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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
आज संसार का सबसे बड़ा संकट केवल राजनीतिक नहीं है, आर्थिक भी नहीं है। सबसे बड़ा संकट है मनुष्य का विचार छोड़कर विचारधाराओं का गुलाम बन जाना। आधुनिक दुनिया में मनुष्य को अब उसके आचरण, तप, चरित्र, साधना और अनुभव से नहीं, बल्कि उसकी “आईडियोलॉजी” से पहचाना जाता है। कोई वामपंथी है, कोई दक्षिणपंथी, कोई सेक्युलर, कोई राष्ट्रवादी, कोई पूँजीवादी, कोई समाजवादी। ऐसा लगता है जैसे पूरी मानवता को अलग-अलग खाँचों में बाँट दिया गया हो। परंतु यदि भारतीय वैदिक दृष्टि से देखा जाए तो “विचार” और “विचारधारा” दोनों एक-दूसरे के विपरीत प्रकृति के शब्द हैं। इन्हीं दोनों के अंतर को न समझ पाने के कारण आज संसार संघर्ष, हिंसा, मानसिक गुलामी और वैचारिक आतंक से ग्रस्त है।
सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि “विचार” क्या है। “विचार” शब्द संस्कृत धातु “चर्” से निर्मित माना जाता है, जिसका आशय है चलना, मनन करना, परीक्षण करना। अर्थात जो मनुष्य जीवन, अनुभव, प्रकृति, समाज और सत्य को देखकर भीतर से चिंतन करता है, वही विचार है। विचार किसी बंद कमरे में बैठकर लिखे गए सिद्धांत नहीं होते। विचार जीवन से पैदा होते हैं। खेत में काम करने वाला किसान, सीमा पर खड़ा सैनिक, तपस्या करता ऋषि, परिवार चलाती माता इन सबके जीवनानुभव से विचार जन्म लेते हैं। इसलिए भारतीय परंपरा में कहा गया कि जीवन सबसे बड़ी पुस्तक है।
यही कारण है कि वैदिक वाङ्मय, श्रुति, स्मृति, उपनिषद, पुराण, आगम और निगम में “विचारधारा” शब्द नहीं मिलता। वहाँ “धर्म” है, “ऋत” है, “सत्य” है, “विवेक” है, “चिंतन” है, “मनन” है; परंतु विचारधारा नहीं है। क्योंकि सनातन वैदिक धर्म मनुष्य को किसी वैचारिक जेल में बंद नहीं करता। यहाँ सत्य को खोजने की स्वतंत्रता है। यहाँ प्रश्न है, तर्क है, शास्त्रार्थ है, अनुभव है।
इसके विपरीत “विचारधारा” शब्द आधुनिक पश्चिमी बौद्धिक परंपरा की उपज है। अंग्रेज़ी का शब्द “Ideology” यूनानी मूल “Idea” और “Logos” से विकसित हुआ, किंतु इसका आधुनिक राजनीतिक स्वरूप यूरोप की मजहबी और राजनीतिक उथल-पुथल से निकला। वास्तव में पश्चिम की लगभग सभी आधुनिक विचारधाराएँ क्रिश्चियनिटी की मानसिक संरचना से प्रभावित हैं। चाहे राइट हो, लेफ्ट हो, सेंटर हो, सेक्युलरिज़्म हो, नेशनलिज़्म हो, पूँजीवाद हो या समाजवाद — सबके भीतर वही एकरेखीय सोच दिखाई देती है कि “एक विचार अंतिम सत्य है और बाकी सब गलत हैं।”
क्रिश्चियनिटी ने संसार को “Believers” और “Non-believers” में बाँटकर देखा। इस्लाम ने “मोमिन” और “काफ़िर” में बाँटा। वही मानसिकता आगे चलकर आधुनिक विचारधाराओं में भी आई। अब वहाँ “बुर्जुआ और सर्वहारा”, “राइट और लेफ्ट”, “लिबरल और कंजरवेटिव”, “सेक्युलर और कम्युनल” जैसे नए विभाजन खड़े कर दिए गए। नाम बदल गए, लेकिन सोच वही रही “हमारे साथ हो तो ठीक, नहीं हो तो शत्रु।”
यही कारण है कि विचारधाराएँ मनुष्य को जोड़ती नहीं, तोड़ती हैं। वे पहले समूह बनाती हैं, फिर संघर्ष पैदा करती हैं। इतिहास इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। कार्ल मार्क्स ने बंद कमरे में बैठकर “दास कैपिटल” लिखी। वह पुस्तक बाद में कम्युनिस्टों की मजहबी पुस्तक बन गई।
मार्क्स ने वर्ग संघर्ष का सिद्धांत दिया और कहा कि दुनिया को बदलना है। परंतु व्यवहार में जब कम्युनिज़्म को उतारा गया, तो उसने मानवता को क्या दिया?
सोवियत संघ में स्टालिन के शासनकाल में लाखों लोग मारे गए। चीन में माओत्से तुंग की नीतियों के कारण करोड़ों लोग भूख और हिंसा से मारे गए। कंबोडिया में पोल पॉट ने नरसंहार किया। विभिन्न ऐतिहासिक अध्ययनों और शोधों के अनुसार कम्युनिस्ट शासन और आंदोलनों के कारण विश्वभर में लगभग 10 से 15 करोड़ लोगों की मृत्यु हुई। यह संख्या किसी युद्ध से कम नहीं थी।
भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। नक्सलवाद के नाम पर हजारों निर्दोष आदिवासी, सैनिक और नागरिक मारे गए। बंगाल में राजनीतिक हिंसा दशकों तक चलती रही। केरल और त्रिपुरा में वैचारिक संघर्षों ने समाज को बाँटा। केवल सत्ता और विचारधारा के नाम पर लाखों परिवार उजड़ गए। क्योंकि विचारधारा मनुष्य को पहले “समूह” बनाती है, फिर “दुश्मन” खोजती है।
सनातन वैदिक धर्म की प्रकृति इससे बिल्कुल अलग है। यहाँ मनुष्य को किसी विचारधारा का सैनिक नहीं बनाया जाता। यहाँ कहा गया सत्यं वद, धर्मं चर।” यहाँ धर्म का अर्थ “रिलिजन” या “मजहब” नहीं है। धर्म वह है जो धारण करने योग्य है, जो जीवन और सृष्टि के संतुलन की रक्षा करे।
ऋग्वेद में कहा गया
“ऋतं च सत्यं चाभीद्धात् तपसोऽध्यजायत।”
अर्थात इस सृष्टि का आधार ऋत और सत्य है।
सनातन परंपरा में प्रकृति को त्रिगुणात्मक माना गया सत्त्व, रज और तम। जो इस प्रकृति के संतुलन को समझे, उसकी रक्षा करे, वही धर्ममार्गी है। इसलिए “वसुधैव कुटुम्बकम्” का अर्थ यह कभी नहीं था कि जो मानवता का विनाश करे, जो प्रकृति का संतुलन तोड़े, जो हिंसा और मतांधता फैलाए, वह भी उसी भाव का अधिकारी है। यह भावना उन लोगों के लिए है जो ऋत, धर्म और प्रकृति के संतुलन को स्वीकार करते हैं।
इसी प्रकार “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” का अर्थ भी आधुनिक सेक्युलर अर्थों में नहीं समझना चाहिए। इसका आशय यह नहीं कि सभी मजहबी विचारधाराएँ समान हैं। इसका वास्तविक अर्थ है कि सत्य एक है, किंतु उसे जानने वाले साधक उसे अनेक प्रकार से व्यक्त करते हैं। यह वाक्य उन साधकों के लिए है जो सत्य की खोज करते हैं, न कि उन विचारधाराओं के लिए जो “मानो या मरो” की मानसिकता पर चलती हैं।
सनातन धर्म का आधार अनुभव है। यहाँ कोई अंतिम पैगंबर नहीं, कोई अंतिम पुस्तक नहीं, कोई अंतिम आदेश नहीं। यहाँ अनुभव से सत्य को जानने की परंपरा है। इसलिए यहाँ चार्वाक भी बचा रहा, बुद्ध भी, शंकर भी, रामानुज भी, नाथ भी, सिद्ध भी। इतनी विविधता केवल उसी सभ्यता में संभव है जो विचार पर आधारित हो, विचारधारा पर नहीं।
विचार मनुष्य को विनम्र बनाते हैं, क्योंकि वे अनुभव से पैदा होते हैं। विचारधाराएँ मनुष्य को अहंकारी बनाती हैं, क्योंकि वे उसे “अंतिम सत्य का ठेकेदार” बना देती हैं। यही कारण है कि विचारधाराओं के नाम पर संसार में सबसे अधिक रक्तपात हुआ है।
आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि भारत भी किसी नई विचारधारा का निर्माण करे। आवश्यकता इस बात की है कि भारत अपने वैदिक विचार को पुनः पहचाने। यह भूमि विचारधाराओं की नहीं, दर्शन की भूमि है; संघर्ष की नहीं, संतुलन की भूमि है; मताग्रह की नहीं, सत्य की खोज की भूमि है।
जिस दिन भारत फिर से विचार और विचारधारा के अंतर को समझ लेगा, उसी दिन वह मानसिक गुलामी से मुक्त होना प्रारंभ कर देगा। क्योंकि सनातन वैदिक धर्म कोई “आईडियोलॉजी” नहीं है। वह जीवन का शाश्वत अनुभव है।
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