सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

भाग–1 भारतीय समाज की संरचना : ब्रह्मसत्ता का दर्शन और पाश्चात्य विमर्श की सीमाएँ


आज यदि किसी विश्वविद्यालय, समाचार चैनल, सामाजिक विमर्श या बौद्धिक गोष्ठी में भारतीय समाज की चर्चा होती है तो कुछ शब्द लगभग अनिवार्य रूप से सुनाई देते हैं—"पितृसत्तात्मक व्यवस्था", "ब्राह्मणवादी पितृसत्ता", "सवर्ण वर्चस्व", "सत्ता का केंद्रीकरण" आदि। धीरे-धीरे इन शब्दों को इस प्रकार स्थापित किया गया कि मानो यही भारतीय समाज का वास्तविक परिचय हों। नई पीढ़ी का एक बड़ा वर्ग इन्हें बिना किसी शास्त्रीय या ऐतिहासिक अध्ययन के अंतिम सत्य मानने लगा है। प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में सनातन वैदिक परम्परा की व्याख्या इन शब्दों से की जा सकती है?

उत्तर स्पष्ट है—नहीं। क्योंकि ये शब्द भारतीय दर्शन से उत्पन्न नहीं हुए हैं। इनकी उत्पत्ति यूरोप के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास में हुई, जहाँ समाज की संरचना राज्य, चर्च और सत्ता-संघर्ष के आधार पर विकसित हुई। भारत का आधार इससे बिल्कुल भिन्न है। यहाँ समाज का मूलाधार ब्रह्म, धर्म और आत्मा है, सत्ता नहीं।

औपनिवेशिक दृष्टि और भारतीय समाज

सन् 1817 में जेम्स मिल ने History of British India लिखी। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि उन्होंने न संस्कृत पढ़ी थी, न भारत की यात्रा की थी और न ही भारतीय दर्शन का प्रत्यक्ष अध्ययन किया था। फिर भी उन्होंने भारतीय इतिहास को "अंधविश्वासी", "पिछड़ा" और "ब्राह्मणों द्वारा नियंत्रित" समाज के रूप में चित्रित किया। बाद में थॉमस मैकॉले की शिक्षा नीति ने भारतीय ज्ञान परम्परा को विद्यालयों से बाहर कर दिया और पश्चिमी इतिहासबोध को स्थापित किया।

मैक्समूलर ने वेदों का संपादन और अनुवाद किया। उनका योगदान महत्वपूर्ण है, किन्तु अनेक भारतीय विद्वानों ने यह भी संकेत किया कि वैदिक शब्दों की व्याख्या कई स्थानों पर यूरोपीय धार्मिक दृष्टिकोण से की गई। परिणामस्वरूप वेदों के दार्शनिक अर्थ के स्थान पर उन्हें केवल प्राचीन धार्मिक ग्रंथ के रूप में प्रस्तुत किया गया।

स्वतंत्रता के बाद अपेक्षा थी कि भारत अपनी ज्ञानपरम्परा के आधार पर स्वयं को समझेगा, किन्तु विश्वविद्यालयों में पश्चिमी समाजशास्त्र और मार्क्सवादी इतिहासलेखन का प्रभाव निरंतर बढ़ता गया। वर्ग-संघर्ष, सत्ता-संघर्ष और लैंगिक संघर्ष के सिद्धांत भारतीय समाज पर आरोपित किए गए। धीरे-धीरे "ब्राह्मणवाद" और "पितृसत्ता" जैसे शब्द अकादमिक शब्दावली से निकलकर सामाजिक विमर्श का हिस्सा बन गए।

भारतीय समाज का आधार क्या है?

यदि कोई व्यक्ति भारतीय समाज को समझना चाहता है तो उसे सबसे पहले यह समझना होगा कि यहाँ अंतिम सत्ता राजा नहीं, संसद नहीं, समाज नहीं और व्यक्ति भी नहीं है। यहाँ अंतिम सत्ता परब्रह्म है।

उपनिषद उद्घोष करते हैं—

"सर्वं खल्विदं ब्रह्म।"
(छान्दोग्य उपनिषद् ३.१४.१)

अर्थात् यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्मस्वरूप है।

इसी प्रकार—

"अहं ब्रह्मास्मि।"
(बृहदारण्यक उपनिषद् १.४.१०)

और

"तत्त्वमसि।"
(छान्दोग्य उपनिषद् ६.८.७)

ये महावाक्य बताते हैं कि आत्मा और ब्रह्म अलग-अलग सत्ता नहीं हैं। प्रत्येक जीव में वही आत्मा विद्यमान है। जब सम्पूर्ण सृष्टि एक ही ब्रह्म का विस्तार है तो वहाँ स्थायी शत्रुता, वर्ग-संघर्ष या जन्मगत श्रेष्ठता का सिद्धांत कैसे हो सकता है?

धर्म क्या है?

पश्चिम में Religion का अर्थ है—एक पैगम्बर, एक पुस्तक और एक उपासना पद्धति।

भारतीय परम्परा में धर्म का अर्थ इससे बिल्कुल भिन्न है।

महाभारत में कहा गया है—

"धारणाद्धर्ममित्याहुः धर्मो धारयति प्रजाः।"

अर्थात् जो सम्पूर्ण प्रजा और सृष्टि को धारण करे वही धर्म है।

इसीलिए धर्म केवल मंदिर जाना नहीं है। माता-पिता की सेवा धर्म है, सत्य बोलना धर्म है, न्याय करना धर्म है, प्रकृति की रक्षा धर्म है, राष्ट्र की रक्षा धर्म है और आत्मा को परब्रह्म की ओर ले जाने वाला प्रत्येक आचरण धर्म है।

इसी कारण अंग्रेज़ी का Religion शब्द धर्म का पूर्ण पर्याय नहीं हो सकता।

चार पुरुषार्थ और भारतीय जीवन

भारतीय जीवन का लक्ष्य केवल अर्थोपार्जन नहीं है। यहाँ जीवन चार पुरुषार्थों पर आधारित है—

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।

अर्थ और काम को भी धर्म के अधीन रखा गया है तथा मोक्ष को अंतिम लक्ष्य माना गया है।

महाभारत में कहा गया है—

"धर्मादर्थश्च कामश्च।"

अर्थात् धर्म से ही अर्थ और काम की सिद्धि होती है।

आज का भौतिकवादी विमर्श अर्थ और काम तक सीमित है। सफलता का अर्थ धन, पद और सत्ता माना जाता है। किन्तु भारतीय दृष्टि कहती है कि धन और भोग साधन हैं, साध्य नहीं। अंतिम लक्ष्य आत्मा का परब्रह्म में लय है।

स्त्री और पुरुष का संबंध

आज कहा जाता है कि भारतीय समाज पितृसत्तात्मक है। यह निष्कर्ष भारतीय दर्शन को समझे बिना दिया गया है।

भारतीय संस्कृति का सबसे अद्भुत प्रतीक अर्धनारीश्वर है। यहाँ शिव और शक्ति एक ही स्वरूप के दो पक्ष हैं। शक्ति के बिना शिव 'शव' हैं और शिव के बिना शक्ति अप्रकट है।

ब्रह्मा के साथ सरस्वती, विष्णु के साथ श्रीलक्ष्मी और शिव के साथ पार्वती का समन्वय यह बताता है कि सृष्टि का आधार सहयोग है, संघर्ष नहीं।

यदि कोई घर चलाने के लिए माता अन्न बनाती है और पिता बाहर कार्य करता है, तो यह सत्ता का प्रश्न नहीं, उत्तरदायित्व का विभाजन है। जैसे शरीर में हृदय और मस्तिष्क दोनों आवश्यक हैं, वैसे ही समाज में स्त्री और पुरुष दोनों पूरक हैं।

वर्णव्यवस्था का वास्तविक स्वरूप

ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में कहा गया है—

"ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥"

इसका अर्थ यह नहीं कि कोई जन्म से श्रेष्ठ और कोई जन्म से हीन है। इसका अर्थ है कि समाज एक विराट पुरुष है और उसके विभिन्न अंग विभिन्न कार्य करते हैं।

क्या शरीर में मस्तिष्क बिना पैरों के चल सकता है? क्या हाथ बिना हृदय के कार्य कर सकते हैं? नहीं। उसी प्रकार समाज के सभी अंग परस्पर पूरक हैं।

इस व्यवस्था का उद्देश्य सत्ता नहीं, धर्म की स्थापना है।

भारत और यूरोप का मूल अंतर

प्लेटो के आदर्श राज्य में राज्य सर्वोच्च संस्था है। यूरोप का राजनीतिक विकास भी राज्य-केंद्रित रहा। चर्च और राज्य के संघर्ष से सेक्युलरिज्म उत्पन्न हुआ।

भारत में स्थिति भिन्न है।

राजा भी धर्म के अधीन है।

राजा जनक ब्रह्मज्ञानी हैं।

भगवान राम लंका जीतकर उसे अपने अधिकार में नहीं रखते, विभीषण को सौंप देते हैं।

भरत सिंहासन पर नहीं बैठते, राम की चरणपादुकाओं को सिंहासन पर स्थापित करते हैं।

अश्वमेध यज्ञ में स्वयं भगवान भी धर्मानुसार विधि का पालन करते हैं।

अर्थात् यहाँ व्यक्ति नहीं, पद नहीं, राज्य नहीं, बल्कि धर्म सर्वोच्च है।

ब्रह्मसत्ता ही अंतिम सत्य

भारतीय दर्शन का सबसे बड़ा सिद्धांत यह है कि यह संसार परिवर्तनशील है। शरीर नश्वर है, पद नश्वर है, सत्ता नश्वर है, राज्य भी नश्वर है।

केवल ब्रह्म शाश्वत है।

इसीलिए भारतीय समाज में राजा संन्यासी बन सकता है और संन्यासी राजाओं का गुरु हो सकता है। विश्वामित्र, वशिष्ठ, याज्ञवल्क्य, जनक और शंकराचार्य की परम्परा इसी सत्य की पुष्टि करती है।

भारतीय समाज को यदि केवल सत्ता, वर्ग और संघर्ष की दृष्टि से देखा जाएगा तो उसका वास्तविक स्वरूप कभी समझ में नहीं आएगा। यह समाज ब्रह्मसत्ता को अंतिम सत्य मानता है। राज्य, समाज, परिवार, वर्ण, आश्रम और व्यक्ति—सभी धर्म के अधीन हैं, और धर्म स्वयं उस शाश्वत ब्रह्म की व्यवस्था है जो सम्पूर्ण सृष्टि को धारण करता है।

इसी मूल सत्य को विस्मृत कर आयातित शब्दों के आधार पर भारतीय समाज का मूल्यांकन किया गया। परिणामस्वरूप "पितृसत्ता" और "ब्राह्मणवाद" जैसे शब्द वास्तविकता से अधिक राजनीतिक उपकरण बन गए। जबकि सनातन वैदिक परम्परा का मूल संदेश है—समस्त सृष्टि एक ही ब्रह्म का विस्तार है, प्रत्येक जीव में वही आत्मा विद्यमान है और मनुष्य का अंतिम लक्ष्य सत्ता नहीं, मोक्ष है।

यही भारतीय समाज की आत्मा है और यही उसके सम्यक् अध्ययन की पहली शर्त है।

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