सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

The Vedic Period : इतिहास नहीं, औपनिवेशिक षड्यंत्र




✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

भारतीय सभ्यता को समझने की सबसे बड़ी समस्या यह है कि भारत को भारत की दृष्टि से नहीं देखा गया। उसे यूरोप और आब्राह्मिक मानसिकता के चश्मे से देखने का प्रयास किया गया। यही कारण है कि हिंदू समाज, वेद, पुराण, वर्णव्यवस्था, कालचक्र, पुनर्जन्म और भारतीय दर्शन सबकी व्याख्या विकृत रूप में प्रस्तुत की गई। मैंने जब भारतीय इतिहास, धर्मदर्शन, वेद, उपनिषद, पुराण, स्मृति-ग्रंथ और आधुनिक इतिहासकारों का लेखन पढ़ा तो बार-बार एक ही बात स्पष्ट हुई कि हिंदू समाज को समझने की मूल कुंजी “काल” की सनातन अवधारणा में छिपी हुई है। जब तक भारतीय काल-दृष्टि को नहीं समझा जाएगा, तब तक हिंदू समाज की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना को समझना असंभव रहेगा।

समस्या की जड़ यह है कि पश्चिम समय को एक सीधी रेखा मानता है। वहाँ सृष्टि का एक आरंभ है और एक अंतिम अंत है। आब्राह्मिक परंपराओं में यही अवधारणा दिखाई देती है। ईसाई धर्मशास्त्री जेम्स अशर ने बाइबिल के आधार पर सृष्टि की रचना 4004 ईसा पूर्व मानी थी। अर्थात् संपूर्ण मानव इतिहास कुछ हजार वर्षों में सीमित कर दिया गया। बाद में यही मानसिकता यूरोपीय इतिहास और औपनिवेशिक शिक्षा का आधार बनी। जब अंग्रेज भारत आए तो वे इसी रेखीय मानसिकता के साथ आए। उन्होंने भारत को भी उसी ढाँचे में फिट करने का प्रयास किया। परिणामस्वरूप “वैदिक काल”, “उत्तर वैदिक काल”, “ब्राह्मण काल” जैसी अवधारणाएँ गढ़ी गईं।

परंतु सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या स्वयं वेद, उपनिषद, पुराण या स्मृतियाँ “वैदिक काल” जैसी किसी अवधारणा को स्वीकार करती हैं? क्या कहीं लिखा है कि वेद किसी विशेष समय में लिखे गए और फिर उनका काल समाप्त हो गया? उत्तर स्पष्ट है नहीं। भारतीय परंपरा में वेदों को “अपौरुषेय” कहा गया है। अर्थात् वे मनुष्यकृत नहीं हैं। मीमांसा दर्शन वेदों को नित्य और सनातन मानता है। शतपथ ब्राह्मण और मनुस्मृति में वेदों की सनातनता का स्पष्ट वर्णन मिलता है। भारतीय परंपरा के अनुसार प्रत्येक सृष्टि-चक्र में वेद पुनः प्रकट होते हैं। इसलिए “वैदिक काल” शब्द स्वयं वैदिक दृष्टि के विरुद्ध है। यह भारतीय अवधारणा नहीं, बल्कि पश्चिमी इतिहास-लेखन द्वारा थोपी गई अवधारणा है।

भारतीय काल-दृष्टि मूलतः चक्रीय है। यहाँ समय रेखा नहीं, कालचक्र है। यहाँ सृष्टि एक बार नहीं बनती। वह बार-बार प्रकट होती है और बार-बार प्रलय में ब्रह्म में लीन हो जाती है। यही कारण है कि भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं “भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।” अर्थात् यह समस्त प्राणीसमूह बार-बार उत्पन्न होता है और पुनः लीन हो जाता है। यही सनातन काल-दृष्टि है।

भारतीय कालगणना की व्यापकता आधुनिक इतिहास की सीमाओं को ध्वस्त कर देती है। एक चतुर्युगी सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग मिलाकर 43,20,000 वर्ष की होती है। ऐसे 71 चतुर्युग मिलकर एक मन्वंतर बनाते हैं। 14 मन्वंतर मिलकर एक कल्प बनाते हैं। विष्णु पुराण, भागवत पुराण तथा महाभारत के अनुसार एक कल्प की अवधि 4 अरब 32 करोड़ वर्ष है। उतनी ही अवधि प्रलय की भी है। अर्थात् सृष्टि और प्रलय का एक पूर्ण चक्र लगभग 8 अरब 64 करोड़ वर्षों का होता है। यह क्रम अनंत है। सृष्टि बनती है, लय को प्राप्त होती है, पुनः प्रकट होती है। यह क्रम कभी रुकता नहीं।

यही कारण है कि भारतीय परंपरा “सनातन” शब्द का प्रयोग करती है। सनातन का अर्थ ही है जिसका न आदि है, न अंत। यहाँ सृष्टि भी सनातन चक्र में है, आत्मा भी शाश्वत है और काल भी अनंत है। इसलिए भारत को कुछ हजार वर्षों के इतिहास में बाँधना स्वयं भारत की आत्मा को नकारना है।

आधुनिक विज्ञान आज ब्रह्मांड की आयु लगभग 13.8 अरब वर्ष मानता है। पृथ्वी की आयु लगभग 4.54 अरब वर्ष मानी जाती है। प्रश्न यह है कि हजारों वर्ष पहले भारतीय ऋषियों ने अरबों वर्षों की कल्पना कैसे कर ली? जब आधुनिक विज्ञान के पास दूरबीन, उपग्रह और आधुनिक गणनाएँ नहीं थीं, तब भारतीय मनीषा इतनी विराट काल-कल्पना कैसे कर रही थी? इसका उत्तर आधुनिक इतिहासकारों के पास नहीं है। वे इसे मिथक कहकर टाल देते हैं, क्योंकि यदि वे इसे गंभीरता से स्वीकार करेंगे तो उनकी पूरी रेखीय इतिहास-दृष्टि ध्वस्त हो जाएगी।

इसी संदर्भ में योग वसिष्ठ का कागभुशुण्डि प्रसंग भारतीय काल-दृष्टि की विराटता को सबसे अधिक स्पष्ट करता है। जब मैंने इस प्रसंग को गंभीरता से पढ़ा, तब यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो गई कि भारतीय मनीषा समय को केवल वर्षों, तिथियों और राजवंशों की गणना के रूप में नहीं देखती थी। यहाँ काल केवल घड़ी की गति नहीं है, बल्कि चेतना, सृष्टि और अस्तित्व का अनंत प्रवाह है। यही कारण है कि कागभुशुण्डि स्वयं कहते हैं कि उन्होंने 11 बार रामायण को घटित होते देखा और 16 बार महाभारत को देखा। यह कथन आधुनिक इतिहास-दृष्टि को सीधी चुनौती देता है।

यदि भारतीय चिंतन केवल रेखीय इतिहास में सोच रहा होता, तो “अनेक राम”, “अनेक महाभारत” और “अनेक ब्रह्मा” जैसी अवधारणाएँ उत्पन्न ही नहीं होतीं। इसका अर्थ स्पष्ट है कि भारतीय दृष्टि में रामायण और महाभारत केवल एक बार घटित होने वाली ऐतिहासिक घटनाएँ नहीं हैं। वे धर्म और अधर्म के सनातन संघर्ष के प्रतीक हैं, जो प्रत्येक कल्प और प्रत्येक युगचक्र में अलग-अलग रूपों में पुनः प्रकट होते रहते हैं। सृष्टि बदलती है, युग बदलते हैं, पात्र बदलते हैं, लेकिन चेतना का संघर्ष और धर्म की पुनर्स्थापना का क्रम चलता रहता है।

यही कारण है कि भारतीय परंपरा “इतिहास” को केवल घटनाओं की सूची नहीं मानती। यहाँ इतिहास चेतना का प्रवाह है। पश्चिमी मानसिकता के लिए यह समझना कठिन है, क्योंकि वह समय को एक सीधी रेखा में देखती है एक आरंभ, एक मध्य और एक अंतिम अंत। इसी कारण उसने पूरी मानव सभ्यता को कुछ हजार वर्षों में बाँध दिया। वहीं भारतीय दृष्टि कहती है कि सृष्टि अनादि है, काल अनंत है और निर्माण-प्रलय का क्रम निरंतर चलता रहता है।

योग वसिष्ठ में कागभुशुण्डि केवल सृष्टि के चक्र की बात नहीं करते, बल्कि वे यह भी बताते हैं कि उन्होंने असंख्य ब्रह्मांडों को उत्पन्न होते और नष्ट होते देखा है। वे कहते हैं कि ब्रह्मांड समुद्र की तरंगों की तरह उठते और विलीन होते रहते हैं। यह कोई साधारण धार्मिक कल्पना नहीं है। आज आधुनिक भौतिकी “Multiverse Theory” की चर्चा कर रही है और यह संभावना व्यक्त कर रही है कि हमारा ब्रह्मांड अकेला नहीं हो सकता। लेकिन भारतीय मनीषा हजारों वर्ष पहले “अनंत कोटि ब्रह्मांड” की बात कर रही थी।

भागवत पुराण में “अनंतकोटि ब्रह्मांडनायक” शब्द आता है। इसका अर्थ केवल इतना नहीं है कि भगवान महान हैं। इसका वास्तविक अर्थ है वह परम चेतना जो अनंत ब्रह्मांडों का संचालन करती है। प्रश्न यह है कि जब दुनिया की अधिकांश सभ्यताएँ पृथ्वी को ही सम्पूर्ण अस्तित्व मान रही थीं, तब भारतीय ऋषि अनंत ब्रह्मांडों की बात क्यों कर रहे थे? यह केवल कल्पना नहीं हो सकती।

यही नहीं, भारतीय परंपरा केवल एक पृथ्वी या एक लोक तक सीमित नहीं रही। यहाँ भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक जैसी अवधारणाएँ मिलती हैं। इसका अर्थ यह है कि भारतीय चिंतन अस्तित्व को बहुस्तरीय और बहुआयामी रूप में देख रहा था। आधुनिक विज्ञान आज अतिरिक्त आयामों, डार्क मैटर और डार्क एनर्जी की चर्चा कर रहा है, जबकि भारतीय मनीषा बहुत पहले स्थूल जगत के परे अनेक स्तरों की बात कर रही थी।

कागभुशुण्डि प्रसंग का एक और अत्यंत गहरा पक्ष है काल की सापेक्षता। योग वसिष्ठ बार-बार यह स्पष्ट करता है कि काल केवल बाहरी गति नहीं है; वह मन और चेतना की अवस्था से जुड़ा हुआ है। वहाँ राजा लवण की कथा आती है, जहाँ कुछ क्षणों में पूरा जीवन बीत जाता है। बाहर की दुनिया में केवल कुछ क्षण बीतते हैं, लेकिन चेतना के भीतर वर्षों का अनुभव हो जाता है। इसका अर्थ यह है कि भारतीय मनीषा समय को केवल स्थिर गणना नहीं मान रही थी।

आधुनिक विज्ञान में अल्बर्ट आइंस्टीन ने सापेक्षता सिद्धांत के माध्यम से कहा कि समय निरपेक्ष नहीं है। गति और परिस्थिति के अनुसार समय बदल सकता है। भारतीय मनीषा योग वसिष्ठ में हजारों वर्ष पहले चेतना के स्तर पर यही बात कह रही थी। यही कारण है कि योग वसिष्ठ में काल को मन की अवस्था तक कहा गया है।

पुराणों को लेकर आधुनिक बुद्धिजीवी वर्ग बार-बार यह आरोप लगाता है कि उनमें विरोधाभास हैं। कहीं एक कथा अलग है, कहीं दूसरी। लेकिन वे जानबूझकर “कल्पभेद” की अवधारणा को छिपा देते हैं। स्वयं पुराण स्पष्ट कहते हैं कि अलग-अलग कल्पों में घटनाओं का स्वरूप बदल सकता है। इसलिए अलग-अलग पुराणों में कथाओं के अलग रूप मिलते हैं। यह विरोधाभास नहीं है, बल्कि चक्रीय सृष्टि-दृष्टि का स्वाभाविक परिणाम है।

शिव पुराण, विष्णु पुराण और देवी भागवत पुराण में कई घटनाओं के वर्णन अलग मिलते हैं, क्योंकि वे भिन्न कल्पों के संदर्भ में हैं। पश्चिमी मानसिकता इसे “Contradiction” कहती है, क्योंकि वह समय को केवल एक रेखा में देखती है। लेकिन भारतीय दृष्टि कहती है कि यदि सृष्टि अनंत बार बनती और मिटती है, तो प्रत्येक कल्प में घटनाओं के स्वरूप बदल सकते हैं।

आज विज्ञान कहता है कि आधुनिक मानव लगभग 2 से 3 लाख वर्ष पुराना है और प्रारंभिक मानव प्रजातियाँ लगभग 15 से 20 लाख वर्षों तक जाती हैं। लेकिन भारतीय ग्रंथ अरबों वर्षों की कालगणना करते हैं। एक कल्प 4 अरब 32 करोड़ वर्षों का बताया गया है। प्रश्न यह है कि यदि मानव सभ्यता इतनी सीमित थी, तो भारतीय ऋषियों ने अरबों वर्षों की अवधारणा कैसे विकसित कर ली? यह केवल कल्पना नहीं हो सकती। यह किसी अत्यंत विकसित चेतना, गहन तप और उच्च आध्यात्मिक अनुभूति का परिणाम था।

इसीलिए भारतीय ज्ञानपरंपरा को केवल धार्मिक परंपरा मानना बहुत बड़ी भूल है। यह सभ्यता काल, चेतना, सृष्टि और ब्रह्मांड के अत्यंत गहरे अध्ययन पर आधारित थी। योग वसिष्ठ का कागभुशुण्डि प्रसंग स्पष्ट रूप से बताता है कि भारतीय मनीषा सृष्टि को सीमित इतिहास की दृष्टि से नहीं, बल्कि अनंत कालचक्र की दृष्टि से देखती थी। इसलिए हिंदू सभ्यता को कुछ हजार वर्षों के “वैदिक काल” में बाँधना केवल औपनिवेशिक मानसिकता का परिणाम है, भारतीय दृष्टि का नहीं।

ऋग्वेद के नासदीय सूक्त को जब गहराई से पढ़ते हैं तो स्पष्ट दिखाई देता है कि वेद सामान्य मानवीय बुद्धि की रचना नहीं हैं। “तदा न आसीन्नो सदासीत्तदानीम्” — अर्थात् उस अवस्था में न सत था, न असत। यह कोई साधारण दार्शनिक वाक्य नहीं है। यह उस अवस्था का वर्णन है जहाँ सृष्टि अभी प्रकट नहीं हुई थी, जहाँ अस्तित्व और अनस्तित्व दोनों की सामान्य धारणाएँ भी लागू नहीं होतीं। यही कारण है कि वेदों को अपौरुषेय कहा गया। हमारे ऋषियों ने वेदों की रचना नहीं की; उन्होंने उस सनातन ज्ञान का साक्षात्कार किया जो सृष्टि के प्रत्येक चक्र में विद्यमान रहता है। सृष्टि के प्रारंभ में वही ज्ञान ऋषियों को पुनः प्राप्त होता है और फिर वही ज्ञान श्रुति परंपरा के माध्यम से लोक में प्रवाहित होता है।

यहीं भारतीय दृष्टि और पश्चिमी दृष्टि का मूल अंतर दिखाई देता है। पश्चिम हर ज्ञान को किसी मनुष्य की बौद्धिक रचना मानता है। वहाँ हर विचार का एक आरंभ होता है, एक लेखक होता है और एक ऐतिहासिक काल होता है। लेकिन भारतीय परंपरा वेदों को किसी एक समय में उत्पन्न हुआ ज्ञान नहीं मानती। वेद सनातन हैं। इसलिए “वैदिक काल” जैसी अवधारणाएँ भारतीय दृष्टि से कभी पूर्ण सत्य नहीं हो सकतीं। वे पश्चिमी इतिहास-दृष्टि का परिणाम हैं, जहाँ सब कुछ रेखीय समय में बाँधकर देखा जाता है।

आज आधुनिक विज्ञान “Quantum Vacuum” और ब्रह्मांडीय शून्यता की चर्चा करता है। वैज्ञानिक कहते हैं कि सृष्टि पूर्ण रिक्तता से नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म अव्यक्त अवस्था से प्रकट हुई होगी। भारतीय ऋषियों ने हजारों वर्ष पहले नासदीय सूक्त में उसी अवस्था का दार्शनिक स्वरूप व्यक्त कर दिया था। यही कारण है कि भारतीय दर्शन में “शून्य” का अर्थ केवल खालीपन नहीं है। यहाँ शून्य अव्यक्त चेतना की अवस्था भी है, जहाँ समस्त सृष्टि संभाव्यता के रूप में विद्यमान रहती है।

भारतीय मनीषा सृष्टि को स्थिर वस्तु नहीं मानती। यहाँ सृष्टि निरंतर प्रकट और अप्रकट होती रहती है। निर्माण, स्थिति और प्रलय यही सनातन क्रम है। यही कारण है कि भारतीय ग्रंथों में अरबों वर्षों की कालगणना मिलती है। एक कल्प 4 अरब 32 करोड़ वर्षों का बताया गया है। यह कोई सामान्य कल्पना नहीं है। जब दुनिया की अधिकांश सभ्यताएँ कुछ हजार वर्षों के भीतर सोच रही थीं, तब भारतीय मनीषा ब्रह्मांडीय कालचक्र की बात कर रही थी।

भारतीय समाज की संरचना भी इसी सनातन और समन्वयी दृष्टि पर आधारित थी। ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में समाज को “विराट पुरुष” का शरीर कहा गया। यह केवल सामाजिक व्यवस्था का वर्णन नहीं है, बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक अवधारणा है। इसका अर्थ यह है कि समाज कोई यांत्रिक समूह नहीं, बल्कि एक जीवित चेतन इकाई है। जिस प्रकार शरीर के प्रत्येक अंग का अपना महत्व होता है, उसी प्रकार समाज के प्रत्येक वर्ग का अपना दायित्व और स्थान है।

ब्राह्मण मुख हैं, क्षत्रिय भुजाएँ, वैश्य जंघाएँ और शूद्र चरण। आधुनिक राजनीति और पश्चिम-प्रभावित विमर्श ने इस प्रतीक को जानबूझकर ऊँच-नीच और शोषण का आधार बनाकर प्रस्तुत किया। लेकिन भारतीय परंपरा में चरण सबसे अधिक पूजनीय माने गए। कोई हिंदू अपने गुरु, माता-पिता या भगवान के मुख को स्पर्श नहीं करता; वह चरण स्पर्श करता है। चरण सेवा, समर्पण और आधार के प्रतीक हैं।

यदि चरण हीन होते तो भरत भगवान राम की पादुका सिंहासन पर स्थापित न करते। राम स्वयं वन में थे, लेकिन अयोध्या का शासन उनकी पादुकाओं के माध्यम से चलाया गया। यह केवल भक्ति नहीं, बल्कि भारतीय प्रतीक-दृष्टि का गहरा संदेश है कि चरण सत्ता और धर्म के आधार हैं। यदि चरण तुच्छ होते तो “चरणामृत” की परंपरा कभी उत्पन्न न होती। मंदिरों में भगवान के चरणों का जल अमृत मानकर ग्रहण किया जाता है। संत परंपरा में “चरण शरण” को मोक्ष का मार्ग कहा गया। भक्त कबीर, तुलसीदास, सूरदास सभी ने चरणों को ही भक्ति और समर्पण का प्रतीक माना।

भारतीय संस्कृति में चरणों का अर्थ केवल शरीर का अंग नहीं है। चरण गति हैं, आधार हैं, धारण करने वाली शक्ति हैं। शरीर स्वयं चरणों के कारण खड़ा रह सकता है। इसलिए पुरुषसूक्त को आधुनिक जातीय राजनीति के चश्मे से समझना मूलतः भारतीय प्रतीक-दृष्टि को न समझ पाने का परिणाम है।

इसी प्रकार भगवद्गीता में श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं — “चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।” अर्थात् वर्ण व्यवस्था गुण, कर्म और स्वभाव पर आधारित है। यहाँ जन्म का उल्लेख नहीं है। भारतीय परंपरा में मनुष्य का मूल्य उसकी चेतना, उसके गुण और उसके कर्म से निर्धारित होता था।

भारतीय इतिहास और परंपरा में इसके असंख्य उदाहरण मिलते हैं। महर्षि वाल्मीकि जन्म से ब्राह्मण नहीं थे, फिर भी महर्षि बने और रामायण जैसे महाकाव्य के रचयिता बने। यदि वर्ण केवल जन्म से निर्धारित होता, तो उन्हें कभी यह स्थान नहीं मिलता।

वेदव्यास मिश्र वंश में जन्मे, फिर भी वेदों के संहिताकर्ता और महाभारत के रचयिता बने। आज पूरा सनातन समाज उन्हें “व्यासपीठ” का आदर देता है। यह इस बात का प्रमाण है कि भारतीय परंपरा में आध्यात्मिक पात्रता जन्म से ऊपर थी।

सत्यकाम जाबाल का प्रसंग और भी महत्वपूर्ण है। जब उनसे उनके गोत्र के विषय में पूछा गया, तो उनकी माता ने स्पष्ट कहा कि उन्हें स्वयं उनके पिता का ज्ञान नहीं है। फिर भी उनकी सत्यप्रियता देखकर उन्हें ब्रह्मविद्या का अधिकारी माना गया। यदि जन्म ही अंतिम आधार होता, तो उन्हें वेदांत का ज्ञान प्राप्त करने की अनुमति कभी न मिलती।

यही वह पक्ष है जिसे आधुनिक विमर्श जानबूझकर छिपा देता है। भारतीय समाज को उसकी आध्यात्मिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि से काटकर केवल जातीय संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया गया। जबकि भारतीय दृष्टि समाज को संघर्षरत वर्गों में नहीं, बल्कि एकात्म चेतना में देखती है। यही कारण है कि यहाँ समाज को “विराट पुरुष” कहा गया। अर्थात् ऐसा जीवित अस्तित्व जहाँ प्रत्येक अंग आवश्यक है और सभी मिलकर ही पूर्णता का निर्माण करते हैं।

भारतीय समाज की मूल आत्मा समन्वय थी, संघर्ष नहीं। कर्तव्य था, केवल अधिकार नहीं। आध्यात्मिक पात्रता थी, केवल जन्म नहीं। यही कारण है कि सनातन व्यवस्था हजारों वर्षों तक इतनी विशाल और जीवित बनी रही।

औपनिवेशिक और मार्क्सवादी इतिहास-लेखन ने भारतीय समाज को केवल संघर्ष, जाति और शोषण के ढाँचे में प्रस्तुत किया। क्योंकि यदि वे भारतीय काल-दृष्टि और आध्यात्मिक आधार को स्वीकार कर लेते, तो उनकी पूरी वैचारिक संरचना ढह जाती। इसलिए भारत को उसकी आत्मा से काटकर प्रस्तुत किया गया। परंतु सत्य यह है कि भारत केवल एक राष्ट्र नहीं, बल्कि सनातन चेतना की अभिव्यक्ति है। यहाँ काल भी अनंत है, सृष्टि भी अनंत है और ब्रह्मांड भी अनंत हैं।

इसी कारण भारतीय ज्ञानपरंपरा को केवल धार्मिक परंपरा मानना बहुत बड़ी भूल है। यह सभ्यता केवल पूजा-पद्धति पर आधारित नहीं थी। यह अस्तित्व, काल, चेतना और ब्रह्मांड के अत्यंत गहरे अध्ययन पर आधारित सभ्यता थी। इसलिए “वैदिक काल” जैसी अवधारणाएँ भारतीय दृष्टि से अधूरी ही नहीं, बल्कि भ्रामक प्रतीत होती हैं। भारतीय परंपरा स्वयं को किसी सीमित ऐतिहासिक कालखंड में बाँधती ही नहीं। यहाँ वेद सनातन हैं, सृष्टि चक्रीय है, ब्रह्मांड अनंत हैं और काल अनादि है। यही सनातन दृष्टि है और यही हिंदू सभ्यता की वास्तविक आत्मा है।

टिप्पणियाँ