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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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।।ॐ।।
-डॉ. नितिन सहारिया, महाकौशल
युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य अपने वान्ग्डमय -"युग परिवर्तन कैसे और कब ?" में पृष्ठ 8.10 में लिखते हैं कि-
*महात्मा रामचंद्र* भी अपनी सफल भविष्यवाणियों के लिए विख्यात हैं। ' *राष्ट्रधर्म' के जनवरी 1971 के अंक* में उनका एक लेख प्रकाशित हुआ था। इस लेख में बिहार प्रदेश के व्यापक रूप से जलमग्न और क्षतिग्रस्त होने की भविष्यवाणी की गई थीं। उस समय तक ऐसा कोई लक्षण नहीं था जिससे तत्काल यह मान लिया जाता कि वस्तुत: ऐसा होगा। किंतु बाद में सचमुच दो समुद्री तूफान आए और पूर्वी पाकिस्तान के 20 लाख लोगों को नष्ट करके रख गए । आज भी वहां की प्रलय विभिषिका समाप्त नहीं हुई। जब होगी तब पूर्वी पाकिस्तान प्रलय के बाद वाले शांत और संस्कृत सभ्य समाज वाले देश के रूप में दिखाई देगा। बिहार के संबंध में की गई भविष्यवाणी की सत्यता भी स्पष्ट देखी जा सकती है। यह पंक्तियां जिस समय लिखी जा रही हैं, अधिकांश बिहार बाढ़ की चपेट में फंसा हुआ है, जबकि उसकी भविष्यवाणी 10 -11 महीने पहले ही कर दी गई थी। यह *भविष्यवाणी शाहजहांपुर के एक सुप्रसिद्ध योगी और संत महात्मा रामचंद्र ने की थी।*
" संसार में जब भी कोई देवदूत आया, अवतार हुआ, तब -तब प्रकृति ने उनके निर्माण के पूर्व की अवस्था को ध्वंस करने में सहयोग अवश्य दिया है। *वह महासंघर्ष की भूमिका इसी शताब्दी के अंत तक निश्चित रूप से घटित हो जानी चाहिए। परिवर्तन का समय आ गया है, जो अब टल नहीं सकता। ईश्वरीय सत्ता मानवीय रूप में अपनी परम प्रिय 'स्वर्गादपि गरीयसी' धरती पर भारतवर्ष में जन्म ले चुकी है और अपना काम करने में लगी हुई है। जब उसकी तमाम योजनाएं और क्रियाकलाप सामने आएंगे, तब लोगों को पता चलेगा और पश्चाताप भी होगा कि भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण, भगवान बुद्ध और परशुराम की तरह का अवतार हमारे समय में आया और हम उन्हें पहचान भी न सके; सहयोग देना तो दूर की बात रही।"*
ये शब्द भी उन्ही महात्मा रामचंद्र के हैं, जिनकी भविष्यवाणियों का इन पंक्तियों में उल्लेख किया जा रहा है। ये किसी प्रकार के यश लोकेशणा की कामना के बिना एक सच्चे योगी के समान आत्मकल्याण और लोक कल्याण में रत रहते हैं। यह भविष्यवाणी तो उनकी इस प्रेरणा की प्रतीक समझी जानी चाहिए कि- *जागृत आत्माएं यदि उनका विवेक साथ देता हो तो विद्ममान देवदूत को पहचाने और उसके नवनिर्माण के महासंघर्ष में हनुमान, नल- नील, अंगद की तरह मुक्तिवाहिनी का सेनापतित्व करने के लिए आगे आए।*
कुछ शंकालू और आर्यसमाजी जैसे तर्क वाले व्यक्तियों ने महात्मा रामचंद्र से प्रश्न किया कि- परमात्मा तो सर्वव्यापी सत्ता है ,तत्व रूप में है, वह अवतार कैसे ले सकता है? इस पर उन्होंने समझाया- " *हर व्यक्ति में एक अचेतन तत्व काम करता है, उसे सांसारिक कार्य-कलाप के लिए तन भी मिला है। अचेतन मन (अतिंद्री जगत का अधिष्ठाता) प्रत्यक्ष जगत का कारण है। मन से ही योजनाएं बनती और फिर क्रियान्वित होती हैं। परमात्मा में 'मनस' शक्ति नहीं होती है, पर मनुष्य जाति के उद्बोधन और मार्गदर्शन के लिए तो यह शक्ति ही आवश्यक है। इसलिए अदृश्य चेतना के रूप में काम करने वाली सत्ता को मन में परिपूर्ण होने के लिए किसी शरीर में व्यक्त होना पड़ता है। शरीर में होने पर भी उसकी शरीर में कोई आसक्ति नहीं होती अर्थात काम ,क्रोध, लोभ , मोह आदि मनोविकार उसका कुछ नहीं कर पाते वह भूत -भविष्य सब कुछ जानने वाला होने पर भी अन्य मनुष्यों की तरह ही काम करने वाला होता है, किंतु उसका अतींद्रिय ज्ञानवाल एवं मनोबल इतना प्रचंड और प्रखर होता है ,कि संसार का कोई भी दुस्तर से दुस्तर कार्य उसके लिए असंभव ,अशक्य नहीं होता। ऐसी ही दिव्यसत्ता भारतवर्ष में अपना काम कर रही है, बहुत शीघ्र उसे लोग पहचानेंगे।"*
अपनी इस भविष्यवाणी में ही *महात्मा रामचंद्र ने जहां इस दिव्य सत्ता की प्रचंड सामर्थ्य का दिग्दर्शन कर दिया ,वहां लोगों की पहचान के लिए मानो संकेत भी दे दिया है* । उनकी भविष्यवाणी का यह अंश बार-बार पढ़ने और मन करने योग्य है - *सूर्य की गर्मी पिछले कुछ समय से कम हो रही है। वैज्ञानिक हैरान है कि सूर्य के इस कार्य का कारण क्या है? वे इस कारण चिंतित है कि सूर्य की ऊर्जा व गर्मी समाप्त हो जाने से सारे भौतिक साधन होने पर भी मनुष्य जाति का अस्तित्व संकट में पड़ सकता है* और उससे बचने का उपाय उनकी समझ में नहीं आ रहा है।
सूर्य की शक्ति के इस असाधारण हास पर प्रकाश डालते हुए योगाचार्य लिखते हैं कि - *यह हास मनुष्य के रूप में इस महान ईश्वरीय सत्ता द्वारा उसका उपयोग है । प्रकृति जो परिवर्तन करती है ,वह सूर्य के परिवर्तन से ही प्रारंभ होता है, क्योंकि दृश्य जगत की आत्मा सूर्य ही है। तीव्रहास का तात्पर्य है कि जो परिवर्तन होना है, वह जल्दी ही हो जाए। इस सूर्य शक्ति का उपयोग भगवान द्वारा नियुक्त यह अवतार ही कर रहा है ।* जैसे ही कार्य पूरा हुआ और प्रकृति ने अपनी नई व्यवस्था का क्रम जमा लिया और फिर से सूर्य अपनी पूर्व प्रखरता पर आ जाएगा।
प्रसिद्ध *भविष्यवक्ता महात्मा रामचंद्र इस बात से पूर्णत: सहमत है कि आज का बुद्धिबाद और नास्तिकता, धर्म और अध्यात्म के प्रति उत्कृष्ट आस्था में बदल जाएंगे। उसके लिए जो ईश्वरी सत्ता उदित हुई और काम कर रही है, वह अहम भाव से पूर्णतया मुक्त होगी। शरीर में होने पर भी वह नितांत भावनाओं से बनी एक प्रकार की भाव प्रतिमा होगी अर्थात वह मानवीय मन न होकर ईश्वरीय मन होगी, जो सैकड़ो लोगों की सहायता करती हुई युग -प्रत्यावर्तन- प्रक्रिया को पूरा करेगी।*
यह भविष्यवाणी केवल कुतूहल के लिए नहीं है। *अतीन्द्रिय दृष्टा की प्रेरणा को समझा जाना चाहिए और यदि मन किसी ईश्वरीय दिव्य सत्ता के अस्तित्व को स्वीकार करता हो, तो उसकी सहायता के लिए साहस भी प्रदर्शित किया ही जाना चाहिए।....*
( नोट- इस लेख में जिस अवतारी सत्ता की ओर संकेत किया जा रहा है, यदि उसके संदर्भ में कुछ अधिक जानने की इच्छा हो तो आप इस लेख के लेखक से संपर्क 8720857296 पर कर सकते हैं ।)
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