सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

चुनाव बढ़ते गए, समाज टूटता गया






✍️दीपक कुमार द्विवेदी

भारत की आत्मा को भीतर से खोखला करने वाला सबसे बड़ा घुन यदि कोई है, तो वह डेमोक्रेसी है। यह वही घुन है जो धीरे-धीरे राष्ट्रों को बाहर से नहीं, भीतर से चाटता है। प्रारम्भ में यह व्यवस्था स्वतंत्रता, समानता और अधिकारों का स्वप्न दिखाती है, परन्तु समय बीतने के साथ समाज को जाति, भाषा, क्षेत्र, सम्प्रदाय, वर्ग और राजनीतिक स्वार्थों में विभाजित कर देती है। आज भारत उसी मार्ग पर खड़ा दिखाई देता है, जहाँ से आगे या तो राष्ट्रीय पुनर्जागरण है अथवा विखण्डन।

भारत कोई साधारण भूभाग नहीं है। यह हजारों वर्षों से विविध परम्पराओं, दर्शन-पद्धतियों, भाषाओं, जातीय समूहों, आस्थाओं और जीवन-शैलियों का महासमूह रहा है। इस राष्ट्र ने चार्वाक को भी स्थान दिया और वेदांत को भी; बौद्धों को भी आश्रय दिया और शैव-वैष्णव परम्पराओं को भी। भारत की शक्ति उसकी विविधता में थी, परन्तु डेमोक्रेसी उस विविधता को समन्वय के रूप में नहीं, संघर्ष के रूप में देखती है। यही कारण है कि आज भारत में प्रत्येक विमर्श “बनाम” की राजनीति में परिवर्तित कर दिया गया है स्त्री बनाम पुरुष, दलित बनाम सवर्ण, उत्तर बनाम दक्षिण, भाषा बनाम भाषा, युवा बनाम राज्य, मूलवासी बनाम तथाकथित बाहरी।
यह भारतीय दृष्टि नहीं, यूरोपीय वर्ग-संघर्ष की दृष्टि है।

यूरोप का इतिहास बताता है कि वहाँ समाज को सदैव संघर्ष के आधार पर संगठित किया गया। कभी महिलाओं को डायन घोषित कर जीवित जला दिया गया, कभी चर्च के नाम पर लाखों लोगों का नरसंहार हुआ, कभी नस्लवाद के आधार पर उपनिवेशवाद खड़ा किया गया। दो विश्वयुद्ध उसी यूरोपीय मानसिकता की देन थे। वहीं से डेमोक्रेसी की आधुनिक अवधारणा निकली। वही मानसिकता आज भारत पर थोपी जा रही है। भारत को यूरोपीय चश्मे से देखने का परिणाम यह हुआ कि यहाँ के समाज को “पिछड़ा”, “बर्बर”, “अंधविश्वासी” और “जातिवादी” सिद्ध कर राज्य-नियंत्रित ढाँचे में बाँध दिया गया।

भारत में 1950 से डेमोक्रेसी आधारित संसदीय प्रणाली लागू है। पिछले लगभग 76 वर्षों में सैकड़ों चुनाव हुए, हजारों नेता बदले, अनेक राजनीतिक दल आए और चले गए, परन्तु व्यवस्था का चरित्र नहीं बदला। जनता एक दल से निराश होकर दूसरे को चुनती है, फिर उससे निराश होकर तीसरे को। यह चक्र निरंतर चलता रहता है। चुनाव एक स्थायी राजनीतिक मनोरंजन बन चुके हैं। पंचायत चुनाव, नगर निगम चुनाव, विधानसभा चुनाव, लोकसभा चुनाव, उपचुनाव पूरा समाज निरंतर राजनीतिक उत्तेजना में उलझा रहता है। राष्ट्र-निर्माण पीछे छूट जाता है।

यदि डेमोक्रेसी वास्तव में समाज को स्थिर और संगठित करती, तो स्वतंत्रता के बाद भारत में इतने व्यापक सामाजिक संघर्ष क्यों उत्पन्न होते? विभिन्न अध्ययनों और सरकारी अभिलेखों के अनुसार स्वतंत्रता के बाद भारत में 50 हजार से अधिक साम्प्रदायिक दंगे हुए। नक्सलवादी हिंसा में हजारों सुरक्षाकर्मी और नागरिक मारे गए। खालिस्तान आंदोलन ने पंजाब को रक्तरंजित किया। कश्मीर दशकों तक आतंकवाद से जूझता रहा। बंगाल, केरल और त्रिपुरा जैसे राज्यों में राजनीतिक हिंसा सामान्य राजनीतिक संस्कृति बन गई। पश्चिम बंगाल में वामपंथी शासन के दशकों के दौरान हजारों राजनीतिक हत्याएँ हुईं। केरल में वैचारिक संघर्ष के नाम पर निरंतर रक्तपात होता रहा। यह सब उसी डेमोक्रेसी के भीतर हुआ जिसे “लोक-इच्छा” की सर्वोत्तम प्रणाली कहा गया।

डेमोक्रेसी का सबसे बड़ा संकट यह है कि वह संख्या को सत्य मान लेती है। जिसके पास अधिक मत हैं, वही सही मान लिया जाता है। परन्तु भारत का मूल दर्शन संख्या पर नहीं, धर्म पर आधारित था। यहाँ धर्म का अर्थ रिलिजन नहीं था। धर्म वह व्यवस्था थी जो समाज, प्रकृति, कर्तव्य, न्याय और संतुलन को धारण करे। इसी कारण भारत में लोकतांत्रिक परम्पराएँ होते हुए भी केंद्रीकृत डेमोक्रेसी नहीं थी। गाँव आत्मनिर्भर थे। स्थानीय समुदाय अपने निर्णय स्वयं लेते थे। “कोउ नृप होइ हमहि का हानि” जैसी कहावत इसी सामाजिक संरचना से उत्पन्न हुई थी, जहाँ स्थानीय जीवन राज्य से अधिक समाज पर आधारित था।

भगवान राम लंका विजय के बाद लंका को अपने साम्राज्य में मिलाने का प्रयास नहीं करते, बल्कि विभीषण को राज्य सौंप देते हैं। यही भारतीय राष्ट्रदृष्टि थी विजय के बाद भी स्थानीय स्वायत्तता। राजा पृथु, महाराज रघु, धर्मराज युधिष्ठिर, विक्रमादित्य और समुद्रगुप्त जैसे चक्रवर्ती सम्राटों के काल में भी भारत ने सांस्कृतिक एकता के भीतर प्रशासनिक विविधता को स्थान दिया। समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति लेख में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि अनेक राज्यों को स्थानीय स्वशासन के साथ अधीनता स्वीकार करने दी गई थी। भारत की शक्ति केंद्रीकृत दमन में नहीं, सांस्कृतिक समन्वय में थी।

इसके विपरीत आधुनिक डेमोक्रेसी एक राष्ट्र, एक कानून, एक प्रशासनिक ढाँचे और एक राजनीतिक विमर्श के माध्यम से पूरे समाज को नियंत्रित करना चाहती है। परिणामस्वरूप स्थानीय परम्पराएँ नष्ट होती हैं, ग्राम व्यवस्था टूटती है, परिवार विघटित होता है और लोग राज्य-निर्भर बनते जाते हैं। पहले गाँव आत्मनिर्भर थे; आज लोग नौकरी, राशन, अनुदान और सरकारी योजनाओं पर निर्भर हैं। बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और न्यायिक विलम्ब स्थायी समस्या बन चुके हैं। एक साधारण विवाद के लिए वर्षों तक न्यायालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। यह कैसी जनव्यवस्था है जिसमें समाज स्वयं निर्णय लेने की क्षमता खो दे?

डेमोक्रेसी का एक और घातक पक्ष यह है कि वह वैश्विक शक्तियों के लिए राष्ट्रों को भीतर से नियंत्रित करने का माध्यम बन जाती है। आज अमेरिका और पश्चिमी शक्तियाँ “मानवाधिकार”, “सामाजिक न्याय”, “अल्पसंख्यक अधिकार” और “उदारवाद” के नाम पर विश्वभर की पारम्परिक संरचनाओं को तोड़ रही हैं। यूरोप और अमेरिका में परिवार व्यवस्था लगभग ध्वस्त हो चुकी है। चर्चों का प्रभाव लगातार घट रहा है। जन्मदर संकट में है। समाज गहरे मानसिक अवसाद और सांस्कृतिक विघटन से गुजर रहा है। यही कारण है कि अब अफ्रीका और एशिया नए वैचारिक युद्धक्षेत्र बनाए जा रहे हैं।

भारत में स्वतंत्रता के बाद बड़े पैमाने पर मतांतरण हुए। विभिन्न ईसाई मिशनरी संगठनों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा के माध्यम से दूरस्थ क्षेत्रों में गहरी पैठ बनाई। उत्तर-पूर्व के अनेक राज्यों की जनसांख्यिकीय संरचना पूर्णतः बदल गई। यह केवल धार्मिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक और राजनीतिक परिवर्तन भी था। डेमोक्रेसी के भीतर संख्या ही शक्ति है, इसलिए मतांतरण केवल आस्था का विषय नहीं रहता, वह राजनीतिक शक्ति-संतुलन का माध्यम बन जाता है।
तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीति इसका दूसरा उदाहरण है। वहाँ दशकों से उत्तर भारत, संस्कृत, सनातन परम्परा और वैदिक संस्कृति के विरुद्ध वैचारिक संघर्ष खड़ा किया गया। भाषा को सांस्कृतिक संवाद के स्थान पर राजनीतिक हथियार बनाया गया। यही मानसिकता 1947 में भारत-विभाजन के समय भी दिखाई दी थी, जब पाकिस्तान को “पाक भूमि ” और शेष भारत को “नपाक ” समझा गया। डेमोक्रेसी ऐसी विभाजक मानसिकताओं को समाप्त नहीं करती; वह उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व देकर और अधिक सशक्त कर देती है।

यदि आने वाले 20 से 30 वर्षों में भारत ने अपनी शासन-दृष्टि पर पुनर्विचार नहीं किया, तो यह डेमोक्रेसी रूपी घुन राष्ट्र की आत्मा को इस सीमा तक खोखला कर देगी कि भारत केवल एक प्रशासनिक नक्शा बनकर रह जाएगा। क्षेत्रीय पहचानें राष्ट्रीय पहचान पर भारी पड़ेंगी। जातीय और भाषाई राजनीति नए विखण्डनों को जन्म देगी। वैश्विक बाज़ार शक्तियाँ परिवार और परम्परा को उपभोक्तावाद में बदल देंगी। समाज राज्य-निर्भर भीड़ में परिवर्तित हो जाएगा।

भारत को पश्चिमी डेमोक्रेसी की नकल नहीं, अपनी सभ्यतागत दृष्टि से उपयुक्त व्यवस्था चाहिए। इसके लिए भारत को पुनः अपने मूल ग्रंथों और परम्पराओं की ओर लौटना होगा शुक्रनीति, कौटिल्य अर्थशास्त्र, विदुर नीति, महाभारत, उपनिषद, योगवासिष्ठ, स्मृतियाँ, पुराण और षड्दर्शन। भारत का भविष्य कार्ल मार्क्स, रूसो और लॉक की अवधारणाओं में नहीं, अपनी सभ्यतागत आत्मा में सुरक्षित है।

डेमोक्रेसी का यह घुन केवल राजनीतिक समस्या नहीं है; यह सांस्कृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक संकट है। यदि समाज को पुनः शक्ति नहीं मिली, यदि ग्राम और समुदाय पुनः आत्मनिर्भर नहीं बने, यदि राष्ट्र को केवल चुनावी गणित से ऊपर उठाकर सभ्यता के रूप में नहीं देखा गया, तो आने वाले दशकों में भारत भी उसी विघटन का शिकार होगा जिसने यूरोप की आत्मा को खोखला कर दिया।

भारत को चुनावी भीड़तंत्र नहीं, सभ्यतागत राष्ट्रदृष्टि चाहिए। तभी यह राष्ट्र भविष्य में विश्व को नया मार्ग दिखा सकेगा।

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