सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

भाग–6 धर्माधारित समाज की संरचना : सनातन सभ्यता की जीवंत सामाजिक व्यवस्था और उसकी निरंतरता


विश्व के इतिहास में अनेक ऐसे साम्राज्य हुए जिन्होंने विशाल भूभागों पर शासन किया, विशाल सेनाएँ खड़ी कीं, भव्य नगर बसाए और अपने समय में अपार शक्ति का प्रदर्शन किया, किन्तु राजनीतिक सत्ता समाप्त होते ही उनकी सांस्कृतिक पहचान भी धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सीमित होकर रह गई। इसके विपरीत भारतीय सभ्यता की विशेषता यह है कि उसने अपनी निरंतरता का आधार राज्य को नहीं, समाज को बनाया। राजवंश बदले, सीमाएँ बदलीं, भाषाएँ बदलीं, राजनीतिक व्यवस्थाएँ बदलीं, किन्तु समाज का मूल जीवनक्रम चलता रहा। यही सनातन व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता है।

भारतीय समाज का संगठन किसी एक केन्द्रीय संस्था के अधीन नहीं था। उसका निर्माण अनेक परस्पर सम्बद्ध इकाइयों से हुआ। परिवार, कुल, गोत्र, ग्राम, जनपद, आश्रम, तीर्थ, मंदिर, मठ, गुरुकुल, उत्सव, संस्कार और लोकाचार—ये सभी मिलकर समाज की ऐसी संरचना बनाते थे जिसमें प्रत्येक संस्था दूसरी संस्था को शक्ति प्रदान करती थी। किसी एक व्यवस्था के दुर्बल होने पर भी सम्पूर्ण समाज समाप्त नहीं होता था, क्योंकि उसके संरक्षण के अनेक केन्द्र विद्यमान रहते थे।

परिवार इस व्यवस्था की प्रथम इकाई था। जन्म से लेकर अन्त्येष्टि तक मनुष्य केवल जैविक रूप से नहीं, बल्कि संस्कारों के माध्यम से समाज से जुड़ता था। नामकरण, अन्नप्राशन, उपनयन, विवाह, श्राद्ध और विविध संस्कार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं थे; वे व्यक्ति को समाज, पूर्वजों और आने वाली पीढ़ियों से जोड़ने वाली सांस्कृतिक कड़ियाँ थे। इस प्रकार समाज का निर्माण किसी संवैधानिक अनुबंध से नहीं, बल्कि संस्कारों की निरन्तरता से होता था।

गोत्र और कुल व्यवस्था का उद्देश्य केवल वंश का परिचय देना नहीं था। वे स्मृति, उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक अनुशासन के माध्यम थे। प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को किसी परम्परा का उत्तराधिकारी मानता था और उसी के अनुरूप अपने आचरण को मर्यादित रखने का प्रयास करता था। इसी कारण सामाजिक जीवन में व्यक्तिगत स्वच्छन्दता की अपेक्षा सामूहिक उत्तरदायित्व को अधिक महत्व प्राप्त हुआ।

ग्राम भारतीय समाज की वास्तविक शक्ति था। ग्राम केवल कृषि उत्पादन की इकाई नहीं था, बल्कि स्वशासन, न्याय, सहयोग और लोकजीवन का केन्द्र था। जलाशयों का निर्माण, देवस्थानों का संरक्षण, गौचर भूमि की व्यवस्था, उत्सवों का आयोजन और सामाजिक विवादों का समाधान स्थानीय स्तर पर ही सम्पन्न होता था। यही कारण है कि राजनीतिक उथल-पुथल के समय भी ग्रामजीवन अपनी गति से चलता रहा।

मंदिरों ने भी भारतीय समाज में केवल उपासना का कार्य नहीं किया। अनेक क्षेत्रों में वे शिक्षा, कला, संगीत, नृत्य, दान, अन्नक्षेत्र, चिकित्सा और सामाजिक संगठन के केन्द्र बने। तीर्थों ने भारत के विविध प्रदेशों को सांस्कृतिक सूत्र में बाँधा। उत्तर का यात्री दक्षिण जाता था, दक्षिण का साधक हिमालय पहुँचता था, पूर्व का भक्त पश्चिम के तीर्थों में जाता था। इस सतत् आवागमन ने भारत की सांस्कृतिक एकता को राजनीतिक सीमाओं से कहीं अधिक मजबूत बनाया।

भारतीय उत्सव भी सामाजिक संगठन के साधन रहे। दीपावली, होली, नवरात्र, मकर संक्रान्ति, रथयात्रा, पोंगल, बिहू, ओणम, जन्माष्टमी, रामनवमी और अनगिनत स्थानीय पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामुदायिक सहभागिता के अवसर हैं। इन उत्सवों में परिवार, समाज, व्यापार, कृषि, कला और धर्म एक साथ उपस्थित होते हैं। यही कारण है कि भारतीय समाज की सांस्कृतिक स्मृति केवल ग्रन्थों में नहीं, बल्कि लोकजीवन में सुरक्षित रही।

आश्रम व्यवस्था ने जीवन को क्रमबद्ध किया। ब्रह्मचर्य ने शिक्षा और अनुशासन का संस्कार दिया, गृहस्थाश्रम ने उत्पादन और समाज-पालन का दायित्व निभाया, वानप्रस्थ ने अनुभव को समाज को समर्पित किया और संन्यास ने जीवन को आत्मचिन्तन की दिशा दी। इस प्रकार प्रत्येक अवस्था का समाज में निश्चित स्थान था और प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी रूप में लोककल्याण से जुड़ा रहता था।

पुरुषार्थ व्यवस्था ने भी भारतीय समाज को संतुलित बनाया। अर्थ का अर्जन आवश्यक माना गया, किन्तु उसे धर्म से पृथक नहीं किया गया। काम का स्वीकार किया गया, किन्तु उसे मर्यादा में रखा गया। मोक्ष को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य मानकर यह स्पष्ट किया गया कि भौतिक उपलब्धियाँ ही मनुष्य की अंतिम पहचान नहीं हैं। यही संतुलन सामाजिक जीवन में संयम और उत्तरदायित्व की भावना उत्पन्न करता रहा।

भारतीय समाज की एक अन्य विशेषता उसकी विकेन्द्रीकृत संरचना रही। ज्ञान का केन्द्र केवल एक नगर नहीं था, साधना का केन्द्र केवल एक तीर्थ नहीं था और सांस्कृतिक अधिकार केवल एक संस्था के पास नहीं था। परिणामस्वरूप जब किसी क्षेत्र पर संकट आया तब भी अन्य क्षेत्रों में परम्परा जीवित रही। इसी कारण अनेक ऐतिहासिक परिवर्तनों और आक्रमणों के बावजूद भारतीय सांस्कृतिक जीवन की निरन्तरता बनी रही।

लोक परम्पराओं ने भी इस व्यवस्था को गहराई प्रदान की। लोकगीतों में राम और कृष्ण जीवित रहे, लोककथाओं में महाभारत जीवित रहा, ग्रामदेवताओं की पूजा में स्थानीय इतिहास सुरक्षित रहा, तीर्थयात्राओं में सांस्कृतिक स्मृति संरक्षित रही और घर-घर में सुनाई जाने वाली कथाओं ने अगली पीढ़ियों तक परम्परा का संचार किया। इस प्रकार भारतीय समाज का संरक्षण केवल विद्वानों ने नहीं, बल्कि सामान्य गृहस्थ, किसान, कारीगर, साधु, स्त्रियों, परिवारों और लोकसमुदाय ने मिलकर किया।

इसी सामाजिक संरचना के कारण भारतीय सभ्यता का अस्तित्व किसी एक राजसत्ता पर निर्भर नहीं रहा। सत्ता बदलती रही, किन्तु समाज चलता रहा; शासक बदलते रहे, किन्तु संस्कार बने रहे; भाषाएँ बदलती रहीं, किन्तु सांस्कृतिक सूत्र नहीं टूटा। यही उसकी स्थायित्व-शक्ति है।

अतः सनातन समाज की वास्तविक पहचान केवल उसके दार्शनिक ग्रन्थों में नहीं, बल्कि उसकी जीवंत सामाजिक संस्थाओं में भी निहित है। परिवार से लेकर तीर्थ तक, ग्राम से लेकर मठ तक, संस्कार से लेकर उत्सव तक और लोकाचार से लेकर पुरुषार्थ तक—इन सबका समन्वय एक ऐसी सभ्यता का निर्माण करता है जो स्वयं को निरन्तर पुनर्जीवित करने की क्षमता रखती है। यही उसकी सामाजिक संरचना की मौलिक विशेषता है और यही उसकी सांस्कृतिक निरन्तरता का आधार भी।

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