सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

पुण्यभूमि भारत


✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

भारत को यदि केवल आधुनिक राजनीति की भाषा में समझने का प्रयास किया जाए, तो भारत कभी समझ में नहीं आएगा। यही आज की सबसे बड़ी बौद्धिक भूल है। यूरोप के इतिहास से निकले हुए शब्द—नेशन, नेशनलिज़्म, सेकुलरिज़्म, राइट, लेफ्ट, सोशलिज़्म—इन सबको लेकर भारत को पढ़ने की आदत ने भारत के वास्तविक स्वरूप को धुंधला कर दिया है। जबकि भारत का उद्भव ही यूरोप की राजनीतिक चेतना से सर्वथा भिन्न है।



यूरोप में “नेशन” की अवधारणा चर्च, साम्राज्य और नस्लीय संघर्षों की पृष्ठभूमि में विकसित हुई। वहाँ राष्ट्रीयता का अर्थ प्रायः राजनीतिक प्रभुत्व, सीमाओं का विस्तार और राज्यसत्ता की सर्वोच्चता बन गया। इसी मानसिकता ने आगे चलकर साम्राज्यवाद और विश्वयुद्धों को जन्म दिया। यूरोप का इतिहास बताता है कि वहाँ राज्य ने समाज को निर्मित किया। किन्तु भारत में स्थिति इसके विपरीत रही। यहाँ समाज और संस्कृति ने राज्य को जन्म दिया। भारत की आत्मा किसी राजसत्ता से नहीं बनी; राजसत्ताएँ आती-जाती रहीं, पर भारत बना रहा।


भारत का जन्म किसी “सामाजिक अनुबंध” से नहीं हुआ। भारत किसी संधि, संविधान, युद्धविराम अथवा राजकीय घोषणा का परिणाम नहीं है। भारत की अवधारणा सृष्टि की अवधारणा से जुड़ी हुई है। भारतीय कालबोध रेखीय नहीं है कि एक समय कुछ नहीं था और फिर अचानक इतिहास प्रारम्भ हो गया। भारतीय मनीषा ने समय को घड़ी की सूई की भाँति आगे बढ़ती हुई रेखा नहीं माना, बल्कि एक चिरंतन चक्र के रूप में देखा। सृष्टि उत्पन्न होती है, विकसित होती है, प्रलय में विलीन होती है और पुनः प्रकट होती है। यही कारण है कि भारतीय परम्परा में “कल्प”, “मन्वंतर”, “युग” और “प्रलय” जैसी अवधारणाएँ विकसित हुईं।



महाप्रलय में सम्पूर्ण चराचर जगत् परब्रह्म नारायण में समाहित हो जाता है, किन्तु धर्म अव्यक्त रूप में स्थित रहता है। पुनः सृष्टि के साथ वही धर्म प्रकट होता है। भारत उसी धर्म की भू-अभिव्यक्ति है। इसीलिए भारत का अस्तित्व किसी ऐतिहासिक तिथि से प्रारम्भ नहीं होता। भारत कोई आधुनिक राज्य नहीं है जिसका जन्म किसी वर्ष विशेष में हुआ हो। भारतीय दृष्टि में भारत स्वयंभू है, क्योंकि उसका आधार सनातन धर्म है और धर्म स्वयं सृष्टि के साथ प्रकट होने वाला शाश्वत सिद्धांत है।


इसी कारण भारत को केवल “देश” नहीं कहा गया। वह “भारतवर्ष” है, “आर्यावर्त” है, “पुण्यभूमि” है, “कर्मभूमि” है। ये शब्द केवल भावनात्मक विशेषण नहीं हैं; इनके पीछे गहन दार्शनिक और सांस्कृतिक अनुभूति है। भारत का अस्तित्व केवल भूगोल नहीं है। यदि भारत केवल भूगोल होता, तो अनेक आक्रमणों, विभाजनों और राजवंशों के पतन के साथ समाप्त हो गया होता। किन्तु भारत का अस्तित्व सत्ता से नहीं, संस्कृति से निर्मित हुआ। यही कारण है कि यहाँ राजसत्ताएँ बदलीं, सीमाएँ बदलीं, किन्तु भारत की आत्मा नहीं बदली।


विष्णु पुराण में भारतवर्ष का वर्णन करते हुए कहा गया—
“उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥”


यह श्लोक केवल भूगोल का वर्णन नहीं है। यह भारतीय सांस्कृतिक चेतना का उद्घोष है। हिमालय से समुद्र तक विस्तृत इस भूमि को “भारत” कहा गया और यहाँ निवास करने वाली संतति को “भारती”। यह भाव किसी आधुनिक राजनीतिक विचार से हजारों वर्ष पूर्व विद्यमान था।


किन्तु विष्णु पुराण का महत्त्व केवल इस श्लोक तक सीमित नहीं है। पुराण आगे स्पष्ट कहता है कि यही वह भूमि है जहाँ मनुष्य कर्म करके स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है। अन्य भूमियाँ भोगभूमियाँ हैं; भारत कर्मभूमि है। यह कथन भारत की मूल आत्मा को प्रकट करता है।


यहाँ यह समझना भी आवश्यक है कि पुराण केवल धार्मिक आख्यान नहीं हैं। आधुनिक इतिहासबोध के प्रभाव में पुराणों को प्रायः मिथक मान लिया जाता है, जबकि भारतीय परम्परा में पुराण स्मृति, इतिहास, दर्शन, लोकजीवन और ब्रह्माण्ड-विज्ञान का अद्भुत समन्वय हैं। अठारह महापुराणों का संकलन वेदव्यास ने किया। वे केवल कथाकार नहीं थे; वे भारतीय स्मृति और ज्ञानपरम्परा के महान संयोजक थे।


पुराणों में केवल एक युग या एक कालखंड का वर्णन नहीं है। उनमें अनेक कल्पों, मन्वन्तरों और युगों की कथाएँ हैं। यही कारण है कि भारतीय इतिहासदृष्टि आधुनिक इतिहासलेखन से भिन्न है। आधुनिक इतिहास केवल तिथियों और राजवंशों को देखता है; भारतीय दृष्टि सृष्टि के चिरंतन प्रवाह को देखती है। इसीलिए यहाँ समय का मापन भी सहस्राब्दियों और कल्पों में हुआ। भारतीय मन ने कभी इतिहास को केवल राजाओं और युद्धों तक सीमित नहीं किया। उसने मनुष्य, प्रकृति, देवत्व और ब्रह्माण्ड को एक ही अखण्ड सत्ता के रूप में देखा।


इसीलिए भारत का जीवनदर्शन उपभोगवादी नहीं, साधनामूलक बना। संसार की अनेक सभ्यताओं ने जीवन का लक्ष्य सत्ता, धन और भौतिक वैभव को बनाया। किन्तु भारत ने “पुरुषार्थ चतुष्टय” की अवधारणा दी—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। यहाँ अर्थ और काम का निषेध नहीं हुआ, किन्तु उन्हें धर्म के अधीन रखा गया। धर्म से विमुख अर्थ लोभ बन जाता है और धर्म से विमुख काम पतन। इसलिए भारत की सभ्यता संतुलन की सभ्यता बनी।


यही कारण है कि भारत में राजा से अधिक प्रतिष्ठा ऋषि को मिली। यहाँ विश्वामित्र और वशिष्ठ जैसे ऋषियों के सामने सम्राट भी मस्तक झुकाते थे। मिथिला के जनक केवल चक्रवर्ती सम्राट नहीं थे; वे विदेह कहलाते थे। अष्टावक्र के सामने उनका शिष्यभाव यह दर्शाता है कि भारत में ज्ञान और तप सत्ता से ऊपर थे।

महाभारत में भीष्म पितामह शरशय्या पर पड़े हुए युधिष्ठिर को राजधर्म का उपदेश देते हैं। यह केवल कथा नहीं, बल्कि भारतीय राज्यदर्शन की आत्मा है। भारत में राजा कभी अंतिम सत्य नहीं रहा; धर्म अंतिम सत्य रहा।


यही कारण है कि भारतीय सभ्यता ने मनुष्य को केवल “आर्थिक प्राणी” नहीं माना। आधुनिक पश्चिमी विचारधाराएँ—चाहे पूँजीवाद हो या समाजवाद—अंततः मनुष्य को उसकी आर्थिक भूमिका से पहचानती हैं। एक व्यवस्था उसे उपभोक्ता बनाती है, दूसरी उत्पादन का साधन। एक के लिए मनुष्य बाज़ार का केंद्र है, दूसरी के लिए श्रमशक्ति का। दोनों की चिंता मुख्यतः भौतिक जीवन तक सीमित रहती है। किन्तु भारत ने मनुष्य को केवल शरीर नहीं माना; भारत ने मनुष्य में आत्मा का दर्शन किया। यही भारतीय दृष्टि का सबसे बड़ा अंतर है।
इसीलिए यहाँ जीवन को समझने के लिए “पुरुषार्थ चतुष्टय” की अवधारणा विकसित हुई—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। यह केवल दार्शनिक सिद्धांत नहीं था; यह भारतीय जीवन का व्यावहारिक संतुलन था। भारत ने कभी यह नहीं कहा कि धन त्याज्य है या इच्छा पाप है। भारत जीवन से भागने की नहीं, जीवन को साधने की सभ्यता है।


यही कारण है कि भारत केवल संन्यासियों की भूमि नहीं है; यह राजर्षियों की भूमि भी है। यहाँ जनक हैं, जो राजमहल में रहते हुए भी “विदेह” कहलाते हैं। यहाँ युधिष्ठिर हैं, जिनके लिए राजसत्ता से अधिक महत्त्व धर्म का है। यहाँ विक्रमादित्य हैं, जिनके दरबार में विद्या, कला और शौर्य एक साथ प्रतिष्ठित हैं। यहाँ राजा भोज हैं, जो एक हाथ में शास्त्र और दूसरे में शस्त्र धारण करते हैं। भारत ने कभी वैभव का विरोध नहीं किया, किन्तु वैभव को जीवन का अंतिम लक्ष्य भी नहीं माना।


इसीलिए यहाँ अर्थ को धर्म के अधीन रखा गया। धर्म से विमुख अर्थ केवल लोभ बन जाता है। धन जब केवल संग्रह का साधन बनता है, तब वह मनुष्य को भीतर से रिक्त कर देता है। महाभारत में दुर्योधन के पास अपार शक्ति और वैभव था, किन्तु धर्म से विचलित होने के कारण वही वैभव उसके विनाश का कारण बना। दूसरी ओर युधिष्ठिर के लिए राज्य भी धर्म का माध्यम था, स्वार्थ का साधन नहीं।



भारत की दृष्टि में लक्ष्मी की पूजा हुई, किन्तु लक्ष्मी को कभी अकेला नहीं देखा गया। वह विष्णु के चरणों में प्रतिष्ठित हुई। इसका अर्थ स्पष्ट है—धर्म से जुड़ा हुआ अर्थ ही मंगलकारी है। धर्म से अलग हुआ अर्थ विनाशकारी हो सकता है।


इसी प्रकार भारत ने काम का भी निषेध नहीं किया। भारतीय सभ्यता जीवन को दबाने वाली सभ्यता नहीं है। यहाँ सौन्दर्य है, रस है, संगीत है, नृत्य है, प्रेम है। हमारे मंदिरों की मूर्तियाँ केवल पूजा की वस्तु नहीं हैं; वे जीवन के विविध आयामों की अभिव्यक्ति हैं। किन्तु यहाँ भी काम को धर्म से पृथक नहीं किया गया। मर्यादा से विच्छिन्न काम वासना बन जाता है, और वासना मनुष्य को पतन की ओर ले जाती है। इसीलिए भारतीय दृष्टि में धर्म जीवन का दमन नहीं करता; वह जीवन को दिशा देता है।



और अंततः भारत ने मोक्ष को जीवन का चरम पुरुषार्थ माना। यही भारत को संसार की अन्य सभ्यताओं से अलग करता है। संसार की अधिकांश सभ्यताओं ने जीवन को केवल भौतिक उपलब्धियों तक सीमित रखा, किन्तु भारत ने मनुष्य से पूछा—तुम कौन हो? केवल शरीर? केवल नाम? केवल पद? केवल संपत्ति? उपनिषदों का समूचा चिंतन इसी प्रश्न के इर्द-गिर्द घूमता है।



नचिकेता का यमराज से प्रश्न करना केवल एक कथा नहीं है; वह भारतीय आत्मा की जिज्ञासा है। एक बालक मृत्यु से पूछता है—“मृत्यु के पार क्या है?” यह प्रश्न वही सभ्यता पूछ सकती थी जिसने जीवन को केवल भोग नहीं माना।


इसीलिए भारत में तपस्या का आदर हुआ। यहाँ योग केवल व्यायाम नहीं था; आत्मानुशासन था। यहाँ ध्यान केवल मानसिक शांति का साधन नहीं था; आत्मबोध की यात्रा था। यहाँ राजा भी वन में जाकर ऋषियों के चरणों में बैठता था, क्योंकि भारत ने ज्ञान को सत्ता से ऊपर रखा।


भारत की पूरी जीवनदृष्टि का केंद्र यही था कि मनुष्य केवल जीने के लिए पैदा नहीं हुआ; वह स्वयं को जानने के लिए जन्मा है।



और यहाँ धर्म का अर्थ कभी मजहब नहीं रहा।
यही वह स्थान है जहाँ आधुनिक भारतीय बुद्धिजीवी सबसे अधिक भ्रमित दिखाई देते हैं। अंग्रेजों ने “धर्म” का अनुवाद “रिलीजन” कर दिया और वही भ्रम धीरे-धीरे भारतीय शिक्षा, राजनीति और बौद्धिक जीवन में स्थापित हो गया। जबकि धर्म और रिलीजन में वही अंतर है जो आकाश और पृथ्वी में है। दोनों को एक मान लेना भारतीय चिंतन की मूल आत्मा को ही विकृत कर देना है।



रिलीजन मुख्यतः किसी एक पैगम्बर, एक पुस्तक, एक चर्च, एक उपासना-पद्धति अथवा एक मत-समुदाय पर आधारित हो सकता है। उसकी पहचान इस बात से होती है कि व्यक्ति किस ईश्वर को मानता है, किस प्रकार पूजा करता है और किस धार्मिक समुदाय से स्वयं को जोड़ता है। वहाँ आस्था और उपासना केंद्र में होती है। इसलिए पश्चिमी जगत में “रिलीजन” का संबंध मुख्यतः चर्च, मजहबी संस्थाओं और पूजा-पद्धतियों से रहा।


किन्तु भारत में धर्म का अर्थ इससे कहीं अधिक व्यापक है। धर्म केवल पूजा नहीं है। धर्म केवल मंदिर जाना नहीं है। धर्म केवल किसी एक देवता में श्रद्धा रखना भी नहीं है। धर्म वह शाश्वत व्यवस्था है जो व्यक्ति, समाज, प्रकृति और सम्पूर्ण सृष्टि को धारण करती है। इसी कारण

 मनुस्मृति में कहा गया—
“धारणाद्धर्म इत्याहुः।”

अर्थात् जो धारण करे वही धर्म है।

यह परिभाषा अत्यन्त गहरी है। अग्नि का ताप उसका धर्म है। जल का शीतल होना उसका धर्म है। पृथ्वी का गुरुत्व उसका धर्म है। सूर्य का प्रकाश देना उसका धर्म है। यदि अग्नि ताप छोड़ दे, जल शीतलता छोड़ दे, सूर्य प्रकाश देना बंद कर दे या पृथ्वी अपना संतुलन खो दे, तो सृष्टि का क्रम ही टूट जाएगा। उसी प्रकार जब मनुष्य सत्य, न्याय, मर्यादा और कर्तव्य से विमुख होता है, तब समाज का संतुलन भी टूटने लगता है। इसीलिए भारत में धर्म का संबंध केवल ईश्वर-भक्ति से नहीं, बल्कि जीवन की संपूर्ण व्यवस्था से है।



इसी कारण भारतीय परम्परा में धर्म के अनेक रूप दिखाई देते हैं—पुत्रधर्म, मातृधर्म, पितृधर्म, गुरुधर्म, राजधर्म, राष्ट्रधर्म। महाभारत में भीष्म पितामह युधिष्ठिर को राजधर्म का उपदेश देते हैं। श्रीराम वनवास इसलिए स्वीकार करते हैं क्योंकि उनके लिए पिता का वचन धर्म है। अर्जुन युद्धभूमि में मोहग्रस्त होते हैं, तब श्रीकृष्ण उन्हें केवल युद्ध का उपदेश नहीं देते; वे उन्हें स्वधर्म का

 स्मरण कराते हैं—
“स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥”

यहाँ धर्म किसी मजहबी पहचान का प्रश्न नहीं है; यह कर्तव्य और मर्यादा का प्रश्न है।

यही कारण है कि भारत में कभी एक पुस्तक, एक पैगम्बर या एक उपासना-पद्धति को अंतिम सत्य नहीं माना गया। यहाँ वेद हैं, उपनिषद हैं, पुराण हैं, आगम हैं, स्मृतियाँ हैं, दर्शन हैं। यहाँ शिव भी हैं, विष्णु भी हैं, शक्ति भी हैं, सूर्य भी हैं। यहाँ योग है, भक्ति है, ज्ञान है, तंत्र है। यहाँ उपासना की असंख्य धाराएँ हैं, किन्तु उन्हें बाँधने वाला मूल तत्व धर्म है।

ऋग्वेद का यह प्रसिद्ध वाक्य—
“एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।”


भारतीय दृष्टि की इसी व्यापकता को प्रकट करता है। सत्य एक है, किन्तु ज्ञानी उसे अनेक रूपों में व्यक्त करते हैं। इसलिए भारत में विविधता संघर्ष का कारण नहीं बनी। यहाँ शंकराचार्य और बुद्ध, वेदान्त और सांख्य, भक्त और योगी—सभी एक ही सांस्कृतिक प्रवाह के भीतर संवाद करते रहे।

इसके विपरीत, जब धर्म को केवल “रिलीजन” मान लिया जाता है, तब उसका स्वरूप अत्यन्त संकीर्ण हो जाता है। तब धर्म केवल पूजा-पद्धति तक सीमित होकर रह जाता है। तब मनुष्य यह मानने लगता है कि मंदिर, मस्जिद या चर्च जाना ही धार्मिकता है। जबकि भारतीय दृष्टि में यदि किसी व्यक्ति के जीवन में सत्य नहीं, करुणा नहीं, मर्यादा नहीं, तो केवल पूजा-पद्धति उसे धर्मात्मा नहीं बना सकती।


इसीलिए भारत में धर्म कभी जीवन से पृथक संस्था नहीं बना। वह स्वयं जीवन का आधार था। परिवार का संतुलन धर्म से था, समाज की मर्यादा धर्म से थी, राज्य की वैधता धर्म से थी। राजा भी धर्म के अधीन था। यही कारण है कि भारतीय राज्यदर्शन में “राजधर्म” शब्द आया, “राजसत्ता” नहीं।


भारत की पूरी सभ्यता इसी धर्माधारित चेतना पर खड़ी हुई। यही उसकी आत्मा है, यही उसकी जीवनशक्ति है और यही कारण है कि सहस्रों वर्षों के आक्रमणों, विभाजनों और राजनीतिक परिवर्तनों के बाद भी भारत जीवित रहा।


महाभारत में भीष्म पितामह युधिष्ठिर को राजधर्म का उपदेश देते हैं। श्रीराम वन जाते हैं क्योंकि पिता का वचन उनके लिए धर्म है। श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित करते हैं क्योंकि अधर्म के सामने निष्क्रिय रहना धर्म नहीं है। भारतीय परम्परा में धर्म कभी पलायन का नाम नहीं रहा। धर्म का अर्थ केवल सहन करना नहीं है; धर्म का अर्थ है—सत्य और संतुलन की रक्षा करना। जहाँ करुणा आवश्यक हो वहाँ करुणा, और जहाँ शस्त्र आवश्यक हो वहाँ शस्त्र—यही भारतीय दृष्टि है।


इसीलिए भारत को समझने के लिए “अहिंसा” को भी उसके वास्तविक संदर्भ में समझना आवश्यक है। आधुनिक समय में बार-बार यह वाक्य दोहराया जाता है—“भारत युद्ध का नहीं, बुद्ध का देश है।” यह वाक्य सुनने में आकर्षक अवश्य लगता है, किन्तु भारत की परम्परा को अधूरा और विकृत रूप में प्रस्तुत करता है। भारत बुद्ध का भी देश है और युद्ध का भी, जब युद्ध धर्म की रक्षा के लिए हो। भारत ने कभी कायरता को आध्यात्म नहीं माना। यहाँ क्षमा है, पर दुर्बलता नहीं। यहाँ करुणा है, पर आत्मसमर्पण नहीं। यहाँ शांति है, पर अधर्म के सामने नपुंसक निष्क्रियता नहीं।


भारतीय परम्परा में क्षात्रतेज को उतना ही महत्त्व प्राप्त है जितना ब्रह्मतेज को। यदि केवल ऋषि होते और क्षत्रिय न होते, तो यह सभ्यता बहुत पहले समाप्त हो चुकी होती। विश्वामित्र का यज्ञ अंततः राम और लक्ष्मण के धनुष से ही सुरक्षित हुआ। महाभारत में अर्जुन यदि गांडीव रखकर बैठ जाते, तो धर्म की रक्षा नहीं होती।
 स्वयं श्रीकृष्ण गीता में अर्जुन से कहते हैं—
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ।”
अर्थात् कायरता को मत अपनाओ।

यह केवल अर्जुन के लिए नहीं, सम्पूर्ण भारतीय चेतना के लिए संदेश है। भारत ने कभी निर्बलता को आदर्श नहीं माना। “अहिंसा परमो धर्मः” कहा गया, किन्तु उसी परम्परा ने “धर्म हिंसा तथैव च” भी कहा। अर्थात् धर्म की रक्षा के लिए किया गया संघर्ष भी धर्म है। यही कारण है कि भारत में दुर्गा की आराधना भी है और गीता का युद्धोपदेश भी।


“वीर भोग्या वसुंधरा”—यह केवल काव्यपंक्ति नहीं, भारतीय क्षात्रधर्म की उद्घोषणा है। पृथ्वी का संरक्षण केवल उपदेशों से नहीं होता; उसके लिए शक्ति चाहिए। यह प्रकृति का नियम है। निर्बल सभ्यताएँ इतिहास में टिकती नहीं। संसार उसी की बात सुनता है जिसके भीतर आत्मबल और शौर्य दोनों हों। भारत की प्राचीन परम्परा इसी कारण चक्रवर्ती सम्राटों की परम्परा रही।
महाराज मनु केवल विधानकर्ता नहीं थे; उन्होंने सामाजिक व्यवस्था और राजधर्म की आधारभूमि निर्मित की। राजा पृथु का उल्लेख पुराणों में आता है कि उन्होंने पृथ्वी को व्यवस्थित किया, कृषि और लोकजीवन को स्थिरता प्रदान की। इसी कारण पृथ्वी का नाम “पृथ्वी” पड़ा। महाराज भरत के नाम पर यह भूमि “भारतवर्ष” कहलायी। यह कोई संयोग नहीं है कि इस देश का नाम किसी भूभाग, नदी या जाति पर नहीं, बल्कि एक धर्माधारित सम्राट पर पड़ा।


रघुवंश की परम्परा भी केवल राजवंश की कथा नहीं है; वह धर्माधारित राज्यचेतना की परम्परा है। कालिदास जब रघु, दिलीप और अज का वर्णन करते हैं, तब वे केवल विजेताओं का नहीं, धर्मपालक राजाओं का चित्र प्रस्तुत करते हैं। श्रीराम इसी परम्परा के चरम आदर्श हैं। उन्होंने लंका पर विजय प्राप्त की, किन्तु उसे अपने साम्राज्य में नहीं मिलाया। विभीषण को राज्य सौंपकर लौट आए। यह भारतीय विजय-दृष्टि और यूरोपीय साम्राज्यवाद के बीच मूलभूत अंतर है।


महाभारत में युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ और बाद में अश्वमेध यज्ञ भी इसी वैदिक राज्यचेतना के प्रतीक थे। आधुनिक दृष्टि से देखने वाले लोग अश्वमेध को साम्राज्यवाद समझ लेते हैं, जबकि उसका वास्तविक उद्देश्य धर्माधारित सार्वभौम व्यवस्था की स्थापना था। अश्वमेध का अर्थ था—राजसत्ता धर्म के अधीन रहेगी और समस्त जनपद उस व्यवस्था को स्वीकार करेंगे। यह यूरोप की औपनिवेशिक विजय की तरह लूट और दासता का अभियान नहीं था।


अंतिम अश्वमेध यज्ञ पुष्यमित्र शुंग ने किया। यह घटना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत की वैदिक परम्परा पर अनेक प्रकार के संकट उत्पन्न हो रहे थे। पुष्यमित्र शुंग का अश्वमेध केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं था; वह यह घोषणा थी कि भारत की वैदिक राज्यचेतना अभी जीवित है और धर्माधारित व्यवस्था समाप्त नहीं हुई है।



आज एक और मिथ्या प्रचार बड़े योजनाबद्ध ढंग से किया जाता है कि “भारत ने कभी आक्रमण नहीं किया।” यह कथन आधा सत्य है और आधा असत्य। भारत ने यूरोप की तरह लूट, उपनिवेश और नस्लीय प्रभुत्व के लिए आक्रमण नहीं किए; किन्तु धर्म, संस्कृति और सीमा की रक्षा के लिए भारत ने युद्ध भी किए और विजय अभियान भी चलाए। यदि भारत ने ऐसा न किया होता, तो यह सभ्यता सहस्रों वर्ष पहले समाप्त हो चुकी होती।


विक्रमादित्य ने शकों के विरुद्ध युद्ध किए और उन्हें पराजित कर भारत की सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा की। बप्पा रावल ने अरब आक्रमणों का प्रतिरोध किया। अरब विस्तार यदि उसी गति से बढ़ता रहता, तो पश्चिमोत्तर भारत का स्वरूप बहुत पहले बदल चुका होता। राजा भोज केवल विद्वान और कला संरक्षक नहीं थे; वे एक शक्तिशाली योद्धा और राष्ट्ररक्षक भी थे। उनके समय में मालवा केवल साहित्य का केंद्र नहीं, सैन्य शक्ति का भी केंद्र था।


दक्षिण भारत के चोल सम्राटों ने भारतीय समुद्री शक्ति को चरम पर पहुँचाया। राजेन्द्र चोल प्रथम का अभियान इसका प्रमाण है। उन्होंने श्रीविजय साम्राज्य तक विजय प्राप्त की। यह कोई साधारण घटना नहीं थी। उस समय भारतीय नौसैनिक शक्ति दक्षिण-पूर्व एशिया तक अपना प्रभाव स्थापित कर चुकी थी। किन्तु यहाँ भी भारत और यूरोप के साम्राज्यवाद में अंतर स्पष्ट दिखाई देता है।

 यूरोप जहाँ गया, वहाँ उसने उपनिवेश बनाए, संसाधन लूटे और स्थानीय संस्कृतियों को नष्ट किया। भारत जहाँ पहुँचा, वहाँ उसने संस्कृति, भाषा, स्थापत्य और दर्शन का प्रकाश पहुँचाया। बाली, जावा, सुमात्रा, कंबोज और अंगकोरवाट आज भी उसके जीवित प्रमाण हैं। वहाँ भारतीय प्रभाव तलवार के भय से नहीं, संस्कृति के आकर्षण से पहुँचा।

भारत ने कभी शक्ति का निषेध नहीं किया। शक्ति-विहीन शांति टिकती नहीं। यह प्रकृति का नियम है। जंगल में भी वही वृक्ष जीवित रहता है जिसकी जड़ें मजबूत हों। निर्बल सभ्यताओं को इतिहास निगल जाता है। यही कारण है कि भारतीय परम्परा में दुर्गा की आराधना भी है, कालभैरव भी हैं, और गीता का युद्धोपदेश भी।

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—
“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥”

अर्थात् सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए ही अवतार होता है।

यही भारत की युद्धदृष्टि है। यहाँ युद्ध सत्ता, स्वार्थ और लूट के लिए नहीं, धर्मसंस्थापन के लिए है। यही कारण है कि भारतीय क्षात्रधर्म विनाश का नहीं, संतुलन और मर्यादा की रक्षा का धर्म है।


आज भारतीय समाज, अर्थात् हिंदू समाज की दूसरी बड़ी समस्या यह है कि वह स्वयं को विदेशी राजनीतिक शब्दों से पहचानने लगा है। कोई स्वयं को “राष्ट्रवादी” कहता है, कोई “दक्षिणपंथी”, कोई “वामपंथी”, कोई “उदारवादी”, कोई “समाजवादी”। सुनने में ये शब्द बड़े आधुनिक और वैचारिक प्रतीत होते हैं, किन्तु प्रश्न यह है कि क्या ये शब्द भारत की आत्मा को व्यक्त करते हैं? क्या भारत को वास्तव में इन शब्दों में समझा जा सकता है?

सत्य यह है कि ये सभी शब्द यूरोप की विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थितियों से उत्पन्न हुए हैं। इनका जन्म भारत की सभ्यता में नहीं हुआ। “राइट” और “लेफ्ट” फ्रांसीसी क्रांति के बाद की संसदीय बैठकों से निकले शब्द हैं। “सोशलिज़्म” औद्योगिक क्रांति के बाद यूरोप में उत्पन्न आर्थिक असमानताओं और वर्गसंघर्ष की प्रतिक्रिया थी। “कैपिटलिज़्म” व्यापारिक और औद्योगिक विस्तार की उपज था। “सेकुलरिज़्म” चर्च और राजसत्ता के संघर्ष से पैदा हुआ। और “नेशनलिज़्म” यूरोप के नस्लीय, भाषायी और राजनीतिक संघर्षों की भूमि पर विकसित हुआ।


इन सबकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि यूरोप है; भारत नहीं।
यही कारण है कि जब इन शब्दों को भारत पर आरोपित किया जाता है, तब भारत का वास्तविक स्वरूप विकृत होने लगता है। क्योंकि भारत कोई “इज़्म” नहीं है। भारत किसी राजनीतिक विचारधारा का उत्पाद नहीं है। भारत का निर्माण किसी दार्शनिक घोषणापत्र, किसी आर्थिक सिद्धांत या किसी राजनीतिक क्रांति से नहीं हुआ। भारत का निर्माण सहस्रों वर्षों की साधना, अनुभव और सांस्कृतिक चेतना से हुआ है।


यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय चर्च और राजसत्ता के संघर्षों के बीच हुआ। बाद में उसमें नस्लीय अस्मिता, भाषायी आग्रह और साम्राज्यवादी अहंकार जुड़ता चला गया। जर्मनी में हिटलर का राष्ट्रवाद, इटली में मुसोलिनी का राष्ट्रवाद और यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों का राष्ट्रवाद अंततः विश्वयुद्धों और उपनिवेशवाद का कारण बना।
 वहाँ राष्ट्रवाद का केंद्र प्रायः राजनीतिक शक्ति और जातीय प्रभुत्व था।


भारत की चेतना इससे सर्वथा भिन्न है।
भारत का संबंध भूमि से केवल राजनीतिक नहीं, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक है। पश्चिम में भूमि “टेरिटरी” होती है; भारत में भूमि “मातृभूमि” होती है। पश्चिम में राष्ट्र राज्य से बनता है; भारत में राज्य राष्ट्र से उत्पन्न होता है। पश्चिम में सत्ता पहले आती है, संस्कृति बाद में बनती है। भारत में संस्कृति पहले आई, राजसत्ताएँ बाद में आती-जाती रहीं।


इसीलिए “राष्ट्रवाद” शब्द भारत की आत्मा को पूर्णतः व्यक्त नहीं कर पाता। भारत का भाव “राष्ट्रभक्ति” और “राष्ट्रभाव” का भाव है। यहाँ भूमि के प्रति सम्बन्ध केवल राजनीतिक निष्ठा का नहीं, श्रद्धा और आत्मीयता का है। इसीलिए भारत माता की अवधारणा यहाँ स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है। यह कोई आधुनिक राजनीतिक नारा नहीं है। यह वैदिक चेतना का विस्तार है जिसने

 पृथ्वी को माता कहा—
“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।”

भारत का राष्ट्रभाव किसी एक नस्ल, भाषा या पंथ पर आधारित नहीं है। यदि ऐसा होता, तो भारत हजारों वर्षों तक जीवित नहीं रह सकता था। कश्मीर से कन्याकुमारी तक भाषाएँ बदलती हैं, वेशभूषा बदलती है,

 लोकपरम्पराएँ बदलती हैं, किन्तु एक सांस्कृतिक चेतना सबको जोड़ती है। यही कारण है कि राम उत्तर भारत के भी हैं और दक्षिण भारत के भी। कृष्ण द्वारका के भी हैं और मणिपुर के भी। गंगा उत्तर में बहती है, किन्तु तमिल संत भी उसे “गंगा माता” कहता है। यही भारत की सांस्कृतिक एकात्मता है।


इसीलिए भारत को समझने के लिए “हिंदुत्व” शब्द को भी उसके वास्तविक अर्थ में समझना आवश्यक है। आधुनिक राजनीति ने इस शब्द को या तो संकीर्ण बना दिया या जानबूझकर विकृत कर दिया। जबकि भारत की परम्परा में हिंदुत्व किसी मजहबी पहचान का नाम नहीं है। हिंदुत्व उस सनातन जीवनदृष्टि का नाम है जो सम्पूर्ण सृष्टि को एकात्म रूप में देखती है।


वेदों में यही दृष्टि “ऋत” के रूप में प्रकट होती है। उपनिषदों में वही “ब्रह्म” बनती है। गीता में वही “योग” के रूप में आती है। यही दृष्टि कहती है—

ईशावास्यमिदं सर्वम्।”

अर्थात् सम्पूर्ण जगत् ईश्वर से व्याप्त है।

इसलिए हिंदुत्व किसी एक पूजा-पद्धति का नाम नहीं है। यह जीवन को देखने की दृष्टि है। यह वह दृष्टि है जिसमें प्रकृति भी पूज्य है, माता भी पूज्य है, गुरु भी पूज्य है और राष्ट्र भी पूज्य है। यही कारण है कि भारत में धर्म और संस्कृति को अलग-अलग नहीं देखा गया।


अरविंदो घोष ने उत्तरपाड़ा भाषण में इसी सत्य को अत्यन्त स्पष्ट शब्दों में कहा था—
“सनातन धर्म ही भारत की राष्ट्रीयता है।”


यह कोई चुनावी नारा नहीं था। यह भारत की आत्मा का दार्शनिक उद्घोष था। अरविंद समझते थे कि भारत का अस्तित्व उसकी धर्मचेतना से जुड़ा है। यदि भारत अपनी सनातन चेतना से कट गया, तो केवल भूगोल शेष रहेगा, जीवित राष्ट्र नहीं।


अरविंद के लिए भारत कोई निर्जीव राजनीतिक इकाई नहीं था। वे भारत को एक जीवित शक्ति, एक आध्यात्मिक सत्ता के रूप में देखते थे। यही कारण है कि उनके चिंतन में भारत का उत्थान केवल आर्थिक या राजनीतिक प्रश्न नहीं है; वह आध्यात्मिक पुनर्जागरण का प्रश्न है।


इसी सत्य को स्वामी विवेकानंद ने अपने शब्दों में व्यक्त किया। उन्होंने कहा—

“धर्म ही भारत का जीवन-रक्त है।”
विवेकानंद ने पश्चिम की भौतिक प्रगति को देखा था, किन्तु साथ ही उसकी आध्यात्मिक रिक्तता को भी अनुभव किया। वे समझते थे कि यदि भारत पश्चिम की केवल भौतिकता का अनुकरण करेगा और अपनी आध्यात्मिकता खो देगा, तो भारत की आत्मा नष्ट हो जाएगी। इसीलिए वे बार-बार भारत को उसकी सनातन जड़ों की ओर लौटने का आह्वान करते हैं।

इसी विचार को दीनदयाल उपाध्याय ने “चिति” की अवधारणा के माध्यम से अत्यन्त गहराई से समझाया। अपनी पुस्तक राष्ट्र जीवन की दिशा में वे लिखते हैं कि प्रत्येक राष्ट्र की एक “चिति” होती है—एक मूल चेतना, एक आत्मा, जो उसके समस्त जीवन को दिशा देती है। वही उसके साहित्य, कला, समाज, राजनीति और संस्कृति को आकार देती है।

भारत की चिति क्या है?
दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार भारत की चिति सनातन वैदिक आर्य संस्कृति है। यही वह तत्व है जिसने भारत को सहस्रों वर्षों तक जीवित रखा। यही कारण है कि यहाँ राजसत्ताएँ टूटीं, विदेशी आक्रमण हुए, विश्वविद्यालय जलाए गए, मंदिर ध्वस्त किए गए, विभाजन हुआ—फिर भी भारत समाप्त नहीं हुआ। क्योंकि भारत केवल राजनीतिक ढाँचा नहीं है। भारत लोकमानस की जीवित चेतना है।


यही कारण है कि भारत की पहचान किसी संविधान की धारा से नहीं बनती; उसकी पहचान उसकी सनातन सांस्कृतिक चेतना से बनती है। वेदों से लेकर उपनिषदों तक, रामायण से लेकर महाभारत तक, पुराणों से लेकर लोकगीतों तक, यह चेतना अखण्ड रूप से प्रवाहित होती रही है। भारत की आत्मा इसी सनातन प्रवाह में जीवित है।

भारत की संस्कृति अक्षयवट की भाँति है। उसका मूल सनातन धर्म है और उसकी अनंत शाखाएँ हैं—शैव, वैष्णव, शाक्त, जैन, बौद्ध, सिख, नाथ, सिद्ध, भक्ति परम्परा, लोकदेवता, ग्रामदेवियाँ, वेदांत, सांख्य, योग, मीमांसा, तंत्र—ये सब उसी चिति की विविध अभिव्यक्तियाँ हैं। बाहर से देखने वाले को यह विविधता दिखाई देती है, किन्तु भीतर एक ही चेतना प्रवाहित होती है। यही कारण है कि भारत ने कभी एकरूपता पर बल नहीं दिया; उसने एकात्मता को महत्त्व दिया। यहाँ मार्ग अनेक हो सकते हैं, किन्तु लक्ष्य एक ही है—धर्म, सत्य और आत्मबोध।


भारत पुण्यभूमि इसलिए कहा गया क्योंकि यह केवल जन्म लेने की भूमि नहीं, आत्मोन्नति की भूमि मानी गयी। पुराणों ने भारत को कर्मभूमि कहा। इसका अर्थ अत्यन्त गहरा है। संसार के अन्य भूभागों में मनुष्य भोग के लिए जन्म ले सकता है, किन्तु भारत वह भूमि है जहाँ मनुष्य कर्म के द्वारा अपने जीवन को ऊर्ध्वगामी बना सकता है। यहाँ केवल अर्थ और काम की प्राप्ति ही नहीं, धर्म और मोक्ष की भी साधना संभव मानी गयी। इसी कारण विष्णु पुराण कहता है कि देवता भी भारतभूमि में जन्म पाने की इच्छा करते हैं, क्योंकि यही वह भूमि है जहाँ कर्म से आत्मोद्धार का मार्ग खुलता है।


भारत की पूरी सभ्यता इसी धर्मचेतना पर निर्मित हुई। यहाँ जीवन का अंतिम लक्ष्य केवल समृद्धि नहीं, सत्य रहा। यहाँ राजा भी अंततः धर्म के अधीन रहा। यहाँ शक्ति का आदर हुआ, किन्तु शक्ति को कभी स्वार्थ और दमन का साधन नहीं माना गया। श्रीराम ने रावण पर विजय प्राप्त की, पर लंका को अपने साम्राज्य में नहीं मिलाया। युधिष्ठिर ने युद्ध जीता, किन्तु राज्य को भोग नहीं, दायित्व माना। भारत के युद्ध भी केवल भूभाग के लिए नहीं, धर्म और मर्यादा की रक्षा के लिए लड़े गए।
इसीलिए यहाँ ऋषि और योद्धा विरोधी नहीं रहे; वे एक ही सभ्यता के दो आधारस्तंभ बने। विश्वामित्र और राम, चाणक्य और चन्द्रगुप्त, समर्थ रामदास और शिवाजी, गुरु गोविन्द सिंह और खालसा—भारतीय परम्परा में ज्ञान और शक्ति साथ-साथ चलते हैं। भारत जानता था कि केवल शास्त्र से धर्म नहीं बचता और केवल शस्त्र से सभ्यता जीवित नहीं रहती। धर्मरक्षा के लिए दोनों आवश्यक हैं।


भारत पुण्यभूमि इसलिए भी है क्योंकि यहाँ प्रकृति को भी धर्म से जोड़ा गया। यहाँ नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं रहीं—वे माताएँ बनीं। हिमालय केवल पर्वत नहीं रहा—वह देवात्मा बना। गाय केवल पशु नहीं रही—गोमाता बनी। पीपल, वट, तुलसी, गंगा, यमुना, नर्मदा—इन सबके प्रति श्रद्धा केवल अंधविश्वास नहीं थी; यह उस सभ्यता की दृष्टि थी जो सम्पूर्ण सृष्टि में एक ही चेतना का अनुभव करती थी। यही कारण है कि भारत में धर्म केवल मनुष्य तक सीमित नहीं रहा; वह प्रकृति, समाज, परिवार और समस्त जीवन से जुड़ा।


यही भारत की वास्तविक शक्ति है। भारत केवल राजनीतिक इकाई नहीं है। वह एक जीवित सांस्कृतिक सत्ता है। राजसत्ताएँ बदलीं, साम्राज्य टूटे, आक्रमण हुए, विभाजन हुए; किन्तु भारत जीवित रहा क्योंकि उसकी चिति जीवित रही। यही सनातन चिति भारत को अन्य सभ्यताओं से भिन्न बनाती है।


और जब तक यह सनातन चिति जीवंत है, तब तक भारत केवल एक राष्ट्र के रूप में नहीं रहेगा; वह विश्व के लिए दिशा बना रहेगा। क्योंकि भारत का अर्थ केवल भूगोल नहीं है। भारत धर्म की जीवित परम्परा है। भारत उस सनातन सत्य की अभिव्यक्ति है जो सृष्टि के साथ प्रकट होता है और प्रलय के बाद भी अव्यक्त रूप में विद्यमान रहता है।

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