सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

बौद्ध अहिंसा का अतिरेक और भारत का विखंडन





✍️दीपक कुमार द्विवेदी

भारत के इतिहास को केवल राजाओं, युद्धों और राजनीतिक घटनाओं से नहीं समझा जा सकता। किसी भी सभ्यता की स्थिरता उसके दार्शनिक आधार, सामाजिक संरचना, आत्मरक्षात्मक चेतना और सांस्कृतिक एकता पर निर्भर करती है। भारतीय इतिहास का गंभीर अध्ययन करने पर यह स्पष्ट दिखाई देता है कि पिछले लगभग दो हजार वर्षों में भारत को जितनी क्षति बाहरी आक्रमणों से हुई, उतनी ही आंतरिक वैचारिक विखंडन से भी हुई।

प्राचीन भारत की सांस्कृतिक सीमाएँ आज के भारत तक सीमित नहीं थीं। गांधार (अफगानिस्तान), सिंध, तक्षशिला, नेपाल, तिब्बत, दक्षिण-पूर्व एशिया और इंडोनेशिया तक भारतीय वैदिक-सांस्कृतिक प्रभाव था। चीनी यात्री ह्वेनसांग और फाह्यान के यात्रा-वृत्तांत इस व्यापक सांस्कृतिक प्रभाव की पुष्टि करते है ।

बंगाली समाज आज जिस प्रकार हिंसा, अराजकता और वैचारिक भ्रम में दिखाई देता है, उस पर कभी गंभीर चर्चा नहीं हुई। सामान्यतः लोग केवल राजनीति, चुनाव या आर्थिक कारणों की बात करते हैं, परंतु उसके पीछे जो दीर्घकालिक वैचारिक कारण कार्य करते रहे, उन पर कोई बात नहीं करता। प्रश्न यह है कि बंगाल जैसा सांस्कृतिक और बौद्धिक क्षेत्र धीरे-धीरे इतना असंतुलित कैसे हुआ।

इतिहासकार आर. सी. मजूमदार ने History of Bengal तथा The History and Culture of the Indian People में उल्लेख किया है कि पाल वंश (लगभग 750–1174 ई.) के काल में बंगाल बौद्ध मत का प्रमुख केंद्र बन चुका था। गोपाल, धर्मपाल और देवपाल जैसे पाल शासकों ने नालंदा, विक्रमशिला और सोमपुर महाविहारों को संरक्षण दिया। धर्मपाल (770–810 ई.) के समय विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना हुई, जबकि सोमपुर महाविहार, जो वर्तमान बांग्लादेश के पहाड़पुर में स्थित है, उस समय विश्व के सबसे बड़े बौद्ध शिक्षा केंद्रों में गिना जाता था। तिब्बती इतिहासकार तारानाथ और चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरण भी पूर्वी भारत में बौद्ध प्रभाव की पुष्टि करते हैं।
इसी काल में बंगाल में वैदिक क्षात्र परंपरा अपेक्षाकृत कमजोर होती दिखाई देती है। बौद्ध मत का केंद्रीय सिद्धांत अहिंसा, संन्यास और वैराग्य था। यह व्यक्तिगत आध्यात्मिक साधना के लिए प्रभावी हो सकता है, परंतु राज्य और समाज की सुरक्षा के लिए केवल अहिंसावादी दृष्टि पर्याप्त नहीं मानी गई। यही कारण है कि शुक्र नीति कौटिल्य के अर्थशास्त्र, मनुस्मृति और महाभारत जैसे वैदिक ग्रंथों में दण्डनीति और राज्य-सुरक्षा को अनिवार्य माना गया है।

1204–05 ईस्वी में मुहम्मद बख्तियार खिलजी ने बंगाल पर आक्रमण किया। फारसी इतिहासकार

मिन्हाज-उस-सिराज ने तबकात-ए-नासिरी में लिखा है कि खिलजी अत्यंत सीमित सैन्य बल के साथ नदिया पहुँचा और लक्ष्मण सेन को पीछे हटना पड़ा। यह घटना केवल सैन्य पराजय नहीं थी, बल्कि यह संकेत भी थी कि बंगाल की राजनीतिक-सामाजिक संरचना बाहरी आक्रमणों के प्रति अत्यंत संवेदनशील हो चुकी थी। इसके बाद बंगाल में तुर्क, अफगान और मुगल सत्ता के विभिन्न चरण स्थापित हुए।

यहीं से एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रश्न खड़ा होता है। जिन क्षेत्रों में बौद्ध मत सबसे अधिक प्रभावी था गांधार, अफगानिस्तान, सिंध और बंगाल वही क्षेत्र बाद में सबसे पहले इस्लामी आक्रमणों के सामने क्यों टूटे? इसका उत्तर केवल सैन्य पराजय में नहीं, बल्कि वैचारिक संरचना में भी छिपा है।

लेकिन इतिहास का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। बौद्ध मत का विस्तार प्रायः राजाश्रय पर निर्भर रहा। सम्राट अशोक, कनिष्क और पाल शासकों के संरक्षण में वह फला-फूला, परंतु जैसे ही राजनीतिक संरक्षण समाप्त हुआ, बौद्ध संस्थाएँ तेजी से कमजोर हो गईं। नालंदा और विक्रमशिला जैसे विशाल महाविहार बाहरी आक्रमणों के सामने अपनी रक्षा नहीं कर सके।

इतिहासकार ए. एल. बाशम ने भी माना कि भारत में बौद्ध संस्थाओं के पतन का एक बड़ा कारण उनका अत्यधिक संस्थागत और राजाश्रित होना था।
इसके विपरीत सनातन वैदिक धर्म का स्वरूप समाज-आधारित था, केवल राज्य-आधारित नहीं। यही कारण है कि इस्लामी आक्रमण, अंग्रेजी उपनिवेशवाद, ईसाई मिशनरी गतिविधियों और आधुनिक वामपंथी विचारधाराओं के लगातार आक्रमणों के बाद भी सनातन परंपरा समाप्त नहीं हुई। शैव, वैष्णव, शाक्त, तांत्रिक, वेदांत और भक्ति परंपराएँ आज भी जीवित हैं। काशी, पुरी, कांची, द्वारका, बद्रीनाथ, श्रृंगेरी जैसे केंद्र लगातार सक्रिय रहे।

यहीं सनातन वैदिक धर्म और अवैदिक मतों के बीच मूल अंतर दिखाई देता है। वैदिक दर्शन सृष्टि को त्रिगुणात्मक मानता है सत्त्व, रज और तम। भगवद्गीता के 14वें अध्याय में श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि सम्पूर्ण जगत इन तीन गुणों से संचालित होता है। केवल सात्त्विकता से समाज नहीं चलता। यदि समाज में रजोगुण अर्थात् पराक्रम और शासन समाप्त हो जाए, तो तमोगुणी और हिंसक शक्तियाँ हावी हो जाती हैं।

इसीलिए वैदिक धर्म में अहिंसा और हिंसा दोनों की मर्यादा निर्धारित है। “अहिंसा परमो धर्मः, धर्म हिंसा तथैव च” केवल धार्मिक वाक्य नहीं, बल्कि सभ्यता की सुरक्षा का सिद्धांत है। रामायण में भगवान श्रीराम युद्ध से पहले अंगद को रावण के पास शांति प्रस्ताव लेकर भेजते हैं। महाभारत में श्रीकृष्ण हस्तिनापुर जाकर पाँच गाँव तक का प्रस्ताव रखते हैं ताकि युद्ध टल जाए। इसका अर्थ यह है कि वैदिक परंपरा पहले संवाद और शांति चाहती है, लेकिन जब अधर्म समाप्त नहीं होता, तब युद्ध को भी धर्म मानती है।

रामायण में भगवान श्रीराम युद्ध से पहले अंगद को रावण के पास शांति प्रस्ताव लेकर भेजते हैं। महाभारत में श्रीकृष्ण हस्तिनापुर जाकर पाँच गाँव तक का प्रस्ताव रखते हैं। इसका अर्थ यह है कि वैदिक धर्म पहले संवाद और शांति चाहता है, लेकिन जब अधर्म और अत्याचार समाप्त न हो, तब युद्ध को धर्म मानता है। यही कारण है कि वैदिक धर्मी सामान्यतः अतिवादी नहीं होता।
इसके विपरीत जब कोई मत केवल अहिंसा को सर्वोच्च बना देता है, तब समाज आत्मरक्षाहीन होने लगता है। और जब कोई मजहब स्वयं को “एकमात्र सत्य” घोषित करता है, तब वह विस्तारवादी और हिंसक बन जाता है। इतिहास में दोनों स्थितियाँ दिखाई देती हैं।

शुक्रनीति, अर्थशास्त्र, मनुस्मृति और महाभारत में दण्डनीति और राज्य-सुरक्षा को अनिवार्य बताया गया है। आचार्य शुक्र लिखते हैं कि जो राज्य दुष्टों को दण्ड नहीं देता, वह स्वयं विनाश को प्राप्त होता है। कौटिल्य ने भी स्पष्ट कहा कि बिना शक्ति के शांति संभव नहीं। यही कारण है कि वैदिक धर्मी सामान्यतः अतिवादी नहीं होता, क्योंकि उसकी दृष्टि संतुलन पर आधारित है।

इसके विपरीत अवैदिक मतों और आब्राहमिक मजहबों में या तो अत्यधिक अहिंसा दिखाई देती है, या फिर एकमात्र सत्य की कट्टर अवधारणा। बौद्ध मत ने शांति को इतना अधिक महत्व दिया कि समाज आत्मरक्षाहीन होता गया। दूसरी ओर इस्लाम और क्रिश्चियनिटी ने स्वयं को अंतिम सत्य मानकर विस्तारवादी रूप ग्रहण किया।
इतिहास इसका प्रमाण देता है। इस्लामी इतिहास में जिहाद और खिलाफत की अवधारणा के माध्यम से अरब से लेकर भारत तक विशाल सैन्य विस्तार हुआ। ईसाई इतिहास में क्रूसेड्स, इन्क्विजिशन और औपनिवेशिक मिशनरी गतिविधियों के अनेक उदाहरण मिलते हैं। इतिहासकार विल ड्यूरेंट ने The Story of Civilization में मध्यकालीन धार्मिक युद्धों को मानव इतिहास के सबसे रक्तरंजित अध्यायों में गिना है।
भारत में गोवा इन्क्विजिशन, जबरन मतांतरण और मंदिर-विध्वंस के प्रमाण उपलब्ध हैं। इसी प्रकार इस्लामी आक्रमणों के दौरान नालंदा, विक्रमशिला और हजारों मंदिरों के विनाश का उल्लेख तारीख-ए-फिरोजशाही और तबकात-ए-नासिरी जैसे स्रोतों में मिलता है।

बौद्ध मत का उदाहरण सामने है। प्राचीन गांधार, बामियान और अफगानिस्तान कभी बौद्ध संस्कृति के प्रमुख केंद्र थे। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने सातवीं शताब्दी में वहाँ हजारों भिक्षुओं और विशाल विहारों का वर्णन किया है। आज वहाँ बौद्ध संस्कृति का लगभग कोई अस्तित्व नहीं है। पूरा क्षेत्र इस्लामीकृत हो गया। यही स्थिति बंगाल और मध्य एशिया के कई क्षेत्रों में हुई।

इतिहास के अनेक स्रोतों का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट दिखाई देता है कि वैदिक परंपरा और बौद्ध मत के बीच केवल दार्शनिक मतभेद नहीं थे, बल्कि कई कालखंडों में राजनीतिक और सांस्कृतिक संघर्ष भी उपस्थित थे। बौद्ध मत ने स्वयं को वैदिक परंपरा से पृथक स्थापित करने का प्रयास किया। वेदों की अपौरुषेयता, यज्ञ परंपरा, वर्णव्यवस्था और वैदिक सामाजिक संरचना का विरोध करते हुए उसने एक अलग धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान निर्मित की। यही पृथकतावादी प्रवृत्ति आगे चलकर भारतीय सभ्यतागत एकता के लिए भी चुनौती बनी।
वीर विनायक दामोदर सावरकर ने स्वर्णिम पृष्ठ में लिखा है कि भारत के इतिहास में कई बार वैदिक सत्ता के विरोध ने विदेशी आक्रमणकारियों को अवसर दिया। सावरकर विशेष रूप से इस बात का उल्लेख करते हैं कि कुछ बौद्ध समूहों ने वैदिक शक्तियों के विरुद्ध यवनों और बाद में इस्लामी आक्रमणकारियों से सहयोग की अपेक्षा की।

पुष्यमित्र शुंग के संदर्भ में लंबे समय तक यह प्रचारित किया गया कि उन्होंने बौद्धों पर अत्याचार किए और बौद्ध मत को समाप्त करने का प्रयास किया। इसका आधार मुख्यतः बौद्ध ग्रंथ दिव्यावदान रहा। लेकिन आधुनिक इतिहासकारों जैसे हेमचंद्र रायचौधरी, आर. सी. मजूमदार और एटियेन लामोट ने इस कथन को अतिरंजित माना है। यदि पुष्यमित्र शुंग वास्तव में बौद्ध-विनाशक होते, तो उनके काल और उसके बाद साँची, भरहुत और अन्य बौद्ध स्तूपों का विस्तार और संरक्षण संभव नहीं होता। पुरातात्विक प्रमाण बताते हैं कि शुंग काल में कई बौद्ध स्मारकों का निर्माण और विस्तार हुआ। इससे स्पष्ट होता है कि पुष्यमित्र शुंग को पूर्णतः “बौद्ध-विरोधी” बताना ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं है।

इसके विपरीत यह ऐतिहासिक तथ्य है कि इस्लामी आक्रमणों के बाद भारत और मध्य एशिया के बौद्ध केंद्र लगभग पूर्णतः समाप्त हो गए। अफगानिस्तान, गांधार और बामियान क्षेत्र कभी बौद्ध संस्कृति के प्रमुख केंद्र थे। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने सातवीं शताब्दी में वहाँ हजारों भिक्षुओं और विशाल विहारों का वर्णन किया है। लेकिन इस्लामी आक्रमणों के बाद पूरा क्षेत्र क्रमशः इस्लामीकृत हो गया। बामियान की बुद्ध प्रतिमाएँ, जो लगभग डेढ़ हजार वर्षों तक खड़ी रहीं, 2001 में तालिबान द्वारा नष्ट कर दी गईं।

सिंध का उदाहरण भी इसी संदर्भ में उल्लेखनीय है। 711 ईस्वी में मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर आक्रमण किया। कुछ इतिहासकारों और सभ्यता-अध्येताओं ने उल्लेख किया है कि सिंध के भीतर बौद्ध और वैदिक शक्तियों में आंतरिक विभाजन था। चचनामा जैसे स्रोतों की कुछ व्याख्याओं में यह तर्क दिया गया कि राजा दाहिर के विरुद्ध कुछ बौद्ध समूहों ने अरब आक्रमणकारियों का विरोध नहीं किया, क्योंकि वे वैदिक राजसत्ता से असंतुष्ट थे। हालांकि इस विषय पर इतिहासकारों में मतभेद हैं, लेकिन इतना स्पष्ट है कि आंतरिक विभाजन ने अरब आक्रमण को आसान बनाया। विडंबना यह रही कि सिंध में इस्लामी सत्ता स्थापित होने के बाद वही बौद्ध समुदाय धीरे-धीरे समाप्त हो गया या इस्लामीकरण के अधीन चला गया।

जहाँ वैदिक धर्म की सांस्कृतिक पकड़ कमजोर हुई, वहाँ भारतीय सभ्यतागत प्रभाव भी धीरे-धीरे समाप्त होता गया। भारतीय इतिहास में यह प्रक्रिया अनेक चरणों में दिखाई देती है। प्राचीन भारत का सांस्कृतिक प्रभाव केवल वर्तमान भारत तक सीमित नहीं था, बल्कि गांधार, सिंध, तक्षशिला, बलूच क्षेत्र, नेपाल, तिब्बत, बर्मा और दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैला हुआ था। समय के साथ मजहबी आक्रमणों, मतांतरण, औपनिवेशिक हस्तक्षेप और पृथकतावादी राजनीति के कारण ये क्षेत्र क्रमशः भारतीय सांस्कृतिक धारा से अलग होते गए।
गांधार — वर्तमान अफगानिस्तान — कभी वैदिक और बाद में बौद्ध संस्कृति का प्रमुख केंद्र था। तक्षशिला और बामियान जैसे केंद्र भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े थे। 7वीं–10वीं शताब्दी के बीच इस्लामी आक्रमणों और क्रमिक इस्लामीकरण के कारण वहाँ की मूल हिंदू-बौद्ध पहचान समाप्त हो गई।

सिंध, जहाँ वैदिक सभ्यता की प्राचीन परंपरा थी, 711 ईस्वी में मुहम्मद बिन कासिम के आक्रमण के बाद धीरे-धीरे इस्लामी प्रभाव में चला गया। राजा दाहिर की पराजय के बाद सिंध का राजनीतिक और सांस्कृतिक स्वरूप बदलने लगा।

बलूच क्षेत्र भी प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक प्रभाव का भाग था, लेकिन अरब और बाद के इस्लामी शासन के प्रभाव में वह भारत की मुख्य सांस्कृतिक धारा से अलग होता गया।

तक्षशिला, जो वैदिक शिक्षा और दर्शन का महान केंद्र था, विदेशी आक्रमणों और इस्लामी विस्तार के बाद अपनी मूल पहचान खो बैठा।

कश्मीर, जहाँ कभी शैव दर्शन और संस्कृत विद्या का उत्कर्ष था, मध्यकालीन इस्लामी प्रभाव और बाद के राजनीतिक परिवर्तनों से गहरे रूप में प्रभावित हुआ।
बंगाल में पाल वंश (8वीं–12वीं शताब्दी) के दौरान बौद्ध मत का प्रभाव बढ़ा। 1204 ईस्वी में मुहम्मद बख्तियार खिलजी के आक्रमण के बाद नालंदा और विक्रमशिला नष्ट हुए। आगे चलकर बंगाल में इस्लामी प्रभाव बढ़ा और 1947 में मजहबी आधार पर उसका विभाजन हुआ। पूर्वी बंगाल पाकिस्तान बना, जो 1971 में बांग्लादेश बना।

पंजाब का विभाजन भी 1947 में मजहबी आधार पर हुआ। पश्चिमी पंजाब पाकिस्तान में चला गया, जिससे भारतीय सभ्यता का एक बड़ा ऐतिहासिक क्षेत्र अलग हो गया।

तिब्बत सदियों तक भारतीय बौद्ध और वैदिक सांस्कृतिक प्रभाव से जुड़ा रहा। संस्कृत, बौद्ध ग्रंथ और भारतीय आचार्य वहाँ के सांस्कृतिक जीवन का आधार थे। 20वीं शताब्दी में चीन के नियंत्रण के बाद तिब्बत की सांस्कृतिक स्वतंत्रता गंभीर रूप से प्रभावित हुई।
बर्मा (म्यांमार) ब्रिटिश शासन तक प्रशासनिक रूप से भारत का भाग था। 1937 में अंग्रेजों ने उसे भारत से अलग प्रशासनिक इकाई बना दिया।

श्रीलंका पर भी प्राचीन भारत का गहरा सांस्कृतिक प्रभाव था। रामायण परंपरा, बौद्ध धर्म और संस्कृत प्रभाव वहाँ लंबे समय तक रहे, लेकिन औपनिवेशिक और बाद की राजनीतिक प्रक्रियाओं ने उसे अलग राष्ट्रीय पहचान दी।

इंडोनेशिया, कंबोडिया, थाईलैंड और दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक क्षेत्रों में कभी रामायण, महाभारत, शिव, विष्णु और वैदिक संस्कृति का प्रभाव था। बाद में इस्लामी और यूरोपीय औपनिवेशिक प्रभावों के कारण वहाँ की सांस्कृतिक दिशा बदलती गई। इंडोनेशिया में मजहबी परिवर्तन के बाद हिंदू प्रभाव सीमित होकर बाली तक रह गया।

नेपाल लंबे समय तक विश्व का एकमात्र हिंदू राष्ट्र रहा, लेकिन आधुनिक राजनीतिक परिवर्तनों के बाद उसकी संवैधानिक पहचान बदल गई।
1947 का भारत-विभाजन भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा राजनीतिक और सांस्कृतिक विखंडन था, जिसमें पाकिस्तान बना। 1971 में पाकिस्तान का विभाजन होकर बांग्लादेश बना।

आधुनिक काल में खालिस्तान आंदोलन ने भी धार्मिक पहचान के आधार पर अलग राष्ट्र की मांग उठाई। 1980 के दशक में पंजाब आतंकवाद और पृथकतावादी हिंसा का केंद्र बना।

सनातनी हिंदू विचारकों का मत है कि जहाँ-जहाँ वैदिक सांस्कृतिक एकता, क्षात्रचेतना, दण्डनीति और सभ्यतागत आत्मबोध कमजोर हुआ, वहाँ-वहाँ भारतीय प्रभाव घटता गया और मजहबी तथा पृथकतावादी शक्तियाँ मजबूत होती गईं। इसके विपरीत जहाँ वैदिक परंपरा की जड़ें मजबूत रहीं, वहाँ हजार वर्षों के आक्रमणों, मतांतरणों और औपनिवेशिक शासन के बाद भी हिंदू सभ्यता जीवंत रही।

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