सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

भाग–1 ब्रह्म : सनातन समाज की आधारशिला और भारतीय सामाजिक संरचना का दार्शनिक स्वरूप


किसी भी सभ्यता को समझने का सर्वप्रथम नियम यह है कि उसे उसके अपने बौद्धिक और दार्शनिक आधार पर समझा जाए। यदि किसी समाज की व्याख्या बाहरी मानदण्डों से की जाएगी, तो उसके वास्तविक स्वरूप का केवल एक सीमित चित्र ही सामने आएगा। भारतीय सभ्यता के साथ भी यही स्थिति अनेक बार दिखाई देती है। यहाँ समाज को केवल सत्ता, अर्थव्यवस्था अथवा राजनीतिक संगठन के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि उसे धर्म पर आधारित एक जीवंत व्यवस्था माना गया है। यही कारण है कि भारतीय परम्परा में समाज का मूलाधार राज्य नहीं, धर्म है; धर्म का आधार किसी व्यक्ति का आदेश नहीं, बल्कि ब्रह्म है; और ब्रह्म का स्वरूप किसी सीमित सत्ता का नहीं, अपितु सम्पूर्ण अस्तित्व का है।

वेदों और उपनिषदों का समग्र चिन्तन इस तथ्य पर आधारित है कि समस्त चराचर जगत एक ही परम तत्त्व की अभिव्यक्ति है। उपनिषद उद्घोष करते हैं—"सर्वं खल्विदं ब्रह्म।" इसका आशय यह है कि सम्पूर्ण जगत उसी परम सत्य से व्याप्त है। "अहं ब्रह्मास्मि" मनुष्य को यह स्मरण कराता है कि उसका वास्तविक स्वरूप शरीर, नाम, कुल, जाति अथवा पद नहीं, बल्कि ब्रह्मस्वरूप आत्मा है। "तत्त्वमसि" यह बताता है कि वही परम सत्य प्रत्येक जीव में विद्यमान है। इस प्रकार भारतीय दर्शन का प्रारम्भ ही एकात्मता से होता है, विभाजन से नहीं।

इसी आधार पर भारतीय समाज की रचना हुई। यहाँ परिवार केवल रक्त-संबंधों का समूह नहीं, संस्कारों का केन्द्र है। ग्राम केवल निवास का स्थान नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व की इकाई है। राज्य केवल प्रशासनिक संस्था नहीं, धर्मरक्षा का साधन है। राजा स्वयं धर्म का पालक माना गया है, धर्म का निर्माता नहीं। महाभारत, रामायण, धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्र सभी इस सिद्धान्त को स्वीकार करते हैं कि राज्य का अस्तित्व धर्म की रक्षा के लिए है।

धर्म का अर्थ भी यहाँ केवल पूजा-पद्धति नहीं है। धर्म वह शक्ति है जो धारण करती है। सत्य, करुणा, न्याय, संयम, दान, यज्ञ, सेवा, स्वाध्याय और लोकमंगल—ये सभी धर्म के अंग हैं। इसी कारण भारतीय समाज में जीवन को चार पुरुषार्थों—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—में व्यवस्थित किया गया। अर्थ और काम का निषेध नहीं किया गया, किन्तु उन्हें धर्म के अधीन रखा गया और मोक्ष को जीवन का परम पुरुषार्थ माना गया।

ब्रह्म की यही अवधारणा भारतीय सामाजिक संरचना को विशिष्ट बनाती है। यदि प्रत्येक जीव में एक ही आत्मा का निवास है तो किसी भी मनुष्य का अंतिम मूल्यांकन उसके जन्म से नहीं, बल्कि उसके आचरण, ज्ञान, तप और कर्म से होगा। इसलिए भारतीय परम्परा में ऋषि, मुनि और आचार्य केवल वंश से नहीं, साधना से प्रतिष्ठित होते हैं। विश्वामित्र का ब्रह्मर्षि बनना, वाल्मीकि का आदिकवि होना, वेदव्यास का वेदों का संहिताकरण करना और अनेक उपनिषदों में राजाओं तथा ऋषियों के मध्य ज्ञान-संवाद इस बात का संकेत देते हैं कि ज्ञान को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था।

इसी संदर्भ में "ब्राह्मण" शब्द को भी समझना आवश्यक है। ब्राह्मण का मूल सम्बन्ध ब्रह्म से है। ब्रह्म का ज्ञाता, ब्रह्म का साधक, वेद का अध्येता, शास्त्र का संरक्षक और समाज को धर्ममार्ग का उपदेश देने वाला ब्राह्मण कहलाता है। आदर्श स्थिति में ब्राह्मण कोई राजनीतिक पद नहीं, बल्कि ज्ञान और तपस्या का दायित्व है। उसका बल शस्त्र नहीं, शास्त्र है; उसका वैभव धन नहीं, विद्या है; उसका अधिकार राज्य नहीं, बल्कि समाज के नैतिक मार्गदर्शन में निहित है।

भारतीय सभ्यता का समूचा सांस्कृतिक विकास इसी ज्ञान-परम्परा के संरक्षण से हुआ। गुरुकुल, आश्रम, यज्ञ, शास्त्रार्थ, वेदाध्ययन और उपनिषदों की संवाद-परम्परा ने समाज को केवल धार्मिक नहीं, बल्कि दार्शनिक और बौद्धिक आधार प्रदान किया। यहाँ प्रश्न पूछना निषिद्ध नहीं था; नचिकेता यम से प्रश्न करता है, गार्गी याज्ञवल्क्य से प्रश्न करती हैं, जनक ऋषियों से प्रश्न करते हैं और श्वेतकेतु अपने पिता से प्रश्न करता है। भारतीय ज्ञान-परम्परा की यही विशेषता उसे विशिष्ट बनाती है।

इस दृष्टि से देखा जाए तो सनातन समाज की संरचना किसी एक वर्ग की प्रभुता पर नहीं, बल्कि ज्ञान, धर्म और उत्तरदायित्व के संतुलन पर आधारित आदर्श व्यवस्था के रूप में प्रतिपादित की गई है। इस व्यवस्था में ब्रह्म सर्वोच्च है, धर्म उसका व्यवहारिक रूप है और समाज उसका जीवंत विस्तार है। व्यक्ति का मूल्य उसके भीतर स्थित आत्मा से है, न कि केवल उसके बाह्य परिचय से।

इसीलिए भारतीय संस्कृति का अंतिम उद्घोष किसी साम्राज्य की स्थापना नहीं, बल्कि आत्मबोध है। "शिवोऽहम्", "अहं ब्रह्मास्मि", "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" और "वसुधैव कुटुम्बकम्" केवल आध्यात्मिक सूत्र नहीं, बल्कि उसी सामाजिक दर्शन के स्तम्भ हैं जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि एक परिवार है और धर्म उसका धारण करने वाला सिद्धान्त।

यही वह दार्शनिक भूमि है जिस पर सनातन वैदिक समाज की सामाजिक संरचना विकसित हुई। इस संरचना को समझने के लिए केवल सामाजिक संस्थाओं का अध्ययन पर्याप्त नहीं, बल्कि उसके आध्यात्मिक और दार्शनिक आधार का अध्ययन अनिवार्य है। जब तक ब्रह्म को नहीं समझा जाएगा, तब तक धर्म का अर्थ अधूरा रहेगा; धर्म को समझे बिना समाज की संरचना अधूरी रहेगी; और समाज की संरचना को उसके मूल दार्शनिक आधार से पृथक करके देखने पर भारतीय सभ्यता का वास्तविक स्वरूप कभी पूर्ण रूप से समझ में नहीं आएगा।

(क्रमशः – भाग 2 : इन्द्र–विरोचन संवाद, आत्मविद्या और देव–असुर की दो जीवन-दृष्टियाँ)

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