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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
दिल्ली के जवाहर भवन में हुए कार्यक्रम में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजकुमार भाटी ने जिस तरह ब्राह्मण समाज के लिए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया, उसने एक बार फिर उस पूरे वैचारिक नेटवर्क का चेहरा सामने ला दिया जो वर्षों से “ब्राह्मणवाद” शब्द को हथियार बनाकर सनातन धर्म, हिंदू समाज और भारत की सांस्कृतिक एकता पर हमला कर रहा है। यह कोई अचानक दिया गया बयान नहीं था। सोशल मीडिया पर राजकुमार भाटी के पुराने वीडियो भरे पड़े हैं, जिनमें वह लगातार ब्राह्मण समाज और “ब्राह्मणवाद” के खिलाफ अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करते दिखाई देते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार मंच बड़ा था, चेहरे बड़े थे और पूरा नेटवर्क खुलकर सामने आ गया।
यह कार्यक्रम डॉ. रफरफ शकील अंसारी और जावेद अनवर की पुस्तक ‘जाति और साम्प्रदायिकता के विषाणु’ के लोकार्पण के लिए आयोजित किया गया था। मंच पर योगेंद्र यादव, आशुतोष, प्रो. रतन लाल, शीबा असलम फहमी और बिलाल अहमद जैसे लोग मौजूद थे। यह कोई सामान्य बौद्धिक गोष्ठी नहीं थी। यह वही वैचारिक गिरोह है जो वर्षों से विश्वविद्यालयों, मीडिया मंचों, एक्टिविस्ट समूहों, न्यूज़ पोर्टलों और सोशल मीडिया के जरिए “मनुवाद”, “ब्राह्मणवाद” और “सनातन विरोध” को एक राजनीतिक और बौद्धिक फैशन बनाने में लगा हुआ है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पूरा कार्यक्रम राजीव गांधी फाउंडेशन से जुड़े वैचारिक दायरे में हुआ। राजीव गांधी फाउंडेशन की स्थापना 21 जून 1991 को हुई थी। इसकी चेयरपर्सन सोनिया गांधी रहीं। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, डॉ. मनमोहन सिंह और पी. चिदंबरम जैसे कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे इससे जुड़े रहे हैं। इसलिए जब ऐसे मंचों पर लगातार वही लोग दिखाई देते हैं जो हिंदू सामाजिक संरचना, सनातन परंपरा और विशेष रूप से ब्राह्मण समाज को निशाना बनाते हैं, तो यह कहना कि कांग्रेस का इससे कोई संबंध नहीं है, वास्तविकता से आंख मूंदना होगा।
राहुल गांधी स्वयं लोकसभा और सार्वजनिक मंचों से बार-बार वही बातें दोहराते रहे हैं जो आज राजकुमार भाटी जैसे नेता आक्रामक भाषा में बोल रहे हैं। राहुल गांधी कई बार कह चुके हैं कि “पांच हजार वर्षों तक दलितों-पिछड़ों को पानी तक नहीं पीने दिया गया।” उन्होंने संसद में एकलव्य की कहानी सुनाते हुए “ब्राह्मणवादी व्यवस्था” पर हमला किया। बजट सत्र के दौरान भी राहुल गांधी ने लोकसभा में कहा कि “शूद्रों को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं था, उनके कानों में पिघला सीसा डाला जाता था।” उन्होंने शंबूक वध का उदाहरण देकर सनातन परंपरा और ब्राह्मण समाज पर निशाना साधा।
यानी जो भाषा राजकुमार भाटी सड़कछाप शैली में बोलते हैं, वही बातें राहुल गांधी संसद के भीतर “ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था” जैसे शब्दों में कहते दिखाई देते हैं। राहुल गांधी कई बार “ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था को खत्म करना होगा” जैसी भाषा इस्तेमाल कर चुके हैं।
महिलाओं को पढ़ने का अधिकार नहीं था, शूद्रों को ज्ञान से दूर रखा गया इस तरह के कथनों के जरिए लगातार यह नैरेटिव स्थापित करने की कोशिश की जाती है कि हिंदू समाज की हर समस्या की जड़ केवल “ब्राह्मणवाद” है।
यही वही वैचारिक लाइन है जिसे अंग्रेजों ने “Brahminism” शब्द गढ़कर शुरू किया था, मिशनरियों ने आगे बढ़ाया, वामपंथी दीमकों ने विश्वविद्यालयों और मीडिया में फैलाया और आज कांग्रेस से जुड़े वैचारिक नेटवर्क उसे राजनीतिक भाषा में दोहरा रहे हैं।
योगेंद्र यादव की इस पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में मौजूदगी पूरे मामले को केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि वैचारिक रूप से भी बेहद गंभीर बना देती है। क्योंकि योगेंद्र यादव कोई सामान्य चुनाव विश्लेषक या टीवी डिबेट में बैठने वाले टिप्पणीकार नहीं रहे। वह सीधे उस सत्ता संरचना का हिस्सा रहे हैं जिसे यूपीए शासनकाल में “सुपर सरकार” कहा जाता था।
योगेंद्र यादव सोनिया गांधी द्वारा बनाई गई National Advisory Council (NAC) के सदस्य थे। NAC का गठन जून 2004 में यूपीए-1 सरकार बनने के बाद किया गया था। आधिकारिक रूप से इसे सलाहकार परिषद कहा गया, लेकिन उस समय देश की राजनीति और मीडिया में यह व्यापक धारणा थी कि असली वैचारिक और नीतिगत शक्ति प्रधानमंत्री कार्यालय नहीं, बल्कि सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली NAC के पास है।
वरिष्ठ पत्रकार एम.जे. अकबर, स्वपन दासगुप्ता और कई राजनीतिक विश्लेषकों ने उस समय NAC को “extra-constitutional authority” और “super cabinet” तक कहा था। क्योंकि डॉ. मनमोहन सिंह संवैधानिक रूप से प्रधानमंत्री थे, लेकिन सामाजिक नीति, शिक्षा, अल्पसंख्यक नीति, NGO आधारित शासन मॉडल और अधिकार आधारित कानूनों की दिशा NAC तय कर रही थी।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि NAC में जिन लोगों को शामिल किया गया, उनकी पृष्ठभूमि देखकर पूरा वैचारिक ढांचा साफ समझ आता है।
योगेंद्र यादव के अलावा NAC में अरुणा रॉय, हर्ष मंदर, ज्यां द्रेज़ (Jean Drèze), तीस्ता सीतलवाड़, फराह नक़वी, राम पुनियानी, नंदिनी सुंदर और उषा रामनाथन जैसे लोग प्रभावशाली रूप से जुड़े रहे। इन लोगों का वर्षों का लेखन, एक्टिविज्म और सार्वजनिक रुख लगातार हिंदुत्व विरोधी, पहचान आधारित राजनीति और तथाकथित “ब्राह्मणवादी व्यवस्था” विरोधी विमर्श से जुड़ा रहा है।
हर्ष मंदर ने अपने लेखों और भाषणों में लगातार हिंदुत्व राजनीति को “majoritarian threat” बताया। तीस्ता सीतलवाड़ लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदू संगठनों और गुजरात दंगों को लेकर अभियान चलाने के लिए चर्चा में रहीं। राम पुनियानी का पूरा सार्वजनिक विमर्श “हिंदुत्व फासीवाद” और “ब्राह्मणवादी राजनीति” जैसे शब्दों पर आधारित रहा। नंदिनी सुंदर और उषा रामनाथन जैसे लोग लगातार “राज्य बनाम अल्पसंख्यक” और “बहुसंख्यक उत्पीड़न” वाले विमर्श को आगे बढ़ाते रहे।
यही वह दौर था जब विश्वविद्यालयों, मीडिया संस्थानों और तथाकथित “सिविल सोसायटी” नेटवर्क में “मनुवाद”, “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता”, “ब्राह्मणवादी फासीवाद” और “हिंदू मेजॉरिटेरियनिज्म” जैसे शब्द व्यवस्थित रूप से स्थापित किए गए।
इससे पहले ये शब्द सीमित वामपंथी अकादमिक दायरों तक सीमित थे, लेकिन यूपीए काल में यही भाषा मीडिया डिबेट, सरकारी सेमिनार, विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम, NGO एक्टिविज्म और तथाकथित सामाजिक न्याय विमर्श का हिस्सा बन गई।
यही वह समय था जब विदेशी फंडिंग नेटवर्क, NGO इकोसिस्टम और विश्वविद्यालयी एक्टिविज्म का गठजोड़ खुलकर सामने आने लगा।
राजीव मल्होत्रा ने अपनी पुस्तक Breaking India: Western Interventions in Dravidian and Dalit Faultlines (2011) में विस्तार से लिखा कि कैसे विदेशी चर्च नेटवर्क, Ford Foundation, Western Evangelical groups, अमेरिकी विश्वविद्यालयों से जुड़े South Asia departments और भारतीय NGO नेटवर्क मिलकर भारत को जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर बांटने वाले नैरेटिव को बढ़ावा देते हैं।
राजीव मल्होत्रा ने पुस्तक में यह भी लिखा कि “Aryan vs Dravidian”, “Dalit vs Brahmin” और “North vs South” जैसे नैरेटिव केवल अकादमिक बहस नहीं हैं, बल्कि इन्हें योजनाबद्ध तरीके से अंतरराष्ट्रीय फंडिंग, एक्टिविस्ट नेटवर्क और राजनीतिक संरक्षण के माध्यम से आगे बढ़ाया गया।
Ford Foundation का नाम कई बार भारतीय एक्टिविस्ट नेटवर्क और नीति समूहों की फंडिंग को लेकर चर्चा में रहा। अमेरिकी चर्च समर्थित संस्थाएं और पश्चिमी विश्वविद्यालय लंबे समय से भारत में “caste oppression narrative” को वैश्विक मंचों पर स्थापित करने का प्रयास करते रहे हैं।
यही कारण है कि जब राजीव गांधी फाउंडेशन से जुड़े मंचों पर योगेंद्र यादव जैसे लोग दिखाई देते हैं और उसी मंच पर राजकुमार भाटी जैसे नेता ब्राह्मण समाज के लिए अपमानजनक भाषा बोलते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत बयान नहीं रह जाता।
यह उसी लंबे वैचारिक ढांचे का हिस्सा दिखाई देता है जिसमें कांग्रेस से जुड़े वैचारिक नेटवर्क, वामपंथी एक्टिविस्ट समूह, NGO इकोसिस्टम, विदेशी फंडिंग नेटवर्क और जाति आधारित राजनीति करने वाले संगठन मिलकर एक ऐसा नैरेटिव खड़ा करते दिखाई देते हैं जिसमें “ब्राह्मणवाद” शब्द को राजनीतिक हथियार और “सनातन विरोध” को वैचारिक अभियान में बदल दिया गया है।
असल में “ब्राह्मणवाद” शब्द का इतिहास समझे बिना इस पूरे खेल को समझना संभव ही नहीं है। क्योंकि भारतीय परंपरा में “ब्राह्मणवाद” जैसा कोई शब्द उस अर्थ में कभी था ही नहीं जिस अर्थ में आज उसे गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है। वेद, उपनिषद, गीता, रामायण, महाभारत, मनुस्मृति या किसी भी प्राचीन भारतीय ग्रंथ में “ब्राह्मणवाद” शब्द उस राजनीतिक अर्थ में नहीं मिलता। भारतीय परंपरा में “ब्राह्मण” एक गुण, ज्ञान और कर्म आधारित अवधारणा थी, लेकिन औपनिवेशिक इतिहासकारों और मिशनरियों ने इसे सत्ता और शोषण से जोड़कर प्रस्तुत करना शुरू किया।
यह शब्द अंग्रेजी शब्द Brahminism का अनुवाद है। इसे सबसे पहले औपनिवेशिक अंग्रेज इतिहासकारों, मिशनरियों और यूरोपीय इंडोलॉजिस्टों ने इस्तेमाल किया। इसके पीछे सीधी राजनीतिक और धार्मिक मंशा थी। अंग्रेजों को भारत पर शासन करना था, भारत की संपत्ति लूटनी थी और साथ ही अपने शासन को “सभ्य बनाने वाला मिशन” साबित करना था। इसलिए हिंदू समाज की सांस्कृतिक रीढ़ को निशाना बनाना जरूरी समझा गया।
1817 में जेम्स मिल ने History of British India लिखी। जेम्स मिल कभी भारत आया तक नहीं था, लेकिन उसने हिंदू सभ्यता को पिछड़ा, अंधविश्वासी और दमनकारी साबित करने की कोशिश की। उसने भारतीय इतिहास को इस तरह लिखा कि ब्राह्मण समाज को हर सामाजिक समस्या की जड़ बताया जा सके। बाद में मिशनरियों ने “Brahminism” शब्द को हथियार की तरह इस्तेमाल करना शुरू किया।
मिशनरियों के सामने सबसे बड़ी समस्या भारत की सनातन सांस्कृतिक संरचना थी। वेद, उपनिषद, संस्कृत, मंदिर परंपरा और धार्मिक ज्ञान परंपरा का केंद्र ब्राह्मण समाज था। उन्हें पता था कि जब तक यह सांस्कृतिक ढांचा मजबूत रहेगा, तब तक बड़े पैमाने पर ईसाईकरण आसान नहीं होगा। इसलिए ब्राह्मणों को “विलेन” बनाना जरूरी समझा गया।
मिशनरियों ने यह नैरेटिव फैलाना शुरू किया कि भारत की सारी सामाजिक समस्याओं की जड़ “ब्राह्मणवाद” है और ईसाईयत उससे मुक्ति दिला सकती है। यही कारण था कि चर्च समर्थित लेखकों और मिशनरियों के साहित्य में “Brahminism vs Christianity” जैसा विमर्श दिखाई देने लगा।
इसी दौरान “आर्य आक्रमण सिद्धांत” को व्यवस्थित रूप से फैलाया गया। फ्रेडरिक मैक्स मूलर की भाषाई थ्योरी को बाद में नस्लीय रूप देकर प्रचारित किया गया कि आर्य बाहर से आए थे और ब्राह्मणों ने यहां के मूल निवासियों पर कब्जा कर लिया। इससे अंग्रेज अपने विदेशी शासन को भी सही ठहरा सकते थे। संदेश साफ था अगर आर्य बाहर से आकर भारत पर शासन कर सकते हैं, तो अंग्रेज भी कर सकते हैं।
यानी अंग्रेजों ने एक साथ दो काम किए पहला, हिंदू समाज को “आर्य बनाम द्रविड़” और “ब्राह्मण बनाम बाकी समाज” में बांटना; दूसरा, अपने औपनिवेशिक शासन को वैचारिक वैधता देना।
1835 में थॉमस बैबिंगटन मैकॉले की शिक्षा नीति लागू हुई। अपनी प्रसिद्ध Minute on Indian Education में मैकॉले ने साफ लिखा था कि ऐसा वर्ग तैयार करना है जो “रक्त और रंग से भारतीय हो लेकिन सोच से अंग्रेज हो।” इसके बाद शिक्षा व्यवस्था के जरिए भारतीयों को उनकी सांस्कृतिक जड़ों से काटने का संगठित काम शुरू हुआ। संस्कृत, भारतीय दर्शन और पारंपरिक ज्ञान प्रणाली को कमजोर किया गया, जबकि अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से औपनिवेशिक इतिहास और सोच थोपी गई।
ब्रिटिश अधिकारी हर्बर्ट होप रिस्ले ने 1901 की जनगणना में भारतीय समाज को जाति और नस्ल के आधार पर वर्गीकृत करने का काम किया। उसकी पुस्तक The People of India (1908) इसी सोच का हिस्सा थी। रिस्ले ने नाक की लंबाई और शारीरिक संरचना तक के आधार पर भारतीय जातियों को नस्लीय श्रेणियों में बांटने की कोशिश की। यही वह दौर था जब “आर्य बनाम द्रविड़” की राजनीति को दक्षिण भारत में वैचारिक आधार मिलना शुरू हुआ ।
बाद में यही औपनिवेशिक सिद्धांत दक्षिण भारत की द्रविड़ राजनीति का आधार बना। ई.वी. रामासामी पेरियार ने “ब्राह्मणवाद विरोध” को राजनीतिक आंदोलन में बदल दिया। फिर DMK ने उसी राजनीति को सत्ता का हथियार बनाया। धीरे-धीरे “ब्राह्मणवाद” शब्द सामाजिक बहस नहीं, बल्कि हिंदू समाज को तोड़ने का राजनीतिक औजार बन गया।
स्वतंत्रता के बाद उम्मीद थी कि अंग्रेजों द्वारा बनाया गया यह औपनिवेशिक नैरेटिव खत्म होगा, लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा। अंग्रेजों ने जिस “आर्य आक्रमण सिद्धांत”, “ब्राह्मणवाद” और “हिंदू समाज = शोषक संरचना” वाले नैरेटिव को भारत पर शासन करने और ईसाईकरण को बढ़ाने के लिए खड़ा किया था, वही सोच स्वतंत्र भारत में कांग्रेस शासन के दौरान और अधिक संस्थागत रूप से मजबूत होती चली गई।
ई.वी. रामासामी “पेरियार” को आज दक्षिण भारत में सामाजिक सुधारक बताकर महिमामंडित किया जाता है, लेकिन यदि उनके भाषणों, लेखों और आंदोलनों को गंभीरता से पढ़ा जाए तो साफ दिखाई देता है कि उनकी राजनीति का असली केंद्र “ब्राह्मणवाद विरोध” के नाम पर सनातन धर्म, हिंदू देवी-देवताओं और हिंदू सांस्कृतिक प्रतीकों पर लगातार हमला करना था।
1925 में पेरियार ने Self-Respect Movement शुरू किया। नाम भले “आत्मसम्मान आंदोलन” रखा गया, लेकिन कुछ ही वर्षों में इसका पूरा विमर्श “ब्राह्मण विरोध” और “हिंदू धर्म विरोध” में बदल गया। पेरियार खुले मंचों से भगवान राम, रामायण, वेद, पुराण और हिंदू परंपराओं का अपमान करते थे। उन्होंने भगवान राम को “आर्य आक्रमणकारी” और रावण को “द्रविड़ नायक” बताने की राजनीति शुरू की। रामायण को “आर्य बनाम द्रविड़” युद्ध की कहानी की तरह प्रचारित किया गया।
पेरियार ने सार्वजनिक रूप से रामायण की प्रतियां जलाने तक के अभियान चलाए। कई जगहों पर हिंदू देवी-देवताओं के पोस्टरों और मूर्तियों के खिलाफ प्रदर्शन हुए। यह केवल सामाजिक सुधार नहीं था, बल्कि हिंदू आस्था और सनातन सांस्कृतिक प्रतीकों के खिलाफ संगठित वैचारिक हमला था।
उनकी पूरी राजनीति उसी औपनिवेशिक “Aryan vs Dravidian Theory” पर खड़ी थी जिसे अंग्रेजों और मिशनरियों ने भारत को तोड़ने के लिए खड़ा किया था। अंग्रेज इतिहासकार जेम्स मिल, मैक्स मूलर और हर्बर्ट रिस्ले जैसे लोगों ने पहले यह नैरेटिव बनाया कि आर्य बाहर से आए और उन्होंने यहां के मूल निवासियों पर कब्जा किया। बाद में उसी सिद्धांत को दक्षिण भारत में राजनीतिक आंदोलन का रूप दे दिया गया।
पेरियार ने दावा किया कि ब्राह्मण “बाहरी आर्य” हैं जिन्होंने द्रविड़ समाज को गुलाम बनाया। यहीं से “ब्राह्मणवाद विरोध” केवल सामाजिक बहस नहीं रहा, बल्कि संगठित राजनीतिक हथियार बन गया।
1944 में पेरियार ने Justice Party को बदलकर Dravidar Kazhagam (DK) बनाया। इसके बाद द्रविड़ राजनीति का पूरा केंद्र “ब्राह्मणवाद विरोध”, “हिंदी विरोध” और “सनातन विरोध” बन गया।
1949 में सी.एन. अन्नादुरई ने DMK की स्थापना की। DMK ने पेरियार की इसी वैचारिक लाइन को सत्ता की राजनीति में बदल दिया। फिल्मों, नाटकों, अखबारों, साहित्य और राजनीतिक भाषणों के जरिए लगातार “ब्राह्मणवाद विरोध” को जनमानस में स्थापित किया गया। करुणानिधि जैसे नेताओं ने तमिल सिनेमा को भी इस राजनीति का हथियार बनाया।
धीरे-धीरे “ब्राह्मणवाद” शब्द दक्षिण भारतीय राजनीति का स्थायी हथियार बन गया। बाद में यही मॉडल वामपंथी विश्वविद्यालय नेटवर्क, एक्टिविस्ट समूहों और उत्तर भारत की जातीय राजनीति में भी दिखाई देने लगा। “मनुवाद”, “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता”, “ब्राह्मणवादी व्यवस्था” जैसे शब्द उसी वैचारिक ढांचे से निकले।
आज उसी राजनीति का विस्तार उदयनिधि स्टालिन के बयानों में साफ दिखाई देता है। 2 सितंबर 2023 को चेन्नई में आयोजित “सनातन उन्मूलन सम्मेलन” में उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म की तुलना डेंगू, मलेरिया और कोरोना से करते हुए कहा था कि “सनातन का विरोध नहीं, उसका उन्मूलन होना चाहिए।”
उदयनिधि स्टालिन ने कहा था “डेंगू, मच्छर, मलेरिया, कोरोना इनका केवल विरोध नहीं किया जाता, इन्हें खत्म किया जाता है। सनातन भी ऐसा ही है।”
यह कोई भावनात्मक बयान नहीं था। यह उसी वैचारिक परंपरा की अगली कड़ी थी जिसकी शुरुआत पेरियार ने की थी।
सबसे गंभीर बात यह रही कि DMK नेतृत्व ने उदयनिधि स्टालिन से दूरी नहीं बनाई। बाद में तमिलनाडु विधानसभा में भी उन्होंने दोबारा कहा कि “सनातन लोगों को बांटता है और इसे खत्म किया जाना चाहिए।” उस समय राज्य के नए मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय भी सदन में मौजूद थे, लेकिन उन्होंने इस बयान पर कोई आपत्ति नहीं जताई।
मद्रास हाईकोर्ट पहले भी उदयनिधि स्टालिन की ऐसी टिप्पणियों को लेकर तीखी टिप्पणी कर चुका है। अदालत ने इस तरह के बयानों को “hate speech” की श्रेणी में माना था। इसके बावजूद DMK और उससे जुड़े वैचारिक समूह लगातार “सनातन विरोध” और “ब्राह्मणवाद विरोध” को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करते रहे हैं।
यही कारण है कि आज “ब्राह्मणवाद विरोध” को केवल सामाजिक न्याय की बहस बताना वास्तविकता छिपाना है। यह दशकों से चल रहा संगठित वैचारिक अभियान है, जिसकी जड़ें औपनिवेशिक “आर्य-द्रविड़” सिद्धांत, मिशनरी एजेंडे, द्रविड़ राजनीति और आधुनिक वामपंथी एक्टिविज्म में गहराई से जुड़ी हुई हैं।
जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पुस्तक The Discovery of India (1946) में आर्यों को भारत के बाहर से आने वाली जाति के रूप में प्रस्तुत करने वाली औपनिवेशिक धारणाओं को स्वीकार करने वाली भाषा लिखी। पुस्तक के “The Vedic Period” और “The Continuity of Indian Culture” से जुड़े हिस्सों में नेहरू आर्यों के उत्तर-पश्चिम से भारत आने, यहां पहले से मौजूद द्रविड़ सभ्यता से उनके संपर्क और बाद में सामाजिक संरचना बनने की चर्चा करते हैं। कई संस्करणों में यह चर्चा लगभग पृष्ठ 70 से 85 के बीच मिलती है।
नेहरू लिखते हैं कि आर्यों के भारत आगमन के बाद “racial and political problems” पैदा हुए और बाद में भारतीय समाज की संरचना विकसित हुई। यह वही औपनिवेशिक ढांचा था जिसे जेम्स मिल, मैक्स मूलर और हर्बर्ट रिस्ले जैसे अंग्रेज इतिहासकार पहले से स्थापित कर चुके थे।
असल में अंग्रेजों ने “आर्य आक्रमण सिद्धांत इतिहास समझाने के लिए नहीं बनाई थी। इसके पीछे साफ राजनीतिक उद्देश्य था। अगर यह साबित कर दिया जाए कि आर्य बाहर से आए थे और उन्होंने यहां के मूल निवासियों पर शासन किया, तो अंग्रेज भी अपने विदेशी शासन को वैध ठहरा सकते थे। संदेश साफ था “जब आर्य बाहर से आकर भारत पर शासन कर सकते हैं तो अंग्रेज क्यों नहीं?”
यही नहीं, इस सिद्धांत के जरिए हिंदू समाज को “आर्य बनाम द्रविड़”, “ऊंची जाति बनाम मूल निवासी” और “ब्राह्मण बनाम बाकी समाज” में बांटने का वैचारिक आधार भी तैयार किया गया।
समस्या यहां और गंभीर हो गई क्योंकि स्वतंत्र भारत में कांग्रेस शासन ने इस औपनिवेशिक सिद्धांत को चुनौती देने के बजाय उसे शिक्षा व्यवस्था और इतिहास लेखन में जगह दी। नेहरू की वैचारिक स्वीकार्यता के बाद विश्वविद्यालयों, NCERT की किताबों और अकादमिक संस्थानों में वही नैरेटिव स्थापित होता चला गया।
इसके बाद वामपंथी इतिहासकारों और तथाकथित प्रगतिशील अकादमिक समूहों को वैचारिक ताकत मिली। रोमिला थापर, इरफान हबीब, डी.एन. झा और कई अन्य इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास को “शोषक बनाम शोषित” के फ्रेम में पढ़ाना शुरू किया।
“ब्राह्मणवादी व्यवस्था”, “मनुवाद”, “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” जैसे शब्द धीरे-धीरे अकादमिक भाषा से निकलकर मीडिया और राजनीति का हिस्सा बन गए।
यानी अंग्रेजों ने जिस नैरेटिव को भारत पर शासन करने, हिंदू समाज को तोड़ने और ईसाईकरण को बढ़ाने के लिए बनाया था, कांग्रेस शासन में वही नैरेटिव भारत की शिक्षा व्यवस्था, इतिहास लेखन और सरकारी बौद्धिक ढांचे का हिस्सा बन गया।
इसके बाद वामपंथी दीमकों ने विश्वविद्यालयों, मीडिया संस्थानों और इतिहास लेखन पर कब्जा किया। रोमिला थापर, इरफान हबीब, डी.एन. झा और कई वामपंथी इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास को “शोषक बनाम शोषित” के ढांचे में पढ़ाना शुरू किया। “मनुवाद”, “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता”, “ब्राह्मणवादी व्यवस्था” जैसे शब्द अकादमिक भाषा का हिस्सा बनाए गए।
1996 में कांचा इलैया की पुस्तक Why I Am Not a Hindu आई। इसमें “ब्राह्मणवाद” को भारत की समस्याओं का मूल कारण बताया गया। गेल ऑम्वेट जैसी लेखिकाओं ने भी इसी तरह का विमर्श आगे बढ़ाया।
राजीव मल्होत्रा ने अपनी पुस्तक Breaking India (2011) में विस्तार से लिखा कि कैसे विदेशी चर्च नेटवर्क, Ford Foundation जैसे विदेशी फंडिंग नेटवर्क, वामपंथी अकादमिक समूह, NGO नेटवर्क और भारतीय राजनीतिक इकोसिस्टम मिलकर भारत को जाति, क्षेत्र और पहचान के आधार पर तोड़ने का काम कर रहे हैं। उन्होंने विस्तार से बताया कि कैसे “दलित बनाम ब्राह्मण”, “आर्य बनाम द्रविड़” और “उत्तर बनाम दक्षिण” जैसे नैरेटिव्स को अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, चर्च समर्थित नेटवर्कों और एक्टिविस्ट समूहों के माध्यम से बढ़ाया गया।
2009 में शुरू हुई वेबसाइट Forward Press ने इस पूरे अभियान को डिजिटल रूप में आगे बढ़ाया। इस पोर्टल पर लगातार ऐसे लेख प्रकाशित होते रहे हैं जिनमें “ब्राह्मणवाद” शब्द को लगभग गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है। वहां हिंदू सामाजिक संरचना, सनातन परंपराओं और ब्राह्मण समाज को हर समस्या की जड़ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
आज हजारों ट्विटर हैंडल, यूट्यूब चैनल, फेसबुक पेज और इंस्टाग्राम अकाउंट्स दिन-रात वही भाषा दोहराते हैं। फिल्मों और वेब सीरीज में भी हिंदू साधु, पुरोहित और ब्राह्मण पात्रों को अक्सर पाखंडी, षड्यंत्रकारी और दमनकारी दिखाया जाता है। यह सब केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि धीरे-धीरे मानसिकता बदलने की प्रक्रिया है।
पूर्वोत्तर भारत में बड़े पैमाने पर मिशनरी गतिविधियां चलीं। चर्च समर्थित संस्थाओं और विदेशी फंडिंग नेटवर्कों को कांग्रेस शासन के दौरान जिस तरह प्रशासनिक और राजनीतिक स्पेस मिला, उससे कई राज्यों में तेजी से ईसाईकरण हुआ। यही कारण है कि आज बहुत से लोग मानते हैं कि कांग्रेस और उससे जुड़े वैचारिक नेटवर्क केवल वोट बैंक की राजनीति नहीं कर रहे, बल्कि लंबे समय से हिंदू समाज को जातियों में बांटने, ब्राह्मण विरोधी विमर्श को बढ़ाने और सनातन की सांस्कृतिक जड़ों को कमजोर करने वाले अभियान को संस्थागत संरक्षण दे रहे हैं।
राजकुमार भाटी का बयान केवल किसी नेता की अभद्र भाषा नहीं है, बल्कि उस लंबे वैचारिक अभियान का हिस्सा है जिसे अंग्रेजों ने “ब्राह्मणवाद” और “आर्य-द्रविड़” नैरेटिव के जरिए शुरू किया था। मिशनरियों ने इसे ईसाईकरण के लिए इस्तेमाल किया, वामपंथी दीमकों ने विश्वविद्यालयों और मीडिया में फैलाया, और कांग्रेस से जुड़े वैचारिक नेटवर्कों ने संस्थागत संरक्षण दिया।
जेम्स मिल, मैक्स मूलर और हर्बर्ट रिस्ले जैसे औपनिवेशिक इतिहासकारों ने हिंदू समाज को “ब्राह्मण बनाम बाकी समाज” में बांटने की नींव रखी। बाद में नेहरू की Discovery of India, वामपंथी इतिहासकारों, NAC जैसे ढांचों, Forward Press जैसे पोर्टलों और एक्टिविस्ट नेटवर्कों ने “मनुवाद”, “ब्राह्मणवादी व्यवस्था” और “सनातन विरोध” को संगठित राजनीतिक विमर्श बना दिया।
आज राजकुमार भाटी, उदयनिधि स्टालिन और ऐसे कई नेता उसी वैचारिक लाइन को आगे बढ़ा रहे हैं, जहां “ब्राह्मणवाद विरोध” के नाम पर सनातन की सांस्कृतिक जड़ों को निशाना बनाया जा रहा है।
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