- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
---
(आज 24 मई- जयंती पर शत् शत् नमन करते हुए सादर समर्पित है)
यह कितना अद्वितीय संयोग है,कि अमेरिका से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की गर्जना करने वाले महारथी करतार सिंह सराभा जयंती ऐंसे समय पड़ी है,जब चार दिन पहले अमेरिका में कथित रुप से अध्ययन के लिए गए आम आदमी पार्टी के आई.टी.सेल के सरगना और अर्बन नक्सली अभिजीत दिपके ने दुश्मन देशों के समर्थन से भारत में विद्रोह और अराजकता फैलाने के लिए "कॉकरोच जनता पार्टी" की स्थापना की। यह विडंबना तो देखिए कि एक ओर भारत की स्वतंत्रता के लिए अमेरिका के सेन फ्रांसिस्को में सन् 1913 में लाला हरदयाल और सोहन सिंह भकना "गदर" पार्टी की स्थापना करते हैं,जिसमें करतार सिंह सराभा पूर्णाहुति देते हैं,वहीं दूसरी अमेरिका के बोस्टन में रह रहे अभिजीत दिपके भारत में अराजकता फैलाने के लिए कॉकरोच जनता पार्टी की स्थापना करता है। अतः देश के युवाओं को यह समझना पड़ेगा कि कौन देश प्रेमी था और कौन देशद्रोही है?
इतिहास गवाह है कि भारत से विदेशी सत्ता को उखाड़ने के लिए इंग्लैंड,अमेरिका,जर्मनी फ्रांस और स्विट्जरलैंड जैसे देशों से श्याम जी कृष्ण वर्मा, विनायक दामोदर वीर सावरकर,
मदन लाल धींगरा,लाला हरदयाल, सोहन सिंह भकना, करतार सिंह सराभा और भीकाजी कामा जैंसे अनेक क्रांतिकारियों ने स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल फूँका था,परन्तु दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि उसी देश को बर्बाद करने और अपने अस्तित्व को बचाने के लिए आम आदमी पार्टी और वामपंथी दल ने दुश्मन देशों की शह पर युवाओं को दिशा भ्रमित कर 'कॉकरोच जनता पार्टी' को जन्म दिया है,जिसका उद्देश्य भारत में अशांति और अराजकता फैलाकर उसे तोड़ना है।अमेरिका से अभिजीत दिपके,जर्मनी से ध्रुव राठी और ऑस्ट्रेलिया से अर्पित शर्मा प्रमुख सरगना हैं। ये तीनों क्रांतिकारी नहीं वरन् परजीवी कॉकरोच हैं,जो ये चाहते हैं कि भारत में सुव्यवस्थित शासन तंत्र को छिन्न -भिन्न किया जाए इसके लिए युवा आंदोलित होकर रेलियाँ निकालें और तोड़फोड़ कर,अराजकता फैलायें, फलस्वरूप ये डॉलर कमाएं,अपनी रीच बढ़ाएं और समय आने में सत्ता प्राप्त कर सकें। इसलिए इन तथाकथित नकली क्रांतिकारी कॉकरोचों को खरपतवार की तरह उखाड़ के फेंक देना ही भारत के लिए श्रेयस्कर होगा।
एतदर्थ करतार सिंह सराभा के जीवन दर्शन को युवाओं के लिए जानना अत्यंत आवश्यक और प्रासंगिक है।महान् क्रांतिकारी स्वतंत्रता संग्राम के अद्भुत एवं अद्वितीय नायक, अंग्रेजों के लिए भय का पर्याय महारथी करतार सिंह सराभा - सरदार भगत सिंह के आदर्श थे।आधुनिक भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अद्भुत एवं अद्वितीय नायक थे।
तथाकथित आधुनिक भारत में सन् 1857 से सन 1947 तक,स्वतंत्रता संग्राम के 3 प्रमुख सोपान हैं- प्रथम सोपान सन् 1857 का स्वतंत्रता संग्राम जो कतिपय भारतीय गद्दार सामंतों के अंग्रेजों के साथ मिल जाने के कारण असफल हुआ पर बावजूद इसके राष्ट्रीयता के सुनहरे बीज को रोपित कर गया, जिसे अंग्रेजों के साथ मिलकर परजीवी इतिहासकारों और वामपंथियों ने "चोर चोर मौसेरे भाई" की कहावत के आलोक में स्वतंत्रता संग्राम को विभिन्न प्रकार से उपमायें देकर नकार दिया और "गदर" जैंसे शब्दों का नाम देकर उसके महत्व को कम किया, इसलिए तो अमेरिका में भारत के स्वतंत्रता संग्राम हेतु जिस दल का गठन किया उसका नाम लाला हरदयाल ने "गदर" रखा और समाचार पत्र का भी! इसी के महानायक थे "करतार सिंह सराभा", जिनका जन्म 24 मई सन् 1896 और बलिदान 16 नवंबर सन् 1915(19 वर्ष 6 माह की उम्र में फांसी) को हुआ। आपकी माताश्री का नाम माता साहिब कौर पिताश्री का नाम मंगल सिंह था।
इतिहास के विद्यार्थी होने के नाते मेरे दृष्टिकोंण से सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम सोपान के बाद 1947 तक स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए स्वतंत्रता संग्राम के 2 समानांतर सोपान रहे हैं, प्रथम - क्रांतिकारी राष्ट्रवाद - जो मुखर होकर अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र संग्राम कर स्वतंत्रता प्राप्ति कर भारतीयों के वीरोचित विजय दिलाने में विश्वास रखते थे। इस श्रंखला में सुनियोजित परंपरा के नायक करतार सिंह सराभा से लेकर रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद,भगतसिंह मास्टरदा, प्रीतिलता, और फिर सैलाब के रूप में महानायक सुभाषचंद्र बोस के साथ उभरते हैं। इस सोपान में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की संख्या लाखों में है, जो स्वतंत्रता संग्राम के वास्तविक नायक थे परंतु अंग्रेजी इतिहासकारों और देशी परजीवी इतिहासकारों के साथ वामपंथियों ने इनके इतिहास और योगदान को धूमिल किया है जिसकी सजा इनको मिलेगी।
द्वितीय सोपान - उदार राष्ट्रवाद का था जिसमें कभी - कभी मौसम के बदलने के साथ गर्माहट भी आती जाती रहती थी पहले अंग्रेजों के समर्थन में स्वराज्य चाहते थे, फिर महा महारथी लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल बरतानिया सरकार के विरुध्द उग्र हुए साथ ही स्वाधीनता संग्राम का मोर्चा संभाल लिया परंतु चाटुकारों की फौज ने इनके साथ भी धोखा किया और फिर तथाकथित शांति के पथ पर चलकर स्वाधीनता प्राप्त करने पूरा श्रेय लूट लिया। परंतु प्रथम सोपान वालों को तो..अरे श्रेय तो छोड़िये, आतंकवादियों का तक तमगा दिया गया अब इस विषय पर फिर किसी दिन लिखना प्रासंगिक होगा।
आज तो करतार सिंह सराभा जी का दिन है.. हाँ! मैट्रिक की परीक्षा के बाद उच्च शिक्षा के लिए करतार सिंह सराभा अमेरिका निकल गये।
परंतु किस्मत में तो स्वतंत्रता संग्राम के महान् महारथी होना लिखा था, नियति ने करवट बदली और जब 25 मार्च सन् 1913 के दिन लाला हरदयाल सेन फ्रांसिस्को भाषण दे रहे थे, तब अंत में उन्होंने कहा कि कौन अपने प्राणों की आहुति देगा? फिर क्या था करतार सिंह सराभा ने कहा कि "मैं दूंगा"और इस दिन हुआ करतार सिंह सराभा का नया अवतार।आनन-फानन में अमेरिका और कनाडा में 8 हजार भारतीयों को सदस्य बना लिया गया और युद्ध की तैयारी आरंभ हो गयी।
सौभाग्य से प्रथम विश्व युद्ध 1914 में आरंभ हो गया, इसी का लाभ उठाते हुए भारत में अंग्रेजों पर आक्रमण करने के करतार सिंह सराभा के निर्देशन में 4 हजार स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने भारत की ओर कूच किया, परन्तु हाय रे! दुर्भाग्य भारत के कुछ नामी-गिरामी गद्दारों ने इस योजना को अंग्रेजों को बता दिया।
फलस्वरूप धरपकड़ी हुई आधे से अधिक क्रांतिकारी पकड़े गये लेकिन करतार सिंह सराभा बच निकले और जालंधर पहुंचे, जहां रासबिहारी बोस और शचीन्द्र नाथ सान्याल से मिले और योजना बनायी। पुराने साथी बिछड़ गये इसलिए करतार सिंह सराभा ने पंजाब की सभी सैनिक छावनियों में जाकर स्वतंत्रता के युद्ध के लिए सैनिकों को अपनी ओर करने का अभियान चलाया। अभियान गति पर था परन्तु फिर धोखा हुआ गद्दारों ने खबर कर दी और करतार सिंह सराभा को वैंसे ही घेरा जैंसे वीर अभिमन्यु को घेरा गया था। अंग्रेज़ बहुत खौफजदा थे इसलिए जेल में एक फौजी टुकड़ी 24 घंटे उनकी निगरानी करती थी।
करतार सिंह सराभा पर लाहौर षड्यंत्र के नाम से प्रकरण चलाया गया,उनके साथ 63 अन्य क्रांतिकारियों पर भी मुकदमा चलाया गया था।करतार सिंह पर हत्या,डाका और शासन को उलटने का अभियोग लगाया गया था। प्रकरण में 24 क्रांतिकारियों को फांसी की सजा दी गई परन्तु अपील करने पर सात क्रांतिकारियों की फांसी की सजा को स्थिर रखा गया था। उन सातों क्रांतिकारियों के नाम थे -करतार सिंह सराभा, विष्णु पिंगले,काशीराम, जगत सिंह, हरिनाम सिंह, सज्जन सिंह और बक्शीश सिंह।
बरतानिया सरकार को करतार सिंह सराभा से किस प्रकार भय था,इसका अनुमान जज के निर्णय से लगाया जा सकता है। जज ने अपने फैसले में करतार सिंह सराभा के लिए लिखा था कि
" इस युवक ने अमेरिका से लेकर हिंदुस्तान तक अंग्रेजी शासन को उलटने का प्रयत्न किया है।इसे जब और जहाँ भी अवसर मिला, अंग्रेजों को हानि पहुंचाने का प्रयत्न किया।इसकी अवस्था बहुत कम है,किंतु अंग्रेजी शासन के लिए बड़ा भयानक है।"
आखिर बलिदान का दिन आ ही गया, उन्होंने कहा था कि "जज साहब मुझे फांसी ही देना.. मैं पुनर्जन्म में विश्वास करता हूँ और तब तक जन्म लेता रहूंगा जब तक की मेरा देश स्वतंत्र न हो जाए" -भारत माता की जय। देश तो स्वतंत्र हो गया पर अभी इनके साथ न्याय नहीं हुआ है और न्याय यही है कि इनकी पूजा करें, इनके योगदान को याद करें, इतिहास के पुनर्लेखन में सहयोग करें। इतिहास का पुनर्लेखन जारी है, इसी कड़ी में यह शब्दांजलि अर्पित है।
करतार सिंह सराभा एक महान् क्रांतिकारी कवि और शायर थे उनकी,यह गज़ल भगत सिंह को बेहद प्रिय थी, वे इसे अपने पास हमेशा रखते थे और अकेले में अक्सर गुनगुनाया करते थे। श्रद्धांजलि स्वरुप प्रस्तुत है -
"यहीं पाओगे महशर में जबां मेरी बयाँ मेरा,
मैं बन्दा हिन्द वालों का हूँ है हिन्दोस्तां मेरा;
मैं हिन्दी ठेठ हिन्दी जात हिन्दी नाम हिन्दी है,
यही मजहब यही फिरका यही है खानदां मेरा;
मैं इस उजड़े हुए भारत का यक मामूली जर्रा हूँ,
यही बस इक पता मेरा यही नामो-निशाँ मेरा;
मैं उठते-बैठते तेरे कदम लूँ चूम ऐ भारत!
कहाँ किस्मत मेरी ऐसी नसीबा ये कहाँ मेरा;
तेरी खिदमत में अय भारत! ये सर जाये ये जाँ जाये,
तो समझूँगा कि मरना है हयाते-जादवां मेरा!"
अंत में यही कि जब भी भारत को बदनीयती से हानि पहुंचाने के लिए परजीवी कॉकरोच पैदा होंगे, तब उनके उपचार के लिए करतार सिंह सराभा का कृतित्व और व्यक्तित्व भारत के युवाओं के लिए सदैव मार्गदर्शी और कालजयी रहेगा। करतार सिंह सराभा की प्रेरणा से युवाओं में यही स्वर मुखरित होना चाहिए कि
"देश से है प्यार तो,
हर पल ये कहना चाहिए,
मैं रहूं या ना रहूं,
भारत ये रहना चाहिए।
सिलसिला ये बाद मेरे,
यूँ ही चलना चाहिए,
मैं रहूं या ना रहूं
भारत ये रहना चाहिए।
---
जय हिंद, जय भारत,
-डॉ. आनंद सिंह राणा, श्रीजानकीरमण महाविद्यालय एवं इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें