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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
संयुक्त राष्ट्र का सतत् विकास लक्ष्य 2030 (एस डी जी 2030) आज केवल विकास, पर्यावरण या निर्धनता उन्मूलन का कार्यक्रम नहीं रह गया है। यह एक व्यापक वैश्विक वैचारिक ढाँचा बन चुका है, जिसके माध्यम से मानव सभ्यता की मूल संरचनाओं धर्म, परिवार, संस्कृति, शिक्षा, राष्ट्रीय चेतना और आर्थिक स्वायत्तता को पुनर्गठित करने का प्रयास किया जा रहा है। इस परियोजना को “मानवता”, “समानता”, “समावेशन”, “सामाजिक न्याय”, “जलवायु संरक्षण” और “वैश्विक नागरिकता” जैसे आकर्षक नारों में प्रस्तुत किया जाता है, किन्तु इसकी वास्तविक दिशा पारंपरिक समाजों को कमजोर कर एक केंद्रीकृत वैश्विक व्यवस्था स्थापित करने की ओर दिखाई देती है। भारत जैसे देशों के लिए यह खतरा और भी बड़ा है, क्योंकि भारत अब भी परिवार, धर्म, परंपरा और सांस्कृतिक निरंतरता पर आधारित सभ्यता है। यदि इन स्तंभों को व्यवस्थित रूप से कमजोर किया गया, तो केवल राजनीतिक परिवर्तन नहीं होगा, बल्कि सभ्यतागत विघटन प्रारम्भ होगा।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र की स्थापना अंतर्राष्ट्रीय शांति के उद्देश्य से हुई थी। परन्तु 1970 के दशक के बाद उसकी प्रभावशीलता घटने लगी। इसी समय पश्चिमी वैश्विक शक्तियों, वित्तीय संस्थानों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, विश्व आर्थिक मंच, वैश्विक मीडिया नेटवर्कों, आइवी लीग विश्वविद्यालयों और कल्चरल मार्क्सवादी बौद्धिक समूहों ने संयुक्त राष्ट्र को एक नए वैचारिक औजार में बदलना प्रारम्भ किया। अब उसका कार्य केवल युद्ध रोकना नहीं, बल्कि राष्ट्रों की आंतरिक नीतियों शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवार, लैंगिकता, संस्कृति और सामाजिक संरचना को प्रभावित करना बन गया।
2000 में सहस्राब्दि विकास लक्ष्य और 2015 में सतत् विकास लक्ष्य (SDG 2030) इसी प्रक्रिया के औपचारिक चरण थे। पहली दृष्टि में ये लक्ष्य सकारात्मक लगते हैं निर्धनता समाप्त करना, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, लैंगिक समानता आदि। लेकिन जब इनके भीतर छिपी वैचारिक परतों को देखा जाता है, तब स्पष्ट होता है कि यह केवल विकास कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक पुनर्गठन की परियोजना है।
सबसे पहले जलवायु परिवर्तन को वैश्विक संकट के रूप में स्थापित किया गया। पृथ्वी को बचाने के नाम पर भय का वातावरण तैयार किया गया। “क्लाइमेट इमरजेंसी”, “नेट जीरो”, “कार्बन फुटप्रिंट” और “सस्टेनेबिलिटी” जैसे शब्दों के माध्यम से यह प्रचारित किया गया कि अब सम्पूर्ण मानव समाज को वैश्विक नियमों के अनुसार चलना होगा। इसके बाद इसी ढाँचे में शिक्षा, स्वास्थ्य, लैंगिक पहचान, मानवाधिकार, प्रवासन, नस्लवाद, सामाजिक न्याय और यौन शिक्षा जैसे विषय जोड़ दिए गए। यही वह बिंदु है जहाँ पर्यावरण संरक्षण की आड़ में एक व्यापक वैचारिक एजेंडा प्रवेश करता है।
यहीं से कल्चरल मार्क्सवाद की भूमिका प्रारम्भ होती है। पारंपरिक मार्क्सवाद आर्थिक संघर्ष पर आधारित था, किन्तु सोवियत संघ की विफलता के बाद पश्चिमी वामपंथी विचारकों ने यह समझ लिया कि समाज को केवल आर्थिक क्रांति से नहीं बदला जा सकता। फ्रैंकफर्ट स्कूल और ग्राम्शीवादी विचारधारा ने यह सिद्धांत विकसित किया कि पश्चिमी और प्राचीन सभ्यताओं की वास्तविक शक्ति उनकी संस्कृति, परिवार, धर्म और राष्ट्रीय चेतना में निहित है। इसलिए यदि समाज को नियंत्रित करना है, तो इन संस्थाओं को भीतर से तोड़ना होगा। यही “कल्चरल मार्क्सवाद” है।
अब संघर्ष मजदूर और पूँजीपति के बीच नहीं, बल्कि पुरुष और महिला, बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक, धर्म और तथाकथित प्रगतिशीलता, परिवार और व्यक्तिगत स्वच्छंदता, राष्ट्रवाद और वैश्विकता के बीच निर्मित किया गया। समाज को स्थायी रूप से “उत्पीड़क” और “उत्पीड़ित” वर्गों में बाँटना इस विचारधारा की मूल रणनीति है।
अमेरिका में “क्रिटिकल रेस थ्योरी” इसी परियोजना का उदाहरण है। इस सिद्धांत के अनुसार समाज की प्रत्येक संरचना कानून, शिक्षा, संस्कृति मूलतः दमनकारी है। अब यही मॉडल अन्य देशों में अलग-अलग रूपों में लागू किया जा रहा है। भारत में इसे जाति, ब्राह्मणवाद, पितृसत्ता और सामाजिक न्याय के नाम पर आगे बढ़ाया जा रहा है। विश्वविद्यालयों, मीडिया और एनजीओ नेटवर्कों के माध्यम से युवाओं को यह सिखाया जा रहा है कि उनकी सभ्यता मूलतः दमनकारी है और उन्हें अपनी परंपराओं से मुक्त होना चाहिए।
यह पूरी प्रक्रिया केवल विचारधारा से नहीं चलती; इसके पीछे विशाल वैश्विक वित्तीय और संस्थागत तंत्र कार्य करता है। विश्व आर्थिक मंच (WEF), ब्लैकरॉक, वैनगार्ड, स्टेट स्ट्रीट जैसी निवेश कंपनियाँ, अंतर्राष्ट्रीय परामर्शदाता संस्थाएँ, वैश्विक फाउंडेशन, आइवी लीग विश्वविद्यालय और अंतर्राष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन मिलकर नीतियाँ तैयार करते हैं। फिर इन्हें संयुक्त राष्ट्र के दस्तावेजों, वैश्विक रिपोर्टों और “मानवाधिकार” के नाम पर राष्ट्रों पर लागू किया जाता है।
जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन, रॉकफेलर फाउंडेशन और अन्य वैश्विक नेटवर्क शिक्षा, मीडिया, स्वास्थ्य और सामाजिक आंदोलनों को वित्तपोषित करते हैं। विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों को शोध अनुदान दिए जाते हैं। मीडिया को फंडिंग दी जाती है। एनजीओ को सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता, अल्पसंख्यक अधिकार, जलवायु परिवर्तन और यौन शिक्षा के नाम पर वित्तीय सहायता दी जाती है। फिर यही एनजीओ सरकारों पर दबाव बनाते हैं, अदालतों में याचिकाएँ दायर करते हैं, पाठ्यक्रम बदलवाते हैं और नई नीतियों को “वैश्विक मानक” बताकर लागू करवाते हैं।
भारत में नई शिक्षा नीति, सामाजिक-भावनात्मक शिक्षा (SEL), व्यापक यौन शिक्षा (CSE), वैश्विक नागरिकता शिक्षा (GCE) और क्षमता-आधारित शिक्षा (CBE) जैसे मॉडल इसी वैश्विक ढाँचे से प्रभावित दिखाई देते हैं। इनका उद्देश्य केवल शिक्षा सुधार नहीं, बल्कि बच्चों की मानसिक संरचना को बदलना है।
सामाजिक-भावनात्मक शिक्षा (SEL) बच्चों को पारंपरिक नैतिकता से हटाकर “वैश्विक नैतिकता” की ओर ले जाती है। परिवार, धर्म और संस्कृति से मिलने वाली शिक्षा को “पुराना” और “दमनकारी” बताया जाता है। बच्चों को यह सिखाया जाता है कि उनकी प्राथमिक पहचान परिवार या धर्म नहीं, बल्कि “वैश्विक समुदाय” है।
व्यापक यौन शिक्षा (CSE) इस परियोजना का सबसे खतरनाक भाग है। यूनेस्को और विश्व स्वास्थ्य संगठन से जुड़े दस्तावेजों में अत्यल्प आयु के बच्चों तक लैंगिक पहचान, यौन व्यवहार, समलैंगिकता, हस्तमैथुन और यौन प्रयोगशीलता जैसे विषय पहुँचाने की अनुशंसा की गई। पश्चिमी देशों में 5–8 वर्ष के बच्चों को “जेंडर फ्लुइडिटी”, “सेक्सुअल प्लेज़र” और “जेंडर एक्सपेरिमेंटेशन” जैसे विषय पढ़ाए गए। यही मॉडल धीरे-धीरे भारत सहित अन्य देशों में भी लाने का प्रयास हो रहा है।
यह केवल स्वास्थ्य शिक्षा नहीं है। इसका उद्देश्य बच्चों को परिवार और संस्कृति से काटना है। जब पाँच वर्ष का बच्चा अपनी लैंगिक पहचान पर संदेह करने लगे, जब उसे यह सिखाया जाए कि माता-पिता की मान्यताएँ “पुरानी सोच” हैं, तब परिवार की भूमिका स्वतः कमजोर होने लगती है।
वैश्विक नागरिकता शिक्षा (GCE) बच्चों को राष्ट्र और सभ्यता से ऊपर “वैश्विक नागरिक” बनाना चाहती है। इसका परिणाम यह होता है कि नई पीढ़ी अपने इतिहास, धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीय हितों से भावनात्मक रूप से कटने लगती है। यदि किसी समाज की नई पीढ़ी अपनी जड़ों से कट जाए, तो वह केवल वैश्विक बाजार और कॉर्पोरेट ढाँचों के लिए उपयुक्त श्रमशक्ति बनकर रह जाती है।
यही कारण है कि आज का युवा “कौशल आधारित श्रमिक” बनाने पर जोर दिया जा रहा है। क्षमता-आधारित शिक्षा (CBE) में ज्ञान, दर्शन, इतिहास और सांस्कृतिक चेतना की जगह “स्किल”, “बिहेवियर” और “कम्पिटेन्सी” को महत्व दिया जा रहा है। इसका अंतिम परिणाम यह होगा कि भारत का युवा अपनी सभ्यता से कटा हुआ, सांस्कृतिक रूप से रिक्त और केवल वैश्विक कंपनियों के लिए काम करने वाला श्रमिक बन जाएगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चीन स्वयं इन वैश्विक नीतियों को पूर्ण रूप से लागू नहीं करता। चीन अपनी राष्ट्रीय संस्कृति, शिक्षा, परिवार संरचना और जनसंख्या नीति पर पूर्ण नियंत्रण बनाए रखता है। उसने पश्चिमी वोक विचारधारा, व्यापक यौन शिक्षा और पहचान की राजनीति को अपने समाज में प्रवेश नहीं करने दिया। चीन वैश्विक संस्थाओं का उपयोग अपने आर्थिक और राजनीतिक हितों के लिए करता है, लेकिन भारत जैसे देशों पर वही नीतियाँ थोपने का समर्थन करता है जो उनकी सांस्कृतिक संरचना को कमजोर कर सकती हैं।
भारत में स्थिति अधिक गंभीर इसलिए है क्योंकि यहाँ की सरकारें, विश्वविद्यालय, मीडिया और नीति-निर्माता बिना गहराई से समझे इन वैश्विक मॉडलों को “प्रगतिशील सुधार” मानकर स्वीकार कर रहे हैं। पश्चिमी देशों में जिन नीतियों के दुष्परिणाम सामने आ चुके हैं टूटते परिवार, घटती जन्मदर, मानसिक अवसाद, पहचान संकट, अकेलापन और सामाजिक विघटन उन्हीं मॉडलों को भारत में आधुनिकता और सुधार के नाम पर लागू किया जा रहा है।
इस पूरी परियोजना को समझने के लिए उस दस-स्तरीय वैचारिक प्रक्रिया को समझना आवश्यक है जिसके माध्यम से जलवायु विमर्श को वैश्विक सामाजिक पुनर्गठन में बदला गया।
पहला चरण था जलवायु परिवर्तन को पर्यावरणीय समस्या के रूप में प्रस्तुत करना। प्रारम्भ में बात केवल प्रदूषण, कार्बन उत्सर्जन और प्राकृतिक संसाधनों तक सीमित थी। परन्तु शीघ्र ही इसे “जलवायु आपातकाल” का रूप दिया गया। मीडिया, विश्वविद्यालयों और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने यह वातावरण बनाया कि पृथ्वी विनाश के कगार पर है और यदि वैश्विक नियंत्रण नहीं हुआ तो मानवता समाप्त हो जाएगी।
दूसरा चरण था पर्यावरण को “संवहनीयता” से जोड़ना। अब केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि सम्पूर्ण आर्थिक और सामाजिक ढाँचे को “सस्टेनेबल” घोषित मानकों के अनुसार चलाने की बात होने लगी। विकासशील देशों पर दबाव बनाया गया कि वे अपने औद्योगिक विकास को वैश्विक जलवायु लक्ष्यों के अनुसार सीमित करें। उदाहरण के लिए, पश्चिमी देशों ने दशकों तक जीवाश्म ईंधनों का उपयोग कर औद्योगिक समृद्धि प्राप्त की, परन्तु अब वही विकासशील देशों को कार्बन उत्सर्जन कम करने का उपदेश देते हैं।
तीसरा चरण था संवहनीयता को विकास के साथ मिलाकर “सतत् विकास” बनाना। अब निर्धनता, शिक्षा, स्वास्थ्य, लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय जैसे विषयों को जलवायु विमर्श के भीतर जोड़ा गया। इससे संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक संस्थाओं को राष्ट्रों की आंतरिक नीतियों में हस्तक्षेप का नैतिक आधार मिल गया।
चौथा चरण था मानवाधिकार आंदोलन के भीतर कल्चरल मार्क्सवाद का प्रवेश। नस्लवाद-विरोध, सामाजिक न्याय और लैंगिक समानता के नाम पर समाज को स्थायी अपराधबोध और विभाजन की मानसिकता में ढाला गया। “व्हाइट प्रिविलेज”, “ब्राह्मणवादी संरचना”, “टॉक्सिक मैस्कुलिनिटी” जैसे शब्द इसी प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
पाँचवाँ चरण था पहचान की राजनीति का विस्तार। पीड़ित होने का दावा करने वाले सभी प्रकार के समूहों को इसमें सम्मिलित होने दिया गया और इस प्रकार, जिसे 'वोकइस्म' के रूप में जाना जाता है, वह सतत् विकास का अंग बन गया। इससे 'उत्पीड़ित' लोगों के रूप में पुल जी बी टी क्यु आई ए+, दलित, मुसलमान, खालिस्तानी और अन्य लोग आ गए - सतत् विकास की बड़ी परिभाषा में सभी प्रकार के कारण सम्मिलित हो गए
छठा चरण था सोशल इमोशनल लर्निंग (SEL) का प्रवेश। इस तरह के व्यापक परिवर्तन के लिए मनुष्यों के सोचने और अनुभव करने के तरीके को फिर से संगठित करने की आवश्यकता है। इसलिए, विशेषज्ञों और सलाहकारों के एक समूह द्वारा 'सामाजिक भावनात्मक शिक्षा' 'सोशल इमोशनल लर्निंग' (एस ई एल) को तैयार किया गया और विश्वव्यापी रूप से शिक्षा का मूलमंत्न बना दिया गया।
सातवाँ चरण थाकॉम्प्रिहेन्सिव सेक्सुअलिटी एजुकेशन (CSE)। यूनेस्को और विश्व स्वास्थ्य संगठन से जुड़े दस्तावेजों में कम आयु के बच्चों को लैंगिक पहचान, यौन अधिकार, यौन व्यवहार और जेंडर विविधता से संबंधित शिक्षा देने की अनुशंसा की गई। कई यूरोपीय देशों में 5–8 वर्ष के बच्चों तक को यौन व्यवहार और लैंगिक प्रयोगशीलता से जुड़े विषय पढ़ाए गए। यह प्रक्रिया परिवार संस्था को कमजोर करती है क्योंकि बच्चों के नैतिक मार्गदर्शन का केंद्र माता-पिता से हटाकर वैश्विक वैचारिक ढाँचे को बना दिया जाता है।
आठवाँ चरण था बच्चों में लैंगिक प्रयोगशीलता को सामान्य बनाना। अनेक विद्यालयों में “प्राइड कार्यक्रम”, “ड्रैग क्वीन स्टोरी आवर” और जेंडर परिवर्तन को प्रोत्साहित करने वाली गतिविधियाँ चलायी गईं। अमेरिका के कुछ राज्यों में माता-पिता से बच्चों की जेंडर पहचान छिपाने के नियमों पर विवाद हुआ।
नौवाँ चरण था ग्लोबल सिटिज़नशिप एजुकेशन (GCE)। बच्चों को यह सिखाया जाने लगा कि उनकी सर्वोच्च निष्ठा अपने राष्ट्र या संस्कृति से नहीं, बल्कि वैश्विक समुदाय से होनी चाहिए। इससे राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक अस्मिता कमजोर होती है। यूरोप में बढ़ती सांस्कृतिक असुरक्षा और पहचान संकट इसी प्रक्रिया का परिणाम माना जा रहा है।
दसवाँ चरण था कम्पिटेन्सी बेस्ड एजुकेशन (CBE)। अब शिक्षा का केंद्र ज्ञान नहीं, बल्कि “व्यवहार” और “दृष्टिकोण” बन गया। विद्यार्थियों को किस प्रकार सोचना चाहिए, किस प्रकार प्रतिक्रिया देनी चाहिए और किन मूल्यों को स्वीकार करना चाहिए यह सब शिक्षा प्रणाली के माध्यम से नियंत्रित किया जाने लगा।
इस पूरे ढाँचे के पीछे केवल वैचारिक नहीं, बल्कि आर्थिक शक्तियाँ भी सक्रिय हैं। विश्व आर्थिक मंच (WEF), ब्लैकरॉक, वैनगार्ड, स्टेट स्ट्रीट जैसी निवेश कंपनियाँ, सिलिकॉन वैली की तकनीकी कंपनियाँ, अरबपति फाउंडेशन और अंतर्राष्ट्रीय परामर्शदाता संस्थाएँ नीति निर्माण को प्रभावित कर रही हैं। क्लाउस श्वाब की पुस्तक “द ग्रेट रीसेट” में स्पष्ट रूप से वैश्विक आर्थिक और सामाजिक पुनर्गठन की बात कही गई। कोविड महामारी के बाद “बिल्ड बैक बेटर” जैसे नारे लगभग समान शब्दों में अनेक देशों में दिखाई दिए। यह वैश्विक नीति समन्वय का संकेत था।
जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन, रॉकफेलर फाउंडेशन तथा अन्य वैश्विक नेटवर्क शिक्षा, मीडिया, स्वास्थ्य और सामाजिक आंदोलनों को वित्तपोषित करते हैं। इन संस्थाओं के माध्यम से पाठ्यक्रम, मीडिया नैरेटिव और सामाजिक विमर्श प्रभावित किए जाते हैं।
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा खतरा राष्ट्रीय संप्रभुता के क्षरण में है। जब नीति-निर्माण स्थानीय समाज और लोकतांत्रिक इच्छाशक्ति के बजाय वैश्विक संस्थाओं द्वारा प्रभावित होने लगे, तब राष्ट्र केवल प्रशासनिक इकाइयाँ बनकर रह जाते हैं।
दूसरा खतरा परिवार संस्था के विघटन का है। पश्चिमी देशों में टूटते परिवार, घटती जन्मदर, अकेलापन, मानसिक अवसाद और पहचान संकट इसी सामाजिक विघटन के परिणाम हैं। जापान, यूरोप और अमेरिका में जन्मदर ऐतिहासिक रूप से गिर चुकी है। पारंपरिक परिवार कमजोर होने पर समाज अधिक अस्थिर और राज्य पर अधिक निर्भर बनता है।
तीसरा खतरा सांस्कृतिक स्मृति के विनाश का है। जब किसी समाज को उसके इतिहास, धर्म और परंपराओं से काट दिया जाता है, तब वह वैचारिक रूप से रिक्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में वैश्विक विचारधारा आसानी से नियंत्रण स्थापित कर लेती है।
चौथा खतरा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंत का है। सोशल मीडिया कंपनियाँ, विश्वविद्यालय और मीडिया संस्थान तय कर रहे हैं कि कौन-सा विचार स्वीकार्य है। कोविड महामारी, जेंडर विचारधारा और वैश्विक एजेंडों पर प्रश्न उठाने वाले अनेक वैज्ञानिकों, पत्रकारों और शिक्षकों को सेंसरशिप का सामना करना पड़ा।
पारंपरिक उदारवाद और आधुनिक वोक विचारधारा का अंतर यहाँ स्पष्ट हो जाता है।
पारंपरिक उदारवाद कहता था हर व्यक्ति को बोलने का अधिकार है। आधुनिक वोक विचारधारा कहती है केवल वही विचार स्वीकार्य हैं जो हमारी विचारधारा से सहमत हों।
पारंपरिक उदारवाद व्यक्ति की योग्यता को महत्व देता था। आधुनिक वोक राजनीति समूह पहचान को प्राथमिकता देती है।
उदारवाद अवसर की समानता चाहता था; वोक विचारधारा परिणामों की समानता थोपना चाहती है।
उदारवाद कानून के समक्ष समानता की बात करता था; वोक विचारधारा “ऐतिहासिक अन्याय” के नाम पर समूह-आधारित विशेषाधिकारों को बढ़ावा देती है।
उदारवाद सांस्कृतिक बहुलता का समर्थन करता था; वोक विचारधारा परंपरागत संस्कृतियों को “दमनकारी” बताकर उन्हें बदलना चाहती है।
उदारवाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करता था; वोक विचारधारा कैंसल कल्चर और डिजिटल सेंसरशिप का उपयोग करती है।
आज पश्चिम में परिवार संस्था टूट रही है। विवाह दर घट रही है। बच्चे मानसिक तनाव और पहचान संकट से जूझ रहे हैं। अमेरिका और यूरोप में अवसाद, नशाखोरी और आत्महत्या की समस्याएँ लगातार बढ़ रही हैं। यह केवल आर्थिक कारणों से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विघटन का परिणाम है। वही मॉडल अब भारत में लाया जा रहा है।
यह संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत अस्तित्व का संघर्ष है। यदि भारत की नई पीढ़ी को उसकी संस्कृति, धर्म, इतिहास और परिवार से काट दिया गया, यदि उसे केवल “वैश्विक नागरिक” और “कॉर्पोरेट श्रमिक” बनाकर तैयार किया गया, यदि बच्चों के मानस में प्रारम्भ से ही लैंगिक भ्रम और सांस्कृतिक अपराधबोध भर दिया गया, तो आने वाले दशकों में भारत की सभ्यतागत निरंतरता गंभीर संकट में पड़ सकती है।
सभ्यताएँ केवल युद्ध से नष्ट नहीं होतीं; वे तब नष्ट होती हैं जब उनकी नई पीढ़ी अपनी जड़ों को भूल जाती है। एस डी जी 2030 के माध्यम से चल रही यह वैश्विक वैचारिक परियोजना उसी दिशा में कार्य कर रही है जहाँ राष्ट्र केवल प्रशासनिक इकाइयाँ बन जाएँ, परिवार कमजोर हो जाएँ, धर्म निजी अपराध जैसा प्रतीत होने लगे, संस्कृति उपहास का विषय बन जाए और मानव समाज वैश्विक बाजार शक्तियों तथा केंद्रीकृत वैचारिक नियंत्रण के अधीन आ जाए।
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