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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी भारत के इतिहास में केवल राजनीतिक परिवर्तन का काल नहीं था, बल्कि बौद्धिक पुनर्परिभाषा का भी काल था। इस समय भारत का अध्ययन उन लोगों द्वारा किया जाने लगा जिनकी शिक्षा, धार्मिक पृष्ठभूमि और समाज-दृष्टि यूरोपीय अनुभवों से निर्मित थी। उन्होंने भारत को उसी दृष्टि से समझने का प्रयास किया जिसके माध्यम से वे अपने इतिहास, समाज और धर्म को देखते थे। परिणामस्वरूप भारतीय जीवन के अनेक ऐसे आयाम, जो सहस्राब्दियों से एक समन्वित सांस्कृतिक व्यवस्था का अंग थे, उन्हें पृथक-पृथक सामाजिक वर्गों और शक्ति-संरचनाओं के रूप में पढ़ा जाने लगा।
भारतीय सभ्यता में धर्म, दर्शन, संस्कृति, शिक्षा, परिवार, उत्सव और लोकाचार एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। यहाँ जीवन का कोई भी क्षेत्र पूर्णतः पृथक नहीं था। ग्राम का उत्सव भी धर्म से जुड़ा था, कृषि भी ऋतुचक्र और यज्ञ से जुड़ी थी, शिक्षा भी संस्कार का भाग थी और राज्य भी धर्म के अधीन माना जाता था। इस एकात्म व्यवस्था को पश्चिमी समाजशास्त्रीय पद्धतियों से समझने का प्रयास हुआ तो स्वाभाविक रूप से अनेक नए निष्कर्ष सामने आए।
औपनिवेशिक प्रशासन के लिए भारत को जानना केवल बौद्धिक जिज्ञासा का विषय नहीं था; शासन की आवश्यकता भी था। जनगणना, जाति-वर्गीकरण, प्रशासनिक श्रेणियाँ और विधिक संहिताएँ तैयार करते समय भारतीय समाज को निश्चित खाँचों में बाँधने का प्रयास हुआ। अनेक गतिशील सामाजिक पहचानों को स्थिर श्रेणियों में परिवर्तित किया गया। स्थानीय विविधताओं, क्षेत्रीय परम्पराओं और व्यवहारगत भिन्नताओं की अपेक्षा व्यापक वर्गीकरण को अधिक महत्व दिया गया। इससे भारतीय समाज की बहुलतापूर्ण संरचना का एक सरल और कठोर चित्र निर्मित होने लगा।
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और बीसवीं शताब्दी में यूरोप में विकसित वर्ग-संघर्ष, शक्ति-संबंध और सामाजिक वर्चस्व की व्याख्याओं ने विश्वभर के अकादमिक विमर्श को प्रभावित किया। भारतीय समाज का अध्ययन भी इन्हीं प्रतिमानों के माध्यम से होने लगा। अनेक विद्वानों ने भारतीय इतिहास को मुख्यतः सत्ता, संसाधन और सामाजिक प्रभुत्व के संदर्भ में पढ़ा। दूसरी ओर अनेक भारतीय चिन्तकों ने यह प्रतिपादित किया कि भारतीय समाज को केवल संघर्ष के आधार पर नहीं समझा जा सकता, क्योंकि उसकी आधारभूत अवधारणाएँ धर्म, पुरुषार्थ, आश्रम, संस्कार, दायित्व और लोकमंगल से निर्मित हैं।
इसी काल में "ब्राह्मणवाद", "पितृसत्ता", "सामाजिक वर्चस्व" और "संरचनात्मक असमानता" जैसे पद व्यापक बौद्धिक चर्चा का विषय बने। इन अवधारणाओं का उपयोग अनेक सामाजिक प्रश्नों को समझने के लिए किया गया। साथ ही अनेक परम्परागत विचारकों ने यह तर्क रखा कि यदि भारतीय समाज की व्याख्या केवल इन्हीं अवधारणाओं के आधार पर की जाएगी तो उसके आध्यात्मिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक पक्ष उपेक्षित रह जाएँगे। उनके अनुसार भारतीय समाज की व्याख्या में वेद, उपनिषद, महाभारत, रामायण, स्मृति, पुराण, लोकाचार, तीर्थ, मठ, गुरुकुल और ग्रामजीवन की भूमिका को भी समान महत्व मिलना चाहिए।
भारतीय समाज की एक विशेषता यह रही कि यहाँ अनेक परम्पराएँ एक साथ विकसित हुईं। वैदिक, आगमिक, शैव, वैष्णव, शाक्त, स्मार्त, जैन, बौद्ध और अनेक लोकधाराएँ समान सांस्कृतिक भूगोल में विकसित होती रहीं। इनके मध्य शास्त्रार्थ हुए, मतभेद हुए, दार्शनिक प्रतिस्पर्धा हुई, किन्तु ज्ञान की परम्परा निरन्तर चलती रही। यही कारण है कि भारत का सांस्कृतिक इतिहास केवल एकरेखीय नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय दिखाई देता है।
औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था के विस्तार के साथ भारतीय परम्परा के अध्ययन का केन्द्र भी परिवर्तित हुआ। संस्कृत पाठशालाओं, गुरुकुलों और पारम्परिक विद्यापीठों की अपेक्षा आधुनिक विश्वविद्यालयों का प्रभाव बढ़ा। इससे नए अनुसंधान हुए, अनेक प्राचीन ग्रन्थों का सम्पादन हुआ और भारतीय इतिहास के नए आयाम सामने आए। साथ ही यह प्रश्न भी उठने लगा कि क्या भारतीय समाज को केवल आधुनिक समाजशास्त्रीय सिद्धान्तों से समझा जा सकता है अथवा उसके अपने दार्शनिक प्रतिमानों की भी आवश्यकता है।
भारतीय बौद्धिक परम्परा की सबसे बड़ी विशेषता उसका संवाद है। मीमांसक वेदान्तियों से वाद करते हैं, बौद्ध न्यायाचार्यों से शास्त्रार्थ करते हैं, शैव और वैष्णव अपने सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत और द्वैत परम्पराएँ एक-दूसरे से असहमत होते हुए भी दार्शनिक संवाद बनाए रखती हैं। इस परम्परा में विचार का उत्तर विचार से दिया जाता है, इसलिए भारतीय ज्ञान-संस्कृति का विकास निरन्तर विमर्श से हुआ।
आधुनिक भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अपनी परम्परा का न तो अन्धानुकरण करे और न ही उसे केवल औपनिवेशिक व्याख्याओं के माध्यम से देखे। आवश्यक यह है कि भारतीय समाज को उसके शास्त्रीय स्रोतों, ऐतिहासिक अनुभवों, क्षेत्रीय विविधताओं और दार्शनिक आधारों के साथ समग्र रूप से समझा जाए। तभी उसके वास्तविक स्वरूप का संतुलित चित्र सामने आएगा।
भारतीय सभ्यता की शक्ति इसी समन्वय में रही है कि उसने समय-समय पर आत्मपरीक्षण किया, मतभेदों को स्थान दिया, सुधारों को स्वीकार किया और साथ ही अपनी मूल दार्शनिक धारा को भी जीवित रखा। यही निरन्तरता उसे केवल एक प्राचीन संस्कृति नहीं, बल्कि एक जीवित सभ्यता बनाती है।
(क्रमशः – भाग–5 : आदि शंकराचार्य, अद्वैत वेदान्त, निर्वाणषट्कम् और "शिवोऽहम्" की सामाजिक एवं दार्शनिक व्याख्या)
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