य कर रही है।

“मेक इन इंडिया”, “आत्मनिर्भर भारत”, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाएँ, हरित ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन और जैव ईंधन जैसी योजनाओं का उद्देश्य केवल विकास नहीं, बल्कि डॉलर पर निर्भरता कम करना भी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा तेल की बचत और सोने की अनावश्यक खरीद कम करने की अपील भी इसी आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। भारत विश्व के सबसे बड़े सोना आयातक देशों में है। जब भारत अधिक सोना खरीदता है, तब उसके लिए भी भारी मात्रा में डॉलर खर्च करने पड़ते हैं।

इसी बीच दुनिया में “डीडॉलराइजेशन” अर्थात डॉलर पर निर्भरता कम करने की चर्चा तेज़ हो रही है। रूस पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों और उसके लगभग 300 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार को फ्रीज़ किए जाने के बाद अनेक देशों को यह भय हुआ कि यदि भविष्य में उनके साथ भी ऐसा हुआ तो क्या होगा? यही कारण है कि चीन, रूस और कई अन्य देश स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ा रहे हैं।

भारत भी इस दिशा में आगे बढ़ रहा है। यूपीआई जैसी भारतीय डिजिटल भुगतान प्रणाली अब नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मॉरीशस, सिंगापुर, फ्रांस और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों तक पहुँच चुकी है। यह केवल डिजिटल भुगतान नहीं, बल्कि भारतीय वित्तीय व्यवस्था की वैश्विक स्वीकार्यता का संकेत है।

अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न — क्या दुनिया फिर से गोल्ड स्टैंडर्ड की ओर लौट सकती है?

आज दुनिया में यह चर्चा इसलिए बढ़ रही है क्योंकि फ़िएट करेंसी व्यवस्था ने भारी ऋण, मुद्रास्फीति और आर्थिक असंतुलन पैदा किया है। अमेरिका लगातार डॉलर छाप सकता है, क्योंकि डॉलर विश्व मुद्रा है। किंतु विकासशील देशों के पास यह सुविधा नहीं है। यही कारण है कि अमेरिका का कर्ज़ 36 ट्रिलियन डॉलर से अधिक होने के बावजूद डॉलर मजबूत बना हुआ है।

यदि दुनिया फिर से स्वर्ण आधारित मुद्रा व्यवस्था की ओर लौटती है, तो मुद्रा छपाई पर नियंत्रण लगेगा। सरकारें असीमित नोट नहीं छाप पाएँगी। मुद्रास्फीति सीमित होगी। वैश्विक व्यापार अधिक संतुलित हो सकता है। अमेरिका का एकाधिकार कम हो सकता है। विशेष रूप से भारत और चीन जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों के लिए यह व्यवस्था अधिक स्थिर सिद्ध हो सकती है।

आज अमेरिका के पास लगभग 8,133 टन सोना है। जर्मनी के पास 3,300 टन से अधिक, इटली और फ्रांस के पास लगभग 2,400 टन तथा रूस और चीन लगातार सोना खरीद रहे हैं। भारत के पास लगभग 880 टन स्वर्ण भंडार है। यही कारण है कि अब अनेक विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को अपने स्वर्ण भंडार में बड़ी वृद्धि करनी चाहिए।

भारतीय परंपरा में सोना और चाँदी केवल आभूषण नहीं माने गए, बल्कि संकट के समय आर्थिक सुरक्षा का आधार समझे गए। यही कारण है कि आज भी भारतीय परिवार अपनी बचत का एक भाग सोने-चाँदी में सुरक्षित रखना उचित मानते हैं। अनुमान है कि भारतीय घरों और मंदिरों में लगभग 25 से 30 हज़ार टन सोना मौजूद है। यह केवल सांस्कृतिक परंपरा नहीं, बल्कि पीढ़ियों के अनुभव से विकसित आर्थिक व्यवहार है। लोगों ने समय के साथ यह देखा कि सत्ता बदली, सरकारें बदलीं, कागज़ी मुद्राओं का मूल्य घटा-बढ़ा, लेकिन सोने और चाँदी का महत्व बना रहा। इसी कारण भारतीय समाज ने इन्हें केवल आभूषण नहीं, बल्कि स्थायी संपत्ति और भविष्य की सुरक्षा के रूप में देखा।

दरअसल आज का पूरा आर्थिक संघर्ष केवल रुपये और डॉलर के बीच का संघर्ष नहीं है। यह उस वैश्विक व्यवस्था का परिणाम है जिसमें दुनिया का अधिकांश व्यापार, तेल खरीद और अंतरराष्ट्रीय भुगतान एक ही मुद्रा डॉलर पर आधारित हो चुका है। ऐसी स्थिति में अमेरिका की आर्थिक नीतियों, युद्धों, प्रतिबंधों और डॉलर की उपलब्धता का प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ता है। भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति इसलिए और चुनौतीपूर्ण हो जाती है क्योंकि हमें ऊर्जा, तकनीक और कई आवश्यक वस्तुओं के लिए भारी मात्रा में आयात करना पड़ता है।

जब तक भारत उत्पादन, तकनीकी क्षमता, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और निर्यात शक्ति में पर्याप्त वृद्धि नहीं करेगा, तब तक रुपये पर दबाव बना रह सकता है। केवल रिज़र्व बैंक द्वारा डॉलर बेच देने या सरकारी घोषणाओं से रुपया स्थायी रूप से मजबूत नहीं होता। मुद्रा की वास्तविक शक्ति उस देश की अर्थव्यवस्था, उत्पादन क्षमता, व्यापारिक संतुलन और वैश्विक विश्वास से तय होती है। इसलिए आने वाले समय में भारत के सामने सबसे बड़ी आवश्यकता यही होगी कि वह आयात आधारित अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर उत्पादन आधारित और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की दिशा में तेजी से आगे बढ़े। तभी रुपया भी स्थिर और मजबूत आधार प्राप्त कर सकेगा।

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