सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

विकास के हर कदम पर खड़े होते सवाल और उसके पीछे की सोच





✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

विकास विरोधी वामपंथी परजीवी मानसिकता को समझना हो तो बड़ी किताबें पढ़ने की ज़रूरत नहीं है, ऐसे ही छोटे-छोटे उदाहरण काफी हैं। हाल ही में रैमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित रवीश कुमार ने गंगा एक्सप्रेसवे के बाद कहा कि दूरी 11 घंटे से घटकर 6 घंटे हो जाएगी तो बाकी के 5 घंटे लोग क्या करेंगे।
अब सीधी बात है, यह सवाल जवाब के लिए नहीं पूछा गया, यह दिमाग में एक शंका डालने के लिए पूछा गया है। यही तरीका होता है सीधे यह नहीं कहेंगे कि सड़क गलत है, प्रोजेक्ट गलत है, बल्कि ऐसा सवाल छोड़ देंगे कि सुनने वाला खुद सोचने लगे कि हाँ, इसमें कुछ तो गड़बड़ होगी। धीरे-धीरे यही बात लोगों के मन में बैठती है।

यही काम होता है सीधे विरोध नहीं, पहले शक पैदा करो, फिर उसी शक को बढ़ाओ। और जब आदमी के दिमाग में एक बार संदेह बैठ गया, तो फिर उसे समझाना मुश्किल हो जाता है।

इसी बात से दिग्विजय सिंह का वह बयान याद आता है, जो उन्होंने अपने मुख्यमंत्री रहते हुए दिया था कि चुनाव विकास से नहीं, मैनेजमेंट से जीते जाते हैं। जब यह सोच आधार बनती है, तो उसका असर एक-दो घटनाओं में नहीं, बल्कि पूरी श्रृंखला में दिखता है। 

यमुना एक्सप्रेसवे के समय 2011 में भट्टा-पारसौल का आंदोलन खड़ा होता है और राहुल गांधी खुद वहाँ पहुँचकर विरोध करते हैं मामला सिर्फ जमीन का नहीं रहता, पूरा प्रोजेक्ट सवालों में आ जाता है। सरदार सरोवर बांध, जिसकी नींव 1961 में पड़ी, उसे 1985 के बाद मेधा पाटकर और नर्मदा बचाओ आंदोलन के जरिए इतना उलझाया गया कि 1993 में विश्व बैंक तक पीछे हट गया, जबकि उसी परियोजना से लाखों किसानों को पानी मिलना था। 2008 में सिंगूर में Tata Motors की नैनो फैक्ट्री करीब 1500 करोड़ का निवेश और हजारों रोजगार आंदोलन के कारण राज्य से बाहर चली जाती है। पश्चिम बंगाल में 1977 से 2011 तक वामपंथी शासन के दौरान उद्योग लगातार घटते गए, और कानपुर जैसे शहरों में 1980 के बाद सैकड़ों इकाइयाँ बंद होती चली गईं।

अब यही पूरा तरीका ग्रेट निकोबार परियोजना में साफ दिखाई देता है। नवंबर 2022 में इस परियोजना को पर्यावरणीय मंजूरी मिलती है, 2023 में कुछ वामपंथी विचारधारा से जुड़े संगठनों द्वारा भारत का सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएँ डाली जाती हैं जंगल, जैव-विविधता और शोंपेन जनजाति का मुद्दा उठाया जाता है लेकिन अदालत तुरंत रोक नहीं लगाती। इसके बाद 8 सितंबर 2025 को सोनिया गांधी The Hindu में लेख लिखती हैं और वही नैरेटिव आगे बढ़ाया जाता है। फिर 29 अप्रैल 2026 को राहुल गांधी खुद ग्रेट निकोबार पहुँचते हैं और वही मुद्दे दोहराते हैं। अब दूसरी तरफ इसका असली महत्व देखिए करीब 75 से 90 हजार करोड़ रुपये का यह प्रोजेक्ट मलक्का जलडमरूमध्य के पास भारत को ऐसी जगह खड़ा कर सकता है, जहाँ से दुनिया का लगभग 30 से 40 प्रतिशत समुद्री व्यापार गुजरता है। आज भी भारत अपने 70 से 75 प्रतिशत ट्रांसशिपमेंट के लिए सिंगापुर और कोलंबो जैसे विदेशी पोर्ट पर निर्भर है। अगर यह प्रोजेक्ट पूरा होता है, तो भारत खुद एक बड़ा लॉजिस्टिक हब बन सकता है —यानी जो काम आज दूसरे देश कर रहे हैं, वह भारत अपने यहाँ कर सकता है।

लेकिन यहाँ जो तरीका दिखता है, वही असली कहानी है सीधे यह नहीं कहा जाता कि प्रोजेक्ट नहीं बनना चाहिए, बल्कि उसे लगातार सवालों में घेरा जाता है। पहले पर्यावरण, फिर आदिवासी, फिर अदालत हर स्तर पर ऐसा माहौल बनाया जाता है कि काम की गति धीमी पड़े। यही वह परजीवी कार्यशैली है खुद कुछ खड़ा नहीं करना, लेकिन जो बन रहा है उसे इतना उलझा देना कि सालों निकल जाएँ। और जब हर बड़े प्रोजेक्ट के साथ यही क्रम दोहराया जाता है, तब यह संयोग नहीं लगता, बल्कि एक पैटर्न बनकर सामने आता है।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट… एक ऐसा प्रोजेक्ट, जो हिंद महासागर में भारत की स्थिति को बिल्कुल अलग स्तर पर ले जाने की क्षमता रखता है और यही वजह है कि इसे लेकर इतनी बेचैनी भी दिखाई दे रही है। राहुल गांधी और कांग्रेस जिस तरह इसका विरोध कर रहे हैं, वह अपने आप में सवाल खड़ा करता है।

जरा ठहरकर देखिए यह वही जगह है, जहाँ से दुनिया का बड़ा समुद्री व्यापार गुजरता है। अगर भारत यहाँ मजबूत होकर खड़ा हो जाता है, तो सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि रणनीतिक संतुलन भी बदल सकता है। चीन, जो लंबे समय से इस पूरे क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, उसके लिए यह सीधी चुनौती होगी।
अब यहीं सबसे बड़ा सवाल उठता है जब कोई काम भारत की ताकत बढ़ाने वाला हो, तब उसके खिलाफ इतनी सक्रियता क्यों दिखाई दे रही है? क्या यह सिर्फ पर्यावरण और स्थानीय मुद्दों की चिंता है, या इसके पीछे कोई और सोच भी काम कर रही है? जब हर बार ऐसे ही बड़े प्रोजेक्ट्स को घेरा जाता है, तो यह सवाल अपने आप खड़ा हो जाता है कि आखिर यह विरोध किस दिशा में जा रहा है और किसके हित में काम कर रहा है। देश सच में यही जानना चाहता है।

यही पूरा ढंग बार-बार अलग-अलग जगहों पर एक जैसा दिखाई देता है। यह विकास विरोधी वामपंथी परजीवी प्रवृत्ति सीधे आकर “फैक्ट्री मत लगाओ” नहीं कहती, बल्कि पहले माहौल बनाती है। कभी पर्यावरण का सवाल उठेगा, कभी मजदूरों के अधिकार की बात होगी, कभी जमीन को लेकर विवाद खड़ा होगा और धीरे-धीरे मामला इतना फैलाया जाता है कि नई फैक्ट्री शुरू होने से पहले ही संदेह में घिर जाती है। कई बार तो जो उद्योग वर्षों से चल रहे होते हैं, उन्हें भी लगातार दबाव, विरोध और आरोपों के जरिए इस स्थिति में ला दिया जाता है कि उनका चलना ही मुश्किल हो जाए।

पश्चिम बंगाल इसका लंबा उदाहरण रहा है—जहाँ एक समय उद्योगों की मजबूत पकड़ थी, वहीं धीरे-धीरे माहौल ऐसा बना कि निवेशक पीछे हटने लगे और इकाइयाँ बाहर जाने लगीं। कानपुर जैसे शहर, जो कभी उत्पादन के बड़े केंद्र माने जाते थे, वहाँ भी समय के साथ उद्योग कमजोर पड़ते गए। हाल के समय में नोएडा और आसपास के इलाकों में भी इसी तरह की कोशिशें दिखाई दीं अलग-अलग मुद्दों के जरिए औद्योगिक गतिविधियों को घेरने की कोशिश हुई, हालांकि कई जगह सरकार की सख्ती के कारण यह पूरी तरह सफल नहीं हो पाई।

तरीका हर बार लगभग एक जैसा रहता है सीधे टकराव से बचते हुए, परत-दर-परत सवाल खड़े करना, माहौल को अनिश्चित बनाना और फिर उसी अनिश्चितता के सहारे काम की गति को धीमा कर देना। बाहर से यह अलग-अलग घटनाएँ लगती हैं, लेकिन ध्यान से देखने पर एक ही क्रम बार-बार दोहराता हुआ दिखाई देता है।
और आखिर में बात वहीं जाकर टिकती है, जहाँ से इस पूरी सोच की असल जड़ दिखाई देती है। शुरुआत में रवीश कुमार का वह सवाल बाकी पाँच घंटे लोग क्या करेंगे” सिर्फ एक टिप्पणी नहीं था, वही इस पूरी मानसिकता की झलक थी। सीधा विरोध नहीं, लेकिन ऐसा संशय डाल देना कि आदमी खुद ही सोच में पड़ जाए। यही तरीका आगे चलकर बड़े स्तर पर दिखता है कभी बयान, कभी लेख, कभी आंदोलन, कभी याचिका रूप बदलते हैं, लेकिन दिशा वही रहती है।

इस सोच का मूल साफ है लोग इतने सक्षम न हो जाएँ कि अपने पैरों पर खड़े होकर सोचने लगें। उन्हें अभाव में रखो, अवसर सीमित रखो, मूलभूत सुविधाओं के लिए भी तरसने दो, ताकि वे मजबूरी में व्यवस्था को ही “माई-बाप” मानते रहें। जब आदमी संघर्ष में उलझा रहता है, तब वह सवाल नहीं करता, वह विकल्प नहीं खोजता, उसकी आकांक्षाएँ भी सीमित रह जाती हैं। यही वह स्थिति है, जो इस पूरी प्रवृत्ति को सबसे ज्यादा अनुकूल लगती है।

यहीं पर वामपंथी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की यथास्थितिवादी मानसिकता एक साथ दिखाई देती है। बड़े प्रोजेक्ट सड़क, उद्योग, बंदरगाह ये सब उस ढांचे को तोड़ते हैं, जहाँ आदमी निर्भर बना रहता है। इसलिए हर बार वही क्रम सामने आता है पहले पर्यावरण के नाम पर सवाल, फिर आदिवासी के नाम पर, फिर अदालत, फिर अंतरराष्ट्रीय मंच धीरे-धीरे काम को इतना उलझा दो कि उसकी रफ्तार ही टूट जाए। पश्चिम बंगाल से लेकर कानपुर तक उद्योगों का खिसकना, सिंगूर से नैनो का जाना, और आज नोएडा जैसे क्षेत्रों में भी ऐसी कोशिशें यह सब अलग-अलग घटनाएँ नहीं लगतीं, बल्कि एक ही धागे में जुड़ी दिखाई देती हैं।

और जब यही क्रम बार-बार दोहराया जाता है, तब यह समझना मुश्किल नहीं रहता कि यह सिर्फ विरोध नहीं है, बल्कि एक स्थायी तरीका है विकास को सीधे रोकना नहीं, बल्कि उसे इतना संदेह और विवाद में घेर देना कि वह अपने आप धीमा पड़ जाए। यही वह बिंदु है, जहाँ यह पूरी मानसिकता अपने असली रूप में सामने आती है।

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