सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

क्या है सच्ची भारतीयता ?



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-डॉ नितिन सहारिया, महाकौशल 

                         भारतीयता माने क्या ? यह प्रश्न सभी भारतीयों के मन में कभी न कभी उत्पन्न अवश्य होता ही है। भारतीयता के अनेक अर्थ ,रुप, भाव,अनुभूति , प्रकार, आयाम हैं । भारतीयता अनेक रूपों में हमारे जीवन में प्रतिदिन, प्रतिक्षण प्रकट होती है। हमारे गुण, कर्म ,स्वभाव की उत्कृष्टता ही विविध रुप मे भारतीयता की अभिव्यक्ति है । भारतीयता हमारे परिधान, वाणी, भोजन , व्यवहार, अतिथि सत्कार, शिक्षा, विचार, भाव इत्यादि अनेक रुपों में नित्य -निरंतर प्रकट होती रहती है।
                   *भारत के आध्यात्मिक - सनातन जीवन मूल्य ही भारतीयता के रुप में अभिव्यक्ति पाते हैं ।* जीवन मूल्य माने त्याग, दया ,करुणा, सत्य, प्रेम , न्याय, अहिंसा, आस्तेय, भ्रात भाव, नारी सम्मान, अतिथि सत्कार, सेवा, संयम, पवित्रता, इन्द्रिय निग्रह, धैर्य, अक्रोध, कर्तव्यपरायणता, संवेदन शीलता, सहिष्णुता, 'वसुधैव कुटुंबकम', 'आत्मवत सर्वभुतेषू' , योग , क्षमाशीलता , श्रधा- विश्वास, निष्ठा, प्रज्ञा, दान, परोपकार, विराटता, उत्सर्ग, इत्यादि सभी श्रेष्ठ गुण हैं । 'मानवता' का ही दूसरा नाम भारतीयता है । *स्वामी विवेकानंद इसे ही 'मनुष्यत्व' के रूप में वरण करने की प्रार्थना माता काली से करते थे ।* 
' *गुरुत्व' ही 'भारतीयता'- 'हिंदुत्व' है ।* 
        'भारतीयता' प्रत्येक भारतीय के जीवन में " *जीवन जीने की कला" Art of living* के रूप में नित्य- निरंतर ,प्रतिक्षण प्रकट होती रहती है। इसी 'भारतीयता' श्रेष्ठता, दिव्यत्व, आर्यत्व के कारण प्राचीनकाल में संपूर्ण विश्व ने हमें 'भूसुर' की उपाधि से संबोधित किया था।
          ' *वसुधैव कुटुंबकम* ' अर्थात संपूर्ण विश्व हमारा परिवार है, कोई भी पराया नहीं। भारतीय दृष्टि में पशु-पक्षी, नदी, पर्वत ,वृक्ष, सर्प, यानी की चींटी से लेकर हाथी तक सब विश्व परिवार के अंग है; इसीलिए हिंदू प्रतिदिन पक्षियों को दाने डालता है, गौ माता को घास खिलाता है, मछली को आटे की गोलियां -दाना खिलाता है। पहली रोटी गाय की अंतिम रोटी कुत्ते की होती है। हमारे लिए कोई भी पराया नहीं सभी के प्रति करुणा ,दया, प्रेम का भाव लेकर हिंदू -भारतीय जीवन जीता है। हमारे प्रत्येक कृत्य से भारतीयता -मानवता- श्रेष्ठता, दिव्यत्व झलकता है।
      ' *आत्मवत सर्व भूतेषू* ' अथार्त संपूर्ण चराचर जगत में चेतन -अचेतन, जीव- अजीब- संजीव,जलचर, थलचर, नभचर ( खग -मृग- नृग ) में ,सृष्टि के कण -कण में,अणु-अणु में एक ही ब्रह्मा- ईश चेतना Divine energy का वास/ अनुभूति करना है। यानी सबमें अपना ही आत्म स्वरूप देखना, अद्वैत की अनुभूति करना है । यह सम्पूर्ण सृस्टि ही विराट ब्रम्ह का स्वरूप ,विस्तार है। यही 'अद्वैत' की अनुभूति ही 'भारतीयता' है। इसी अद्वैत की व्याख्या करते हुए *संत तुकडो जी महाराज* कहते हैं कि - 
" हर देश में तू ,हर वेश में तू ।
तेरे नाम अनेक, तू एक ही है।
 हर खेल में- मेल में, तू ही तो है। "

               जगत का सत्य- ब्रम्ह - ईश्वर- नियंता एक ही है, इसी की अभिव्यक्ति -अनुभूति विविध रूप में हमें होती है। " *एकं सद् विप्रा वहुधा वदन्ति* " वाक्य का यही आशय है की *सबमें उस दिव्य चेतना की अनुभूति करें, सबसे सद (श्रेष्ठ) व्यवहार करें। 'सहिष्णुता' भारतीय संस्कृति की एक विशिष्टता- विशेषता है* । अर्थात 'ही' नहीं 'भी' को जीवन में महत्व देना।
          अथर्ववेद के भूमि सूक्त में भारतीयता के दर्शन होते हैं- " *माता भूमि पुत्रोस्यां पृथिव्य:* '' अर्थात पृथ्वी हमारी माता है और हम इसके पुत्र हैं, यानी की *मातृभूमि से पुत्रवत् व्यवहार करने का जो भाव है,यही भारतीयता है।* 
     प्रत्येक भारतीय संपूर्ण विश्व के कल्याण- मंगल की कामना करता है। " *कृन्वंतो विस्वा मार्यम* " व *"सर्वे भवन्तु सुखिन:*" भारतीय संस्कृति के उद्घोष वाक्य हैं। हम संपूर्ण विश्व को श्रेष्ठ बनाएंगे, सुखी बनाएंगे यही हमारे जीवन का ध्येय वाक्य है। यह जो भाव है परोपकार का, श्रेष्ठ बनाने का यही तत्व तो 'भारतीयता' है।
           " *अतिथि देवो भव:* " अतिथि- मेहमान ,आगंतुक का स्वागत करने का हमारा संस्कार है। भारतीय संस्कृति में मातृ-पितृ देवो भव:, दरिद्र देवो भव:, अतिथि देवो भव: , रास्ट्र देवो भव:, गौ , ब्राह्मण, याचक, भिक्षु, वृक्ष ,नदी,पर्वत, सागर देवो भव का संस्कार समाया हुआ है। हम सबका सम्मान करते हैं। यह जो भाव है सबमें 'ब्रम्ह'- 'ईश्वर' के दर्शन का यही 'भारतीयता' है।
        *मनुस्मृति' में धर्म के 10 लक्षण -तत्व* बताए गए हैं जो इन्हे जीवन में धारण करता है, वही सच्चा धार्मिक/ भारतीय /आर्य/ हिंदू / साधू / मनुष्य कहलाने का अधिकारी है।

धृति: मेधा दमोस्तेय्ं शौच्ं इंद्रिय निग्रह:।
धीर्विधा सत्यंक्रोधो दशक्ं धर्म लक्षण्ं ।।
       अर्थात- धैर्य ,मेधा ,दमन( दुष्प्रवृतियो का) , आस्तेय ( चोरी न करना), शौच( अंत: वाह्य पवित्रता),इंद्रिय निग्रह (इंद्रियों पर नियंत्रण-संयम) , बुद्धि ,विद्या, सत्य, अक्रोध ( क्रोध न करना ) ।
          *त्येन त्यतेंन भुन्जिथा:* हम त्याग पूर्वक भोग करेंगे ,भोग के लिए ही जीवन को समर्पित नहीं करेंगे। यह 'त्याग' - 'तपस्या' का तत्व हमारा वैशिष्टय है। भारतवर्ष में भगवान श्रीराम व श्रीकृष्ण , महापुरुषों , संतों के जीवन में त्याग- तपस्या का वैशिष्टय दिखाई पड़ता है। भगवान श्रीराम माता सीता से बिछोह होने के पश्चात वैभव युक्त राजभवन में भी नीचे चटाई पर सोते थे। वनवास काल में कंदमूल फल खाकर जीवन निर्वाह करते थे । अयोध्या की प्रजाजन ने माता सीता पर मिथ्या आरोप लगाया तब भगवान श्रीराम को अत्यंत कष्ट हुआ किंतु फिर भी लोक मर्यादा के पालन हेतु भगवान ने माता सीता को वन गमन कर दिया व प्रजा को क्षमा किया। अपने प्राण से प्रिय भाई लक्ष्मण को एक प्रसंग मे वचन की अवज्ञा होने पर प्राणदंड अथार्त राज्य से निष्कासन कर दिया। भगवान अपने पिता महाराज दशरथ के वचन पालन हेतु 14 वर्ष वन में चले गए और अनेक संकटों का सामना किया। विश्व के इतिहास में एकमात्र उदाहरण है जहां राज सिंहासन को भरत पर राम ने फुटबॉल बना दिया। इन दृस्टान्तो में तो 'त्याग' की पराकाष्ठा है। ' त्यागवाद' ही हमारी भारतीय संस्कृति का सबसे विशिष्ट तत्व है, इसे ही 'भारतीयता' के नाम से जाना जाता है। भोगवाद ,क्षणिकवाद ,भौतिकतावाद को भारतीय संस्कृति में महत्व नहीं दिया जाता है; जबकि पश्चिमी जगत में मात्र भोगवाद- भौतिकतावाद, असुरर्ता की ही प्रधानता है, जो ठीक पूर्व की संस्कृति (भारत) के विपरीत है।
         *भारतीय संस्कृति के पांच आधार हैं 1. गौ 2. गंगा 3. गीता 4. गायत्री 5. गुरु* जो इनमें आस्था रखता है व इन्हें अपने जीवन में महत्व देता है। वही सच्चा भारतीय है। अथार्त इन पांचो में जो श्रद्धा- आस्था व्यक्त करता है, यही तत्व 'भारतीयता' है।
       भारत 'धर्म' प्राण देश है, जहां प्रत्येक भारतीय धर्म के अनुसार आचरण करता है ,जीवन जीता है। 'धर्म' भारत की 'आत्मा' -'चित्ति' है। क्योंकि 'परमात्मा' में आस्था रखने वाला 'धर्मात्मा' ही तो होता है। भारतीयों को धर्माचरण की प्रेरणा अपने ग्रन्थों वेद- उपनिषद , ब्राह्मण ग्रंथ, स्मृतियों, संहिताओं, पुराण ,रामायण ,श्रीमद्भागवत गीता से मिलती है। इस बात की पुष्टि 1000 वर्ष पूर्व आया अरबी विद्वान लेखक- यात्री *अलबरूनी* ने की है। अत: *यह 'धर्माचरण' का तत्व ही 'भारतीयता' के नाम से जाना जाता है, जो की शाश्वत- अनादी, अनंत ,अखंड, Divine है। इसी तत्व की प्रचंडता-प्रखरता के कारण भारत वर्ष प्राचीन काल में 'विश्वगुरु' था और निकट भविष्य में भी होगा।* 
         जैसे फूल में खुशबू है, अग्नि में तेज है ,जल में रस है वैसे ही भारत में भारतीयता है; और 'भारतीयता' ही 'राष्ट्रीयता' है जिसे अन्य शब्दों में 'हिंदुत्व', सनातन ,आध्यात्मिकता, दिव्यत्व ,आर्यत्व, चित्ति , इत्यादि नामो से पुकारा गया है। *स्वामी विवेकानंद* कहते हैं कि - *" भारतीयता आध्यात्मिकता की तरंगों से ओत -प्रोत है।"* 
वहीं *योगीराज महर्षि अरविंद* कहते हैं कि- *" भारतीयता का प्राण 'धर्म' है, इसकी आस्था धर्म है और इसका भाव धर्म है।"*  
       एक अन्य शब्दों में 'भारतीयता' को 'मानवता' - 'मनुष्यत्व' के नाम से भी जाना जाता रहा है। इसी 'मनुष्यत्व' की प्राप्ति की प्रार्थना स्वामी विवेकानंद निरंतर माता काली से करते थे। अत: *'भारतीयता' का दूसरा नाम ही 'मानवता' है।* 
       भगवान श्रीराम का जीवन ही भारतीयता- आध्यात्मिकता की अभिव्यक्ति है। भगवान श्रीकृष्ण के जीवन में जो ' कर्तत्व ' है, वह भारतीयता- आध्यात्मिकता की ही अभिव्यक्ति है। *भारतवर्ष के ऋषियों ने जो नैतिक- आध्यात्मिक मूल्यों,आदर्शों , धर्म का मार्ग दिखाया है, यही 'भारतीयता' है, वही 'आर्ट ऑफ लिविंग' Art of living के रूप में हमारे जीवन में समाया हुआ है। अर्थात राम का 'रामत्व' व कृष्ण का 'कृष्णत्व' ही 'भारतीयता'- 'मनुष्यता' है,* जो प्रत्येक भारतीय के जीवन में सुबह जागरण से लेकर रात्रि शयन तक प्रत्येक कर्म ,विचार ,भाव में समाया हुआ है।
         वर्तमान समय में हमारा समाज पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित होकर भौतिकता की अंधी दौड़ में दौड़ रहा है। हमारे चिंतन -चरित्र,आचरण में भौतिकतावाद, क्षणिकवाद, भोगवाद का बाहुल्य है। *कहीं न कहीं हमारा समाज 'भारतीयता 'अर्थात भारतीय संस्कृति से दूर जा चुका है। जोकि सारी समस्याओं का मूल कारण है। इसी पर चिंतन, ध्यान Focus करने की आज परम आवश्यकता है।* हम आत्म विश्लेषण, आत्म चिंतन करें कि हम कहां हैं? क्या हमारा जीवन हिंदुत्व -भारतीय चिंतन के प्रकाश से प्रकाशित हो रहा है अथवा हम कुछ हटकर ही जीवन जिए जा रहे हैं। क्या हमें देश- धर्म, मूल्य, नैतिकता ,राष्ट्र के भविष्य की भी कुछ चिंता ,चिंतन है ? कुछ राष्ट्रधर्म -युगधर्म का भी बोध है? अथवा स्वार्थ लोलुप होकर पशुवत जीवन जी रहे हैं। आज इस बात का चिंतन, आत्म विश्लेषण की अत्यधिक आवश्यकता है। यदि हम ऋषियों, भारतीय धर्म ग्रंथो के बताएं मार्ग पर नहीं चल रहे हैं तो यह बड़ा पाप ही नहीं होगा वरन यह आत्मघाती कदम ही सिद्ध होगा। क्योंकि बच्चे बड़ों का ही अनुसरण करते हैं जैसे एक पेज पर कार्बन लगाकर लिखा जाता है तब पांचवा पन्ना -कागज ब्लैंक , कोरा ही दिखाई पड़ता है। यही हाल हम भारतीयों व भारत का भी हो चला है। यानी भारत पतन के गर्त में चला जा रहा है अतः *हमें धर्म- कर्तव्य का स्मरण,आत्म चिंतन करते हुए ऋषियों के वंशज होने ,भारत माता के बेटे होने के नाते अपनी धर्म -संस्कृति ,मूल्यों, आध्यात्मिकता के प्रकाश में ही जीवन जीना चाहिए। हम आत्म विस्मृति से बाहर निकलें।* युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य का कथन है कि - 
      " *सार्थक और प्रभावी उपदेश वही है, जो वाणी से नहीं वरन् आचरण से प्रस्तुत किया जाए।* " 
 अतः *"अप्प दीपों भव:"* 
हम बदलेंगे, युग बदलेगा।
 हम सुधरेंगे,युग सुधरेगा ।।
      यानी 
 *" अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है।"* 
           कुल मिलाकरके हम सभी भारतीयों को अपने धर्म -कर्तव्य का बोध हो जाए व उस मार्ग पर चलने लगे तो राष्ट्र, समाज, विश्व महानता , उज्जवल भविष्य के पथ पर अग्रसर हो जावेगा और यही अभीष्ट भी है।

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