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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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यदि भारतीय समाज का आधार ब्रह्म है, तो उसे केवल सत्ता, संपत्ति और संघर्ष के आधार पर नहीं समझा जा सकता। यही वह बिंदु है जहाँ से भारतीय और पाश्चात्य चिंतन की दिशाएँ अलग हो जाती हैं। पश्चिम का अधिकांश आधुनिक समाजशास्त्र मनुष्य को मुख्यतः आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक इकाई मानता है, जबकि सनातन वैदिक परम्परा मनुष्य को आत्मा मानती है। शरीर बदलता है, पद बदलता है, राज्य बदलते हैं, सभ्यताएँ बदलती हैं, पर आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। यही कारण है कि भारतीय समाज की रचना सत्ता के लिए नहीं, आत्मा के उत्कर्ष के लिए हुई है।
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—
"न जायते म्रियते वा कदाचित्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।" (गीता २.२०)
अर्थात् आत्मा का न जन्म होता है, न मृत्यु। वह शाश्वत है। जब समाज का प्रत्येक व्यक्ति आत्मा है और प्रत्येक आत्मा में वही परब्रह्म विद्यमान है, तब जन्म, लिंग या व्यवसाय के आधार पर किसी की स्थायी श्रेष्ठता या हीनता का प्रश्न ही नहीं उठता।
सनातन परम्परा सृष्टि को केवल दृश्य जगत तक सीमित नहीं मानती। हमारे ऋषियों ने सृष्टि के तीन आयाम बताए—आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक। एक वृक्ष को ही देखिए। उसका तना, शाखाएँ और पत्ते आधिभौतिक हैं, वर्षा, सूर्य और ऋतुओं का प्रभाव आधिदैविक है, और उसी वृक्ष में व्याप्त जीवन का रहस्य आध्यात्मिक है। यदि कोई केवल लकड़ी का मूल्य जानता हो और जीवन के इस व्यापक रहस्य को न समझे, तो वह वृक्ष का पूर्ण अर्थ कभी नहीं जान सकता। यही स्थिति भारतीय समाज की है। केवल अर्थशास्त्र या राजनीति से उसका विश्लेषण अधूरा रहेगा।
सांख्य दर्शन बताता है कि सम्पूर्ण प्रकृति सत्त्व, रजस् और तमस्—इन तीन गुणों से बनी है। किसी में ज्ञान की प्रवृत्ति अधिक है, किसी में पराक्रम की, किसी में उत्पादन और व्यापार की, तो किसी में सेवा और कौशल की। विविधता प्रकृति का नियम है, असमानता नहीं। जैसे शरीर में आँख देखती है, हाथ कार्य करते हैं और पैर चलते हैं, वैसे ही समाज में भी विभिन्न प्रवृत्तियाँ हैं। इस विविधता को संघर्ष नहीं, समन्वय के रूप में समझना ही भारतीय दृष्टि है।
ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में विराट पुरुष के मुख, भुजाएँ, ऊरु और चरणों से समाज के चार वर्णों का प्रतीकात्मक वर्णन मिलता है। इसका अर्थ कभी भी जन्माधारित स्थायी सत्ता नहीं था। शरीर का कोई अंग दूसरे से बड़ा नहीं होता। यदि चरण घायल हो जाएँ तो मुख भी व्याकुल हो जाता है। यदि हाथ कार्य न करें तो मस्तिष्क की योजना भी व्यर्थ हो जाती है। इसलिए वर्ण व्यवस्था का मूल भाव दायित्व है, प्रभुत्व नहीं।
भगवान श्रीकृष्ण भी गीता में कहते हैं—
"चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।" (गीता ४.१३)
अर्थात् वर्णों की व्यवस्था गुण और कर्म के आधार पर है। जन्म का उल्लेख यहाँ नहीं है। बाद के सामाजिक इतिहास में अनेक विकृतियाँ उत्पन्न हुईं, किन्तु विकृति को सिद्धांत मान लेना उसी प्रकार की भूल होगी जैसे रोग को शरीर का स्वभाव मान लेना।
आज स्त्री और पुरुष के संबंध को भी संघर्ष की दृष्टि से देखा जाता है। भारतीय परम्परा इस दृष्टि को स्वीकार नहीं करती। अर्धनारीश्वर का स्वरूप बताता है कि सृष्टि का आधार आधिपत्य नहीं, एकात्मता है। शिव और शक्ति अलग नहीं हैं। शक्ति के बिना शिव की कोई अभिव्यक्ति नहीं और शिव के बिना शक्ति का कोई आधार नहीं। यही सिद्धांत ब्रह्मा-सरस्वती, लक्ष्मी-नारायण और सीता-राम में दिखाई देता है।
रामायण में माता सीता वनगमन का निर्णय स्वयं लेती हैं। महाभारत में द्रौपदी सभा में धर्म पर प्रश्न उठाती हैं। गार्गी और मैत्रेयी वेदांत पर शास्त्रार्थ करती हैं। लोपामुद्रा ऋग्वेद की ऋचाओं की द्रष्टा हैं। यदि भारतीय समाज का मूल स्वरूप पितृसत्तात्मक प्रभुत्व होता, तो यह परम्परा संभव ही नहीं थी। यहाँ स्त्री और पुरुष एक ही धर्मयात्रा के सहयात्री हैं।
भारतीय परिवार भी केवल रक्त संबंधों का समूह नहीं है। यह धर्म का प्रथम विद्यालय है। माता प्रथम गुरु है, पिता उत्तरदायित्व का प्रतीक है, गुरु ज्ञान का आधार है और समाज सहयोग का विस्तार है। इसी कारण यहाँ परिवार का लक्ष्य केवल आर्थिक उन्नति नहीं, संस्कारों का संरक्षण भी है।
भारतीय चिंतन की एक और विशेषता है कि यहाँ विचारों पर ताला नहीं लगाया गया। उपनिषद प्रश्नों से आरम्भ होते हैं। नचिकेता यम से प्रश्न करता है। अर्जुन युद्धभूमि में श्रीकृष्ण से प्रश्न करता है। गार्गी याज्ञवल्क्य से प्रश्न करती हैं। शंकराचार्य और मंडन मिश्र शास्त्रार्थ करते हैं। यहाँ तक कि चार्वाक, जिसने वेदों को स्वीकार नहीं किया और केवल प्रत्यक्ष को प्रमाण माना, उसे भी भारतीय दर्शन ने स्थान दिया। मतभेद को विधर्म नहीं माना गया। यह परम्परा बताती है कि सनातन धर्म किसी एक पुस्तक, एक पैगम्बर या एक मत पर आधारित व्यवस्था नहीं, बल्कि सतत ज्ञानयात्रा है।
श्रुति, स्मृति, आगम, निगम, वेद, उपनिषद, पुराण, षड्दर्शन, ब्राह्मण और श्रमण परम्पराएँ परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक विशाल ज्ञानवृक्ष की शाखाएँ हैं। कोई भक्ति से चलता है, कोई योग से, कोई ज्ञान से, कोई कर्म से; किन्तु लक्ष्य एक ही है—आत्मा का परमात्मा से मिलन।
भारतीय जीवन में लोक और परलोक भी एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। कर्म का सिद्धांत मनुष्य को बताता है कि प्रत्येक कर्म का फल है। यही कारण है कि यहाँ नैतिकता केवल कानून का विषय नहीं, आत्मा का विषय है। यदि कोई व्यक्ति अंधकार में भी सत्य बोलता है, तो वह पुलिस के भय से नहीं, धर्मबोध से बोलता है। यही धर्म समाज को भीतर से संचालित करता है।
विष्णु पुराण में भारतवर्ष को कर्मभूमि कहा गया है—
"उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥"
भारतीय परम्परा मानती है कि देवता भी मोक्ष की प्राप्ति के लिए भारतवर्ष में जन्म लेने की इच्छा करते हैं, क्योंकि यहाँ कर्म, ज्ञान और साधना का अवसर है। इसलिए भारत केवल एक राजनीतिक भूभाग नहीं, बल्कि धर्म, साधना और आत्मोन्नति की भूमि है।
यही कारण है कि भारतीय समाज को केवल सत्ता की भाषा में समझने का प्रयास बार-बार असफल होता है। यहाँ सिंहासन से बड़ा धर्म है, राज्य से बड़ा समाज है, समाज से बड़ी आत्मा है और आत्मा से भी व्यापक परब्रह्म है। व्यक्ति का मूल्य उसके पद से नहीं, उसके आचरण से निर्धारित होता है। राजा जनक ब्रह्मज्ञानी हो सकते हैं और वन में रहने वाला ऋषि सम्राटों का गुरु बन सकता है।
जब इस व्यवस्था को यूरोप की राजनीतिक शब्दावली से देखा जाता है, तब पितृसत्ता, ब्राह्मणवाद और सत्ता-संघर्ष जैसे शब्द जन्म लेते हैं। किन्तु जब इसे उसके अपने शास्त्रीय आलोक में देखा जाता है, तब एक भिन्न चित्र सामने आता है—जहाँ सम्पूर्ण सृष्टि एक परिवार है, प्रत्येक जीव में एक ही आत्मा है, विविधता विरोध नहीं बल्कि प्रकृति का स्वभाव है, और जीवन का अंतिम लक्ष्य किसी दूसरे पर अधिकार स्थापित करना नहीं, बल्कि स्वयं को जानकर परब्रह्म का साक्षात्कार करना है।
यहीं से भारतीय समाज की वह धारा प्रारम्भ होती है जो राजसत्ता को भी धर्म के अधीन रखती है। यही धारा बताती है कि राज्य का वैभव क्षणिक है, किन्तु धर्म शाश्वत है; सत्ता बदलती रहती है, पर ब्रह्मसत्ता न कभी बदलती है और न कभी समाप्त होती है। यही सनातन वैदिक परम्परा की वास्तविक आधारशिला है।
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