सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

भाग–3 ऋषि-परम्परा, यज्ञ और ब्राह्मण की वैदिक अवधारणा : भारतीय ज्ञान-संरचना का आधार


भारतीय सभ्यता का इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और साम्राज्यों का इतिहास नहीं है। यदि भारत की आत्मा को किसी ने सहस्राब्दियों तक अक्षुण्ण रखा, तो वह ऋषि-परम्परा थी। संसार की अधिकांश प्राचीन सभ्यताएँ अपने राजवंशों के साथ विलुप्त हो गईं, किन्तु भारत की सांस्कृतिक निरन्तरता का कारण राजसत्ता नहीं, बल्कि आश्रम, गुरुकुल, यज्ञशालाएँ और ज्ञान की अखण्ड परम्परा रही। यही कारण है कि भारतीय समाज में राजा से भी अधिक सम्मान ऋषि को प्राप्त था और राजमुकुट से भी अधिक प्रतिष्ठा तप, स्वाध्याय और ब्रह्मविद्या को मिली।

वेदों का प्रादुर्भाव किसी एक व्यक्ति की रचना के रूप में नहीं माना गया। ऋषियों को मन्त्रद्रष्टा कहा गया, मन्त्रकर्ता नहीं। उन्होंने सत्य का आविष्कार नहीं किया, बल्कि उसका साक्षात्कार किया। इसी कारण वैदिक परम्परा में ज्ञान को किसी व्यक्ति की सम्पत्ति नहीं, अपितु शाश्वत सत्य का प्रकटीकरण माना गया। यह विचार भारतीय ज्ञानमीमांसा की सबसे बड़ी विशेषता है।

ऋषि-परम्परा का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न कराना नहीं था। गुरुकुलों में वेद, वेदाङ्ग, व्याकरण, छन्द, निरुक्त, ज्योतिष, आयुर्वेद, धनुर्वेद, नीतिशास्त्र, दर्शन, गणित, संगीत और खगोल तक का अध्ययन कराया जाता था। तक्षशिला, नालन्दा, वल्लभी, विक्रमशिला, काञ्ची और उज्जयिनी जैसी विद्यापीठों ने भारत को केवल धार्मिक नहीं, बल्कि बौद्धिक महाशक्ति बनाया।

यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें "ब्राह्मण" शब्द को समझना चाहिए। वैदिक साहित्य में ब्राह्मण का मूल सम्बन्ध ब्रह्मविद्या से है। जो ब्रह्म का अध्ययन करे, वेद का संरक्षण करे, यज्ञ की विधि जाने, समाज को धर्म का उपदेश दे और स्वयं संयम, सत्य तथा तप का जीवन जिए, वही ब्राह्मण कहलाने का अधिकारी माना गया। इसलिए ब्राह्मण का आदर्श स्वरूप अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है; संग्रह नहीं, त्याग है; उपभोग नहीं, संयम है।

भारतीय ग्रन्थों में ब्राह्मण की परीक्षा उसके जन्म से अधिक उसके आचरण से की गई है। महाभारत में अनेक स्थानों पर कहा गया है कि सत्य, दया, तप, शील और ब्रह्मज्ञान से युक्त व्यक्ति ही वास्तविक ब्राह्मण है। इसी प्रकार अनेक पुराणों और स्मृतियों में यह विचार मिलता है कि यदि आचरण भ्रष्ट हो जाए तो केवल जन्म किसी को श्रेष्ठ नहीं बना सकता।

यज्ञ को भी केवल अग्नि में आहुति डालने का कर्मकाण्ड समझ लेना भारतीय परम्परा की सीमित व्याख्या होगी। यज्ञ का व्यापक अर्थ है—स्वार्थ का अतिक्रमण करके लोकमंगल के लिए समर्पण। माता का पुत्र के लिए त्याग यज्ञ है, गुरु का शिष्य के लिए ज्ञानदान यज्ञ है, किसान का अन्न उत्पादन यज्ञ है, सैनिक का राष्ट्ररक्षण यज्ञ है और विद्वान का समाज को ज्ञान देना भी यज्ञ है। इसी कारण गीता में सम्पूर्ण जीवन को यज्ञमय बनाने की शिक्षा दी गई है।

ऋषि और यज्ञ एक-दूसरे से अविच्छिन्न रूप से जुड़े हैं। ऋषि ज्ञान की रक्षा करते हैं और यज्ञ उस ज्ञान को समाज के व्यवहार में रूपान्तरित करता है। जहाँ ज्ञान है पर लोकमंगल नहीं, वहाँ यज्ञ अधूरा है; और जहाँ कर्म है पर विवेक नहीं, वहाँ धर्म अधूरा है। भारतीय सामाजिक संरचना इसी संतुलन पर आधारित रही।

पुराणों में बार-बार यह वर्णन आता है कि जब भी अधर्म की प्रवृत्तियाँ प्रबल होती हैं तो सबसे पहले ऋषियों के आश्रमों, तपोवनों और यज्ञों में विघ्न उत्पन्न होता है। विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिए राम और लक्ष्मण को भेजा जाना, दण्डकारण्य में ऋषियों का राक्षसों से संरक्षण माँगना, अगस्त्य, वशिष्ठ, अत्रि और भारद्वाज जैसे महर्षियों का राजाओं के मार्गदर्शक के रूप में उपस्थित होना—ये सभी प्रसंग इस बात का संकेत हैं कि भारतीय दृष्टि में ज्ञान-संरचना की रक्षा समाज की रक्षा के समान थी।

रामायण में राक्षसों द्वारा यज्ञों में मांस, रक्त और अस्थियाँ फेंककर विघ्न उत्पन्न करने का वर्णन मिलता है। इसका सांकेतिक अर्थ केवल धार्मिक अनुष्ठान का विघटन नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को बाधित करना है जिसके माध्यम से समाज में अनुशासन, संस्कार और नैतिकता का संचार होता था। जब ज्ञान के केन्द्र असुरक्षित होते हैं तो समाज की वैचारिक निरन्तरता भी संकट में पड़ जाती है।

महाभारत का प्रसंग भी इसी तथ्य की पुष्टि करता है। भीष्म, विदुर, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य और व्यास जैसे पात्र केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि ज्ञान-परम्परा के स्तम्भ हैं। युद्ध के बीच भी उनके प्रति सम्मान बना रहता है, क्योंकि भारतीय संस्कृति में ज्ञान को राजनीति से ऊपर स्थान दिया गया है।

गुरु-शिष्य परम्परा इस सम्पूर्ण व्यवस्था की आत्मा थी। गुरु केवल अध्यापक नहीं था, वह जीवन का निर्माता था। शिष्य केवल विद्यार्थी नहीं, बल्कि परम्परा का वाहक था। इसी कारण उपनिषदों में ज्ञान मौखिक संवाद से प्रवाहित होता है। प्रश्न पूछना प्रोत्साहित किया जाता है और उत्तर अनुभव के आधार पर दिए जाते हैं। भारतीय दर्शन में शास्त्रार्थ पराजय के लिए नहीं, सत्य की प्राप्ति के लिए होता था।

भारतीय सामाजिक व्यवस्था की यह विशेषता थी कि वह केवल सत्ता से संचालित नहीं होती थी। ग्रामसभा, कुलाचार, आश्रमव्यवस्था, गुरुकुल, तीर्थ, मठ और शास्त्रार्थ की परम्परा समाज को भीतर से संगठित रखती थी। इसलिए राजनीतिक परिवर्तन होने पर भी सांस्कृतिक जीवन निरन्तर चलता रहा। अनेक विदेशी आक्रमणों और राजनैतिक उतार-चढ़ावों के बाद भी वेद, उपनिषद, गीता, रामायण, महाभारत और पुराण लोकजीवन में जीवित रहे।

आदि शंकराचार्य का सम्पूर्ण जीवन भी इसी ज्ञान-संरचना के पुनर्संगठन का उदाहरण है। उन्होंने केवल दर्शन की स्थापना नहीं की, बल्कि भारत के चारों दिशाओं में मठों की स्थापना कर गुरु-शिष्य परम्परा को संगठित किया, शास्त्रार्थ की परम्परा को पुनर्जीवित किया और वेदान्त को पुनः राष्ट्रीय बौद्धिक धारा का केन्द्र बनाया। यह कार्य किसी राजनीतिक शक्ति से नहीं, बल्कि ज्ञान की शक्ति से सम्पन्न हुआ।

इसीलिए भारतीय सभ्यता में ज्ञान की रक्षा को धर्मरक्षा का अंग माना गया। जिस समाज की स्मृति वेद हों, जिसका इतिहास पुराण हों, जिसका संविधान धर्म हो और जिसके शिक्षक ऋषि हों, उसकी सामाजिक संरचना को समझने के लिए उसके ज्ञान-तन्त्र को समझना अनिवार्य है। ऋषि, यज्ञ और ब्राह्मण की वैदिक अवधारणा उसी ज्ञान-तन्त्र के तीन ऐसे स्तम्भ हैं जिनके बिना भारतीय सभ्यता की निरन्तरता की कल्पना भी संभव नहीं है।

(क्रमशः – भाग–4 : औपनिवेशिक विमर्श, भारतीय समाज की आधुनिक व्याख्याएँ और दार्शनिक प्रतिमानों का परिवर्तन)

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