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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
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कल 25 जून का दिन बीत गया। वर्ष 1975 में लगाए गए आपातकाल को इक्यावन वर्ष पूरे हो चुके हैं। देशभर में अनेक कार्यक्रम आयोजित हुए, लोकतंत्र की रक्षा पर संगोष्ठियाँ हुईं, असंख्य लेख लिखे गए और उन हजारों लोगों का स्मरण किया गया जिन्हें उस कालखंड में बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया के कारागारों में डाल दिया गया था। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पहरा बैठा दिया गया था, समाचार-पत्रों पर सेंसरशिप लागू थी, न्यायपालिका पर दबाव था और राज्य की शक्ति नागरिक अधिकारों पर भारी पड़ रही थी। निस्संदेह वह भारतीय राजनीतिक इतिहास का अत्यंत अंधकारमय अध्याय था और उसका स्मरण होना भी चाहिए। किंतु प्रत्येक वर्ष 25 जून को होने वाले समस्त विमर्शों के बीच एक ऐसा प्रश्न है, जिससे प्रायः बचने का प्रयास किया जाता है। क्या हमने कभी उस संवैधानिक और वैचारिक आधारभूमि की समीक्षा की, जिसके भीतर रहते हुए आपातकाल जैसी व्यवस्था संभव हुई? क्या समस्या केवल तत्कालीन सत्ता और उसके दुरुपयोग की थी, अथवा उस राज्य-दर्शन में भी कोई ऐसी संरचनात्मक सीमा थी जिसने सत्ता के असाधारण केंद्रीकरण को संभव बनाया?
भारत की स्वतंत्रता केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन नहीं थी; वह भारतीय सभ्यता को उसके स्वाभाविक जीवन-दर्शन के अनुरूप पुनर्स्थापित करने का भी अवसर थी। किंतु स्वतंत्रता के उपरांत जिस राज्य-व्यवस्था को अपनाया गया, उसका मूल प्रेरणा-स्रोत भारतीय राजधर्म, धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, महाभारत, शुक्रनीति अथवा ग्राम-स्वराज की परंपरा नहीं बना। उसका वैचारिक आधार आधुनिक यूरोपीय राष्ट्र-राज्य (Nation-State) की वह अवधारणा थी, जिसका विकास ईसाई यूरोप के ऐतिहासिक अनुभवों से हुआ। यूरोप में राष्ट्र-राज्य का उद्भव चर्च, राजसत्ता और साम्राज्य के लंबे संघर्षों के परिणामस्वरूप हुआ। वहाँ समाज की विविधताओं को एक भाषा, एक कानून, एक केंद्रीकृत सत्ता और एक राजनीतिक पहचान के अंतर्गत संगठित करना राज्य का उद्देश्य बना। यही अवधारणा आगे चलकर आधुनिक संवैधानिक व्यवस्थाओं का प्रमुख आधार बनी। इस व्यवस्था में व्यक्ति और राज्य के संबंध का केंद्र 'अधिकार' हैं; कर्तव्य गौण हो जाते हैं, जबकि भारतीय चिंतन में धर्म ही कर्तव्य का पर्याय है और अधिकार उसी से स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होते हैं।
यहीं भारतीय और यूरोपीय दृष्टियों का मूलभूत अंतर दिखाई देता है। भारत ने कभी समाज को राज्य की रचना नहीं माना; यहाँ राज्य समाज से उत्पन्न संस्था था, समाज राज्य से उत्पन्न नहीं होता था। भारतीय परंपरा में राजा धर्म के अधीन था, जबकि आधुनिक राष्ट्र-राज्य में धर्म और समाज दोनों राज्य के अधीन होते चले गए। इसलिए आज जब हम केवल 1975 के आपातकाल को स्मरण करते हैं, तब यह प्रश्न भी उतनी ही गंभीरता से पूछा जाना चाहिए कि दो वर्ष तक चला राजनीतिक आपातकाल तो समाप्त हो गया, किंतु क्या भारत की सभ्यतागत आत्मा पर औपनिवेशिक राज्य-दर्शन का जो आपातकाल स्वतंत्रता के बाद भी बना रहा, उससे मुक्ति का कोई गंभीर प्रयास हुआ? यही प्रश्न इस पूरे विमर्श का वास्तविक केंद्र होना चाहिए।
यहीं से भारतीय और आधुनिक संवैधानिक दृष्टि का मौलिक अंतर स्पष्ट होने लगता है। वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था का केंद्र अधिकार हैं, जबकि भारतीय दर्शन का केंद्र कर्तव्य है। संविधान के मूल अधिकारों पर व्यापक विमर्श होता है, परंतु कर्तव्य सार्वजनिक जीवन के केंद्र में कभी स्थापित नहीं हो सके। समानता की चर्चा होती है, किंतु समानता का अर्थ क्या है, इस पर गंभीर विचार नहीं होता। क्या समानता का अर्थ सभी मनुष्यों को एक जैसा बना देना है, या प्रत्येक व्यक्ति को उसकी प्रकृति, योग्यता और पुरुषार्थ के अनुरूप अवसर उपलब्ध कराना है? भारतीय चिंतन दूसरा मार्ग स्वीकार करता है।
यहाँ समानता का आधार कृत्रिम एकरूपता नहीं, बल्कि न्याय, औचित्य और धर्म है। इसलिए भारत ने कभी अधिकारों को समाज का मूल आधार नहीं माना। यहाँ पहले कर्तव्य का पालन होता था, अधिकार उसी का स्वाभाविक परिणाम माने जाते थे। पिता का कर्तव्य ही पुत्र का अधिकार बनता था, राजा का राजधर्म ही प्रजा की सुरक्षा का आधार होता था और गुरु का दायित्व ही शिष्य के ज्ञान का अधिकार बनता था। अधिकार और कर्तव्य को अलग-अलग नहीं देखा जाता था; दोनों एक ही धर्मचक्र के परस्पर पूरक पक्ष थे।
यदि स्वतंत्र भारत की व्यवस्था धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चतुर्विध पुरुषार्थ पर आधारित होती, तो राज्य का स्वरूप भी भिन्न होता। धर्म जीवन को मर्यादा देता, अर्थ को नैतिक अनुशासन प्राप्त होता, काम संयम और उत्तरदायित्व से संचालित होता तथा मोक्ष मनुष्य के जीवन को आध्यात्मिक दिशा प्रदान करता। इन चारों पुरुषार्थों का दार्शनिक आधार आत्मा, ब्रह्म, कर्मफल और पुनर्जन्म का सिद्धांत है, जिसने भारतीय सभ्यता को केवल भौतिक समृद्धि तक सीमित नहीं रहने दिया। इसी आधार पर रामराज्य की कल्पना विकसित हुई, जहाँ शासन का उद्देश्य केवल प्रशासन चलाना नहीं, बल्कि धर्माधारित न्याय, लोककल्याण और सामाजिक संतुलन की स्थापना था। यदि यही दृष्टि स्वतंत्र भारत की राज्य-व्यवस्था का आधार बनती, तो संभवतः समाज तथाकथित धर्मनिरपेक्षता, राज्य-प्रेरित समाजवाद, असीमित व्यक्तिवाद, उपभोक्तावाद और भौतिकतावादी जीवन-दृष्टि के उस जाल में न उलझता, जिसने समाज को अधिकारों के लिए संघर्षरत समूहों में विभाजित कर दिया। जाति, भाषा, क्षेत्र और पहचान की राजनीति भी इतनी प्रबल न होती, क्योंकि भारतीय दृष्टि का आधार संघर्ष नहीं, धर्म द्वारा संचालित समन्वय और कर्तव्यबोध रहा है।
इसी धर्माधारित व्यवस्था से न्याय का वह सिद्धांत विकसित हुआ, जिसने भारतीय सभ्यता को सहस्राब्दियों तक नैतिक बल प्रदान किया। यहाँ न्याय सत्ता की इच्छा से नहीं, धर्म से संचालित होता था। भारतीय राजधर्म में राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि धर्म का सेवक माना गया है। महाभारत के शान्ति पर्व, कौटिल्य के अर्थशास्त्र, शुक्रनीति तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों में बार-बार यह प्रतिपादित किया गया है कि यदि राजा धर्म से विचलित हो जाए तो राज्य का पतन अवश्यंभावी है।
दक्षिण भारत के चोल वंश के प्रसिद्ध राजा मनुनीति चोल का प्रसंग इसी न्याय-दृष्टि का सर्वाधिक चर्चित उदाहरण है। तमिल शैव ग्रंथ पेरियपुराणम् तथा तमिल लोकपरंपरा में वर्णित है कि राजकुमार के रथ के नीचे आकर एक गौ-बछड़े की मृत्यु हो गई। न्याय की याचना के लिए गौ ने राजमहल के बाहर स्थापित न्याय-घंटी बजाई। राजा के समक्ष जब यह स्पष्ट हुआ कि अपराध उसके अपने पुत्र से हुआ है, तब उसने राजधर्म को पुत्र-मोह से ऊपर रखा और न्याय के समक्ष राजपरिवार तथा सामान्य प्रजा में कोई भेद स्वीकार नहीं किया। इतिहासकार इस प्रसंग को आदर्श राजधर्म का प्रतीकात्मक आख्यान मानते हैं, किंतु इस कथा का संदेश निर्विवाद है भारतीय न्याय-दर्शन में राजा का पुत्र भी धर्म और दंड से ऊपर नहीं था।
आज की स्थिति इसके विपरीत दिखाई देती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विधि के शासन की बात अवश्य की जाती है, किंतु व्यवहार में सत्ता, धनबल और राजनीतिक प्रभाव अनेक बार न्याय की गति को प्रभावित करते दिखाई देते हैं। भ्रष्टाचार, हत्या, बलात्कार अथवा अन्य गंभीर अपराधों के आरोपों का सामना करने वाले अनेक जनप्रतिनिधि चुनाव लड़ते हैं, विधायक, सांसद और मंत्री बनते हैं। अनेक मामलों में दोषसिद्धि के बाद भी अपील, स्थगन और जमानत की लंबी प्रक्रिया के कारण वे वर्षों तक सार्वजनिक जीवन में सक्रिय बने रहते हैं। इससे समाज में यह संदेश जाता है कि प्रभावशाली व्यक्तियों के लिए दंड की संभावना सामान्य नागरिक की तुलना में कम है। परिणामस्वरूप अपराध के प्रति भय कम होता जाता है और कानून का नैतिक प्रभाव भी क्षीण होने लगता है। यह समस्या किसी एक दल, एक सरकार या एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है; यह संपूर्ण राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था की चुनौती बन चुकी है। भारतीय राजधर्म का आग्रह केवल कानून बनाने पर नहीं था, बल्कि इस बात पर था कि न्याय निष्पक्ष, त्वरित और अनिवार्य हो। जिस दिन समाज से दंड का भय समाप्त हो जाता है, उसी दिन व्यवस्था का नैतिक आधार भी डगमगाने लगता है।
आपातकाल की चर्चा केवल 25 जून 1975 तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यदि हम वास्तव में उस कालखंड का ईमानदार मूल्यांकन करना चाहते हैं, तो हमें उसी आपातकाल के दौरान किए गए 42वें संविधान संशोधन की भी गंभीर समीक्षा करनी होगी। उसी संशोधन द्वारा संविधान की प्रस्तावना में "समाजवादी" और "पंथनिरपेक्ष" शब्द जोड़े गए। यह निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य है कि 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा स्वीकृत मूल प्रस्तावना में ये दोनों शब्द नहीं थे। प्रश्न यह नहीं है कि ये शब्द अच्छे हैं या बुरे; प्रश्न यह है कि जिन शब्दों को संविधान सभा ने मूल संविधान का आधार नहीं बनाया, उन्हें आपातकाल जैसी असाधारण राजनीतिक परिस्थिति में जोड़ने की आवश्यकता क्यों पड़ी? स्वतंत्रता के बाद पचहत्तर वर्षों में अनेक सरकारें आईं, अनेक संवैधानिक संशोधन हुए, आर्थिक नीतियाँ बदलीं, 1991 में उदारीकरण हुआ, अनुच्छेद 370 समाप्त हुआ, वस्तु एवं सेवा कर लागू हुआ, तीन तलाक पर कानून बना, किंतु किसी भी सरकार ने संविधान की प्रस्तावना में जोड़े गए इन शब्दों पर पुनर्विचार का साहस नहीं दिखाया। यह केवल राजनीतिक प्रश्न नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत दिशा का प्रश्न है।
भारत के राजनीतिक नेतृत्व और संगठनों की सबसे बड़ी वैचारिक भूल यही रही कि पश्चिम की राजनीतिक शब्दावली को भारतीय दर्शन की कसौटी पर परखे बिना स्वीकार कर लिया गया। अंग्रेज़ी के Religion का अनुवाद "धर्म" कर दिया गया, जबकि भारतीय दर्शन में धर्म का अर्थ कभी भी रिलिजन नहीं रहा। यूरोप में रिलिजन चर्च, पोप, मत और संगठित धार्मिक संस्थाओं की अवधारणा है। वहीं चर्च और राजसत्ता के बीच सदियों तक चले संघर्ष से आधुनिक सेक्युलर राज्य की उत्पत्ति हुई। इसलिए यूरोप में सेक्युलरिज्म चर्च और राज्य के पृथक्करण का सिद्धांत है। भारत में यह ऐतिहासिक परिस्थिति कभी रही ही नहीं। यहाँ न चर्च था, न पोप था और न किसी एक धार्मिक संस्था का सम्पूर्ण समाज पर नियंत्रण था।
भारत में धर्म का अर्थ है वह शाश्वत व्यवस्था जो व्यक्ति, समाज, प्रकृति और संपूर्ण सृष्टि को धारण करती है। वेदों में इसे ऋत कहा गया, जो आगे चलकर धर्म के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। आधुनिक दार्शनिक भाषा में इसे Cosmic Order कहा जा सकता है। धर्म किसी राजा, संसद या न्यायालय द्वारा निर्मित विधान नहीं है। धर्म शाश्वत है, इसलिए भारतीय परंपरा में राजा धर्म के अधीन होता है, धर्म राजा के अधीन नहीं। इसी कारण भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब-जब धर्म की हानि होती है तब वे धर्म की स्थापना के लिए अवतार लेते हैं। वे किसी एक संप्रदाय या पंथ की रक्षा की घोषणा नहीं करते, बल्कि धर्म की रक्षा की घोषणा करते हैं। यही भारतीय सभ्यता और यूरोपीय राजनीतिक चिंतन के बीच सबसे बड़ा दार्शनिक अंतर है।
इसी धर्म का राजनीतिक स्वरूप रामराज्य है। रामराज्य किसी मजहबी राज्य, थियोक्रेटिक स्टेट अथवा पंथ-आधारित शासन का नाम नहीं है। रामराज्य का आधार धर्माधारित न्याय, दायित्व, मर्यादा, लोककल्याण और उत्तरदायी शासन है। महर्षि अरविन्द ने इसलिए कहा था कि "सनातन धर्म ही भारत की आत्मा है।" उनका आशय किसी संकीर्ण धार्मिक पहचान से नहीं, बल्कि उस सभ्यतागत दर्शन से था जिसने भारत को हजारों वर्षों तक एक सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में जीवित रखा।
महात्मा गांधी ने भी स्वतंत्र भारत के आदर्श के रूप में रामराज्य का उल्लेख किया था। किंतु विडंबना यह है कि स्वतंत्र भारत की संवैधानिक भाषा में रामराज्य, राजधर्म, धर्माधारित न्याय अथवा पुरुषार्थ-चतुष्टय जैसे भारतीय दार्शनिक आधार अनुपस्थित रहे, जबकि यूरोप की ऐतिहासिक परिस्थितियों से उत्पन्न समाजवाद और सेक्युलरिज्म को संवैधानिक प्रतिष्ठा मिली। इसी बीच दशकों तक समाजवादी आर्थिक नीतियों के कारण भारत लगभग 3–4 प्रतिशत की धीमी आर्थिक वृद्धि से जूझता रहा, जिसे अर्थशास्त्री राज कृष्ण ने "हिंदू ग्रोथ रेट" कहा था। बाद में स्वयं अर्थशास्त्रियों ने स्वीकार किया कि इसका कारण हिंदू सभ्यता नहीं, बल्कि राज्य-नियंत्रित अर्थव्यवस्था और लाइसेंस-परमिट व्यवस्था थी। 1991 के बाद आर्थिक सुधार हुए, अर्थव्यवस्था तेज़ी से आगे बढ़ी, परंतु क्या केवल आर्थिक सुधारों से राष्ट्र की आत्मा भी बदल जाती है? यदि ऐसा होता तो जातीय राजनीति, तुष्टीकरण के आरोप, संप्रदायिक तनाव, सांस्कृतिक असुरक्षा, सामाजिक विखंडन और राष्ट्रीय अस्मिता का प्रश्न आज भी उतनी तीव्रता से उपस्थित न होता। इसलिए मेरे लिए मूल प्रश्न अर्थव्यवस्था का नहीं, भारत की आत्मा का है। दो वर्ष का राजनीतिक आपातकाल समाप्त हुए आधी शताब्दी से अधिक समय बीत गया, किंतु भारत की सभ्यतागत आत्मा पर औपनिवेशिक और यूरोपीय राज्य-दृष्टि का जो वैचारिक आवरण चढ़ा, उससे मुक्ति का राष्ट्रीय विमर्श आज भी अधूरा दिखाई देता है।
यदि रामराज्य केवल कवियों की कल्पना होता और भारतीय राजधर्म केवल आदर्शवादी आख्यान होते, तो हमारी सभ्यता हजारों वर्षों तक उन्हें शासन के मानक के रूप में क्यों स्मरण करती? हमारे इतिहास, पुराण, महाकाव्य और लोकपरंपराएँ ऐसे असंख्य प्रसंगों से भरी हुई हैं, जहाँ राजा ने अपने परिवार, अपने पुत्र और अपने व्यक्तिगत सुख से भी ऊपर धर्म को रखा। श्रीराम अयोध्या का राज्य त्यागकर पिता के वचन की रक्षा के लिए वन चले जाते हैं। हरिश्चंद्र सत्य की रक्षा के लिए अपना राज्य, परिवार और स्वयं का जीवन तक दाँव पर लगा देते हैं। दक्षिण भारत के चोल सम्राट मनुनीति चोल की कथा इसलिए पीढ़ियों से सुनाई जाती है कि जब उनके पुत्र के रथ से एक गौ-बछड़े की मृत्यु हुई, तब न्याय माँगने आई गौ के सामने उन्होंने राजकुमार और सामान्य प्रजा में कोई भेद स्वीकार नहीं किया। इन प्रसंगों का उद्देश्य केवल चरित्र-निर्माण नहीं था; वे समाज को यह विश्वास दिलाते थे कि धर्म राज्य से बड़ा है, न्याय राजा से बड़ा है और सत्ता कभी भी दंड से ऊपर नहीं हो सकती।
आज जब हम स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहते हैं, तब सार्वजनिक जीवन के अनेक प्रसंग असहज प्रश्न खड़े करते हैं। दक्षिण भारत के एक प्रमुख राजनीतिक नेता सार्वजनिक रूप से सनातन धर्म की तुलना डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों से करते हैं और उसके उन्मूलन की बात कहते हैं। ऐसे वक्तव्य राष्ट्रीय स्तर पर विवाद का विषय बनते हैं, फिर भी उनके राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन पर उसका वैसा प्रभाव दिखाई नहीं देता जैसा किसी अन्य आस्था या समुदाय के संदर्भ में संभवतः देखने को मिलता। यही नहीं, समय-समय पर ब्राह्मण समुदाय के विरुद्ध हिंसक या अपमानजनक वक्तव्य भी सार्वजनिक मंचों पर सुनाई देते हैं। किसी समुदाय के विरुद्ध घृणा का प्रदर्शन यदि राजनीतिक विमर्श का सामान्य भाग बन जाए और समाज का एक वर्ग उस पर तालियाँ बजाए, तो यह केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि न्याय के समान मानदंड का प्रश्न बन जाता है।
यही स्थिति अनेक चर्चित आपराधिक मामलों में भी दिखाई देती है। अपराध की गंभीरता पर चर्चा होने से पहले अभियुक्त और पीड़ित की वैचारिक, जातीय, धार्मिक अथवा लैंगिक पहचान बहस का केंद्र बन जाती है। अपराध का मूल्यांकन न्याय की कसौटी पर कम और वैचारिक दृष्टिकोण के आधार पर अधिक होने लगता है। कई बार सामाजिक और राजनीतिक समूह अपराध की निंदा करने के स्थान पर उसके समर्थन में तर्क खोजने लगते हैं। भारतीय न्याय-दृष्टि में अपराध का निर्णय अपराध के आधार पर होता था, अपराधी की पहचान के आधार पर नहीं। यही कारण था कि भारतीय राजधर्म में न्याय को धर्म का अंग माना गया, जबकि आज अनेक विदेशी वैचारिक विमर्श चाहे वे पहचान-आधारित राजनीति हों, विषैला नारीवाद हो या समाज को स्थायी संघर्षों में विभाजित करने वाले सिद्धांत सार्वजनिक नीति, मीडिया विमर्श और सामाजिक दृष्टिकोण को प्रभावित करते दिखाई देते हैं। भारत की परंपरा समाज को परिवार मानकर चलती थी; वहाँ संघर्ष अंतिम साधन था, मूल सिद्धांत नहीं। आज बहस का केंद्र अनेक बार अधिकार, पहचान और टकराव बन जाता है, जबकि भारतीय चिंतन का केंद्र धर्म, दायित्व और सामाजिक संतुलन रहा है।
आज हम बार-बार कहते हैं कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, सबसे प्राचीन सभ्यता है, सबसे समावेशी संस्कृति है। हम "वसुधैव कुटुम्बकम्" का उद्घोष करते हैं, "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" का गौरव गाते हैं, विज्ञान और ब्रह्म को एक ही सत्य की भिन्न अभिव्यक्तियाँ मानने वाली सभ्यता होने का दावा करते हैं। किंतु क्या हमने कभी ठहरकर यह विचार किया कि हमारी राज्य-व्यवस्था का दार्शनिक आधार क्या है? राष्ट्र, धर्म और समाज के बीच संबंधों को हम किस दृष्टि से देखते हैं? क्या समाज राज्य के लिए है या राज्य समाज के लिए? क्या हमारा मूलाधार अधिकार होगा या कर्तव्य? क्या राज्य केवल कानूनों से चलेगा या धर्माधारित न्याय से भी उसका कोई संबंध होगा? स्वतंत्रता के बाद हमने आर्थिक सुधार किए, उदारीकरण किया, प्रशासनिक सुधार किए, नई तकनीकों को अपनाया, विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में स्थान बनाया, किंतु भारत की सभ्यतागत आत्मा के अनुरूप राज्य-दृष्टि पर कभी वैसी राष्ट्रीय बहस नहीं हुई जैसी आर्थिक नीतियों या चुनावी राजनीति पर होती है।
यही कारण है कि मेरे लिए 25 जून 1975 का आपातकाल केवल लोकतंत्र पर लगा एक राजनीतिक ग्रहण नहीं है। वह उस बड़े प्रश्न की भी याद दिलाता है कि राजनीतिक आपातकाल तो इक्कीस महीनों में समाप्त हो गया, पर भारत की आत्मा पर औपनिवेशिक राज्य-दृष्टि, यूरोपीय वैचारिक प्रतिमानों और अपनी ही सभ्यतागत परंपरा से विमुख होने का जो वैचारिक आवरण चढ़ा, उससे मुक्त होने का राष्ट्रीय विमर्श अभी तक क्यों प्रारंभ नहीं हो सका? शायद भारत के भविष्य का सबसे गंभीर प्रश्न यही है।
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