सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

भाग–2इन्द्र–विरोचन संवाद : आत्मविद्या और देहकेंद्रित दृष्टि का दार्शनिक विवेचन


भारतीय दार्शनिक परम्परा की सबसे विलक्षण विशेषता यह है कि यहाँ सत्य को आदेश के रूप में नहीं, बल्कि जिज्ञासा, साधना और अनुभूति के माध्यम से प्राप्त करने योग्य माना गया है। उपनिषदों में गुरु और शिष्य के मध्य होने वाले संवाद केवल प्रश्नोत्तर नहीं हैं, बल्कि मनुष्य की आन्तरिक यात्रा का क्रमिक विस्तार हैं। छान्दोग्य उपनिषद् में वर्णित प्रजापति, इन्द्र और विरोचन का संवाद इसी परम्परा का एक अत्यन्त गम्भीर उदाहरण है।

कथा आरम्भ होती है एक उद्घोषणा से। प्रजापति कहते हैं कि जो आत्मा को जान लेगा, वह भय, शोक, क्षय और मृत्यु के बन्धन से मुक्त होकर अमृतस्वरूप तत्त्व का अनुभव करेगा। यह घोषणा देवताओं और असुरों दोनों तक पहुँचती है। देवताओं की ओर से इन्द्र और असुरों की ओर से विरोचन आत्मविद्या प्राप्त करने के लिए प्रजापति के आश्रम में उपस्थित होते हैं।

दोनों को तत्काल उत्तर नहीं दिया जाता। उन्हें बत्तीस वर्षों तक ब्रह्मचर्य, सेवा, अनुशासन और साधना का पालन करना पड़ता है। यह प्रसंग इस तथ्य का प्रतीक है कि आत्मज्ञान केवल बौद्धिक सूचना नहीं, बल्कि जीवन के परिष्कार की प्रक्रिया है। जिस मन में अहंकार, अधैर्य और विषयासक्ति विद्यमान हो, वह आत्मा के स्वरूप का साक्षात्कार नहीं कर सकता।

दीर्घकालीन साधना के पश्चात प्रजापति दोनों को जल में अपना प्रतिबिम्ब देखने का निर्देश देते हैं। वे देखते हैं कि जल में उनका सम्पूर्ण शरीर दिखाई दे रहा है। प्रजापति संकेत करते हैं कि उसी पर विचार करो।

विरोचन वहीं रुक जाते हैं। उनके लिए दृश्य ही सत्य है। जो आँखों से दिखाई देता है वही वास्तविक है। शरीर सुन्दर है तो आत्मा सुन्दर है, शरीर बलवान है तो आत्मा बलवान है, शरीर सुखी है तो जीवन सफल है। इस प्रकार वे देह को ही अंतिम सत्य मानकर लौट जाते हैं।

इन्द्र लौटते समय विचार करते हैं कि यदि शरीर ही आत्मा है तो वह रोगग्रस्त भी होता है, वृद्ध भी होता है, घायल भी होता है और मृत्यु के साथ समाप्त भी हो जाता है। जो परिवर्तनशील है वह अमृत कैसे हो सकता है? यह प्रश्न उन्हें पुनः प्रजापति के पास ले आता है।

प्रजापति उन्हें पुनः वर्षों तक साधना कराते हैं और इस बार स्वप्नावस्था का विवेचन करते हैं। इन्द्र पुनः विचार करते हैं कि स्वप्न में भी भय, भ्रम और दुःख उपस्थित होते हैं, अतः यह भी अंतिम सत्य नहीं हो सकता। वे फिर लौटते हैं।

तीसरे चरण में सुषुप्ति की अवस्था का विवेचन होता है। जहाँ न सुख का अनुभव स्पष्ट है, न दुःख का, न जगत का बोध है और न स्वयं का। इन्द्र फिर भी संतुष्ट नहीं होते, क्योंकि जहाँ ज्ञान ही नहीं, उसे आत्मा का पूर्ण स्वरूप कैसे माना जाए?

अन्ततः प्रजापति उन्हें उस चैतन्य का उपदेश देते हैं जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं का साक्षी है। वही नित्य है, वही अविनाशी है, वही आत्मा है। वह न शरीर है, न मन है, न बुद्धि है और न इन्द्रियों का समूह। वही वास्तविक पुरुष है और वही समस्त अनुभवों का आधार है।

इस संवाद में इन्द्र और विरोचन दो व्यक्तियों से अधिक दो जीवन-दृष्टियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। विरोचन की दृष्टि दृश्य पदार्थ पर केन्द्रित है। उसके लिए शक्ति, सौन्दर्य, उपभोग और बाह्य उपलब्धि ही जीवन का केन्द्र है। इन्द्र की दृष्टि प्रश्न करती है, संशय करती है, साधना करती है और अन्ततः बाह्य से आन्तरिक की ओर यात्रा करती है। इसी कारण भारतीय परम्परा में जिज्ञासा को श्रद्धा का विरोध नहीं, बल्कि उसका अनिवार्य अंग माना गया है।

भगवद्गीता के दैवासुरसम्पद्विभागयोग में भी दैवी और आसुरी प्रवृत्तियों का वर्णन इसी मनोवैज्ञानिक आधार पर किया गया है। अभय, सत्य, आत्मसंयम, दान, स्वाध्याय, तप, अहिंसा, क्षमा और करुणा दैवी सम्पदा के लक्षण बताए गए हैं। दूसरी ओर दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अविवेक आसुरी सम्पदा के लक्षण हैं। गीता कहीं भी इन्हें जन्म से प्राप्त गुण नहीं बताती; यह मनुष्य के स्वभाव और आचरण से निर्मित अवस्थाएँ हैं।

पुराणों का अध्ययन भी इसी दृष्टि से किया जाए तो अनेक प्रसंगों का गूढ़ अर्थ स्पष्ट होने लगता है। हिरण्यकशिपु का संघर्ष केवल अपने पुत्र से नहीं है; वह उस भक्ति से है जो अहंकार के सामने झुकने से इनकार करती है। रावण का संघर्ष केवल अयोध्या से नहीं है; वह मर्यादा और तपशक्ति से है। महिषासुर का युद्ध केवल देवताओं से नहीं है; वह संतुलन और दैवी व्यवस्था से है। वृत्रासुर का प्रसंग केवल युद्ध का आख्यान नहीं, बल्कि जीवनदायी प्रवाह को अवरुद्ध करने वाली शक्ति का प्रतीक है।

इन कथाओं में बार-बार यज्ञ, तप, ऋषि और आश्रमों का उल्लेख आता है। इसका कारण यह है कि भारतीय संस्कृति में यज्ञ केवल अग्निहोत्र नहीं, बल्कि समर्पण का सिद्धान्त है। तप केवल वनवास नहीं, बल्कि इन्द्रिय-निग्रह है। ऋषि केवल ग्रन्थकार नहीं, बल्कि ज्ञान के संवाहक हैं। आश्रम केवल निवास-स्थान नहीं, बल्कि शिक्षा और संस्कार के केन्द्र हैं। अतः जब पुराणों में इन पर आक्रमण का वर्णन आता है तो उसका तात्पर्य उस व्यवस्था पर संकट से भी है जो समाज को ज्ञान, अनुशासन और धर्म से जोड़ती है।

भारतीय चिन्तन की एक विशेषता यह भी है कि वह किसी मनुष्य को स्थायी रूप से दैवी या आसुरी नहीं मानता। वाल्मीकि डाकू से महर्षि बनते हैं, अंगुलिमाल हिंसा से करुणा की ओर अग्रसर होता है, अजामिल पतन से उद्धार की ओर बढ़ता है। इसी प्रकार इन्द्र भी अनेक प्रसंगों में अहंकार के कारण त्रुटियाँ करते हैं और पुनः तप तथा ज्ञान के द्वारा स्वयं को शुद्ध करते हैं। यह दृष्टि मनुष्य को परिवर्तनशील मानती है।

इसीलिए भारतीय दर्शन में वास्तविक युद्ध बाह्य शत्रु से पहले अन्तःकरण में स्थित अविवेक, अहंकार, लोभ, मोह और दम्भ के विरुद्ध माना गया है। जो मनुष्य इन पर विजय प्राप्त करता है वही दैवी सम्पदा की ओर अग्रसर होता है और जो इनके अधीन हो जाता है वह आसुरी प्रवृत्ति का आश्रय लेता है।

इन्द्र–विरोचन संवाद का यही शाश्वत संदेश है कि मनुष्य का मूल्य उसकी देह, उसके वैभव या उसकी बाह्य उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उस सत्य की खोज से निर्धारित होता है जिसके लिए वह प्रश्न करने, साधना करने और अपने अहंकार का अतिक्रमण करने का साहस रखता है। यही आत्मविद्या की दिशा है और यही भारतीय दार्शनिक परम्परा की सबसे बड़ी विशेषता है।

(क्रमशः – भाग–3 : ऋषि-परम्परा, यज्ञ, ब्राह्मण की वैदिक अवधारणा और भारतीय ज्ञान-संरचना)

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