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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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विडंबना तो देखिये कि हिंदुओं के त्यौहार आते ही तथाकथित सेकुलरों,मिशनरियों,मुस्लिम निकायों,राजसी दल, विविध एन.जी.ओ.को पर्यावरण,प्रदूषण,जल संरक्षण और अपशिष्ट पदार्थों के निराकरण की गंभीर चिंता और समस्या होने लगती है,संविधान के प्रावधान याद आने लगते हैं।फिर विरोध में न्यायपालिका की शरण ली जाती है और उच्चतम और उच्च न्यायालयों में याचिकाओं की बाढ़ लग जाती है,न्यायपालिकाओं के सेकुलर न्यायाधीश तथाकथित सेकुलरिज्म की आड़ में दवाब में आकर अधिकतर हिन्दुओं के विरोध में निर्णय दे देते हैं, परंतु जब ईसाई और मुस्लिम त्योहारों की बात आती है,तो ये सभी चुप्पी साथ लेते हैं, तब ये सब मिल जाते हैं,और उच्चतम न्यायालय की बात भी नहीं मानते हैं। यहाँ तक कि उच्चतम न्यायालय भी दबाव में आ जाता है और अवमानना का नोटिस तक नहीं देता है। अब देखिए न सन् 1958 में मोहम्मद हनीफ कुरैशी बनाम बिहार राज्य में माननीय उच्चतम न्यायालय में निर्णय दिया था,कि बकरीद के अवसर पर गाय काटना धर्म का आवश्यक तत्व नहीं है,अतः ऐसी छूट देना अवैध है,परंतु इसे किसने सुनाऔर किसने माना? गाय की कुर्बानी निर्बाध रुप से जारी है।
ये किस प्रकार के दोगले बुद्धिजीवी लोग हैं, जो निरीह प्राणियों की कुर्बानी पर मौन हो जाते हैं और उच्चतम न्यायालय की बात भी नहीं मानते, परंतु उच्चतम न्यायालय द्वारा खतरनाक कुत्तों को समाप्त करने की बात की जाती है,तो उसके विरुद्ध याचिकाओं पर याचिकाएं दायर की जाती हैं, और उच्चतम न्यायालय पर दवाब बनाने का अभ्यास किया जाता है।
यह भी एक विडंबना ही है कि,अहिंसा के पुजारी महात्मा गाँधी ने भी बकरीद पर होने वाली कुर्बानी का विरोध कभी नहीं किया परन्तु अहिंसा की वकालत करने वाले तथाकथित सेक्यूलर भी मौन व्रत धारण कर लेते हैं, यह अत्यंत दुखद है। प्राणि (प्राणी) हित,जनहित और पर्यावरण हित की बात करने वाली नामी -गिरामी संस्थाएं और वो पेटा (PETA) संगठन के 20 लाख सदस्य ना जाने कहां गायब हो जाते हैं? महाशिवरात्रि, होली और दीपावली पर अतिसार करने वाले बुद्धिजीवी लुप्त हो जाते हैं ? कुछ भी नहीं कहते ?
बॉलीवुड के नायक और नायिकाओं का तो कहना ही क्या है?उन्होंने तो हिंदू सभ्यता और संस्कृति का उपहास बनाने का ठेका ही ले लिया है! हिंदुओं के त्योहारों के समय कैडबरी का विज्ञापन करते हुए कुछ मीठा हो जाए,कहने में कोई संकोच नहीं होता है, परंतु ऐसा ईद और बकरीद के समय,कहने में उन्हें लकवा मार जाता है।
उल्लेखनीय है कि वीगन/इको-फ्रेंडली एक्टिविज़्म और “चयनात्मक विरोध” के सवाल पर अनेक लोग पर्यावरण, पशु-अधिकार, या क्रएल्टी वीगन/इको-फ्रेंडली एक्टिविज़्म और “चयनात्मक विरोध” का सवाल पर कई लोग पर्यावरण, पशु-अधिकार, या क्रूएल्टी -फ्री जीवन शैली की बात करते हैं—जैसे:- “वीगन फूड अपनाओ”
“गाय/दूध/दही मत लो”
“सेव डॉग–सेव एनिमल”
परंतु वे कभी-कभी कुछ खास कौमी अवसरों पर पशु-अधिकार की आवाज़ नहीं उठाते, जैसे बकरीद पर अथवा खुले स्थानों क्यों काटे जाये..!? यह विरोधाभास लोगों को स्वाभाविक रूप से प्रश्न पूछने पर मजबूर करता है।
चयनात्मक एक्टिविज़्म के परिप्रेक्ष्य में सामाजिक आंदोलनों में अक्सर ऐसा देखा गया है कि — जिस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देना “सुरक्षित” हो, उसी पर आवाज़ ऊँची होती है। जहाँ प्रतिक्रिया देने से सामाजिक टकराव हो सकता है,राजनीतिक प्रतिक्रिया मिल सकती है,आरोप लग सकते हैं— वहाँ कई तथाकथित एक्टिविस्ट जानबूझकर चुप रहना चुनते हैं।
अब 2014 के बाद बकरीद पर कुर्बानी को लेकर सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के फैसलों का मुख्य आधार "मोहम्मद हनीफ कुरैशी बनाम बिहार राज्य" का ऐतिहासिक फैसला बना है। उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि इस्लाम धर्म में बकरीद (ईद-उल-अजहा) के मौके पर गाय की कुर्बानी देना कोई अनिवार्य या मौलिक धार्मिक प्रथा नहीं है।
उच्चतम न्यायालय ने माना है कि गायों, बछड़ों और अन्य दुधारू पशुओं के वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने वाले राज्य के कानून संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का उल्लंघन नहीं करते हैं। यह भी अभिनिर्धारित किया कि किसी भी सार्वजनिक स्थल, सड़क, गली या खुले क्षेत्र में कुर्बानी की अनुमति नहीं होगी,पशु वध केवल निर्दिष्ट और वैध बूचड़खानों में ही किया जाना चाहिए।
उच्चतम न्यायालय ने माना है कि पशुओं की सुरक्षा, साफ-सफाई और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य सरकारों को कानून बनाने और पशु वध को नियंत्रित करने का पूरा अधिकार है।इस कानूनी व्यवस्था के अंतर्गत, विभिन्न राज्य सरकारें (जैसे दिल्ली, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल) अपने स्थानीय कानूनों के अनुसार बकरीद पर गाय, बछड़े या ऊंट की कुर्बानी पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाती हैं। सार्वजनिक स्थानों पर नियमों का उल्लंघन करने पर दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है।
उच्चतम न्यायालय का यह निर्णय पुनः तेजी से उभर कर तब आया,जब 13 मई को पश्चिम बंगाल की नई गठित शुभेंदु अधिकारी की सरकार ने आने वाले मुस्लिम त्यौहार बकरीद को देखते हुए पशुओं की कुर्बानी से जुड़ी अधिसूचना जारी की। इस अधिसूचना के जरिए हर साल होने वाली नागरिकों की परेशानी देखते हुए बकरीद के दौरान पशु वध को नियंत्रित करने के लिए कई नियम तय किए गए थे।
अधिसूचना के बाद विवाद होना शुरु हो गया। याचिकाएं कलकत्ता हाईकोर्ट में पहुंची। तर्क यह था कि यह आदेश धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करता है और मुस्लिम समुदाय की परंपराओं पर अनुचित प्रतिबंध लगाता है। हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश सुजय पॉल और न्यायमूर्ति पार्थ सारथी सेन की खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं के तर्कों को खारिज कर दिया।
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि,
ऐसा नहीं है कि सरकार की अधिसूचना कोई नया प्रतिबंध नहीं लगा रही है, बल्कि 2018 में हाईकोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों को ही लागू करती है।न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर पशु वध की अनुमति नहीं दी जा सकती। बिना स्वास्थ्य परीक्षण के पशु वध रोकना सार्वजनिक स्वास्थ्य और पशु संरक्षण के लिए आवश्यक है।न्यायालय ने माना कि प्रशासन का दायित्व है,कि त्योहारों के दौरान कानून-व्यवस्था बनी रहे और सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी नियमों का पालन हो।
धार्मिक आयोजनों को संवैधानिक व्यवस्था और राज्य के नियामक कानूनों के भीतर ही संचालित किया जाना चाहिए।अदालत ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक मामले मोहम्मद हनीफ कुरैशी बनाम बिहार राज्य का हवाला देते हुए कहा कि, गाय की कुर्बानी इस्लाम का अनिवार्य धार्मिक अभ्यास नहीं मानी जा सकती।
भारतीय सभ्यता और संस्कृति ने विश्व को अहिंसा का पाठ पढ़ाया है और जियो और जीने दो" (Live and Let Live) का नारा भगवान महावीर स्वामी द्वारा दिया गया था। वे जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे। महावीर स्वामी ने अपने उपदेश में अहिंसा और जीव दया को महत्व दिया था। "जियो और जीने दो" का अर्थ है कि हर प्राणी को अपने जीवन जीने का अधिकार है, और हमें दूसरों को उनके जीवन जीने में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। अतः यक्ष प्रश्न यही उठता है कि क्या निरीह पशुओं की कुर्बानी,
धार्मिक संस्कार हो सकता है?
संत कबीर ने भी मुखर होकर कहा कि,
कहत कबीर सुनो भई साधु -
"काटा कूटी जो करै, ते पाखंड को भेष,
निश्चय राम न जानहीं, कहैं कबीर संदेस।"
वहीं कुर्बानी और हलाल के बारे में कहते हैं कि,
"गाफिल गरब करैं अधिकाई।
स्वारथ अरथि वधै ए गाई।।
जाको दूध धाइ करि पीजे।
ता माता को बध क्यों कीजे।।
पकरी जीउ आनिआ देह बिनाशी।
माटी कहु बिसमिल कीआ।।
जोति सरुप अनाहत लागी।
कहु हलाल किउ कीआ।।
इस्लाम का शाब्दिक अर्थ शांति से भी लगाया गया है।तथाकथित पवित्र आसमानी पुस्तक भी, कुर्बानी की ऐसी गलत अवधारणाओं की जड़ पर प्रहार करती है और जोर देकर कहती है कि " न तो जानवरों का मांस और न ही खून अल्लाह तक पहुंचता है, बल्कि आपकी तकवा ही उस तक पहुंचती है ," क्योंकि ईश्वर को भोजन या रक्त की आवश्यकता नहीं है।
अंत में इस विमर्श के आलोक प्रश्न यह है कि क्या मिट्टी के बकरे सहित अन्य दूधारु पशुओं की कुर्बानी प्रतीकात्मक नहीं दी जा सकती है?उत्तर है -हाँ,परन्तु इसके लिए मनोदशा को बदलना होगा और कुर्बानी का सही अर्थ समझना होगा।अतः आग्रह है आइये नवाचार करें,मिट्टी का बकरा क़ुर्बान करें।एक क़ुर्बानी के बाद लाखों लीटर पानी सफ़ाई में बर्बाद हो जाता है।मीट के अलावा जानवर का बाक़ी शरीर भी लाखों टन कबाड़ बन जाता है,जो कि प्रदूषण का कारण बन जाता है।जैसे हिंदुओं द्वारा रंगोत्सव पर्व पर जल का प्रयोग कम किया जा रहा है।दीपोत्सव पर्व पर पटाखों का प्रयोग कम किया जा रहा है, जिससे वायु प्रदूषण ना हो।गणपति और दुर्गा भी इको फ्रेंडली बन रहे है। हिंदुओं में विभिन्न अवसरों पर मिट्टी और गोबर के प्रतीकात्मक स्वरूप बनाकर विविध अनुष्ठान किए जाते हैं,उसी प्रकार आप लोग भी आगे बढ़ें और मिट्टी के बकरे की क़ुर्बानी दें।अगर आपको यह सुझाव अच्छा लगा हो; तो सभी लोगों को अवगत कराएं और इको फ्रेंडली बकरीद मनाइए।
डॉ. आनंद सिंह राणा इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रणाम
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