सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

जब हिंदू समाज जागता है, तो परिणाम बदलते हैं


✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

हिन्दू समाज की जिस शक्ति की चर्चा मैं निरन्तर करता आया हूँ, वही शक्ति समय-समय पर स्वयं को प्रमाणित करती रही है, और आज पश्चिम बंगाल की परिस्थिति में वह पुनः स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। 29 अप्रैल 2026 को सम्पन्न हुए विधान सभा चुनावों का मतदान और उसके उपरान्त आये एग्जिट पोल केवल राजनीतिक संकेत नहीं हैं, बल्कि वे उस गहरी, अंतर्निहित और दीर्घकालिक सामाजिक चेतना का प्रकटीकरण हैं, जिसे वर्षों तक समझने के बजाय दिग्भ्रमित, कायर और असंगठित कहकर खारिज करने का प्रयास किया गया। यह समाज शोर नहीं करता, यह स्वयं का प्रचार नहीं करता, परन्तु जब यह निर्णय लेता है तो उसका प्रभाव सीधा इतिहास पर पड़ता है।

विभिन्न आकलनों, विशेषकर “टुडेज चाणक्य” एग्जिट पोल जिसे सामान्यतः सबसे अधिक प्रमाणिक माना जाता है और जिसने 2021 के पश्चिम बंगाल चुनाव में अपेक्षाकृत सटीक आकलन प्रस्तुत किया था में जो चित्र सामने आया है, वह साधारण नहीं है। भारतीय जनता पार्टी को लगभग 48 प्रतिशत मत तथा 192±11 या उससे अधिक सीटें मिलने का अनुमान व्यक्त किया गया है, जबकि अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस लगभग 38 प्रतिशत के आसपास दिखाई दे रही है। 294 सदस्यीय विधानसभा में यदि 4 मई 2026 को यही परिणाम वास्तविकता के रूप में सामने आता है, तो यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं होगा, बल्कि यह उस मौन सामाजिक क्रांति का उद्घोष होगा, जो वर्षों से भीतर ही भीतर परिपक्व हो रही

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि विभिन्न एग्जिट पोलों में यह संकेत दिया गया है कि दस में छह से सात, बल्कि कई स्थानों पर दस में सात हिन्दुओं ने भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में मतदान किया है। यह कोई साधारण घटना नहीं है। हिन्दू समाज कोई एकरेखीय, आदेश से चलने वाला समाज नहीं है। यह विविधताओं का महासागर है भाषा, परंपरा, पंथ, दर्शन, जीवनशैली सब कुछ भिन्न है। ऐसा समाज यदि एक दिशा में खड़ा होता है, तो यह किसी प्रचार या भावनात्मक उन्माद का परिणाम नहीं होता, बल्कि यह दीर्घकालिक अनुभव, सांस्कृतिक अस्मिता, अस्तित्वबोध और भविष्य की चिंता का संयुक्त परिणाम होता है।

यह सब उस पृष्ठभूमि में हुआ है जहाँ 2021 पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव के उपरांत व्यापक हिंसा हुई थी। अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस से जुड़े तत्वों द्वारा भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर भीषण हिंसा करवाई गई, लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े, सामाजिक और आर्थिक उत्पीड़न हुआ, और भय का वातावरण बनाया गया। सामान्यतः ऐसी परिस्थितियों में समाज टूट जाता है, बिखर जाता है, परन्तु हिन्दू समाज की प्रकृति भिन्न है यह तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं देता, यह प्रतीक्षा करता है।

2026 के चुनाव में जब चुनाव आयोग ने लगभग दो लाख चालीस हजार अर्धसैनिक बलों की तैनाती कर अपेक्षाकृत भयमुक्त वातावरण देने का प्रयास किया, तब वही समाज सामने आया। पश्चिम बंगाल में दोनों चरणों में 90 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ। यह केवल आँकड़ा नहीं है, यह उस दबे हुए समाज की आवाज़ है, जिसे पहली बार निर्भय होकर बोलने का अवसर मिला। यह इस बात का प्रमाण है कि समाज पहले भी था, परन्तु उसे अवसर नहीं मिला था।

अब यहाँ मूल प्रश्न उठता है कि यह समाज ऐसा क्यों है। इसका उत्तर भारतीय दृष्टि में निहित है। पाश्चात्य और आब्राहमिक विचारधाराएँ समाज को भेड़ों के झुंड की तरह देखती हैं उसे एक बाड़े में बंद करना, उसे एक जैसा बनाना, उसे राज्य द्वारा नियंत्रित करना। वहाँ मनुष्य भीड़ है, जिसे दिशा दी जाती है। परन्तु भारतीय दृष्टि में मनुष्य चेतना है, वह ब्रह्म का अंश है। यहाँ विविधता स्वाभाविक है, और यही विविधता इस समाज की शक्ति है, कमजोरी नहीं।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब हम अपनी इस मूल दृष्टि को छोड़कर बाहरी दृष्टि अपनाते हैं। तब हम भी समाज को बाँटने लगते हैं शोषक और शोषित, मोमिन और काफिर, विश्वासी और अविश्वासी। और जैसे ही हम ऐसा करते हैं, हम अपने ही समाज को समझने के बजाय उसे दोष देने लगते हैं। यही कारण है कि हिन्दू समाज को बार-बार गलत समझा गया।

इतिहास इसका साक्षी है कि पिछले लगभग दो हजार वर्षों में इस भूभाग के लगभग 25 टुकड़े हुए हैं। यह विखंडन केवल राजनीतिक कारणों से नहीं हुआ, बल्कि संप्रदाय, मजहब और रिलिजन आधारित विभाजन के कारण हुआ। संस्कृति, भाषा और परंपराएँ अनेक स्थानों पर समान थीं, परन्तु जैसे ही वह सूत्र टूटा जो सबको जोड़ता था, समाज भी टूटता चला गया। भारत का विभाजन इसका अंतिम और सबसे स्पष्ट उदाहरण है, जहाँ ‘हिन्दू और मुस्लिम साथ नहीं रह सकते’ जैसी अवधारणा के आधार पर देश का विभाजन हुआ। इस विचार को उन्नीसवीं शताब्दी में सैयद अहमद ख़ान के विचारों से भी बल मिला।

परन्तु यह भी उतना ही सत्य है कि भारत को यदि किसी एक सूत्र ने जोड़े रखा है, तो वह सनातन वैदिक धर्म है। यही भारत का राष्ट्रधर्म है, यही उसकी आत्मा है। महर्षि अरविन्द ने 1911 के उत्तरपाड़ा भाषण में स्पष्ट कहा था कि सनातन धर्म ही इस राष्ट्र की आत्मा है और भारत उसी पर आधारित है। यह कोई संकीर्ण धार्मिक अवधारणा नहीं, बल्कि एक व्यापक सांस्कृतिक और दार्शनिक जीवनदृष्टि है। जैसे ही यह सूत्र कमजोर होता है, विखंडन प्रारम्भ होता है; और जैसे ही यह चेतना जागृत होती है, समाज पुनः संगठित हो जाता है।
भारतीय दर्शन कहता है कि सृष्टि त्रिगुणात्मक है सत्त्व, रज और तम। समाज में भी तीन प्रकार के लोग होते हैं धर्मनिष्ठ, अधर्मनिष्ठ और प्रमादनिष्ठ। 100 प्रतिशत समाज कभी एक साथ सक्रिय नहीं होता, परन्तु जब समय आता है, तब धर्मनिष्ठ और जाग्रत समाज ही दिशा निर्धारित करता है और वही असंभव को संभव कर देता है।

इसी सत्य को दीनदयाल उपाध्याय ने राष्ट्र और राज्य के भेद के माध्यम से स्पष्ट किया। राज्य एक व्यवस्था है, जो समाज की विकृतियों को नियंत्रित करने के लिए होती है, परन्तु राष्ट्र एक जीवंत चेतना है, जिसका निर्माण हजारों वर्षों में होता है। संस्कृति उसकी भूमि है और उसी से धर्म रूपी चेतना का अक्षय वट उत्पन्न होता है। उस वटवृक्ष से अनगिनत शाखाएँ पंथ, संप्रदाय, दर्शन और परंपराएँ—उद्भूत होती हैं। जब यह चेतना जीवित रहती है, तब समाज असंभव को संभव कर देता है; और जब यह चेतना समाप्त होती है, तब वही समाज विखंडित हो जाता है।

आज पश्चिम बंगाल जो संदेश दे रहा है, वह केवल चुनावी परिणामों का संकेत नहीं है, बल्कि यह उस चेतना के पुनर्जागरण का संकेत है। यदि 4 मई 2026 को परिणाम एग्जिट पोलों के अनुरूप आते हैं, तो यह केवल एक राजनीतिक विजय नहीं होगी, बल्कि यह उस समाज के साहस, धैर्य और संकल्प का परिणाम होगा, जिसने भय में रहकर भी अपने भीतर की शक्ति को जीवित रखा।
अतः यह समझना आवश्यक है कि हिन्दू समाज न दिग्भ्रमित है, न कायर, न असंगठित। वह शांत है, परन्तु भीतर से जुड़ा हुआ है। वह प्रतीक्षा करता है, परन्तु अवसर आने पर निर्णायक हो जाता है। और जब वह निर्णय करता है, तब असंभव को संभव कर देता है। यही उसकी वास्तविक शक्ति है, और यही आज पश्चिम बंगाल ने पुनः सिद्ध कर दिया है।

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