सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

विविधता, पहचान और संधारणीयता के प्रति वैदिक दृष्टिकोण






✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

समृद्ध जैव-विविधता वही होती है, जिसमें अनेक परस्पर आश्रित प्रजातियाँ संतुलित और जीवंत रूप से सह-अस्तित्व में रहती हैं। इसी प्रकार, विविध समुदायों, भाषाओं, परंपराओं और जीवन-पद्धतियों का स्वाभाविक आदान-प्रदान किसी भी संस्कृति के स्वास्थ्य का प्रमाण होता है। जिस प्रकार किसी प्रजाति का विलुप्त होना जैविक पारिस्थितिकी के लिए हानिकारक है, उसी प्रकार पंथों, भाषाओं और सांस्कृतिक परंपराओं का लोप मानवता के सामूहिक विकास के लिए घातक सिद्ध होता है। उपजाऊ भूमि जिस प्रकार अनेक प्रकार के बीजों को पोषित करती है, उसी प्रकार समृद्ध संस्कृति भी विविध क्षमताओं और परंपराओं को संरक्षण देती है।


इस वैदिक दृष्टि में ईश्वर के प्रति विभिन्न उपासना-पद्धतियों और दृष्टिकोणों का सम्मान निहित है। कोई भी ऐसा पंथ अथवा ईसाई रिलिजन, जो स्वयं को ही अंतिम और अनन्य सत्य घोषित करता है, वह उस खरपतवार के समान है जो अन्य परंपराओं और संस्कृतियों को नष्ट कर स्वयं फैलना चाहता है। ईश्वर के प्रति सच्चा सम्मान तभी संभव है, जब प्रत्येक जीव और प्रत्येक संस्कृति में उसी परम चेतना की अभिव्यक्ति को देखा जाए।
 संस्कृतियाँ और पंथ केवल संग्रहालयों की वस्तु बनकर न रह जाएँ, अपितु उन्हें उनके स्वाभाविक परिवेश में विकसित होने का अवसर मिलना चाहिए।

महाभारत में राजा के शपथ-ग्रहण के प्रसंग में यह भाव अत्यंत सुंदर रूप में व्यक्त हुआ है

मालाकारोपमो राजन् भव मा अङ्गारिकोपमः।
तथा युक्तश्चिरं राष्ट्रं भोक्तुं शक्यसि पालयन्॥


अर्थात् “हे राजन्! माला बनाने वाले के समान बनो, कोयला जलाने वाले के समान नहीं।”

यहाँ “माला” विविधता का प्रतीक है। अनेक रंगों, रूपों और सुगंधों वाले पुष्प जब सामंजस्यपूर्वक एक सूत्र में पिरोए जाते हैं, तभी सुंदर माला बनती है। यह विविधता के मध्य समरसता का आदर्श प्रस्तुत करती है। इसके विपरीत, कोयला बनाने वाला सब कुछ जलाकर एक ही प्रकार की राख में परिवर्तित कर देता है। वहाँ भिन्नता समाप्त हो जाती है और केवल निर्जीव एकरूपता शेष रह जाती है।


मालाकार विविधता का आदर करता है और उसे सहेजता है; इसलिए राजा को भी उसी मार्ग का अनुसरण करने का निर्देश दिया गया है। उसे ऐसा शासक नहीं बनना चाहिए जो सबको एक ही साँचे में ढालने का प्रयास करे। वैदिक सामाजिक व्यवस्था का विकेंद्रीकृत और लचीला स्वरूप इसी रूपक में प्रकट होता है। भारतीय संस्कृति न तो अराजक विखंडन को स्वीकार करती है और न ही कृत्रिम एकरूपता को; वह विविधता और समरसता के संतुलन का आदर्श प्रस्तुत करती है।


धर्म का स्वरूप स्थिर या संकुचित नहीं होता। वह निरंतर प्रवाहित, आत्मसात् करने वाला और विकसित होने वाला तत्त्व है। इसी कारण भारत की मूल चेतना बहुलता और संदर्भ-संवेदनशीलता पर आधारित रही है। समानता शुभ है, किंतु यदि उसकी प्राप्ति विविधता को नष्ट करके की जाए, तो वह विनाशकारी बन जाती है।


भारतीय समाज में विविधता कोई राजनीतिक संघर्ष का परिणाम नहीं, बल्कि उसकी स्वाभाविक प्रकृति है। यहाँ भाषाओं, भोजन-पद्धतियों, वस्त्र-परंपराओं, देवताओं, पूजा-विधियों, दार्शनिक परंपराओं और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों की अनगिनत धाराएँ विद्यमान हैं। यही भारतीय सभ्यता की शक्ति है। यह ऐसी सभ्यता है जिसने केवल विविधता को सहन नहीं किया, बल्कि उसका उत्सव मनाया है।

इसके विपरीत, ईसाई रिलिजन और पश्चिमी वैचारिक परंपराओं में प्रायः समाज को एक ही धार्मिक अथवा वैचारिक ढाँचे में ढालने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। इतिहास साक्षी है कि “एकमात्र सत्य” की अवधारणा के नाम पर अनेक प्राचीन संस्कृतियों, परंपराओं और ज्ञान-परंपराओं को नष्ट किया गया। यूरोप, अमेरिका और अन्य क्षेत्रों में स्थानीय परंपराओं तथा मूल निवासियों की सांस्कृतिक पहचान को मिटाने का प्रयास इसी मानसिकता का परिणाम था।

भारतीय दृष्टि विविधता को जीवन का स्वाभाविक सत्य मानती है, जबकि ईसाई रिलिजन की केंद्रीकृत और एकाधिकारवादी संरचना ने अनेक स्थानों पर विविध परंपराओं को समाप्त कर एकरूपता स्थापित करने का प्रयास किया। बाद में प्रोटेस्टेंट आंदोलनों ने उस केंद्रीकरण को चुनौती अवश्य दी, किंतु उसके परिणामस्वरूप यूरोप लंबे समय तक धार्मिक संघर्षों और रक्तपात से जूझता रहा।


आज “वोक” विचारधारा के नाम पर जो नई सामाजिक संरचनाएँ निर्मित की जा रही हैं, वे भी समाज को विभाजित करने का कार्य कर रही हैं। यह दृष्टिकोण समाज को उत्पीड़क और उत्पीड़ित वर्गों में बाँटकर संघर्ष को स्थायी बनाना चाहता है। पहचान को सहयोग और समरसता का आधार बनाने के स्थान पर उसे संघर्ष का हथियार बनाया जा रहा है। वैदिक दृष्टि इससे भिन्न है; वह समाज को एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र मानती है, जहाँ प्रत्येक घटक परस्पर पूरक होता है।


इसी प्रकार ईएसजी, डीईआई और अन्य वैश्विक मानकों के माध्यम से विचारों और आचरण की एकरूपता थोपने का प्रयास भी आधुनिक “कोयला-दाहक” मानसिकता का उदाहरण है। कुछ वैश्विक संस्थाएँ संपूर्ण विश्व के लिए नैतिकता और सामाजिक आचरण के मानदंड निर्धारित करना चाहती हैं। यह विविधता का संरक्षण नहीं, बल्कि वैचारिक केंद्रीकरण है।

समता और समानता के बीच का अंतर भी यहाँ महत्त्वपूर्ण है। समानता का अर्थ है सभी को समान अवसर प्राप्त होना। किंतु समता का आधुनिक
 राजनीतिक अर्थ परिणामों की कृत्रिम समानता स्थापित करना बन गया है, जिसके लिए पक्षपात और संसाधनों का जबरन पुनर्वितरण किया जाता है। इससे समाज में सहयोग के स्थान पर संघर्ष और पीड़ित मानसिकता को प्रोत्साहन मिलता है।

इसके विपरीत, भारतीय दृष्टिकोण योग्यता, परिश्रम और आत्मोन्नति को महत्त्व देता है। भारत से बाहर जाकर बसे अनेक समुदायों ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी शिक्षा, परिश्रम और सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर सफलता प्राप्त की। उन्होंने अपनी पहचान को पीड़ित मानसिकता में सीमित नहीं किया, बल्कि आत्मबल और अनुकूलन की क्षमता के माध्यम से आगे बढ़े।


वैदिक समाज बहुविध पहचानों को स्वीकार करता है। व्यक्ति का कुलदेवता, ग्रामदेवता, इष्टदेवता, परिवार, समुदाय, क्षेत्र, भाषा और आश्रम ये सभी उसकी पहचान के विभिन्न आयाम हैं। यही बहुलता व्यक्ति को उसकी जड़ों से जोड़ती है और समाज को जीवंत बनाए रखती है।

आज वैश्विक विचारधाराएँ इन स्वाभाविक पहचानों को तोड़कर मनुष्य को एक कृत्रिम वैश्विक ढाँचे में ढालना चाहती हैं। लिंग और कामुकता से जुड़े आधुनिक विमर्शों में भी यही प्रवृत्ति दिखाई देती है, जहाँ पारंपरिक और जैविक पहचानों को अस्थिर कर नई वैचारिक संरचनाएँ आरोपित की जा रही हैं।

भारत की सभ्यतागत शक्ति इसी तथ्य में निहित है कि उसने सहस्राब्दियों के आक्रमणों और औपनिवेशिक अशांतियों के बावजूद अपनी विविधता को सुरक्षित रखा। इसका एक प्रमुख कारण यह था कि भारतीय समाज किसी एक केंद्रीय सत्ता या किसी
 एकाधिकारवादी रिलिजन पर आधारित नहीं था।

भारत और पश्चिम के मध्य मूलभूत अंतर स्पष्ट हैं

भारत में न्याय और सामाजिक व्यवस्था संदर्भ और धर्माधारित कर्तव्यों के अनुसार संचालित होती थी, जबकि पश्चिमी व्यवस्था संहिताबद्ध कानूनों पर आधारित रही।

भारतीय सामाजिक ढाँचा विकेंद्रीकृत और परस्पर निर्भर था, जबकि पश्चिमी व्यवस्था केंद्रीकरण की ओर उन्मुख रही।

भारत में परंपरा और परिवर्तन साथ-साथ चलते रहे, जबकि पश्चिम में इतिहास प्रायः परस्पर संघर्षरत चरणों में विभाजित रहा।

भारत के विभिन्न पंथ शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व में रहे, जबकि ईसाई रिलिजन और इस्लाम के विस्तारवादी तथा अनन्य सत्य आधारित सिद्धांत अनेक स्थानों पर संघर्ष का कारण बने।

भारतीय संस्कृति का प्रसार मुख्यतः ज्ञान, व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान से हुआ, जबकि पश्चिमी सभ्यता ने सैन्य शक्ति और उपनिवेशवाद के माध्यम से अपने प्रभाव का विस्तार किया।

आज भारत में भी पश्चिम-प्रेरित प्रगतिवाद और धर्मनिरपेक्षता के प्रभाव से संस्कृत तथा स्थानीय भाषाओं की उपेक्षा बढ़ी है। अंग्रेज़ी और पश्चिमी जीवन-मूल्यों को उन्नति का पर्याय बना दिया गया है। परंपरा का समर्थन करने वालों को अक्सर पिछड़ा या कट्टर घोषित किया जाता है, जबकि भारतीय आख्यानों और ज्ञान-परंपराओं को मिथक कहकर खारिज किया जाता है।
सच्ची विविधता का अर्थ केवल बाहरी भिन्नताओं से नहीं, बल्कि विचारों, परंपराओं, भाषाओं और आध्यात्मिक दृष्टियों की समृद्धि से है। किसी भी समाज की वास्तविक विविधता को मापने के लिए यह देखना होगा कि

वहाँ कितनी भाषाएँ जीवित हैं,
कितनी उपासना-पद्धतियाँ और देव-परंपराएँ प्रचलित हैं,
कितनी सांस्कृतिक जीवन-शैलियाँ सुरक्षित हैं,
और समाज कितनी स्वाभाविक भिन्नताओं को सम्मानपूर्वक संरक्षित रख पा रहा है।

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