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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
भारत इस समय जिस संकट की ओर बढ़ रहा है, उसे केवल “जनसंख्या” शब्द से समझना भूल होगी। यह संकट केवल जन्मदर का नहीं है, केवल अर्थव्यवस्था का नहीं है और केवल राजनीति का भी नहीं है। यह भारत की सभ्यतागत संरचना पर संकट है। यह उस राष्ट्र की आत्मा पर संकट है जिसने हजारों वर्षों तक परिवार को समाज की मूल इकाई माना, जिसने “कुटुंब” को केवल रक्त संबंध नहीं बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व का केंद्र माना, जिसने माता-पिता को देवतुल्य कहा, जिसने संतान को केवल व्यक्तिगत इच्छा नहीं बल्कि पीढ़ियों की निरंतरता माना।
आज से चार से पाँच वर्ष पहले तक इस देश में एक अजीब प्रकार का वैचारिक वातावरण खड़ा किया गया था। टीवी स्टूडियो, विश्वविद्यालय, अखबारों के संपादकीय पन्ने, तथाकथित सामाजिक संगठन और अनेक स्वयंभू बुद्धिजीवी लगातार “जनसंख्या नियंत्रण कानून” की माँग कर रहे थे। “दो बच्चों की नीति” को आधुनिकता और जिम्मेदार नागरिकता का प्रतीक बताया जा रहा था। उस समय यदि कोई यह कह देता कि भारत को चीन, जापान और यूरोप की स्थिति से सीखना चाहिए, तो उसे अतिशयोक्ति करने वाला कहकर खारिज कर दिया जाता था।
लेकिन आज वही लोग मौन हैं। क्योंकि जिन आशंकाओं को कभी मजाक समझा गया था, वे अब वास्तविकता बन चुकी हैं।
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने तीसरे बच्चे पर 30 हजार रुपये और चौथे बच्चे पर 40 हजार रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा करके वस्तुतः उस वास्तविकता को स्वीकार किया है, जिसे भारत का नीति तंत्र लंबे समय तक समझने को तैयार नहीं था। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि एक समय वे स्वयं जनसंख्या नियंत्रण के समर्थक थे, लेकिन अब परिस्थितियाँ पूरी तरह बदल चुकी हैं।
यह केवल एक प्रशासनिक नीतिगत निर्णय मात्र नहीं है; यह उस गहरे जनसांख्यिकीय भय का संकेत है, जिसे अब सरकारें, अर्थशास्त्री और नीति निर्माता भी महसूस करने लगे हैं। लगातार गिरती जन्मदर भविष्य में केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और सभ्यतागत संकट का कारण बन सकती है।
दरअसल, पिछले तीन दशकों में दुनिया ने जिस मॉडल को “विकास” और “आधुनिकता” मानकर अपनाया, आज वही मॉडल अनेक देशों के लिए गंभीर संकट बन चुका है। कभी कहा जाता था कि अधिक जनसंख्या ही गरीबी, बेरोजगारी और संसाधनों की कमी का मूल कारण है। भारत में भी “हम दो हमारे दो” से लेकर कठोर जनसंख्या नियंत्रण कानून तक की माँग को आधुनिक और प्रगतिशील सोच का प्रतीक बताया गया।
लेकिन आज वही देश, जिन्होंने जन्मदर कम करने को उपलब्धि माना था, अब अपनी घटती आबादी और बूढ़े होते समाज से जूझ रहे हैं।
नायडू ने जिस “2.1” का उल्लेख किया, वही इस पूरे वैश्विक संकट का केंद्र है।
जनसांख्यिकी विज्ञान में कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate — TFR) 2.1 को “Replacement Level Fertility” कहा जाता है। इसका अर्थ है कि औसतन प्रत्येक महिला को लगभग 2.1 बच्चों को जन्म देना होगा ताकि अगली पीढ़ी वर्तमान जनसंख्या का संतुलन बनाए रख सके। जब यह दर लंबे समय तक इससे नीचे चली जाती है, तब समाज धीरे-धीरे वृद्धजन प्रधान बनने लगता है।
इस प्रक्रिया का प्रभाव तुरंत दिखाई नहीं देता। शुरुआत में जन्मदर गिरती है, फिर स्कूलों में बच्चों की संख्या कम होने लगती है। उसके बाद कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और श्रम बाजार में युवाओं की कमी दिखाई देने लगती है। लगभग 20 से 30 वर्षों बाद कार्यशील आयु वर्ग घटने लगता है और वृद्धजन अनुपात तेजी से बढ़ने लगता है। यही वह बिंदु होता है जहाँ पूरी अर्थव्यवस्था का संतुलन प्रभावित होने लगता है।
आज जापान इसी संकट का सबसे बड़ा उदाहरण बन चुका है। जापान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार 2024 में लगभग 7.2 लाख बच्चों का जन्म हुआ, जबकि मौतों की संख्या 15.8 लाख से अधिक रही। अर्थात हर एक जन्म पर दो से अधिक मौतें दर्ज हुईं। यह लगातार नौवाँ वर्ष था जब जापान में जन्मदर रिकॉर्ड निम्न स्तर पर पहुँची।
जापान की कुल आबादी 2008 के बाद लगातार घट रही है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार 2100 तक जापान की आबादी वर्तमान लगभग 12.4 करोड़ से घटकर 7–8 करोड़ के आसपास पहुँच सकती है। जापान की लगभग 30 प्रतिशत आबादी 65 वर्ष से अधिक आयु की हो चुकी है और 80 वर्ष से अधिक आयु वर्ग तेजी से बढ़ रहा है।
इसका सीधा प्रभाव शिक्षा, श्रमशक्ति और अर्थव्यवस्था पर दिखाई दिया। जापान में पिछले दो दशकों में हजारों स्कूल बंद हुए क्योंकि बच्चों की संख्या ही नहीं बची। ग्रामीण क्षेत्रों के अनेक कस्बे और गाँव लगभग खाली हो चुके हैं। “अकिया” अर्थात खाली घरों की संख्या इतनी बढ़ गई कि कई क्षेत्रों में सरकारों को लगभग मुफ्त कीमतों पर मकान देने पड़े।
जापान में वृद्धजन देखभाल राष्ट्रीय संकट बन चुकी है। स्वास्थ्य और पेंशन व्यय लगातार बढ़ रहा है। जापान की सरकार को श्रमिकों की कमी पूरी करने के लिए रोबोटिक्स और विदेशी श्रमिकों पर निर्भर होना पड़ा।
सबसे गंभीर परिवर्तन सामाजिक स्तर पर दिखाई दिया। “कोडोकुशी” अर्थात अकेले मर जाना, जापानी समाज की वास्तविक समस्या बन गई। हजारों वृद्ध लोग अकेले घरों में मर जाते हैं और कई दिनों बाद उनकी मृत्यु का पता चलता है। परिवार संरचना कमजोर होने और विवाह दर गिरने का सीधा प्रभाव सामाजिक अलगाव के रूप में सामने आया।
जापान सरकार ने जन्मदर बढ़ाने के लिए भारी आर्थिक योजनाएँ शुरू कीं। मुफ्त चाइल्डकेयर, टैक्स छूट, मातृत्व सहायता, आवास प्रोत्साहन और विवाह सहायता कार्यक्रम चलाए गए। टोक्यो प्रशासन तक ने युवाओं के लिए सरकारी डेटिंग ऐप लॉन्च किए। लेकिन सामाजिक व्यवहार एक बार बदल जाने के बाद उसे वापस संतुलित करना अत्यंत कठिन सिद्ध हुआ।
दक्षिण कोरिया की स्थिति और भी गंभीर मानी जा रही है। वहाँ कुल प्रजनन दर 0.72 तक पहुँच चुकी है, जो दुनिया में सबसे कम है। सियोल जैसे महानगरों में यह दर 0.5 से भी नीचे चली गई। इसका अर्थ यह है कि एक पूरी पीढ़ी अपने बाद अगली पीढ़ी तक पैदा नहीं कर पा रही।
दक्षिण कोरिया सरकार ने 2006 से 2024 के बीच जन्मदर बढ़ाने के लिए लगभग 270 अरब डॉलर खर्च किए। नकद सहायता, मुफ्त शिक्षा, चाइल्डकेयर योजनाएँ, पितृत्व अवकाश, मातृत्व सहायता और आवास योजनाएँ लागू की गईं। लेकिन विवाह दर लगातार गिरती रही।
दक्षिण कोरिया में “संपो जनरेशन” शब्द प्रचलित हुआ, जिसका अर्थ है ऐसी पीढ़ी जिसने आर्थिक दबाव, महँगी शिक्षा, करियर तनाव और जीवनशैली कारणों से प्रेम, विवाह और बच्चों को त्याग दिया।
दक्षिण कोरिया में निजी शिक्षा व्यवस्था इतनी महँगी हो गई कि परिवार बच्चों को “आर्थिक निवेश” की तरह देखने लगे। वहाँ “हाग्वोन” नामक निजी कोचिंग उद्योग पर परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा खर्च करते हैं। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में दंपति एक बच्चा या बिल्कुल बच्चा न रखने का निर्णय लेने लगे।
चीन का उदाहरण भारत के लिए सबसे बड़ा सबक होना चाहिए। 1979 में चीन ने “वन चाइल्ड पॉलिसी” लागू की। उस समय दुनिया भर के बुद्धिजीवी, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और पश्चिमी अर्थशास्त्री चीन मॉडल की प्रशंसा कर रहे थे। भारत में भी अनेक लोग कठोर जनसंख्या नियंत्रण को विकास का समाधान बता रहे थे।
लेकिन आज वही चीन अपनी ऐतिहासिक भूल भुगत रहा है।
चीन के राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो के अनुसार 2022 में पहली बार चीन की जनसंख्या आधिकारिक रूप से घटी। 2023 और 2024 में भी गिरावट जारी रही। चीन की कार्यशील आयु आबादी 2015 के बाद लगातार कम हो रही है।
चीन में “4-2-1” परिवार संरचना सामने आई — एक बच्चे पर दो माता-पिता और चार दादा-दादी की जिम्मेदारी। इससे आर्थिक और मानसिक दबाव अत्यधिक बढ़ा। युवाओं में विवाह दर गिरने लगी। 2024 तक चीन में विवाह पंजीकरण पिछले कई दशकों के न्यूनतम स्तरों में पहुँच गया।
स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि चीन को “वन चाइल्ड पॉलिसी” समाप्त करनी पड़ी। पहले दो बच्चों की अनुमति दी गई, फिर तीन बच्चों तक की। अब चीन के अनेक प्रांत बच्चों के जन्म पर भारी आर्थिक प्रोत्साहन दे रहे हैं। कुछ क्षेत्रों में तीसरे बच्चे तक नकद सहायता, टैक्स छूट, आवास लाभ और शिक्षा सहायता दी जा रही है।
चीन की स्थानीय सरकारें युवाओं को विवाह के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं क्योंकि चीन को अब स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि यदि कार्यशील युवा आबादी घटती रही, तो उसकी आर्थिक और सामरिक शक्ति दोनों प्रभावित होंगी।
यूरोप भी इसी संकट से गुजर रहा है। इटली की कुल प्रजनन दर लगभग 1.2 तक पहुँच चुकी है। स्पेन, ग्रीस और पुर्तगाल जैसे देशों में भी जन्मदर लंबे समय से प्रतिस्थापन दर से नीचे है।
इटली में “डेमोग्राफिक विंटर” शब्द का उपयोग होने लगा। छोटे कस्बे और गाँव खाली होने लगे। इटली की सरकारों को लोगों को बसाने के लिए प्रतीकात्मक कीमतों यहाँ तक कि 1 यूरो पर मकान देने पड़े।
जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों को श्रमिक संकट से बचने के लिए बड़े पैमाने पर प्रवासन पर निर्भर होना पड़ा। यूरोपियन यूनियन की रिपोर्टों में लगातार यह चिंता व्यक्त की गई कि आने वाले दशकों में वृद्धजन व्यय और श्रमिकों की कमी यूरोप की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डालेगी।
यूरोप की सामाजिक संरचना भी तेजी से बदली। अकेले रहने वाले लोगों की संख्या बढ़ी। विवाह दर घटी। कई देशों में जन्म से अधिक मौतें होने लगीं। यूरोप में वृद्धजन आबादी के कारण स्वास्थ्य सेवा और पेंशन पर सरकारी व्यय लगातार बढ़ रहा है।
रूस की स्थिति भी अलग नहीं है। सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस में जन्मदर लंबे समय तक नीचे रही। 1990 के दशक में आर्थिक अस्थिरता, स्वास्थ्य संकट, शराब की समस्या और सामाजिक अव्यवस्था के कारण रूस की जनसंख्या वृद्धि लगभग रुक गई।
रूस ने जन्मदर बढ़ाने के लिए “मातृत्व पूँजी” (Maternity Capital) जैसी योजनाएँ शुरू कीं। दूसरे और तीसरे बच्चे पर आर्थिक सहायता दी जाने लगी। राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने कई बार सार्वजनिक रूप से कहा कि जनसंख्या संकट रूस की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न है।
रूस में लगातार यह चिंता व्यक्त की गई कि यदि जन्मदर नहीं बढ़ी, तो भविष्य में श्रमशक्ति, आर्थिक उत्पादन और सैन्य क्षमता तीनों प्रभावित होंगी। यूक्रेन युद्ध के बाद यह संकट और गहरा हुआ क्योंकि बड़ी संख्या में युवा आबादी युद्ध और प्रवासन से प्रभावित हुई।
अमेरिका की स्थिति कुछ भिन्न लेकिन उतनी ही महत्वपूर्ण है। अमेरिका लंबे समय तक प्रवासन के कारण जनसंख्या संतुलन बनाए रखने में सफल रहा, लेकिन वहाँ भी जन्मदर लगातार नीचे जा रही है। CDC और Pew Research Center के अनुसार अमेरिका की जन्मदर ऐतिहासिक निम्न स्तरों के आसपास पहुँच चुकी है।
विवाह दर घट रही है, अकेले रहने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है और परिवार संरचना तेजी से बदल रही है। “DINK” (Double Income No Kids) और “Child-Free Lifestyle” जैसे मॉडल तेजी से बढ़े।
अमेरिका के Surgeon General ने “Loneliness Epidemic” अर्थात अकेलेपन को सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट तक कहा। रिपोर्टों में बताया गया कि सामाजिक अलगाव का प्रभाव धूम्रपान और मोटापे जितना गंभीर हो सकता है।
इन सभी देशों का अनुभव एक साझा तथ्य की ओर संकेत करता है जब किसी समाज में जन्मदर लंबे समय तक प्रतिस्थापन दर 2.1 से नीचे चली जाती है, तो समस्या केवल आबादी घटने तक सीमित नहीं रहती। धीरे-धीरे श्रमशक्ति घटती है, वृद्धजन अनुपात बढ़ता है, आर्थिक विकास धीमा पड़ता है, सामाजिक सुरक्षा पर दबाव बढ़ता है और परिवार संरचना कमजोर होने लगती है।
भारत के लिए यह प्रश्न इसलिए और गंभीर है क्योंकि भारत की सामाजिक संरचना पश्चिम की तरह राज्य आधारित नहीं, बल्कि परिवार आधारित रही है। यहाँ करोड़ों वृद्ध माता-पिता आज भी अपने बच्चों और संयुक्त परिवार पर निर्भर हैं।
यदि भारत में कुल प्रजनन दर (TFR) लंबे समय तक प्रतिस्थापन दर 2.1 से नीचे बनी रहती है, तो अगले 50 से 100 वर्षों में भारत की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संरचना में अत्यंत गहरे परिवर्तन दिखाई दे सकते हैं। यह केवल आबादी घटने का प्रश्न नहीं होगा; यह सभ्यतागत संतुलन, श्रमशक्ति, परिवार संरचना, वृद्धजन अनुपात, आर्थिक उत्पादन और सामाजिक स्थिरता का प्रश्न बन जाएगा।
आज भारत अपनी युवा आबादी के कारण दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक संभावनाओं में गिना जाता है। लगभग 65 प्रतिशत आबादी कार्यशील आयु वर्ग (15–64 वर्ष) में है। इसी कारण भारत को “डेमोग्राफिक डिविडेंड” वाला देश कहा जाता है। लेकिन जनसांख्यिकी स्थिर नहीं रहती।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर लगभग 2.0 तक पहुँच चुकी है। दक्षिण भारत के अनेक राज्यों केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश — में यह 1.6–1.8 के बीच पहुँच चुकी है। महानगरों और उच्च शिक्षित शहरी वर्गों में यह दर और नीचे जा रही है।
संयुक्त राष्ट्र की World Population Prospects 2024 रिपोर्ट के अनुसार भारत की आबादी 2060 के आसपास अपने चरम पर पहुँचने के बाद धीरे-धीरे घटने लग सकती है। लेकिन वास्तविक संकट कुल आबादी घटने से अधिक आयु-संतुलन के टूटने का होगा।
यदि यही प्रवृत्ति अगले 50 वर्षों तक जारी रही, तो 2050–2070 के बीच भारत में कार्यशील युवा आबादी का अनुपात तेजी से गिरना शुरू हो सकता है। आज जो भारत युवा शक्ति के कारण उत्पादन, सेवा क्षेत्र, IT, विनिर्माण और स्टार्टअप अर्थव्यवस्था में आगे बढ़ रहा है, वही भारत भविष्य में श्रमिक संकट का सामना कर सकता है।
दक्षिण भारत में इसके प्रारंभिक संकेत अभी से दिखाई देने लगे हैं। केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक के अनेक क्षेत्रों में निर्माण, सेवा और औद्योगिक क्षेत्रों के लिए उत्तर भारत और पूर्वी भारत से श्रमिकों पर निर्भरता बढ़ चुकी है। यदि जन्मदर लंबे समय तक नीचे रही, तो भविष्य में पूरे भारत में श्रमशक्ति की कमी दिखाई दे सकती है।
कृषि क्षेत्र सबसे पहले प्रभावित हो सकता है। भारत की खेती अभी भी बड़े पैमाने पर पारिवारिक श्रम और ग्रामीण युवा आबादी पर निर्भर है। लेकिन यदि ग्रामीण क्षेत्रों से युवा आबादी घटती गई और छोटे परिवार सामान्य होते गए, तो खेती की संरचना बदल सकती है। जापान की तरह भारत में भी ऐसे गाँव उभर सकते हैं जहाँ वृद्धजन तो होंगे, लेकिन खेती करने वाली युवा आबादी नहीं बचेगी।
शिक्षा क्षेत्र में भी बड़ा परिवर्तन दिखाई दे सकता है। जापान और दक्षिण कोरिया की तरह भारत में भी स्कूलों और कॉलेजों में छात्रों की संख्या घट सकती है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल बंद होने की स्थिति बन सकती है। निजी शिक्षा उद्योग, जो आज तेजी से विस्तार कर रहा है, भविष्य में छात्र संख्या संकट का सामना कर सकता है।
2050 के बाद भारत में वृद्धजन आबादी का अनुपात तेजी से बढ़ सकता है। UNFPA की India Ageing Report 2023 के अनुसार 2050 तक भारत में 60 वर्ष से अधिक आयु की आबादी लगभग 34 करोड़ तक पहुँच सकती है। 80 वर्ष से अधिक आयु वर्ग में 279 प्रतिशत तक वृद्धि का अनुमान व्यक्त किया गया।
यदि जन्मदर लगातार नीचे रही, तो 2080–2100 तक भारत भी जापान और यूरोप की तरह वृद्धजन प्रधान समाज बन सकता है। इसका अर्थ होगा कि कम संख्या में युवा पूरी वृद्ध आबादी का आर्थिक भार उठाएँगे।
भारत की स्थिति पश्चिम से इसलिए अधिक गंभीर हो सकती है क्योंकि यूरोप और अमेरिका में राज्य आधारित “वेलफेयर सिस्टम” मौजूद है। वहाँ पेंशन, वृद्ध देखभाल और स्वास्थ्य सेवा का बड़ा हिस्सा सरकारें वहन करती हैं। लेकिन भारत में परिवार ही सबसे बड़ी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था है। करोड़ों वृद्ध माता-पिता आज भी अपने बच्चों और संयुक्त परिवार पर निर्भर हैं।
Longitudinal Ageing Study in India (LASI) के अनुसार भारत के अधिकांश वृद्धजन आर्थिक और भावनात्मक रूप से परिवार पर निर्भर रहते हैं। यदि भविष्य में परिवार छोटे होते गए, विवाह दर गिरी और “सिंगल चाइल्ड” या “नो चाइल्ड” मॉडल बढ़ता गया, तो वृद्धजन देखभाल राष्ट्रीय संकट बन सकती है।
चीन की “4-2-1” संरचना भारत में भी दिखाई दे सकती है — एक बच्चे पर दो माता-पिता और चार दादा-दादी की जिम्मेदारी। इससे मानसिक तनाव, आर्थिक दबाव और विवाह से दूरी बढ़ सकती है।
आज महानगरों में “DINK” (Double Income No Kids) और “Single Lifestyle” मॉडल तेजी से बढ़ रहे हैं। यदि यही प्रवृत्ति 30–40 वर्षों तक जारी रही, तो भारत की पारंपरिक संयुक्त परिवार व्यवस्था लगभग समाप्त हो सकती है।
इसके सामाजिक प्रभाव अत्यंत गहरे होंगे।
पश्चिमी देशों में परिवार विघटन के साथ अकेलेपन, अवसाद और मानसिक तनाव की समस्या तेजी से बढ़ी। अमेरिका के Surgeon General ने “Loneliness Epidemic” को सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट कहा। जापान में “कोडोकुशी” जैसी घटनाएँ सामने आईं, जहाँ हजारों वृद्ध लोग अकेले घरों में मर जाते हैं।
भारत में अभी परिवार व्यवस्था किसी प्रकार समाज को संतुलित किए हुए है। लेकिन यदि परिवार कमजोर हुए, तो भारत में मानसिक स्वास्थ्य संकट कहीं अधिक गहरा हो सकता है क्योंकि भारतीय समाज अभी भी भावनात्मक रूप से परिवार केंद्रित है।
इसके आर्थिक प्रभाव भी गहरे होंगे।
जब युवा आबादी घटती है, तो उपभोग पैटर्न बदलता है। वृद्धजन समाज कम जोखिम लेता है, कम उद्यमिता करता है और आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ने लगती है। जापान के “लॉस्ट डिकेड्स” और यूरोप की धीमी विकास दर इसके उदाहरण हैं।
भारत की पूरी विकास रणनीति अभी युवा आबादी पर आधारित है। IT सेक्टर, स्टार्टअप, विनिर्माण, डिजिटल अर्थव्यवस्था और सेवा क्षेत्र युवा कार्यबल पर निर्भर हैं। यदि कार्यशील आबादी घटती गई, तो भारत की आर्थिक वृद्धि दर पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
सैन्य और सामरिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण होंगे। इतिहास में बड़ी युवा आबादी किसी भी राष्ट्र की सामरिक शक्ति का आधार मानी गई है। रूस और चीन जैसे देशों ने सार्वजनिक रूप से जनसंख्या संकट को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ा। यदि भारत में भी लंबे समय तक जन्मदर नीचे रही, तो भविष्य में सैन्य भर्ती, औद्योगिक उत्पादन और रणनीतिक क्षमता प्रभावित हो सकती है।
सांस्कृतिक स्तर पर परिवर्तन और भी गहरे हो सकते हैं। भारतीय सभ्यता की निरंतरता केवल राजनीतिक शक्ति से नहीं, बल्कि परिवार, परंपरा और पीढ़ियों के सांस्कृतिक हस्तांतरण से बनी रही। यदि परिवार छोटे होते गए, विवाह दर गिरती गई और जन्मदर लगातार नीचे गई, तो आने वाले 70–100 वर्षों में भारतीय समाज का सांस्कृतिक व्यवहार पूरी तरह बदल सकता है।
संयुक्त परिवार, पारिवारिक उत्तरदायित्व, बहु-पीढ़ी जीवन, पारंपरिक सामाजिक संबंध और सामुदायिक संरचना कमजोर हो सकती है। पश्चिमी देशों की तरह अकेले रहने वाले लोगों की संख्या तेजी से बढ़ सकती है।
आज जो संकट जापान, दक्षिण कोरिया, चीन, यूरोप, रूस और अमेरिका अलग-अलग रूपों में झेल रहे हैं श्रमिक संकट, वृद्धजन विस्फोट, विवाह दर में गिरावट, मानसिक अवसाद, अकेलापन, सामाजिक विखंडन और आर्थिक दबाव वही प्रवृत्तियाँ भारत में भी अगले 50–100 वर्षों में दिखाई दे सकती हैं यदि जन्मदर लगातार प्रतिस्थापन दर से नीचे बनी रही और परिवार संरचना कमजोर होती गई।
लेकिन पिछले दो दशकों में भारत में परिवार व्यवस्था को व्यवस्थित रूप से कमजोर करने वाला एक वैचारिक, सांस्कृतिक और आर्थिक वातावरण तैयार हुआ। यह परिवर्तन अचानक नहीं आया। 1991 के बाद आर्थिक उदारीकरण, वैश्विक मीडिया विस्तार और डिजिटल उपभोक्तावादी संस्कृति के साथ भारत में जीवनशैली का स्वरूप तेजी से बदला।
यहाँ “ग्लोबल मार्केट फोर्सेज” को समझना आवश्यक है। आधुनिक वैश्विक पूँजीवाद का मूल आधार केवल उत्पादन नहीं, बल्कि उपभोक्तावाद है। और उपभोक्तावाद की सबसे बड़ी बाधा मजबूत परिवार होता है। संयुक्त परिवार सीमित उपभोग करता है, बचत करता है, संसाधन साझा करता है और सामूहिक आर्थिक सुरक्षा बनाए रखता है। लेकिन अकेला व्यक्ति अधिक उपभोग करता है, अधिक ऋण लेता है, अधिक डिजिटल निर्भर होता है और बाजार के लिए आदर्श ग्राहक बनता है।
OECD देशों के आर्थिक अध्ययनों में यह स्पष्ट दिखाई देता है कि जैसे-जैसे “सिंगल पर्सन हाउसहोल्ड” बढ़े, उपभोक्ता खर्च भी बढ़ा। अमेरिका में 1960 में अकेले रहने वाले लोगों की संख्या लगभग 13% थी, जो आज 29% से ऊपर पहुँच चुकी है। यूरोपियन यूनियन के कई देशों में 35–40% घरों में केवल एक व्यक्ति रहता है। इसका सीधा प्रभाव उपभोग पैटर्न पर पड़ा।
अमेरिकी सामाजिक आलोचक Christopher Lasch ने The Culture of Narcissism में लिखा था कि आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति व्यक्ति को परिवार और समुदाय से काटकर आत्मकेंद्रित उपभोक्ता में बदल देती है। इसी प्रकार Zygmunt Bauman ने Liquid Love में आधुनिक संबंधों को “अस्थायी उपभोग संबंध” कहा।
यही कारण है कि पूरी दुनिया में “हाइपर इंडिविजुअलिज़्म” अर्थात अतिव्यक्तिवाद को बढ़ावा मिला। व्यक्ति को परिवार, समाज और परंपरा से काटकर “स्वतंत्र उपभोक्ता” में बदलना आधुनिक बाजार व्यवस्था की मूल आवश्यकता बन गया।
Netflix, OTT प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया, विज्ञापन उद्योग और डिजिटल मनोरंजन संस्कृति ने मिलकर ऐसी मानसिकता तैयार की जिसमें विवाह को “बंधन”, मातृत्व को “करियर बाधा” और परिवार को “पुरानी संस्था” की तरह प्रस्तुत किया जाने लगा। पश्चिमी मनोरंजन उद्योग में पिछले दो दशकों में परिवार-विरोधी कथानकों का विस्तार हुआ और अब वही प्रभाव भारतीय मनोरंजन उद्योग में भी दिखाई देने लगा है।
आज भारत के शहरी युवा का बड़ा हिस्सा अपना सांस्कृतिक और सामाजिक व्यवहार परिवार से अधिक डिजिटल एल्गोरिद्म से सीख रहा है। Instagram, short-video culture और OTT प्लेटफॉर्मों ने “तुरंत सुख”, “व्यक्तिगत स्वतंत्रता” और “कमिटमेंट-फ्री लाइफस्टाइल” को सामाजिक आदर्श की तरह प्रस्तुत किया।
अमेरिका के Pew Research Center की रिपोर्टों के अनुसार युवाओं में विवाह और स्थायी संबंधों के प्रति रुचि लगातार घट रही है। दक्षिण कोरिया में “संपो जनरेशन” शब्द प्रचलित हुआ ऐसी पीढ़ी जिसने आर्थिक दबाव और जीवनशैली कारणों से प्रेम, विवाह और बच्चों को छोड़ दिया। जापान में “हिकिकोमोरी” और “पैरासाइट सिंगल” जैसी सामाजिक घटनाएँ सामने आईं। चीन में “लाई फ्लैट” और “लेट इट रॉट” जैसी युवा मानसिकताएँ उभरीं, जहाँ युवा विवाह, करियर और परिवार से दूरी बना रहे हैं।
भारत में भी इसके संकेत तेजी से दिखाई देने लगे हैं। महानगरों में विवाह की औसत आयु 30–35 वर्ष तक पहुँच रही है। बड़ी संख्या में लोग विवाह नहीं करना चाहते। शहरी पेशेवर वर्ग में “DINK” (Double Income No Kids) मॉडल तेजी से बढ़ा है। कई सर्वेक्षणों में शहरी दंपतियों ने आर्थिक दबाव, करियर और “लाइफस्टाइल फ्रीडम” के कारण बच्चे न चाहने की बात कही।
भारत में यह विमर्श अब केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा। “वोकिज़्म”, “क्रिटिकल कास्ट थ्योरी ”, “DEI/DEIA”, पहचान आधारित राजनीति और तथाकथित “सामाजिक न्याय” के नाम पर पश्चिमी सांस्कृतिक विमर्श धीरे-धीरे संस्थागत रूप ले रहा है।
अमेरिका में “क्रिटिकल रेस थ्योरी” मूलतः नस्लीय इतिहास और संस्थागत भेदभाव की बहस से निकली अवधारणा थी। लेकिन भारत में उसका रूपांतरण “क्रिटिकल कास्ट थ्योरी” के रूप में किया गया। अब भारतीय समाज को स्थायी “उत्पीड़क बनाम पीड़ित” समूहों में विभाजित करके देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है। विश्वविद्यालयों, सोशल मीडिया और डिजिटल एक्टिविज़्म के माध्यम से युवाओं को लगातार “सामाजिक न्याय योद्धा” की मानसिकता की ओर धकेला जा रहा है, जहाँ समाज को परिवार, परंपरा और सभ्यता के आधार पर देखने के बजाय केवल संघर्ष और पहचान राजनीति के आधार पर देखने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
पश्चिम में “सोशल जस्टिस” की अवधारणा चर्च, नस्लीय संघर्ष, औद्योगिक पूँजीवाद और औपनिवेशिक इतिहास की पृष्ठभूमि से विकसित हुई। भारत की सामाजिक संरचना उससे मूलतः भिन्न थी। भारत का समाज केवल राज्य और व्यक्ति के संबंधों पर आधारित नहीं था; यहाँ परिवार, समुदाय, ग्राम व्यवस्था, जाति-व्यवसाय संरचना और धार्मिक-सांस्कृतिक संस्थाएँ सामाजिक जीवन का हिस्सा थीं।
लेकिन पिछले वर्षों में पश्चिमी अकादमिक विमर्श को भारत पर उसी रूप में लागू करने का प्रयास हुआ, मानो भारत का पूरा इतिहास केवल दमन और संघर्ष का इतिहास रहा हो। “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता”, “कास्ट प्रिविलेज”, “संरचनात्मक उत्पीड़न” और “जेंडर ओप्रेशन” जैसे शब्द अब अकादमिक, कॉर्पोरेट और डिजिटल विमर्श का स्थायी हिस्सा बन चुके हैं।
SDG 2030, ESG मॉडल और वैश्विक कॉर्पोरेट गवर्नेंस ढाँचों के माध्यम से विश्वविद्यालयों, प्रशासन और कॉर्पोरेट क्षेत्र में “DEI/DEIA” आधारित नीतियाँ बढ़ीं। मूल रूप से Diversity, Equity, Inclusion और Accessibility का घोषित उद्देश्य प्रतिनिधित्व और अवसरों का विस्तार था, लेकिन आलोचकों का तर्क है कि कई संस्थानों में यह धीरे-धीरे वैचारिक प्रशिक्षण मॉडल में बदलता गया, जहाँ पारंपरिक सामाजिक और सांस्कृतिक संरचनाओं को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा।
इसी के साथ “जेंडर पॉलिटिक्स” और “जेंडर आइडेंटिटी” आधारित विमर्श भी तेजी से बढ़ा। अमेरिका, कनाडा और यूरोप के कई देशों में प्राथमिक स्तर तक जेंडर और सेक्सुएलिटी आधारित पाठ्यसामग्री को लेकर बड़े विवाद हुए। कई अमेरिकी राज्यों में अभिभावकों और स्कूल बोर्डों के बीच संघर्ष देखने को मिले।
भारत में भी धीरे-धीरे इसी प्रकार की भाषा और विमर्श प्रवेश कर रहे हैं। बच्चों के लिए “जेंडर सेंसिटाइजेशन”, “समग्र यौन शिक्षा”, “जेंडर न्यूट्रैलिटी” और पहचान आधारित प्रशिक्षण मॉड्यूल NGO नेटवर्क, कॉर्पोरेट कार्यक्रमों और शैक्षणिक चर्चाओं के माध्यम से बढ़े हैं। आलोचकों का तर्क है कि अत्यंत कम आयु में यौन और जेंडर विमर्श को संस्थागत रूप देना भारतीय सामाजिक संरचना और पारिवारिक मनोविज्ञान के अनुरूप नहीं है।
OTT प्लेटफॉर्म, वेब सीरीज़ और डिजिटल मनोरंजन उद्योग ने “कैज़ुअल रिलेशनशिप”, “हुकअप कल्चर” और कमिटमेंट-फ्री जीवनशैली को सामान्य जीवनशैली की तरह प्रस्तुत किया। विवाह को दीर्घकालिक सामाजिक संस्था के बजाय व्यक्तिगत विकल्प की तरह दिखाया जाने लगा। मातृत्व और पितृत्व को कई बार “लाइफस्टाइल बाधा” की तरह चित्रित किया गया।
यहाँ स्पष्ट करना आवश्यक है कि महिलाओं की शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान का विरोध कोई नहीं कर सकता। भारतीय परंपरा में स्त्री को “शक्ति”, “अर्धांगिनी” और “गृहलक्ष्मी” कहा गया। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब पूरे पारिवारिक ढाँचे को ही अपराधबोध में धकेला जाने लगे और विवाह संस्था को मूलतः दमनकारी बताया जाने लगे।
इसके सामाजिक प्रभाव अब स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर घटकर लगभग 2.0 तक पहुँच चुकी है, अर्थात प्रतिस्थापन दर 2.1 से नीचे। दक्षिण भारत के अनेक राज्यों केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में यह 1.6 या उससे नीचे पहुँच चुकी है।
भारत में निजी शिक्षा की लागत असाधारण रूप से बढ़ चुकी है। National Sample Survey Office (NSSO) और विभिन्न वित्तीय अध्ययनों के अनुसार शहरी मध्यमवर्गीय परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा केवल बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च कर रहे हैं।
भारत की बड़ी आबादी आज भी 15 से 20 हजार रुपये मासिक आय पर जीवन जी रही है। ऐसे परिवारों के लिए निजी विद्यालय, कोचिंग, स्वास्थ्य सेवाएँ और शहरी जीवन का खर्च उठाना अत्यंत कठिन होता जा रहा है। परिणामस्वरूप परिवार छोटा होता जा रहा है।
भारत में प्रतिवर्ष लगभग 1.5 करोड़ गर्भपात होने के अनुमान The Lancet और Guttmacher Institute से जुड़े अध्ययनों में सामने आए हैं। सोशल मीडिया और मनोरंजन उद्योग ने विवाह पूर्व संबंधों, अस्थायी रिश्तों और “कैज़ुअल रिलेशनशिप” संस्कृति को सामान्य बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
आज भारतीय समाज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ एक ओर पश्चिमी उपभोक्तावादी मॉडल है और दूसरी ओर भारत की पारंपरिक परिवार आधारित सभ्यतागत संरचना। दुर्भाग्य यह है कि भारत ने अपनी सभ्यतागत दृष्टि को ही “पुराना” मान लिया।
भारत का पारंपरिक आर्थिक मॉडल केवल GDP आधारित नहीं था। उसमें सीमित उपभोग, सामाजिक उत्तरदायित्व, समुदाय और पारिवारिक संतुलन का विचार था। महात्मा गांधी का ग्राम स्वराज, पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद और भारतीय गृहस्थ आश्रम की व्यवस्था इसी संतुलित सामाजिक संरचना पर आधारित थी।
लेकिन भारत ने पश्चिमी समाजवादी और पूँजीवादी मॉडल की अंधाधुंध नकल की। परिणाम यह हुआ कि न तो मजबूत कल्याणकारी राज्य बन पाया और न ही परिवार सुरक्षित रह पाया।
यदि अगले 100 वर्षों तक यही स्थिति जारी रही तो 2100 का भारत आज के भारत जैसा नहीं होगा।
गाँव खाली होने लगेंगे। वृद्धजन आबादी विस्फोटक रूप से बढ़ेगी। विवाह दर लगातार घटेगी। जन्मदर जापान और दक्षिण कोरिया जैसी 1.0–1.2 तक पहुँच सकती है। अकेलापन, मानसिक अवसाद और सामाजिक विघटन सामान्य सामाजिक समस्याएँ बन जाएँगी।
और तब भारत को भी वही करना पड़ेगा जो आज चीन और जापान कर रहे हैं लोगों को पैसे देकर बच्चे पैदा करने के लिए मनाना।
लेकिन तब तक शायद बहुत देर हो चुकी होगी।
सभ्यताएँ केवल सेना, तकनीक या GDP से जीवित नहीं रहतीं। वे परिवारों से जीवित रहती हैं।
भारत हजारों वर्षों तक इसलिए जीवंत रहा क्योंकि यहाँ परिवार था, संस्कार थे, पीढ़ियों की निरंतरता थी।
यदि भारत ने समय रहते अपनी सभ्यतागत आत्मा को नहीं पहचाना, तो आने वाले दशकों में वह केवल आर्थिक संकट नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विघटन और सामाजिक विखंडन का सामना करेगा। और इतिहास गवाह है कोई भी राष्ट्र बाहर से उतना नहीं टूटता, जितना भीतर से टूटने पर बिखरता है।
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