सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

सूर्योदय हो चला, अब प्रकाश फैलना ही बाकी है....-१




।।ॐ।।



-डॉ.नितिन सहारिया ,महाकौशल

युग परिवर्तन की भवितव्यता अर्थात भारत व विश्व के भविष्य के संदर्भ में युगऋषि पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी स्पस्ट रुप से लिखते हैं कि-    
          " सूर्योदय पूर्व दिशा से होता है। उषाकाल की लालिमा उसकी पूर्व सूचना लेकर आती है। कुक्कुट उस पूर्व वेला की अग्रिम सूचना देने लगते हैं। तारों की चमक और निशा कालीमा की सघनता कम हो जाती है। *इन्हीं लक्षणों से जाना जाता है कि प्रभातकाल समीप आ गया है और अब सूर्योदय होने ही वाला है।*   
       *नवजागरण का, युग-परिवर्तन का सूर्योदय भी इसी क्रम से होगा ।* यह सार्वभौम प्रश्न है, विश्वमानव से संबंधित समस्या है- एक देश, एक जाति की नहीं। फिर भी उदय का क्रम पूर्व से ही चलेगा। *कुछ चिरंतन विशेष परंपरा ऐसी चली आती है कि विश्वमानव ने जब भी करवट ली है, तब उसका सूत्र संचालन सूर्योदय की भांति ही पूर्व दिशा से हुआ है।* यों पाश्चात्य देशवासी भारत को 'पूर्व' मानते हैं, पर *जहां तक आध्यात्मिक चेतना का प्रश्न है, निसंदेह यह श्रेय- सौभाग्य इसी देश को मिला है। वह विश्व की चेतनात्मक हलचलों का उत्तरदायित्व अग्रिम पंक्ति में खड़ा होकर वहन करें,* इस बार भी ऐसा ही होने जा रहा है। *युग परिवर्तन का प्रकाश इस पुण्य भूमि से आरंभ हो चुका है, अब वह कुछ ही समय में विश्वव्यापी बनने जा रहा है।*   
      विश्व जड़ और चेतन दो भागों में विभक्त है। जड़ प्रकृति से संबंधित प्रगति को संपदा के रूप में देखा जा सकता है और चेतन प्रकृति के विकास को विचारणा एवं भावना के रूप में समझा जाएगा। सुविधा और संपदा की अभिवृद्धि भौतिक प्रगति कहलाती है। और चेतना की उत्कृष्टता को आत्मिक उत्कर्ष कहा जाता है। जहां तक भौतिक प्रगति का संबंध है, उसके लिए राजतंत्र, अर्थतंत्र, विज्ञान तंत्र और शिक्षा तंत्र का उत्तरदायित्व है कि वे आधिकाधिक सुविधा एवं संपदा उत्पन्न करके सुख- साधनों को आगे बढ़ाएं।  
        आत्मिक प्रगति के लिए ज्ञानतंत्र उत्तरदायी है। इसे दूसरे शब्दों में दर्शन ,धर्म, अध्यात्म एवं कला के नाम से जाना जा सकता है। चेतना की भूख इन्हीं से बुझती है। उसे इन्ही से दिशा और प्रेरणा मिलती है। परिवर्तन एवं उत्कर्ष भी इन्हीं आधारों को लेकर संभव होता है। अस्तु ,यह अनिवार्य है कि यह चेतनात्मक प्रगति आवश्यक हो तो ज्ञानतंत्र को प्रखर बनाना पड़ेगा। सच तो यह है कि जब कभी ज्ञानतंत्र शिथिल पड़ता है ,विकृत होता है तभी व्यक्ति का स्तर लड़खड़ाता है और उस अस्तव्यवस्था में भौतिक जगत की समस्त गतिविधियां उलझ जाती हैं। *तत्वदर्शी सदा से यह कहते रहे हैं कि संपदा नहीं ,विचारणा प्रमुख है। यदि विचारणा सही रही तो संपदा छाया की तरह पीछे-पीछे फिरेगी*, पर यदि संपदा को ही सब कुछ माना गया और *चेतना- स्तर की उत्कृष्टता उपेक्षित की गई तो बढी हुई संपदा दूध पीकर परिपुष्ट हुए सर्प की तरह सर्वनाश करने पर उतारू हो जाएगी।* *यह शाश्वत तथ्य है ,* इसे इतिहास ने लाखों बार आजमाया है और करोड़ों बार आजमाया जा सकता है।  
       *युग- परिवर्तन के जिस अभियान में हमें दिलचस्पी है, वह चेतनात्मक उत्कर्ष ही है।* इसका अर्थ यह नहीं की भौतिक प्रगति व्यर्थ है। वह भी आवश्यक है, पर वह दूसरे लोगों का काम है, जिसे वे शक्तिभर संपन्न कर भी रहे हैं। सरकारें पंचवर्षीय योजनाएं बनाती हैं । वैज्ञानिक शोध कार्यों में जुटे हुए हैं। अर्थशास्त्री व्यवसाय उत्पादन और वितरण का तना-बना बना रहे हैं। सैन्य तंत्र अयुधों के निर्माण और योद्धाओं के प्रशिक्षण में लगा है। शिक्षा शास्त्री बौद्धिक क्षमता के अभिवर्धन में लगे हैं। *उपेक्षित तो ज्ञानतंत्र ही पड़ा है* उस नाम पर जो खड़ा है ,उसे तो विदूषको जैसी विडंबना ही कहा जा सकता है। धर्म के नाम पर जो कहा और किया जा रहा है, उसमें ऐसी आस्तिकता की अपेक्षा नास्तिकता भली प्रतीत होती है। *ज्ञानतंत्र यदि मानवी सद्भावना और सत्यवृत्तियों के अभिवर्धन की अपेक्षा कर्मकांड में ही उलझाए रहे और सातवें आसमान के सपने दिखाते रहे, कर्म को व्यर्थ और भक्ति को प्रधान कहता रहे तो उससे मानव समाज का, विश्व का कोई हित साधन न हो सकेगा; धर्म- व्यवसाईयों की आजीविका भले ही चलती रहे।*   
        *नवनिर्माण के अवतरण की किरणें अगले दिनों प्रबुद्ध एवं जीवंत आत्माओं पर बरसेंगी । वह व्यक्तिगत लाभ में संलग्न रहने की लिप्सा को लोक-मंगल के लिए उत्सर्ग करने की आंतरिक पुकार सुनेंगे।* यह पुकार इतनी तीव्र होगी कि चाहने पर भी वह संकीर्ण स्वार्थ पर्ता भरा व्यक्तिवादी जीवन जी ही न सकेंगे। लोभ और मोह की जटिल जंजीर वैसे ही टूटती दिखेगी जैसे कृष्ण जन्म के समय बंदीग्रह के ताले अनायास ही खुल गए थे। यों मायावद्द किटकों के लिए वासना और तृस्णा की परिधि तोड़कर परमार्थ के क्षेत्र में कदम बढ़ाना लगभग असंभव जैसा लगता है। पेट और प्रजनन की विडंबनाओ के अतिरिक्त वे क्या आगे की और कुछ बात सोच या कर सकेंगे? *पर समय ही बताया कि इसी जाल -जंजाल में जकड़े हुए वर्गों में से कितनी प्रबुद्ध आत्माएं उछलकर आगे आती हैं और सामन्य स्थिति में रहते हुए कितने ऐसे अद्भुत क्रियाकलाप संपन्न करती हैं,* जिन्हें देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ेगा। *जन्मजात रूप से तुच्छ स्थिति में जकड़े हुए व्यक्ति अगले दिनों जब महामानवों की भूमिका प्रस्तुत करते दिखाई पड़े तो समझना चाहिए कि युग परिवर्तन का प्रकाश एवं चमत्कार सर्वसाधारण को प्रत्यक्ष हो चला।*   
     *निस्संदेह युग परिवर्तन का प्रधान आधार भावनात्मक नवनिर्माण ही होगा।* जनमानस में इन दिनों झूठी मान्यताओं की भरमार है। सोचने की सही पद्धति एक प्रकार से विस्मृत ही हो गई है। स्थिति का सही मूल्यांकन कर सकने वाला दृष्टिकोण हाथ से चला गया है । उसके स्थान पर भ्रांतियां के चमगादड़ विचार भवन के गुंबदों में उल्टे लटके पड़े हैं। इस सारे कूड़े -करकट को एक बार झाड़ बुहार कर साफ करना होगा और चिंतन की इस परिष्कृत प्रक्रिया को जनमानस में प्रतिस्थापित करना पड़ेगा जो मानवीय गरिमा के अनुरूप है। किसी धर्म -संप्रदाय ,संत या ग्रंथ को बुद्धि बेचकर किसी का भी अंधानुकरण न करने की बात हर किसी के मन में घुसती चली जाएगी और जो न्याय ,विवेक, सत्य एवं तथ्य की कसौटियों पर खड़ा सिद्ध होगा उसी को स्वीकारने की प्रवृत्ति बढ़ेगी। इस आधार के प्रबल होते ही न अनैतिकताओं के लिए कोई स्थान रह जाएगा और न झूठी मान्यताओं के लिए। *निर्मल और निष्पक्ष चिंतन किसी भी देश ,धर्म या वर्ग के व्यक्ति को इस स्थान पर पहुंचा देगा जिसके लिए भारतीय अध्यात्म अनादिकाल से अंगुलीनिर्देश करता रहा है।*   
      यह हलचलें जन-जन में दृष्टिगोचर होगी। समुन्नत आत्माएं निजी सुख- सुविधाओं को तिलांजलि देकर विश्व के भावनात्मक नवनिर्माण को इस युग की सर्वोत्तम साधना, उपासना, तपश्चार्य एवं आवश्यकता समझते हुए इसी में सर्व्तो भावेन संलग्न होंगी। साथ ही *सामान्य स्तर के व्यक्तियों में इतना विवेक तो अनायास ही जागृत होगा कि वह अंधकार और प्रकाश का अंतर समझ सकें, अनुचित के लिए दुराग्रह छोड़कर न्याय और विवेक के आधार पर प्रतिपादित उचित को स्वीकार कर सकें। इस प्रकार उभय- पक्षीय सुयोग- संयोग उस प्रयोजन को अग्रगामी बनाते चले जाएंगे जो युग- परिवर्तन का मूल आधार है।"*

क्रमशः ......

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