- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
भारतीय दर्शन का इतिहास केवल विचारों का इतिहास नहीं है, बल्कि आत्मबोध की अखण्ड यात्रा का इतिहास है। वैदिक ऋचाओं से प्रारम्भ होकर उपनिषदों में विकसित हुई ब्रह्मविद्या अनेक दार्शनिक धाराओं से होकर प्रवाहित होती रही। समय के साथ विभिन्न मतों का उदय हुआ, अनेक आचार्यों ने अपने-अपने सिद्धान्त प्रतिपादित किए और व्यापक शास्त्रार्थों की परम्परा विकसित हुई। इसी बौद्धिक परिवेश में आदि शंकराचार्य का अवतरण भारतीय चिन्तन के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ के रूप में दिखाई देता है।
अल्पायु में सम्पूर्ण भारत का परिभ्रमण करने वाले शंकराचार्य ने केवल दार्शनिक मत की स्थापना नहीं की, बल्कि एक विखण्डित होती हुई ज्ञान-परम्परा को पुनः संगठित करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने विभिन्न मठों, परम्पराओं, संन्यास-व्यवस्थाओं और वेदान्तीय अध्ययन को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया। उत्तर में ज्योतिर्मठ, दक्षिण में श्रृंगेरी, पूर्व में गोवर्धन पीठ और पश्चिम में शारदा पीठ की स्थापना केवल धार्मिक केन्द्रों की स्थापना नहीं थी; यह भारतीय ज्ञान-परम्परा को चारों दिशाओं में स्थायी आधार प्रदान करने का सांस्कृतिक प्रयास था।
अद्वैत वेदान्त का मूल प्रतिपादन अत्यन्त सरल किन्तु गहन है। ब्रह्म ही परम सत्य है, जगत उसी का विविध रूप में अनुभव है और जीव अपने वास्तविक स्वरूप में उसी ब्रह्म से अभिन्न है। अविद्या के कारण मनुष्य अपने को सीमित शरीर, मन और अहंकार के रूप में अनुभव करता है, जबकि ज्ञान उसे उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराता है। इसीलिए अद्वैत का लक्ष्य किसी बाह्य विजय की प्राप्ति नहीं, बल्कि आत्मस्वरूप की पहचान है।
निर्वाणषट्कम् इस दर्शन का अत्यन्त सघन और काव्यमय रूप है। प्रथम श्लोक में आचार्य कहते हैं—
मनो बुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहम्।
न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे।
न च व्योमभूमिर्न तेजो न वायुः।
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥
यहाँ मनुष्य अपने समस्त उपाधियों का क्रमशः अतिक्रमण करता है। वह कहता है कि मैं मन नहीं हूँ, बुद्धि नहीं हूँ, अहंकार नहीं हूँ, इन्द्रियाँ नहीं हूँ और पंचमहाभूतों का मात्र समूह भी नहीं हूँ। मेरा वास्तविक स्वरूप चैतन्य और आनन्द है।
दूसरे श्लोक में प्राण, सप्तधातु, पञ्चकोश और कर्मेन्द्रियों का निषेध करते हुए आत्मा को उनसे परे स्थापित किया गया है। यह संकेत करता है कि जीवन का वास्तविक आधार जैविक संरचना नहीं, बल्कि चेतन सत्ता है। भारतीय दर्शन में मनुष्य का मूल्य केवल शरीर की सक्रियता से नहीं, आत्मा की अनुभूति से निर्धारित होता है।
तीसरे श्लोक में द्वेष, राग, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य का निषेध है। यह केवल आध्यात्मिक शिक्षा नहीं, बल्कि सामाजिक शिक्षा भी है। जिस समाज का आदर्श इन दोषों से मुक्त मनुष्य हो, वहाँ स्थायी वैमनस्य, संग्रह और अहंकार को आदर्श नहीं बनाया जा सकता। इस दृष्टि से निर्वाणषट्कम् केवल संन्यासियों का स्तोत्र नहीं, बल्कि आत्मानुशासन का सार्वकालिक घोष है।
चौथे श्लोक में पुण्य-पाप, सुख-दुःख, मन्त्र, तीर्थ, वेद और यज्ञ तक का अतिक्रमण दिखाई देता है। इसका आशय इनका निषेध नहीं, बल्कि यह है कि आत्मा का स्वरूप इन सब सीमाओं से परे है। साधन आवश्यक हैं, किन्तु साध्य उनसे भी व्यापक है। यही अद्वैत का दार्शनिक उत्कर्ष है।
पाँचवें श्लोक का विशेष महत्त्व है—
न मृत्युर् न शंका न मे जातिभेदः।
पिता नैव मे नैव माता न जन्म।
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः।
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥
यहाँ आत्मा के स्तर पर जाति, जन्म, कुल, परिवार और सामाजिक परिचय सभी गौण हो जाते हैं। आत्मा का स्वरूप इन सब उपाधियों से परे है। इसीलिए अद्वैत वेदान्त मनुष्य को उसके मूल स्वरूप में देखने की प्रेरणा देता है। सामाजिक व्यवहार में विविध भूमिकाएँ हो सकती हैं, किन्तु आत्मदृष्टि में समस्त भेद विलीन हो जाते हैं।
अन्तिम श्लोक में आचार्य कहते हैं कि आत्मा निर्विकल्प है, निराकार है और सर्वत्र व्याप्त है। वह न बन्धन है, न मुक्ति का विषय; वह तो स्वयं स्वाभाविक पूर्णता है। इस प्रकार अद्वैत का लक्ष्य किसी नए सत्य की रचना नहीं, बल्कि उस सत्य का स्मरण है जो सदा से विद्यमान है।
इसी दार्शनिक आधार पर भारतीय संस्कृति में अनेक भिन्न उपासना-पद्धतियाँ साथ-साथ विकसित हुईं। शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य, गणपति, स्कन्द अथवा अन्य देवताओं की आराधना अन्ततः उसी परम तत्त्व की विविध प्रतीकात्मक अभिव्यक्तियाँ मानी गईं। इसलिए विविधता को विरोध नहीं, बल्कि एक ही सत्य की अनेक अभिव्यक्तियों के रूप में देखने की परम्परा विकसित हुई।
आदि शंकराचार्य का योगदान केवल दार्शनिक नहीं, सांस्कृतिक भी है। उन्होंने तीर्थों को जोड़ा, मठों को संगठित किया, शास्त्रार्थ की परम्परा को पुनर्जीवित किया, वेदाध्ययन को नई ऊर्जा दी और भारत के सांस्कृतिक भूगोल को एक दार्शनिक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया। उनके लिए भारत केवल राजनीतिक इकाई नहीं, बल्कि ब्रह्मविद्या की भूमि था।
"शिवोऽहम्" का उद्घोष अहंकार का नहीं, अहंकार के विसर्जन का उद्घोष है। इसका अर्थ स्वयं को ईश्वर घोषित करना नहीं, बल्कि अपने भीतर स्थित चिदानन्दस्वरूप आत्मा का अनुभव करना है। इसी अनुभूति से करुणा उत्पन्न होती है, इसी से समदृष्टि विकसित होती है और इसी से धर्म केवल अनुष्ठान न रहकर जीवन का स्वभाव बनता है।
अद्वैत वेदान्त का यही संदेश भारतीय सभ्यता की आत्मदृष्टि का केन्द्र है—मनुष्य का वास्तविक परिचय उसकी बाह्य पहचान नहीं, बल्कि उसका आत्मस्वरूप है; समाज का वास्तविक आधार केवल संस्था नहीं, बल्कि धर्म है; और जीवन का परम प्रयोजन बाह्य विस्तार नहीं, बल्कि आन्तरिक जागरण है।
(क्रमशः – भाग–6 : धर्माधारित समाज, पुरुषार्थ, लोकमंगल और सनातन सभ्यता का समग्र स्वरूप)
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें