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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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१. ब्रह्म, अब्राहम-इनको ब्रह्म तथा अब्राहम मत भी कहा गया है।
सनातन का यह अर्थ नहीं है कि इसका आधार वेद सृष्टि के आरम्भ से था। तत्त्व रूप में वेद के स्तर आरम्भ से ही थे। असत् (अनुभव से परे) से सत् की सृष्टि हुई, आरम्भ में यह कुछ नहीं था-इसे शून्य वेद कहा गया है (ओड़िशा के पञ्चसखा कवियों की व्याख्या)। द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्द ब्रह्म परं च यत्। शाब्दे ब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ (मैत्रायणी उपनिषद्, ६/२२)
शब्द रूप में वेद मन्त्रों का संकलन या संहिता तभी हुई जब वैज्ञानिक प्रगति द्वारा सृष्टि का आकार, कालक्रम, भूगोल-खगोल, खनिज, अन्न उत्पादन आदि विकसित हो चुके थे। लिखित तथा कथित भाषा के समन्वय के बाद ही सूक्तों का संकलन हुआ (ऋग्वेद में गणपति सूक्त, २/२३, बृहस्पति सूक्त, १०/७१)। इन सबका संकलन पुराण साहित्य द्वारा हुआ, जिसके एकीकरण द्वारा वेद की उत्पत्ति ब्रह्मा द्वारा हुई।
इदमेव पुराणेषु पुराण पुरुषस्तदा। (२)
पुराणं सर्व शास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम्। अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः॥३॥
पुराणमेकमेवासीत् तदाकल्पान्तरेऽनघ। त्रिवर्गसाधनं पुण्यं शतकोटि प्रविस्तरम्॥४॥ (मत्स्य पुराण, ५३/२-१०)
नारद पुराण (१/२४/१६-२३) में विस्तार से है।
ब्रह्मा देवानां प्रथमं सम्बभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता। स ब्रह्म विद्यां सर्व विद्या प्रतिष्ठा मथर्वाय ज्येष्ठ पुत्राय प्राह। अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्मा ऽथर्वा तां पुरो वाचाङ्गिरे ब्रह्म-विद्याम्। स भरद्वाजाय सत्यवहाय प्राह भरद्वाजो ऽङ्गिरसे परावराम्। (मुण्डकोपनिषद्,१/१/१,२)-आङ्गिरस भरद्वाज, बृहस्पति के ज्ञान सूक्त (ऋक्, १०/७१)-भरद्वाज गोत्र के ३ प्रवर।
यह सनातन या अपौरुषेय इस अर्थ में है कि किसी एक व्यक्ति का विचार नहीं है, सनातन सत्य है, तथा सभी ज्ञान का आधार या समन्वय है।
सम्पूर्ण सृष्टि को एक मान कर उसे पुरुष या ब्रह्म कहते हैं।
इसके विपरीत अब्राहम मत ब्रह्म का एकत्व नहीं मानते है। अपने मत के अनुसार सर्वोच्च सत्ता को मानते हैं, तथा अन्य द्वारा कल्पित सर्वोच्च सत्ता का विरोध करते है। यह किसी का व्यक्तिगत विचार है। वह अन्य से समन्वय नहीं करता, बल्कि अपने प्रचार के लिए अन्य की निन्दा करता है। अपने पूर्व के प्रवर्तकों की निन्दा तथा विरोध करता है। विचार प्रवाह खण्डित करने को दिति कहा गया है-दो अवखण्डने (पाणिनीय धातु पाठ, ४/३९)। इसका विपरीत अदिति है, जिसका अनन्त चक्र है-अदितिर्जातम्, अदितिर्जनित्वम् (शान्ति पाठ, ऋक्, १/८९/१०, अथर्व, ७/६/१, वाज. यजु, २५/२३)। दैत्य असुर हैं, आदित्य देव हैं।
असीरिया (असुर राज्य) के राजा नबोनासर (संस्कृत का लवणासुर) ने अपनी पुस्तक बेबिलोनिका में लिखा है कि उसने अपने पूर्व के सभी उल्लेख एकत्र कर नष्ट कर दिये जिससे लगे कि सभ्यता का आरम्भ उसी से हुआ। अब्राहम पन्थ के सम्प्रदायों की यही प्रवृत्ति रही है। वे मान ही नही सकते कि उनके पूर्व भी वैज्ञानिक विकास हुआ था। यदि कोई प्रमाण दिखाया जाय तो कहेंगे कि अन्य ग्रहों के प्राणियों का काम है, भले ही बृहस्पति, शनि आदि पर जीवन के प्रमाण नहीं मिलें।
भारत में भी व्यक्तिवादी सम्प्रदायों ने सनातन की निन्दा की है, पर उसी ज्ञान को थोड़े शब्द बदल कर अपना सिद्धान्त बनाया तथा वैदिक ज्ञान को उसकी नकल कहा जैसे योग दर्शन का नाम योगाचार किया, त्रिपुरा रहस्य के १० महाविद्या को १० प्रज्ञा पारमिता नाम दिया, गौतम के न्याय दर्शन को गौतम बुद्ध का कहा (सिद्धार्थ बुद्ध उनसे १३०० वर्ष पूर्व थे, जिनको एक बना दिया गया है)।
२. एक विचार की भिन्न व्याख्या- इस प्रकार की एक कहानी बृहदारण्यक उपनिषद् अध्याय ५, ब्राह्मण २ में है। प्रजापति के पास शिक्षा के लिए मनुष्य, देव और असुर गये। तीनों को प्रजापति ने एक ही अक्षर का उपदेश दिया-द। तीनों ने अपनी प्रवृत्ति के अनुसार अलग अलग अर्थ लगाया। देवों ने समझा के वे अधिक भोग करते हैं, अतः उनको द = दमन का उपदेश दिया है। मनुष्यों ने समझा कि वे अधिक सम्पत्ति का उत्पादन और सञ्चय करते हैं, अतः उनको द = दान केलिए कहा। असुरों ने समझा कि वे बहुत क्रूरता करते हैं, अतः उनको द = दया का उपदेश दिया है।
अतः शब्दों का अर्थ एक है या एक जैसा है, पर प्रवृत्ति के अनुसार उनके विपरीत अर्थ हैं। मनुष्यों के २ मुख्य वर्ग हैं-जो स्वयं अपनी जरूरत की वस्तुओं का यज्ञ द्वारा उत्पादन करते हैं (गीता, ३/१० में प्रजापति का आदेश) वे देव हैं। पुरुष सूक्त १६ के अनुसार देव यज्ञों के परस्पर मिलन द्वारा उन्नति के शिखर पर पहुंचे। इसके विपरीत असुर वे हैं जो असु = शक्ति द्वारा सम्पत्ति लूटने की चेष्टा करते हैं। कोलम्बस आदि लुटेरे विश्व को लूटने चले तो पोप ने विश्व के २ भाग किए-एक भाग स्पेन की लूट तथा दूसरा भाग पुर्तगाल की लूट का क्षेत्र बनाया। बाद में फ्रांस, इंगलैण्ड तथा डच भी इसमें हिस्सा लेने लगे। इनका एक ही नियम था कि लूट का १/५ भाग राजा को देंगे। ६२२ ई. से इस्लाम में भी यही नियम चला। मुहम्मद बिन कासिम आदि लुटेरे जो भी लूटते थे उसका १/५ भाग खलीफा को देते थे। इसमें स्त्रियां भी सम्पत्ति मानी जाती हैं, जिनको माल-ए-गनीमत कहते हैं। विरोधी प्रवृत्ति के कारण शाब्दिक अर्थ एक होते हुए भी व्यवहार में विपरीत हो गया है।
३. सनातन धर्म की विशेषता-
(१) शाश्वत गुण -सनातन धर्म मनुष्य के शाश्वत गुण हैं, जैसे सत्य आचरण, किसी से द्रोह नहीं करना, मन वाणी या कर्म से किसी की हानि नहीं करना आदि। वस्तुतः सत्य शब्द का अर्थ ही है, जिसकी सत्ता सदा बनी रहे। (शतपथ ब्राह्मण, १४/८/६/२)
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्। प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः॥ (मनु स्मृति, ४/१३८)
(२) श्रेय-प्रेय मार्ग-वैवस्वत यम भारत का पश्चिम सीमा (अमरावती से ९० अंश पश्चिम संयमनी = यमन, सना) के राजा थे। उन्होंने कठोपनिषद् में नचिकेता से दोनों का विवेचन किया है-श्रेय (स्थायी या सनातन लाभ) तथा प्रेय (तात्कालिक लाभ या उसका लोभ)।
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः। (कठोपनिषद्, १/२/२)
श्रेय मार्ग पर चलनेवाले सनातनी हैं, उनको सम्मान के लिये श्री कहते हैं। जो हमें प्रेय दे सके वह पीर है या दक्षिण भारत में पेरिया।
(३) सनातन पुरुष की उपासना-सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे (गीता, ११/१८) या भूत-भविष्य-वर्त्तमान में सर्वव्यापी-पुरुष एवेदं सर्वं यद् भूतं यच्च भाव्यं (पुरुष सूक्त)। या उसके शब्द रूप वेद की उपासना -भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात् प्रसिद्ध्यति। (मनु स्मृति, १२/९७)।
(४) सनातन या अमृत तत्त्व की उपासना-मृत्योर्मा अमृतं गमय आदि। जो निर्मित होता है वह बुलबुला जैसा क्षणभङ्गुर है, वह मूल स्रोत से मुक्त होता है अतः उसे मुच्यु या परोक्ष में मृत्यु कहा है। उसके बदले मूल स्रोत (समुद्र) की ही निष्ठा।
स समुद्रात् अमुच्यत, स मुच्युः अभवत्, तं वा एतं मुच्युं सन्तं मृत्य्ः इति आचक्षते (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, १/७)
वेद में इसे केवल सनात् भी कहा है-
सनादेव शीर्यते सनाभिः। (ऋक्, १/१६४/१३, अथर्व, ९/९/११)
अनापिरिन्द्र जनुषा सनादसि (ऋक्, ८/२१/१३, अथर्व, २०/११४/१, साम, १/३९९, २/७३९),
सनाद् राजभ्यो जुह्वा जुहोमि (ऋक्, २/२७/१, वाज यजु, ३४/५४, काण्व सं, ११/१२, निरुक्त, १२/३६)।
मूल तत्त्व से जो बुद्-बुद् निकलता है उसे द्रप्सः (drops) या स्कन्द (निकलना, गिरना) भी कहा है। आकाशगंगा, तारे, ग्रह-सभी द्रप्सः हैं।
स्तोको वै द्रप्सः। (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, २/१२)
द्रप्सश्चस्कन्द प्रथमाँ अनु द्यूनिमं च योनिमनु यश्च पूर्वः (ऋक्, १०/१७/११)
यस्ते द्रप्सः स्कन्दति यस्ते अंशुर्बाहुच्युतो धिषणाया उपस्थात्। (ऋक्, १०/१७/१२)
(५) सनातन यज्ञ-स्वयं यज्ञ द्वारा उत्पादन कर उपभोग करना देवों का कार्य है। इसके विपरीत दूसरों का अपहरण करना असुर वृत्ति है-
यज्ञेनयज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
ते ह नाकः महिमानः सचन्तः यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥ (पुरुष सूक्त, वाज, यजु, ३१/१६)
यज्ञ द्वारा इच्छित वस्तु का उत्पादन होता है-अनेन प्रसविष्यध्वं एष वोऽस्तु इष्टकामधुक् (गीता, ३/१०)।
लूटा माल खत्म हो जाता है पर यज्ञ का चक्र सदा चलता रहता है-एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः (गीता, ३/१६)।
अतः यज्ञ को चलाते रहना सनातन धर्म है। केवल इसका बचा भाग लेना चाहिये जिससे यह चक्र बन्द नहीं हो-
यज्ञशिष्टामृत भुजः (गीता, ४/३१) यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः (गीता, ३/१३)
यज्ञ चक्र द्वारा सभ्यता को सदा चलाते रहना सनातन है। असुरों द्वारा इसी लूट प्रवृत्ति के कारण सनातन धर्म पर सदा खतरा रहता है। इसाई पन्थ में इसे रायल क्विण्टेट (राजा के लिये ५वां भाग) या इस्लाम में इसे माल-ए-गनीमत (लूटी गयी स्त्रियों सम्पत्ति आदि में १/५ भाग खलीफा को) कहते थे।
(६) अमरता-देवों को अमर कहा गया है। तत्त्व रूप में इनके विभिन्न रूप आकाश के विभिन्न भागों में सदा बने रहते हैं। किन्तु मनुष्य रूप में देव अमर नहीं थे। वे भी देव-असुर युद्धों में मरते थे-
निर्जीवं च यमं दृष्ट्वा ततः संत्यज्य दानवः (मत्स्य पुराण, १५०/४९)
ध्रुव ने भी देवयोनि के लाखों यक्षों का वध किया था जब उन्होंने उनके भाई की हत्या कर दी थी (भागवत पुराण, ४/१०/१८-२० आदि)
इन्द्र पद पर भारत के कई राजा रहे हैं, जैसे रजि, नहुष (भागवत पुराण, ९/१८, महाभारत, आदि, ७५/२९ आदि)
अमर होने का एक अर्थ तो यहीं स्पष्ट है कि एक इन्द्र के मरते ही नहुष आदि उनका स्थान लेने के लिए तैयार रहते थे। अमरता का मुख्य अर्थ है, व्यक्ति नष्ट होता है पर उसकी परम्परा चलती रहती है। हर व्यक्ति परम्परा की ३ धाराओं का अंश है जिनको ३ ऋण कहते हैं-देव, ऋषि, पितृ ऋण। मनुष्य अपने पूर्व जन्मों के काम को आगे बढ़ाता है, अपनी वंश परम्परा या काम को आगे बढ़ाता है (सन्तान = सम्यक् प्रकारेण तानयति), या समाज को आगे बढ़ाता है।
समाज रूप में देखें तो उत्पादन की यज्ञ संस्था, शिक्षा संस्था आदि चलती रहती हैं। शिक्षा, धन अर्जन, व्यक्तिगत तप स्वाधाय आदि भी यज्ञ के ही रूप हैं। गीता (४/२४-३२) में ऐसे १४ यज्ञों का वर्णन है। इन सनातन संस्थाओं से सभ्यता चलती रहती है, किसी पैगम्बर द्वारा सभी पूर्व चीजों का विनाश नहीं करते।
(७) आस्तिक-इसका अर्थ अब्राहम पन्थों से प्रायः उलटा है। वहां कहते है कि केवल मेरे पन्थ या भगवान् को मानने वाला ही विश्वासी है, बाकी काफिर है। सनातन धर्म में नास्तिक उसे कहते हैं जो कहता है, न अन्यत् अस्ति = जो मैं कहता हूं वही सही है, अन्य नहीं। जो वेद के केवल एक वाद में रत है और अन्य को गलत कहता है, वह वास्तव में वेद विरोधी और नास्तिक है। यह प्रायः वैसा ही है जैसेकोई कहे कि भौतिक विज्ञान सही है, किन्तु गणित आदि गलत हैं। जो विकल्प देख सकता है, वह विपश्चित् है। जो केवल एक ही मार्ग देखता है, वह अविपश्चित् या मूर्ख है।
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः। वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥ (गीता, २/४२)
(८) ज्ञान पद्धति-जैसे विज्ञान की शाखायें विषय अनुसार हैं, उसी प्रकार भारत में दर्शन शाखा भी विषय अनुसार हैं, पाश्चात्य परम्परा के व्यक्ति अनुसार नहीं। विश्व को २ प्रकार से देखते हैं-अलग अलग पिण्ड या कण गिने जा सकते हैं, कणों का समूह गण हुआ, उस रूप का ज्ञान गणेश हुआ। जो गिन नहीं सकते वह रस रूप सरस्वती है। इस रूप में दोनों की वन्दना से रामचरितमानस का आरम्भ हुआ है-
वर्णानां अर्थ सङ्घानां रसानां छन्दसां अपि। मङ्गलानां च कर्तारौ, वन्दे वाणी विनायकौ॥
सृष्टि को वेद में २ प्रकार से देखा गया है-(१) पुरुष सिद्धान्त- अलग अलग पुरों का क्रम। मनुष्य से छोटे विश्व के ७ स्तर क्रमशः १-१ लाख भाग छोटे हैं-मनुष्य, कलिल, परमाणु, परमाणु नाभि, जगत् कण, देव-असुर प्राण, पितर, ऋषि। सबसे छोटा ऋषि (रस्सी) है जिसका आकार मीटर का १० घात ३५ भाग होगा (क्वाण्ट मेकानिक्स में प्लांक दूरी)। मनुष्य से आरम्भ कर विश्व के ५ स्तर क्रमशः १-१ कोटि गुणा बड़े हैं-पृथ्वी, सौर मण्डल, ब्रह्माण्ड, अनन्त विश्व का दृश्य भाग-तपः लोक)-विष्णु पुराण (२/७/३-४)।
बड़े विश्व ५ हैं, जिनका परस्पर अनुपात ७ है (१० के घात में), छोटे विश्व ७ हैं जिनका अनुपात ५ है। अतः विश्व १० आयाम का होगा। (२) यह श्री सिद्धान्त है।
यान्त्रिक विश्व ५ आयाम का है जिसमें ५ प्रकार की माप होती है (५ मा छन्द)। इसका सांख्य दर्शन है। उसके बाद चेतना के ५ स्तर हैं, जिनके ५ आयाम हुए-पुरुष (पुर या रचना), ऋषि (२ पिण्डों के बीच आकर्षण विकर्षण के ७ प्रकार के सम्बन्ध), नाग या वृत्र (पिण्ड की सीमा रूप सतह), रन्ध्र या नन्द (घनत्व आदि में कमी जिससे नयी सृष्टि या परिवर्तन होता है), रस या आनन्द (मूल समरूप तत्त्व)।
इन ६ आयामों के अनुसार ६ दर्शन तथा ६ दर्श वाक् (लिपि) हैं। आयाम संख्या के वर्ग के अनुसार दर्शन के तत्त्व या लिपि के अक्षर होंगे।
सांख्य दर्शन- ५ x ५ = २५ तत्त्व, रोमन लिपि के २५ अक्षर।
शैव दर्शन के ६ x ६ = ३६ तत्त्व, लैटिन, गुरुमुखी के ३६ अक्षर।
४९ मरुत् के अनुसार ४९ अक्षर की देवनागरी लिपि
८ x ८ = ६४ कला अनुसार ६४ अक्षर की ब्राह्मी लिपि।
(८+९) के वर्ग अनुसार वेद में ३६ x ३ = १०८ स्वर, ३६ x ५ = १८० व्यञ्जन, १ ॐ।
१० आयाम के अनुसार चीन-जापान में कई हजार अक्षर।
(९) जीवन क्रम-मनुष्य जीवन ज्ञान तथा कर्म से चलता है, अतः २ प्रकार की सनातन निष्ठा कही गयी है।
उभाभ्यामेव पक्षाभ्यां यथा खे पक्षिणां गतिः। तथैव ज्ञान कर्माभ्यां जायते परमं पदम्॥
(योगवासिष्ठ, पूर्वार्ध, १/५)
लोकेऽमिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ। ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्॥ (गीता, ३/३)
इनके अभ्यास को तप तथा स्वाध्याय कहते हैं। शरीर तथा मन की क्षमता बढ़ाने के लिए योग के ८ अंग हैं, जिनका वर्णन पतञ्जलि के योग सूत्र में है।
(१०) पर्यावरण-विश्व के विभिन्न क्षेत्रों के प्राणों को देवता कहा गया है। उनकी उपासना या वृद्धि करने पर वे हमारी वृद्धि करते हैं। देव पूजा का यही उद्देश्य गीता में कहा है-
देवान् भावयतान् एनं, ते देवा भावयन्ति वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयं परमवाप्स्यथ॥ (गीता, ३/१०)
देश के लिए ५ यज्ञ कहे गये हैं-(१) राजसूय-राजस्व संग्रह और प्रजा के लिए उपयोग, (२) अश्वमेध -देश के सञ्चार, यातायात व्यवस्था, (३) चयन-कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्तियों का चयन, (४) वाजपेय-देश की उन्नति, (५) शीर्ष-शासक द्वारा नियन्त्रण।
४. सनातन की द्वेषपूर्ण नकल-सनातन धर्म का आधार वेद है। वह किसी मत के समर्थन के लिए नहीं लिखा गया था। पर भारत में विदेशी शासन में अपने मत के प्रचार और अन्य मतों के खण्डन के लिए मूल अर्थों में परिवर्तन किये गये। दूषित अर्थों की कई विधियां हैं-छन्द का पाद भंग कर अन्वय, ब्रह्म या ऋषि वाचक सभी शब्दों का अर्थ परमेश्वर या विद्वान् करना, सभी मनुष्य ऋषियों को अस्वीकार कर अग्नि-वायु आदि तत्त्वों को ऋषि कहना, जिन अर्थों में शब्दों का कभी प्रयोग नहीं हुआ, उन अर्थों का दूषित प्रयोग जिसे निरुक्त प्रक्रिया कहा गया। व्याकरण मूल धातु में उपसर्ग प्रत्यय जोड़ कर शब्द बनते हैं, निरुक्त में शब्द परिवर्तन वैज्ञानिक प्रक्रिया के अनुसार होता है। जैसे-चित् = शून्य आकाश, चिति = कणों को क्रम में सजाना, चेतना = जो चिति कर सके, चित्त = चेतना का निवास।
असुरों ने भी समय समय पर अपने स्वार्थ या वासना पूर्ति के लिए वेद शब्दों के भिन्न अर्थ किये, जैसे पूर्व काल में प्रजापति द्वारा ’द’ उपदेश के ३ प्रकार के अर्थ किये गये थे। वेद की नकल होने के कारण कुरान की अरबी भाषा में कई संस्कृत शब्द हैं। मुहम्मद मुस्तफ़ा ख़ाँ ’मद्दाह’ के उर्दू हिन्दी शब्दकोष (उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ) में भी इस आशय का एक अरबी शब्द दिया है-तवाफ़ुके लिसानैन (अरबी, पुल्लिंग)= दो विभिन्न भाषाओं के किसी शब्द का एक जैसा होना, बनावट में भी और अर्थ में भी, जैसे "फुल्ल" अरबी और संस्कृत दोनों में फूल को कहते हैं। इसका मूल है तवाफ़ुक = परस्पर एक जगह रहना; एक दूसरे के अनुकूल होना; एक दूसरे की सहायता करना, सदृशता, यकसानियत। कुछ उदाहरण-
(१) चार पत्नी-वेद में एक ही पत्नी के ४ रूपों का वर्णन है। उसका अर्थ अरब में ४ पत्नी किया गया। पत्नी रूपों के वेद मन्त्रों के कुछ शब्दों का प्रयोग भारत में नहीं होता है। अतः ४ पत्नी नियम वाले अरबी भाषा में यह शब्द खोजा। पुरानी अरबी में ववाता का अर्थ मालिक या स्वामिनी होता था, आजकल यह मध्य अफ्रीका में प्रचलित है। पतञ्जलि के महाभाष्य के आरम्भ में लिखा है कि वेद के शब्द निरर्थक नहीं हैं, पृथ्वी पर ७ द्वीप हैं, कहीं न कहीं उनका प्रयोग हुआ होगा। सर्वे खल्वप्येते शब्दा देशान्तरेषु प्रयुञ्ज्यन्ते। न चैवोपलभ्यन्ते। उपलब्धौ यत्नः क्रियताम्। महान् शब्दस्य प्रयोगविषयः। सप्तद्वीपा वसुमती त्रयो लोकाः चत्वारो वेदाः साङ्गाः स रहस्या बहुधा भिन्ना एकशतध्वर्यु शाखाः सहस्रवर्त्मा सामवेदः एकविंशतिधा बाह्वृच्यं नवधाथर्वणो वेदः वाकोवाक्यं इतिहासः पुराणं वैद्यकं इत्येतावान् शब्दस्य प्रयोगविषयः। (महाभाष्य, १/१)
पत्नी के वेद में ४ रूप कहे हैं-महिषी (माता), ववाता (स्वामिनी), पालागली (पति-पिता क परिवारों के बीच सम्पर्क, या तोता), परिवृक्ता (स्वतन्त्र व्यक्तित्व या व्यवसाय)। अतः अरब में ४ पत्नियों का नियम हो गया। इनके ३ शब्द केवल प्राचीन अरबी में थे-पाला-गली = २ पाला के बीच की गली, तोता = बोलने वाला पक्षी, २ परिवारों के बीच सम्पर्क के लिए सदा बोलती रहती हैं, ववाता = स्वामिनी (प्राचीन अरबी, अभी केवल केन्या में प्रचलित)
परिवृक्ता च महिषी स्वस्त्या च युधङ्गमः । अनाशुरश्चायामि तोता कल्पेषु सम्मिता ॥१०॥
वावाता च महिषी स्वस्त्या च युधङ्गमः । श्वाशुरश्चायामि तोता कल्पेषु सम्मिता ॥११॥ (अथर्व, २०/१२८)
चतस्रो जाया उपक्लृप्ता भवन्ति। महिषी वावाता परिवृक्ता पालागली। सर्वा निष्किण्योऽलङ्कृताः। मिथुनस्यैव सर्वत्वाय। (शतपथ ब्राह्मण, १३/४/१/८)
प्रहेयो वै पालागलः (दूतः) अध्वानं वै प्रहित एति (शतपथ ब्राह्मण, ५/३/१/११)
महिषी धाय्या। (कौषीतकि ब्राह्मण, १५/४), भुव इति वावाता (पत्नी)। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/९/४/५)
(२) सप्तम मन्वन्तर-बाइबिल के आरम्भ में ७वें दिन की सृष्टि कही गयी है। अभी दिन का अर्थ है-पृथ्वी का अक्ष-भ्रमण काल। जब सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी नहीं बने थे, तब दिन का क्या अर्थ हो सकता है? जब सौर-मण्डल भी नहीं था, तो ब्रह्माण्ड (विश्व रूपी ब्रह्म का अण्ड-गैलेक्सी) का अक्ष-भ्रमण ही दिन है। शतपथ ब्राह्मण (१२/३/२/५) के अनुसार मुहूर्त्त को ७ बार १५ से भाग देने पर लोमगर्त होता है, जो १ सेकण्ड का प्रायः ७५,००० भाग है। त्वचा पर केश लोम हैं, उनका गर्त या आधार कलिल (सेल, cell) है। शतपथ ब्राह्मण (१०/४/४/२) के अनुसार जितने नक्षत्र हैं उतने १ संवत्सर में लोमगर्त हैं। ब्रह्माण्ड में जितने तारा हैं, मनुष्य मस्तिष्क में उतने ही कण हैं-प्रायः २ खर्व। अतः ब्रह्माण्ड मन का बृहत् रूप है और उसकी चेतना या तत्त्व मनु है। इसका अक्ष भ्रमण मन्वन्तर कहा जायेगा, जिसका मान पुराणों के अनुसार ३०.६८ करोड़ वर्ष है। ब्रह्माण्ड केन्द्र से सूर्य प्रायः २/३ त्रिज्या दूरी पर है तथा आधुनिक अनुमान के अनुसार सूर्य २०-२५ करोड़ वर्ष में केन्द्र की १ परिक्रमा करता है। ब्रह्माण्ड का बाहरी किनारा कुछ अधिक समय में परिक्रमा करेगा। इसका अभी ७वां मन्वन्तर चल रहा है, जिसे बाइबिल में ७ दिन कहा है। सूर्य सिद्धान्त (१४/१) के अनुसार यह प्राजापत्य मान है। पृथ्वी सतह पर ऐतिहासिक मन्वन्तर बृहत् मन के भीतर पृथ्वी अक्ष का शङ्कु आकार में भ्रमण चक्र है, जिसे अयन चलन (precession of equinoxes) कहा गया है। यह मन्वन्तर २६,००० वर्ष का है जो स्वायम्भुव मनु से कलि आरम्भ (३१०२ ईपू) तक का समय है (ब्रह्माण्ड पुराण, १/२/९/३६-३७, १/२/२९/१९)।
(३) जन्नत में ७२ हूर-अप्सरा को अरबी में हूर कहते हैं। अप् = जल, सर = गति, जल में तैरने वाली स्त्री अप्सरा है। आजकल सौन्दर्य प्रतियोगिता में स्त्रियां तैरने का वस्त्र पहन कर दिखाती हैं। ब्रह्माण्ड के खाली स्थान में फैला विरल पदार्थ जल जैसा समुद्र है, जिसे अप् कहते हैं। यह समुद्र सरस्वान् है, तथा इसे वरुण स्वर्ग कहते हैं। पुराण भाषा में यह जनः लोक है, जिसे अरबी में जन्नत कहा गया है। जनः लोक में १ कल्प तक आत्मा रहती है, जिसे कुरान में कहा है कि कयामत तक आत्मा रहती है। (वहां कब्र के मृत शरीर को ही आत्मा समझा गया है)।
ध्रुवादूर्ध्वं महर्लोको यत्र ते कल्पवासिनः॥१२॥
ध्रुवसूर्यान्तरं यच्च नियुतानि चतुर्दश।
स्वर्लोकः सोऽपि गदितो लोकसंस्थान चिन्तकैः॥१८॥
त्रैलोक्यमेतत् कृतकं मैत्रेय परिपठ्यते।
जनस्तपस्तथा सत्यमिति चाकृतकं त्रयम्॥१९॥
कृतकाकृतयोर्मध्ये महर्लोक इति स्मृतः।
शून्यो भवति कल्पान्ते योऽत्यन्तं न विनश्यति॥२०॥
(विष्णु पुराण, अध्याय, २/७)
वेद में ३ धामों-पूर्ण विश्व, ब्रह्माण्ड, सौर मण्डल के पिण्ड को भूमि तथा आकाश को पिता कहा गया है। इनके ३ व्रत (अन्तरिक्ष) हैं-अर्यमा, वरुण, मित्र।
तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम् ।
ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन् वरुण मित्र चारु ॥ (ऋक्, २/२७/८)
अयं वै लोको मित्रः, असौ लोकः वरुणः। (शतपथ ब्राह्मण, १२/९/२/१२)
(आपः) यच्च वृत्वा अतिष्ठन् तद् वरणः अभवत्, तं वा एतं वरणं सन्तं वरुण इति आचक्षते परोक्षेण। (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, १/७)
ब्रह्माण्ड के अप् में प्रकाशित पिण्ड तैरते हैं, अतः उनको तारा कहते हैं।
सलिलं वा इदमन्तः (अन्तरिक्षे) आसीत्। यत् अतरन्, तत् तारकानां तारकत्वम्। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/५/२/५)
अप् में चलने के कारण वे अप्सरा हैं। अग्नि की अप्सरा ओषधि, सूर्य की अप्सरा उसकी मरीचि, चन्द्रमा की अप्सरा नक्षत्र, वात की अप्सरा अप्, यज्ञ की अप्सरा दक्षिणा तथा मन की अप्सरा ऋक्-साम हैं (वाज. यजु, १८/३८-४३, शतपथ ब्राह्मण, ९/४/१/७-१२)।
अप् वरुण का क्षेत्र है, उसकी प्रजा गन्धर्व हैं, जो गन्ध रूप हैं (भूमि तत्त्व का गुण गन्ध है, अर्थात् पदार्थ के सूक्ष्म कण) वरुण आदित्यो राजेत्याह तस्य गन्धर्वा विशः त इमे आसत, इति। (शतपथ ब्राह्मण, १३/४/३/७)
योषित् कामा वै गन्धर्वाः (शतपथ ब्राह्मण, ३/२/४/३, ३/९/३/२०)
अप्सरा क्षेत्र (स्त्री) है, गन्धर्व उस क्षेत्र के कण (पुरुष) हैं।
स्त्री कामा वै गन्धर्वाः (ऐतरेय ब्राह्मण, १/२७, कौषीतकि ब्राह्मण, १२/३)
अतः ब्रह्माण्ड में मरने के बाद ७२ हूरों (अप्सरा) की कथा कुरान में है (२७ नक्षत्र, अरबी में २७ का उल्टा ७२)।
(४) संसार-संसार को ३ हिस्से में समझा जाता है-एक आकाश में, एक धरती पर, और एक अपने शरीर के भीतर-इनको आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक कहते हैं। अलिफ आकाश की सृष्टि है (गीता में अक्षराणां अकारोऽस्मि), लाम धरती है। अंग्रेजी में Word में L (लाम) मिलाने से World होता है| संस्कृत में भी लं = पृथ्वी या अग्नि तत्त्व। लाम या अलग अलग रूपों के कारण झगड़ा होता है अतः लाम = लड़ाई। मीम् (अंग्रेजी में me) = मैं का अर्थ अपना शरीर है। संसार के इन ३ रूपों की एकता समझना भगवान की वाणी समझना है।
व्यवहार में विपरीत अर्थ है कि ब्रह्म सबका पालन करता है, अल्लाह रोजा पूरा होते ही अन्य लोगों को मारने का आदेश देता है (कुरान, २/१९१)।
(५) फकीर तथा काफ़िर-यह आदम-हव्वा की कहानी पर आधारित है। जो फाक़ा (अरबी फ़ाकः) करता है वह फकीर (अरबी फ़क़ीर) है, फ़क़ीर होने का गुण फ़ख्र (गौरव) है। उसका उलटा काफी खानेवाला काफिर है। कोई भी बिना खाये जीवित नहीं रह सकता। पर जो सिर्फ अपनी जरूरत के लिये ही खाता है, वह फकीर है। लेकिन अधिकतर लोग सिर्फ खाने या कई चीजों के उपभोग में हमेशा लगे रहते हैं। जरूरत से अधिक उपभोग की कोशिश से ही सभी पाप होते हैं, अतः फकीर का उलटा काफिर बुरा व्यक्ति हुआ। आदम केवल देखभाल करता था, जिसमें खाने की हवस है, वह हव्वा है, वह पुरुष या स्त्री कोई भी हो सकता है। इस कथा का मूल द्वा-सुपर्ण सूक्त है, जिसके अनुसार ज्ञान रूपी वृक्ष पर २ पक्षी बैठे हैं जिनमें एक उसके फल स्वाद सहित खाता है, अन्य केवल देखभाल करता है। शंकराचार्य ने इनको मस्तिष्क के आज
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