सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

भाग–3 राजसत्ता नहीं, ब्रह्मसत्ता : भारतीय समाज की शाश्वत आधारशिला


भारतीय समाज को समझने की सबसे बड़ी भूल यह रही कि उसे यूरोप के इतिहास के चश्मे से देखा गया। यूरोप में सदियों तक चर्च और राज्य के बीच संघर्ष चलता रहा। वहाँ एक पुस्तक, एक धार्मिक सत्ता और एक राजनीतिक सत्ता के बीच अधिकारों का विवाद था। फ्रांस की क्रांति के बाद राज्य और चर्च को अलग करने की अवधारणा विकसित हुई, जिसे आगे चलकर सेक्युलरिज्म कहा गया। यह यूरोप की ऐतिहासिक आवश्यकता थी, परंतु भारत का इतिहास और उसकी आत्मा इससे सर्वथा भिन्न है।

भारत में कभी भी कोई एक व्यक्ति, एक पुस्तक या एक संस्था अंतिम सत्ता नहीं रही। यहाँ वेद हैं, उपनिषद हैं, आगम हैं, निगम हैं, पुराण हैं, दर्शन हैं, भक्ति परम्पराएँ हैं, योग परम्परा है, शैव, शाक्त, वैष्णव, स्मार्त, जैन, बौद्ध, सिख और अनेक लोक परम्पराएँ हैं। विचारों की इतनी विविधता के बीच भी समाज विखंडित नहीं हुआ, क्योंकि सबके केंद्र में धर्म था और धर्म का आधार ब्रह्म था।

यही कारण है कि भारतीय व्यवस्था में राजसत्ता कभी सर्वोच्च नहीं रही। राजा का अधिकार भी धर्म से प्रारम्भ होता है और धर्म पर ही समाप्त होता है। महाभारत में भीष्म पितामह राजधर्म की चर्चा करते हुए कहते हैं कि राजा का प्रथम कर्तव्य धर्म की रक्षा है, अपनी इच्छा की पूर्ति नहीं। मनुस्मृति का प्रसिद्ध वचन है—

"धर्मो रक्षति रक्षितः।"

धर्म की रक्षा करने वाला स्वयं धर्म द्वारा संरक्षित होता है। यह केवल व्यक्ति पर नहीं, राज्य पर भी समान रूप से लागू होता है।

रामायण इसका सबसे सरल उदाहरण है। श्रीराम लंका पर विजय प्राप्त करते हैं, पर उसे अपने साम्राज्य में सम्मिलित नहीं करते। विभीषण को राज्य सौंप देते हैं। यदि सत्ता ही अंतिम लक्ष्य होती, तो लंका अयोध्या का प्रांत बन जाती। भरत चौदह वर्षों तक सिंहासन पर नहीं बैठते, बल्कि श्रीराम की चरणपादुकाओं को राज्य का प्रतीक बनाकर शासन चलाते हैं। संदेश स्पष्ट है—व्यक्ति नहीं, धर्म सर्वोपरि है।

विदेह के राजा जनक राजमहलों में रहते हुए भी ब्रह्मज्ञानी कहलाते हैं। उपनिषदों में ऋषि याज्ञवल्क्य उनके दरबार में शास्त्रार्थ करते हैं और राजा ज्ञान के सामने स्वयं को शिष्य मानते हैं। यह दृश्य विश्व की अन्य सभ्यताओं में दुर्लभ है, जहाँ सत्ता प्रायः ज्ञान पर अधिकार स्थापित करती है। भारत में ज्ञान सत्ता का मार्गदर्शक है।

महाभारत में भी भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को राज्य प्राप्ति का उपदेश नहीं देते। वे धर्म की स्थापना का उपदेश देते हैं—

"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥"
(भगवद्गीता 4.7)

भगवान स्वयं भी धर्म के लिए अवतार लेते हैं, किसी राज्य की स्थापना के लिए नहीं। इसका अर्थ है कि धर्म ब्रह्म की व्यवस्था है और ब्रह्मसत्ता से ऊपर कोई सत्ता नहीं।

इसीलिए भारतीय समाज में सत्ता का मूल्य सीमित है। कोई राजा संन्यास ले सकता है, कोई ऋषि राजाओं का गुरु बन सकता है, कोई वनवासी सम्पूर्ण समाज का आदर्श बन सकता है। विश्वामित्र क्षत्रिय होकर ब्रह्मर्षि बनते हैं। वाल्मीकि समाज को रामायण देते हैं। वेदव्यास महाभारत की रचना करते हैं। ज्ञान और तप के सामने जन्म, पद और शक्ति गौण हो जाते हैं।

यही भारतीय दृष्टि को पितृसत्ता और ब्राह्मणवाद जैसी अवधारणाओं से अलग करती है। यदि समाज की अंतिम सत्ता ब्रह्म है, तो कोई मनुष्य स्थायी रूप से सर्वोच्च नहीं हो सकता। यदि प्रत्येक आत्मा उसी परब्रह्म का अंश है, तो कोई जन्म से हीन और कोई जन्म से श्रेष्ठ नहीं हो सकता। यदि जीवन का लक्ष्य मोक्ष है, तो अर्थ और सत्ता केवल साधन हैं, साध्य नहीं।

विष्णु पुराण भारतवर्ष का परिचय केवल भौगोलिक सीमा के रूप में नहीं देता, बल्कि कर्मभूमि के रूप में करता है—

"उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥"

भारतीय परम्परा मानती है कि यह भूमि केवल राज्य नहीं, साधना की भूमि है। यहाँ जन्म का उद्देश्य केवल उपभोग नहीं, आत्मा का परिष्कार है। लोक और परलोक, कर्म और पुनर्जन्म, धर्म और मोक्ष—ये सब जीवन की एक अखंड यात्रा के अंग हैं।

यही कारण है कि यहाँ परिवार भी केवल आर्थिक संस्था नहीं है। माता को प्रथम गुरु कहा गया, पिता को पालनकर्ता, गुरु को ज्ञानदाता और अतिथि को देवता। यहाँ पृथ्वी माता है, गंगा माता है, गौ माता है। यह संबंध अधिकार का नहीं, आत्मीयता का है। जो सभ्यता पृथ्वी को भी माता कहती हो, उसे केवल पितृसत्तात्मक कह देना उसके दर्शन को समझे बिना दिया गया निर्णय है।

भारतीय समाज का संगठन भी बाइनरी अर्थात दो विरोधी वर्गों पर आधारित नहीं है। यहाँ स्त्री-पुरुष प्रतिस्पर्धी नहीं, अर्धनारीश्वर के दो आयाम हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र विरोधी वर्ग नहीं, विराट पुरुष के अंग हैं। गृहस्थ, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी जीवन के विरोधी चरण नहीं, बल्कि आत्मा की क्रमिक यात्रा हैं। ज्ञान, भक्ति, योग और कर्म अलग-अलग मार्ग हैं, पर लक्ष्य एक ही है।

सनातन परम्परा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसने प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता कभी समाप्त नहीं की। नचिकेता यम से प्रश्न करता है, गार्गी याज्ञवल्क्य से प्रश्न करती हैं, अर्जुन श्रीकृष्ण से प्रश्न करता है, बुद्ध प्रश्न करते हैं, महावीर प्रश्न करते हैं, शंकराचार्य शास्त्रार्थ करते हैं। यहाँ तक कि चार्वाक, जो वेदों को प्रमाण नहीं मानता, उसे भी भारतीय दर्शन में स्थान मिलता है। यह परम्परा बताती है कि सत्य किसी एक व्यक्ति की संपत्ति नहीं है; सत्य की खोज ही धर्म है।

आधुनिक समय में जब भारतीय समाज को केवल सत्ता, वर्ग, जाति और लिंग के संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तब वह अपनी जड़ों से काटा हुआ दिखाई देता है। इन शब्दों का प्रयोग उस समाज पर किया जा रहा है जिसका अंतिम लक्ष्य न साम्राज्य विस्तार है, न धार्मिक प्रभुत्व, न राजनीतिक विजय, बल्कि आत्मा का परब्रह्म से मिलन है।

भारतीय दृष्टि कहती है कि शरीर नश्वर है, सत्ता नश्वर है, राज्य नश्वर है, संपत्ति नश्वर है; शाश्वत यदि कुछ है तो ब्रह्म। वही प्रत्येक जीव में आत्मा के रूप में विद्यमान है। उसी के कारण धर्म है, उसी के कारण समाज है और उसी के कारण समस्त सृष्टि एक सूत्र में बँधी हुई है।

इसलिए भारतीय समाज को समझने का आरम्भ पितृसत्ता, ब्राह्मणवाद या सत्ता-संघर्ष से नहीं, बल्कि उस वैदिक उद्घोष से होना चाहिए जिसने हजारों वर्षों से इस सभ्यता का मार्गदर्शन किया है—

"ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।"
(ईशावास्य उपनिषद् १)

जब सम्पूर्ण जगत एक ही परमात्मा से व्याप्त है, तब किसी भी व्यवस्था का अंतिम आधार सत्ता नहीं, ब्रह्मसत्ता ही हो सकती है। यही सनातन धर्म का प्राण है, यही भारतीय समाज की आत्मा है और यही वह दृष्टि है जिसके बिना भारत को न इतिहास में समझा जा सकता है, न वर्तमान में और न भविष्य में।

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