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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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अंग्रेज़ों के दीवाने राजा राम मोहन रॉय
— वे लोग जिन्होंने ज़ंजीरें बुनीं और उन्हें गहना समझा
आज 22 मई है। राजा राममोहन राय की जयंती। उन्हें "आधुनिक भारत का जनक" कहा जाता है — यह उपाधि पाठ्यपुस्तकों में स्वर्णाक्षरों में लिखी है। जयंती पर उनकी जयकार करना आसान है — और परंपरा भी यही है। पर आज इस जयंती के बहाने एक और बात करनी है। बात उन लोगों की जो देशद्रोही भले न रहे हों, पर जो अंग्रेज़, अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ियत के ऐसे दीवाने थे कि उनकी यह दीवानगी एक पूरे राष्ट्र और सभ्यता पर भारी पड़ गई।
आज बात उस सोच की है जो राममोहन राय में थी, पर उनमें अकेले नहीं थी। वह सोच एक पूरी मानसिकता थी — एक वर्ग की, एक युग की। और उस सोच ने भारत को जितना नुकसान पहुँचाया, शायद उतना किसी बाहरी दुश्मन ने भी नहीं।
अंग्रेज़ों ने भारत को तलवार से नहीं जीता। तलवारें तो थीं, पर वे काफ़ी नहीं थीं। किसी भी साम्राज्य को टिके रहने के लिए सिर्फ़ सैनिकों की नहीं, मानसिकता की ज़रूरत होती है — ऐसे लोगों की जो शासक की भाषा में सोचें, उसकी संस्कृति को श्रेष्ठ मानें, और अपनी जड़ों को खुद ही काटने लगें। अंग्रेज़ों को ऐसे लोग भारत में मिले। भरपूर मिले।
इन्हें आप ग़द्दार शायद नहीं कह सकते — किंतु इतना सरल नहीं है यह मामला। ये वो लोग थे जो अपने आप को प्रगतिशील समझते थे। ये अंग्रेज़ी पढ़े-लिखे थे, तर्क करते थे, समाज-सुधार की बात करते थे। पर इनके दिमाग़ में एक गहरी दरार थी। वह दरार थी हीनभावना की — अपनी सभ्यता, अपनी भाषा, अपने ज्ञान के प्रति।
यह हीनभावना इतनी गहरी थी कि वे सफ़ेद चमड़ी को सिर्फ़ चमड़ी नहीं, श्रेष्ठता का प्रमाण मानने लगे थे। जो अंग्रेज़ बोले, वह सत्य। जो अंग्रेज़ी में लिखा हो, वह ज्ञान। जो संस्कृत में हो, वह अंधविश्वास। जो भारतीय हो, वह पिछड़ा।
11 दिसंबर 1823 को राजा राममोहन राय ने एक पत्र लिखा। पता था — गवर्नर जनरल लॉर्ड एमहर्स्ट। विषय था — भारत में शिक्षा का भविष्य।
उस पत्र में उन्होंने माँग की कि ब्रिटिश सरकार संस्कृत शिक्षा को मिलने वाला सरकारी धन बंद करे और उसके स्थान पर पश्चिमी विज्ञान और अंग्रेज़ी शिक्षा को बढ़ावा दे। उनके शब्दों में संस्कृत की शिक्षा "अंधकार में रखने वाली" थी, और पश्चिमी ज्ञान ही भारत को "प्रकाश" दे सकता था।
यह पत्र इतिहास में एक "ऐतिहासिक दस्तावेज़" के रूप में दर्ज है।
पर ज़रा रुकिए। इसे दूसरी तरफ़ से भी पढ़िए।
एक भारतीय व्यक्ति, उपनिवेशी शासकों को पत्र लिखकर यह कह रहा है कि हमारी अपनी ज्ञान-परंपरा को धन देना बंद करो। हमें अपनी भाषा, अपना दर्शन, अपनी शिक्षा-पद्धति नहीं चाहिए — हमें तुम्हारी चाहिए।
क्या यह सुधार था? या आत्मसमर्पण?
इस पत्र के बाद जो हुआ, वह संयोग नहीं था। 1835 में लॉर्ड मैकॉले ने अपना कुख्यात "मिनट ऑन एजुकेशन" लिखा — वही जिसमें उसने कहा था कि एक अच्छे अंग्रेज़ी पुस्तकालय की एक शेल्फ़ पूरे भारत और अरब के साहित्य से बेहतर है। उसी मैकॉले ने राममोहन राय के विचारों को अपनी नीति की नींव बनाया। और फिर आया English Education Act — जिसने भारतीय भाषाओं और ज्ञान-परंपराओं को सरकारी संरक्षण से वंचित कर दिया।
सोचिए — मैकॉले को ज़मीन किसने दी? वह अकेला यह नहीं कर सकता था। उसे ज़रूरत थी किसी "भारतीय गवाह" की — कोई जो कहे कि हाँ, हमारा ज्ञान बेकार है। वह गवाही राममोहन राय दे चुके थे।
यह वैसा ही है जैसे कोई घर का सदस्य बाहर वालों को बुलाकर कहे — आओ, यह घर तोड़ दो, यह रहने लायक नहीं।
यहाँ एक बात स्पष्ट कर देना ज़रूरी है। राममोहन राय अकेले नहीं थे। वे एक प्रकार के थे — एक मानसिकता के प्रतिनिधि। उस दौर में ऐसे अनेक लोग थे जो अंग्रेज़ों की भाषा, वेशभूषा, खान-पान, रहन-सहन — सब कुछ अपनाने में अपनी उन्नति देखते थे। इनके लिए "सभ्य होना" और "अंग्रेज़ों जैसा होना" एक ही बात थी।
ये लोग ब्रिटिश क्लबों के बाहर खड़े रहते थे और अंदर जाने के लिए तरसते थे — शाब्दिक और रूपक, दोनों अर्थों में। इन्होंने अपने बच्चों को अंग्रेज़ी स्कूलों में भेजा, अपने घरों में अंग्रेज़ी बोलना शुरू किया, अपनी बोली-बानी को "गँवारू" और अंग्रेज़ी को "शरीफ़ों की ज़बान" समझा। अपने रंग को शर्म और गोरे रंग को तरक़्क़ी का पैमाना माना।
इनकी दीवानगी सिर्फ़ अनुकरण नहीं थी — यह एक विश्वास था। इन्हें सचमुच लगता था कि अंग्रेज़ श्रेष्ठ हैं। उनका विज्ञान श्रेष्ठ है — यह ठीक भी था। पर उनका निष्कर्ष यह था कि इसलिए उनकी सब कुछ श्रेष्ठ है — उनकी नस्ल, उनकी संस्कृति, उनका धर्म, उनका शासन।
और इसी निष्कर्ष ने भारत को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँचाया।
भारतीय ज्ञान-परंपरा कोई खाली थैला नहीं थी। गणित, खगोलशास्त्र, आयुर्वेद, भाषाविज्ञान, दर्शन, धातुकर्म, नौकायन — इन सब में भारत की उपलब्धियाँ ऐसी थीं जिन्हें आज पश्चिमी विद्वान भी स्वीकार करते हैं। नालंदा और तक्षशिला केवल धर्म नहीं पढ़ाते थे — वे विश्वविद्यालय थे, पूरी दुनिया के अर्थ में।
जब इस ज्ञान-परंपरा को "अंधकार" कहा गया और उसके स्थान पर मैकॉले की शिक्षा-नीति स्थापित की गई, तो वास्तव में क्या हुआ? एक पूरी पीढ़ी तैयार हुई जो अपनी भाषा में सोच नहीं सकती थी, अपने इतिहास को जानती नहीं थी, और अपनी परंपराओं को शर्म की नज़र से देखती थी। यह पीढ़ी अंग्रेज़ों की सेवा के लिए तैयार थी — क्लर्क, अनुवादक, मध्यस्थ।
मैकॉले ने खुद लिखा था कि वह ऐसा वर्ग तैयार करना चाहता है जो खून और रंग में भारतीय हो, पर रुचि, विचार, नैतिकता और बुद्धि में अंग्रेज़ हो।
राममोहन राय जैसे लोगों ने इस परियोजना की नींव रखी।
इतिहास में नीयत नहीं, परिणाम बोलते हैं। और परिणाम यह था कि एक भारतीय के हाथों लिखा गया वह पत्र उस पूरे तंत्र की बौद्धिक आधारशिला बन गया जिसने भारतीय ज्ञान को हाशिये पर धकेल दिया। सदियों की संचित विद्या — जो गुरुकुलों में जीवित थी, जो ऋषियों की स्मृति में थी, जो ग्रंथों में सुरक्षित थी — उसे एक झटके में "अनुपयोगी" घोषित कर दिया गया।
जो प्रश्न आज पूछना ज़रूरी है वह यह है: क्या उस दौर में भारतीय ज्ञान की आलोचना करना और पश्चिमी शिक्षा की वकालत करना — ब्रिटिश शासन के संदर्भ में — एक राजनीतिक भूल नहीं था? क्या उन्होंने यह नहीं देखा कि वे जिस दरख़्त की शाखाएँ काट रहे हैं, उस पर पूरे समाज का घोंसला टिका है?
इरादा जो भी रहा हो — उस दीवानगी में एक अंधापन था। और उस अंधेपन की क़ीमत भारत ने चुकाई। पीढ़ियों तक।
यह लेख किसी की निंदा के लिए नहीं लिखा गया। यह उस सोच को समझने की कोशिश है जो उपनिवेशवाद के साथ आती है — और जो उपनिवेशवाद के जाने के बाद भी बनी रहती है।
जो देश सदियों तक किसी और के अधीन रहता है, उसके कुछ लोग अपने शासकों को आदर्श मानने लगते हैं। यह कमज़ोरी नहीं, यह मनोविज्ञान है। उपनिवेशवाद सिर्फ़ ज़मीन नहीं लेता — वह आत्मविश्वास लेता है, आत्मसम्मान लेता है, और दिमाग़ में एक ऐसी घुन लगा देता है जो भीतर से खोखला कर देती है।
राममोहन राय उस घुन के शिकार थे। और उन्होंने — जानते हों या न जानते हों — उस घुन को राजकीय नीति में बदलने में मदद की।
जयंती पर फूल चढ़ाना आसान है। इतिहास से सवाल पूछना कठिन है। पर जो क़ौमें अपने इतिहास से सवाल नहीं पूछतीं, वे उसी इतिहास को दोहराती रहती हैं।
22 मई को याद रखिए — पर सिर्फ़ जयंती की तरह नहीं। एक सबक़ की तरह भी।
जो अपनी जड़ों को शर्म की नज़र से देखे, वह दूसरों के लिए ज़मीन तैयार करता है।
सुमित गर्ग
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