सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

एनईपी 2020 के पीछे का वैचारिक खेल





✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

भारत की शिक्षा व्यवस्था अब केवल बच्चों को पढ़ाने और नौकरी के योग्य बनाने तक सीमित नहीं रह गई है। आज शिक्षा वह माध्यम बन चुकी है जिसके जरिए आने वाली पीढ़ियों की सोच, समाज की दिशा, परिवार की अवधारणा, संस्कृति की समझ और यहाँ तक कि भारत की सभ्यतागत पहचान तक को प्रभावित किया जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा के नाम पर जो बदलाव किए गए हैं, उन्हें केवल “सुधार” कहकर नहीं समझा जा सकता। यह एक बहुत बड़ा वैचारिक परिवर्तन है, जो धीरे-धीरे पूरे शिक्षा ढाँचे को बदल रहा है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020, सामाजिक-भावनात्मक शिक्षा (SEL), व्यापक यौन शिक्षा (CSE), DEI यानी Diversity, Equity and Inclusion, जेंडर संवेदनशीलता, समावेशन, वैश्विक नागरिकता, सामाजिक न्याय और संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (SDG 2030)  पहली नजर में ये सब अलग-अलग विषय लगते हैं, लेकिन जब इन्हें जोड़कर देखा जाता है तो एक स्पष्ट तस्वीर सामने आती है। ये सब एक ही वैश्विक वैचारिक ढाँचे के हिस्से हैं, जिसे धीरे-धीरे भारत की शिक्षा व्यवस्था में स्थापित किया जा रहा है।

आज बच्चों को केवल गणित, विज्ञान और भाषा नहीं पढ़ाई जा रही, बल्कि उन्हें यह भी सिखाया जा रहा है कि समाज को किस नजर से देखना है, धर्म को कैसे समझना है, परिवार की भूमिका क्या है, परंपरा का मूल्य क्या है और “सामाजिक न्याय” किसे कहा जाएगा। समस्या यहीं से शुरू होती है, क्योंकि इस पूरे ढाँचे की जड़ें भारतीय चिंतन में नहीं, बल्कि पश्चिमी रेडिकल-लेफ्ट विचारधारा में हैं।


सरकार और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ लगातार यह कहती रही हैं कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारत को उसकी जड़ों से जोड़ने वाली नीति है। कहा गया कि अब भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा के केंद्र में लाया जाएगा, बच्चों को अपनी संस्कृति से जोड़ा जाएगा और शिक्षा को “भारतीयता” के आधार पर खड़ा किया जाएगा। पहली नजर में यह सुनने में बहुत अच्छा लगता है। लंबे समय से लोग भी यही चाहते थे कि भारत की शिक्षा व्यवस्था मैकाले मॉडल से बाहर निकले और अपनी सभ्यता के आधार पर खड़ी हो।

लेकिन जब नीति के दस्तावेज़ों, उससे जुड़े कार्यक्रमों और लागू किए जा रहे ढाँचों को ध्यान से देखा जाता है, तब तस्वीर कुछ और दिखाई देती है। पूरी नीति के भीतर संयुक्त राष्ट्र के SDG 2030 एजेंडा की भाषा साफ दिखाई देती है। “समावेशन”, “इक्विटी”, “जेंडर समानता”, “वैश्विक नागरिकता”, “सस्टेनेबल डेवलपमेंट”, “21वीं सदी के कौशल”, “सामाजिक न्याय” और “विविधता” जैसे शब्द बार-बार सामने आते हैं। यही वही शब्दावली है जिसे संयुक्त राष्ट्र, यूनेस्को, विश्व बैंक और पश्चिमी नीति संस्थान वर्षों से पूरी दुनिया की शिक्षा व्यवस्था में स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं।

भारत में इसे इस तरह प्रस्तुत किया गया मानो भारतीय सभ्यता और आधुनिकता के बीच कोई संतुलन बनाया जा रहा हो। लेकिन वास्तविकता यह है कि भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया गया। कहीं गीता के कुछ श्लोक जोड़ दिए गए, कहीं योग का उल्लेख कर दिया गया, कहीं संस्कृत और प्राचीन भारत की चर्चा कर दी गई  और इसे “भारतीय ज्ञान प्रणाली” का नाम दे दिया गया।

जबकि भारतीय ज्ञान परंपरा इतनी सतही चीज नहीं है। वह केवल कुछ श्लोकों या सांस्कृतिक प्रतीकों तक सीमित नहीं है। भारतीय ज्ञान परंपरा का अर्थ है  जीवन को देखने की पूरी दृष्टि। वेद, उपनिषद, स्मृति, पुराण, दर्शन, योग, आयुर्वेद, ज्योतिष, लोक परंपराएँ, परिवार व्यवस्था, गुरु-शिष्य परंपरा, संस्कार, धर्म, कर्तव्य, आत्मबोध और मोक्ष तक की यात्रा  यह सब भारतीय शिक्षा का हिस्सा था।

भारत की पारंपरिक शिक्षा केवल रोजगार देने के लिए नहीं थी। उसका उद्देश्य मनुष्य को भीतर से विकसित करना था। यहाँ “विद्या” का अर्थ नौकरी नहीं, बल्कि मुक्ति का मार्ग माना गया। शिक्षा व्यक्ति को केवल कुशल नहीं बनाती थी, बल्कि उसे धर्म, आत्मसंयम, विवेक और जीवन के उद्देश्य से जोड़ती थी।

लेकिन नई शिक्षा व्यवस्था में इस मूल आत्मा की जगह धीरे-धीरे पश्चिमी वैचारिक ढाँचा स्थापित किया जा रहा है। शिक्षा का उद्देश्य अब “वैश्विक नागरिक” तैयार करना बताया जा रहा है। बच्चों को उनकी सभ्यतागत पहचान से अधिक “ग्लोबल वैल्यूज़” सिखाई जा रही हैं। “स्किल”, “इनोवेशन”, “इक्विटी”, “इन्क्लूजन” और “जेंडर अवेयरनेस” को केंद्र में रखा गया, जबकि धर्म, संस्कृति, परंपरा और आध्यात्मिक चेतना को धीरे-धीरे किनारे किया गया।

यही सबसे बड़ा प्रश्न है  क्या वास्तव में भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित किया जा रहा है, या उसके नाम पर शिक्षा व्यवस्था को वैश्विक वैचारिक एजेंडों के अनुसार ढाला जा रहा है?



आज “भारतीय ज्ञान प्रणाली” के नाम पर जो कुछ दिखाया जा रहा है, वह अधिकतर प्रतीकात्मक है। गीता के दो-चार श्लोक जोड़ देना, ऋग्वेद के कुछ सूक्त पढ़ा देना, योग दिवस मना लेना या संस्कृत के कुछ शब्द पाठ्यक्रम में डाल देना इससे भारतीय ज्ञान परंपरा का पुनर्जागरण नहीं होता। भारतीय ज्ञान परंपरा केवल धार्मिक उद्धरणों का संग्रह नहीं है, बल्कि जीवन को देखने की एक समग्र दृष्टि है।

यह परंपरा हजारों वर्षों की साधना, अनुभव और चिंतन से बनी है। इसमें श्रुति, स्मृति, वेद, उपनिषद, पुराण, दर्शन, रामायण, महाभारत, योग, आयुर्वेद, ज्योतिष, वास्तु, नाट्यशास्त्र, लोक परंपराएँ, कृषि आधारित अनुभवजन्य ज्ञान, परिवार व्यवस्था, कुल परंपरा, कुल देवता, संस्कार प्रणाली, आश्रम व्यवस्था, गुरु-शिष्य परंपरा, लोक भाषाएँ और बोलियाँ  सब कुछ सम्मिलित है। भारतीय ज्ञान केवल किताबों में सीमित नहीं था। वह जीवन के व्यवहार में था, परिवार में था, परंपराओं में था, लोक स्मृतियों में था, गाँवों के अनुभव में था, ऋषियों की साधना में था।

भारतीय शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी या आर्थिक उत्पादन नहीं था। यहाँ “विद्या” का अर्थ था  मनुष्य को भीतर से विकसित करना, उसे आत्मबोध की ओर ले जाना। शिक्षा केवल पेट भरने का साधन नहीं मानी जाती थी, बल्कि जीवन को समझने का मार्ग मानी जाती थी। इसीलिए भारतीय चिंतन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चार पुरुषार्थों का संतुलन महत्वपूर्ण माना गया। शिक्षा व्यक्ति के शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा चारों के विकास की बात करती थी।

लेकिन आज की शिक्षा व्यवस्था में यह दृष्टि लगभग गायब होती जा रही है। अब शिक्षा का केंद्र “स्किल”, “एम्प्लॉयबिलिटी”, “ग्लोबल कम्पटीशन” और “21वीं सदी की दक्षताएँ” बन गया है। बच्चों को “ह्यूमन रिसोर्स” की तरह तैयार किया जा रहा है, मानो शिक्षा का उद्देश्य केवल बाजार के लिए उपयोगी श्रमिक बनाना हो। चरित्र निर्माण, आत्मानुशासन, आध्यात्मिकता, धर्मबोध, परिवार की समझ और सभ्यतागत चेतना को धीरे-धीरे हाशिए पर डाल दिया गया है।

यहीं से असली वैचारिक परिवर्तन शुरू होता है। इस पूरी प्रक्रिया के केंद्र में पश्चिमी “सामाजिक न्याय” की अवधारणा खड़ी है। भारत में आज “सामाजिक न्याय” जिस रूप में पढ़ाया और प्रचारित किया जा रहा है, उसका मूल भारतीय दर्शन में नहीं है। भारतीय परंपरा में न्याय का आधार “धर्म” था। यहाँ समाज को आपस में लड़ने वाले समूहों में नहीं बाँटा गया। समाज को एक जीवित सांस्कृतिक इकाई माना गया, जहाँ कर्तव्य, संतुलन, समरसता और सामाजिक जिम्मेदारी को महत्व दिया जाता था।

भारतीय दृष्टि समाज को जोड़ने की बात करती थी, जबकि आधुनिक पश्चिमी “सामाजिक न्याय” की राजनीति समाज को पहचान आधारित संघर्षों में बाँटती है। यही कारण है कि आज शिक्षा के माध्यम से बच्चों को पहले उनकी जाति, जेंडर, पहचान और “उत्पीड़न” के नजरिए से सोचने की आदत डाली जा रही है। यह सोच भारतीय सभ्यता की मूल दृष्टि से बिल्कुल अलग है।


लेकिन आधुनिक “सामाजिक न्याय” की अवधारणा भारत की पारंपरिक सोच से नहीं निकली। इसकी जड़ें पूरी तरह पश्चिमी राजनीतिक और वैचारिक आंदोलनों में हैं। Karl Marx के वर्ग संघर्ष सिद्धांत ने समाज को दो हिस्सों  उत्पीड़क और उत्पीड़ित में बाँटकर देखने की सोच दी। बाद में John Rawls ने “समानता” को राज्य द्वारा संसाधनों के पुनर्वितरण से जोड़ दिया। Fabian Socialism ने धीरे-धीरे संस्थाओं के भीतर घुसकर समाज को वैचारिक रूप से बदलने की रणनीति दी। फ्रांसीसी क्रांति के Equality, Liberty, Fraternity के नारे ने पारंपरिक सामाजिक संरचनाओं को तोड़ने की दिशा दी। अमेरिका में Black Civil Rights आंदोलन और बाद में विकसित हुई Critical Race Theory (CRT) ने समाज को स्थायी पहचान-आधारित संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया।

इन्हीं सब विचारों का मिश्रण आज “आधुनिक सामाजिक न्याय” कहलाता है। यह विचार समाज को एक सांस्कृतिक परिवार नहीं मानता, बल्कि लगातार संघर्ष करने वाले समूहों का मैदान मानता है। यही सोच बाद में दुनिया भर के विश्वविद्यालयों, मीडिया संस्थानों, गैर-सरकारी संगठनों और वैश्विक नीति तंत्रों के माध्यम से फैलती गई।

भारत में इसका प्रवेश अंग्रेजों की औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था के जरिए हुआ। 1857 के बाद अंग्रेजों ने जानबूझकर ऐसी शिक्षा प्रणाली बनाई जिसका उद्देश्य भारतीयों को उनकी जड़ों से काटना था। मैकाले मॉडल की शिक्षा ने भारतीयों को अपनी परंपरा पर संदेह करना सिखाया और पश्चिमी राजनीतिक सोच को “आधुनिकता” के रूप में स्थापित किया। धीरे-धीरे अंग्रेजी शिक्षित अभिजात वर्ग तैयार हुआ, जिसने भारत को पश्चिमी चश्मे से देखना शुरू किया।

आज़ादी के बाद भी यह ढाँचा नहीं बदला। नेहरूवादी समाजवाद, Fabian Socialism से प्रभावित नीतियाँ, वामपंथी इतिहास लेखन, विश्वविद्यालयों में स्थापित लेफ्ट-लिबरल बौद्धिक तंत्र और बाद में मंडल राजनीति इन सबने मिलकर “सामाजिक न्याय” की इसी पश्चिमी अवधारणा को संस्थागत रूप दे दिया। विश्वविद्यालयों में दशकों तक इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीति और संस्कृति को उसी नजरिए से पढ़ाया गया जिसमें भारतीय सभ्यता को मुख्यतः दमनकारी संरचना के रूप में दिखाया गया।

आज भारत में जो “सामाजिक न्याय” सबसे अधिक प्रचारित किया जाता है, वह भारतीय दर्शन की नहीं बल्कि पश्चिमी अकादमिक विमर्श की देन है। यह समाज को जोड़ने की नहीं, बल्कि पहचान के आधार पर विभाजित करने की राजनीति पर खड़ा है। अमेरिका में यही सोच Critical Race Theory (CRT) के रूप में सामने आई थी, जहाँ हर सामाजिक समस्या को “श्वेत बनाम अश्वेत” संघर्ष के रूप में देखा गया। भारत में उसी मॉडल को “कास्ट रेस थ्योरी” के रूप में लागू किया गया।

अब भारत में समाज को “ब्राह्मणवादी उत्पीड़न” बनाम “वंचित समूह” के रूप में समझाने की कोशिश की जाती है। “ब्राह्मणवाद” शब्द को एक वैचारिक हथियार बना दिया गया, जिसके जरिए पूरे सनातन ढाँचे को कटघरे में खड़ा किया जाता है। शिक्षा संस्थानों, मीडिया, विश्वविद्यालयों, अंतरराष्ट्रीय फंडिंग वाले गैर-सरकारी संगठनों और सांस्कृतिक प्लेटफॉर्मों के माध्यम से लगातार यह नैरेटिव फैलाया गया कि हिंदू सभ्यता मूलतः पितृसत्तात्मक, स्त्री-विरोधी और विभेदकारी है।

धीरे-धीरे यह बात केवल अकादमिक चर्चा तक सीमित नहीं रही। अब बच्चों और युवाओं को “सामाजिक न्याय” के नाम पर यह सिखाया जा रहा है कि उन्हें “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” को समाप्त करना है। उन्हें यह बताया जा रहा है कि परंपरा, धर्म, परिवार और सांस्कृतिक संरचनाएँ ही सामाजिक अन्याय की जड़ हैं। यह केवल सामाजिक सुधार का प्रश्न नहीं है। यह एक वैचारिक संघर्ष है, जिसमें सनातन धर्म और भारतीय सभ्यता की मूल संरचना को ही समस्या के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

इसी वैचारिक ढाँचे का दूसरा रूप DEI यानी Diversity, Equity and Inclusion है। सुनने में ये शब्द बहुत अच्छे लगते हैं। हर व्यक्ति स्वाभाविक रूप से विविधता और समान अवसर की बात से सहमत होगा। लेकिन इनके पीछे जो राजनीति काम करती है, वह पहचान-आधारित पश्चिमी विचारधारा पर टिकी हुई है। इसमें व्यक्ति को उसके संस्कार, योग्यता, चरित्र और कर्म से नहीं, बल्कि उसकी जाति, जेंडर, लैंगिक पहचान और सामाजिक श्रेणी से परिभाषित किया जाता है।

इस सोच का परिणाम यह होता है कि समाज धीरे-धीरे स्थायी समूह संघर्षों में बदलने लगता है। व्यक्ति पहले भारतीय, मानव या परिवार का सदस्य नहीं रह जाता, बल्कि उसे किसी “पीड़ित” या “विशेषाधिकार प्राप्त” पहचान में बाँध दिया जाता है। यही कारण है कि आज शिक्षा व्यवस्था में योग्यता से अधिक पहचान की राजनीति को महत्व दिया जा रहा है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और उससे जुड़े अनेक कार्यक्रमों में यही विचारधारा अलग-अलग शब्दों में दिखाई देती है। “समावेशन”, “जेंडर समानता”, “समान अवसर”, “इक्विटी”, “वैश्विक नागरिकता”, “सस्टेनेबिलिटी”, “सामाजिक न्याय” ये सभी सीधे संयुक्त राष्ट्र के SDG 2030 एजेंडा से जुड़े हुए शब्द हैं। इन्हें केवल शिक्षा सुधार की भाषा समझना भूल होगी। यह पूरी एक वैचारिक शब्दावली है, जिसके माध्यम से नई पीढ़ी की सोच को वैश्विक राजनीतिक ढाँचे के अनुरूप ढालने का प्रयास किया जा रहा है।


भारत सरकार और अलग-अलग राज्य सरकारों ने पिछले कुछ वर्षों में इन वैश्विक लक्ष्यों को बहुत तेजी से शिक्षा व्यवस्था के भीतर लागू करना शुरू किया। यह काम केवल नई किताबें छापकर नहीं हुआ, बल्कि पूरे शैक्षणिक ढाँचे को धीरे-धीरे बदलकर किया गया। स्कूलों में “जेंडर क्लब”, “लाइफ स्किल्स प्रोग्राम”, “इक्विटी आधारित प्रशिक्षण”, “समावेशन गतिविधियाँ”, SEL और CSE जैसे कार्यक्रमों को शामिल किया गया। शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भी “जेंडर संवेदनशीलता”, “सामाजिक न्याय”, “इन्क्लूसिव एजुकेशन” और “विविधता” को अनिवार्य भाषा बना दिया गया।

अब शिक्षक केवल विषय पढ़ाने वाले व्यक्ति नहीं रह गए, बल्कि उन्हें एक वैचारिक ढाँचे का संवाहक बनाया जा रहा है। प्रशिक्षण के नाम पर उन्हें वही शब्दावली और सोच दी जा रही है जो संयुक्त राष्ट्र, यूनेस्को और पश्चिमी नीति संस्थानों के दस्तावेज़ों में दिखाई देती है। धीरे-धीरे यही भाषा स्कूलों के वातावरण, गतिविधियों और बच्चों की मानसिकता में उतारी जा रही है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि बहुत छोटी उम्र के बच्चों तक को जेंडर पहचान, यौन जागरूकता, नारीवाद, लैंगिक विविधता और “अपनी पहचान चुनने” जैसी अवधारणाओं से परिचित कराया जा रहा है। पाँच-पाँच वर्ष के बच्चों तक के लिए तैयार किए गए मॉड्यूलों में “बॉडी अवेयरनेस”, “जेंडर एक्सप्रेशन” और “इमोशनल सेफ्टी” जैसे शब्द डाले जा रहे हैं। पहली नजर में यह सब स्वास्थ्य और सुरक्षा के नाम पर सही लग सकता है, लेकिन इसके पीछे पश्चिमी रेडिकल जेंडर राजनीति का पूरा ढाँचा सक्रिय है।

व्यापक यौन शिक्षा यानी CSE को बच्चों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और जागरूकता का नाम देकर प्रस्तुत किया गया, लेकिन दुनिया भर में इसके पीछे वही संस्थाएँ सक्रिय रही हैं जो लंबे समय से पारंपरिक परिवार व्यवस्था, जैविक लैंगिक पहचान और धार्मिक नैतिकता को चुनौती देती रही हैं। यह शिक्षा केवल स्वास्थ्य संबंधी जानकारी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि धीरे-धीरे बच्चों की नैतिक और सांस्कृतिक समझ को भी बदलने लगती है।

इसी तरह सामाजिक-भावनात्मक शिक्षा यानी SEL को मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक संतुलन और व्यवहारिक विकास का माध्यम बताया गया। लेकिन व्यवहार में इसके जरिए बच्चों की सामाजिक समझ को नए सिरे से गढ़ा जा रहा है। उन्हें यह सिखाया जा रहा है कि हर पारंपरिक संरचना को “पावर स्ट्रक्चर” की नजर से देखो। परिवार को ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक”, धर्म को “रूढ़िवादी प्रभाव” और परंपराओं को “दमनकारी सामाजिक नियंत्रण” की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है।

धीरे-धीरे बच्चों के मन में अपनी ही सभ्यता, संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों के प्रति संदेह पैदा किया जा रहा है। जो बातें सदियों तक भारतीय समाज को जोड़कर रखती थीं, उन्हें अब “प्रगतिशीलता” के नाम पर पिछड़ेपन की तरह दिखाया जा रहा है। यही कारण है कि नई पीढ़ी का एक हिस्सा अपनी परंपराओं को समझने से पहले ही उनसे दूरी बनाने लगा है।

यह पूरा बदलाव अचानक नहीं आया। इसके पीछे वर्षों से चल रहा वैश्विक वैचारिक अभियान है, जिसमें शिक्षा को केवल ज्ञान देने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की मानसिक संरचना बदलने का उपकरण माना गया। आज भारत में वही प्रयोग शिक्षा सुधार और आधुनिकता के नाम पर लागू होते दिखाई दे रहे हैं।

सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिन वैचारिक पाठ्यक्रमों और सामाजिक प्रयोगों को पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था पर थोपा जा रहा है, उनसे अल्पसंख्यक संस्थानों को काफी हद तक छूट प्राप्त है। अनेक ईसाई और इस्लामी संस्थानों ने व्यापक यौन शिक्षा (CSE) और सामाजिक-भावनात्मक शिक्षा (SEL) जैसे कार्यक्रमों को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। कई कैथोलिक संस्थानों ने खुलकर कहा कि वे अपनी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध जाने वाले पाठ्यक्रमों को लागू नहीं करेंगे। इसी प्रकार कई मदरसों और इस्लामी शिक्षण संस्थानों ने भी इन विषयों को सीमित रखा या उनसे दूरी बनाए रखी।

लेकिन दूसरी ओर हिंदू संचालित विद्यालयों के पास ऐसी स्वतंत्रता लगभग नहीं है। उन पर सरकारी पाठ्यक्रम, सरकारी दिशा-निर्देश और वैचारिक रूप से प्रभावित प्रशिक्षण कार्यक्रमों को लागू करने का लगातार दबाव बनाया गया। परिणाम यह हुआ कि जिन समुदायों की परंपराएँ और सांस्कृतिक संरचनाएँ सबसे अधिक निशाने पर हैं, उन्हीं के बच्चों पर यह पूरी वैचारिक शिक्षा सबसे अधिक लागू की गई।

यहीं शिक्षा का अधिकार अधिनियम यानी RTE 2009 की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। सतह पर देखने पर यह कानून बच्चों को शिक्षा का अधिकार देने वाला प्रगतिशील कानून लगता है, लेकिन इसके भीतर कई ऐसे प्रावधान हैं जिन्होंने शिक्षा व्यवस्था में गंभीर असंतुलन पैदा किया। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि यह कानून वास्तव में “समान शिक्षा अधिकार” का कानून था, तो फिर धार्मिक अल्पसंख्यक संस्थानों को इससे छूट क्यों दी गई?

वास्तविकता यह है कि RTE के कठोर नियम मुख्यतः हिंदू संचालित निजी विद्यालयों पर लागू हुए। 25 प्रतिशत आरक्षण, बुनियादी ढाँचे के सख्त मानक, सरकारी पाठ्यक्रमों को अनिवार्य रूप से लागू करना, शिक्षक नियुक्ति संबंधी नियम और प्रशासनिक नियंत्रण  इन सबका बोझ सबसे अधिक उन्हीं स्कूलों पर पड़ा जो सामान्य हिंदू समाज चला रहा था।

इसके विपरीत अल्पसंख्यक संस्थानों को संवैधानिक संरक्षण के नाम पर काफी स्वतंत्रता मिल गई। वे अपने धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण के अनुसार शिक्षा देने में अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्र रहे। परिणाम यह हुआ कि शिक्षा व्यवस्था में दो अलग-अलग ढाँचे बन गए  एक ऐसा ढाँचा जिस पर सरकारी और वैचारिक नियंत्रण लगातार बढ़ता गया, और दूसरा ऐसा जिसे काफी हद तक स्वतंत्रता प्राप्त रही।

इसका सबसे अधिक नुकसान छोटे और मध्यम स्तर के निजी विद्यालयों को हुआ। देशभर में हजारों छोटे स्कूल, जो निम्न और मध्यम वर्ग के बच्चों को कम शुल्क में शिक्षा दे रहे थे, RTE के कठोर मानकों को पूरा नहीं कर पाए। कहीं भवन मानक, कहीं खेल मैदान, कहीं शिक्षक अनुपात, कहीं प्रशासनिक शर्तें  इन सबने छोटे विद्यालयों पर भारी आर्थिक बोझ डाल दिया। परिणामस्वरूप अनेक स्कूल बंद हो गए।

सबसे दुखद बात यह रही कि इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे वही थे जिनके पास महंगे निजी विद्यालयों में जाने की क्षमता नहीं थी। यानी शिक्षा सुधार के नाम पर सबसे अधिक नुकसान उसी वर्ग को हुआ जो सीमित संसाधनों के बावजूद अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देना चाहता था।

धीरे-धीरे यह स्थिति केवल प्रशासनिक समस्या नहीं रही, बल्कि वैचारिक असंतुलन का रूप लेने लगी। हिंदू संचालित विद्यालय सरकारी नियंत्रण, वैचारिक पाठ्यक्रमों और सामाजिक प्रयोगों के केंद्र बनते गए, जबकि अल्पसंख्यक संस्थान अपेक्षाकृत अपनी सांस्कृतिक पहचान बचाने में सफल रहे।

यहीं से यह प्रश्न और गंभीर हो जाता है कि क्या भारत की शिक्षा व्यवस्था वास्तव में समानता की दिशा में जा रही है, या फिर “समानता” के नाम पर एक विशेष समाज पर वैचारिक बोझ डाला जा रहा है?


सबसे बड़ा प्रश्न आज यही है कि भारत इतनी तेजी से संयुक्त राष्ट्र के SDG 2030 एजेंडा को क्यों लागू कर रहा है। आखिर ऐसी क्या जल्दबाज़ी है कि शिक्षा से लेकर सामाजिक नीतियों तक हर क्षेत्र को उसी भाषा और उसी ढाँचे में ढालने की कोशिश की जा रही है? दुनिया के कई देश संयुक्त राष्ट्र के लक्ष्यों को अपनी राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुसार सीमित रूप में अपनाते हैं। चीन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। उसने आर्थिक विकास और तकनीक को स्वीकार किया, लेकिन अपनी शिक्षा व्यवस्था, सांस्कृतिक ढाँचे और राष्ट्रीय पहचान पर बाहरी वैचारिक नियंत्रण को पूरी तरह हावी नहीं होने दिया। चीन ने राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक निरंतरता और राज्य हितों को प्राथमिकता दी। उसने वैश्विक एजेंडों को अपने ऊपर थोपने नहीं दिया, बल्कि उन्हें अपनी शर्तों पर सीमित रखा।

लेकिन भारत में स्थिति बिल्कुल अलग दिखाई देती है। यहाँ संयुक्त राष्ट्र, वैश्विक संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी नेटवर्कों की भाषा को लगभग बिना किसी गंभीर राष्ट्रीय बहस के स्वीकार कर लिया गया। केंद्र और राज्य सरकारों ने शिक्षा, प्रशासन, सामाजिक अभियानों और नीतियों को तेजी से SDG 2030 के अनुरूप ढालना शुरू कर दिया। “समावेशन”, “जेंडर समानता”, “वैश्विक नागरिकता”, “इक्विटी”, “सस्टेनेबिलिटी” और “सामाजिक न्याय” जैसे शब्द अब सरकारी दस्तावेज़ों, स्कूलों और विश्वविद्यालयों की स्थायी भाषा बन चुके हैं।

यह पूरा परिवर्तन “आधुनिकता” और “प्रगतिशीलता” के नाम पर किया गया, लेकिन इसके सांस्कृतिक और सभ्यतागत परिणामों पर देश में वैसी गंभीर चर्चा कभी नहीं हुई जैसी होनी चाहिए थी। यह प्रश्न शायद ही कभी पूछा गया कि क्या भारत की शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य केवल वैश्विक मानकों के अनुसार “मानव संसाधन” तैयार करना है, या फिर ऐसी पीढ़ी बनाना भी है जो अपनी सभ्यता, परंपरा और सांस्कृतिक चेतना से जुड़ी हो।

भारत को आधुनिक शिक्षा चाहिए, विज्ञान चाहिए, तकनीक चाहिए, शोध चाहिए, वैश्विक प्रतिस्पर्धा भी चाहिए — इसमें कोई विवाद नहीं है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब आधुनिकता के नाम पर अपनी ही सभ्यता को पिछड़ा, दमनकारी या अप्रासंगिक साबित किया जाने लगे। विकास का अर्थ अपनी जड़ों से कट जाना नहीं होता। यदि भारत अपनी आत्मा खो देगा, तो केवल तकनीकी प्रगति उसे सभ्यतागत रूप से जीवित नहीं रख पाएगी।

यदि वास्तव में भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित करना है, तो केवल प्रतीकात्मक बातें पर्याप्त नहीं होंगी। शिक्षा को फिर से भारतीय दृष्टि से देखने की आवश्यकता होगी। वैदिक शिक्षा प्रणाली और आधुनिक विज्ञान के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। बच्चों को केवल करियर, पैकेज और प्रतिस्पर्धा की भाषा नहीं सिखानी होगी, बल्कि जीवन का उद्देश्य भी समझाना होगा।

उन्हें यह बताना होगा कि शिक्षा केवल नौकरी पाने का साधन नहीं है। भारतीय परंपरा में शिक्षा आत्म-विकास का मार्ग थी। यहाँ विद्या का अर्थ था  मनुष्य को भीतर से मुक्त करना, उसे विवेक देना, उसे धर्म का बोध कराना, उसे जीवन के अंतिम उद्देश्य तक ले जाना। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष  इन चारों पुरुषार्थों के संतुलन के बिना भारतीय शिक्षा अधूरी मानी जाती थी।

भारत केवल एक आधुनिक राष्ट्र-राज्य नहीं है। यह हजारों वर्षों की सांस्कृतिक चेतना, आध्यात्मिक अनुभव और सभ्यतागत निरंतरता का परिणाम है। यहाँ की परंपराएँ केवल अतीत की स्मृतियाँ नहीं हैं, बल्कि समाज को जोड़कर रखने वाली जीवित शक्तियाँ हैं। यदि शिक्षा व्यवस्था बच्चों को अपनी ही जड़ों से काट देगी, तो आने वाली पीढ़ियाँ तकनीकी रूप से दक्ष तो होंगी, लेकिन मानसिक और सांस्कृतिक रूप से पश्चिमी वैचारिक उपनिवेश का हिस्सा बन जाएँगी।

आज भारत के सामने सबसे बड़ा संघर्ष सीमाओं का नहीं, बल्कि चेतना का है। प्रश्न यह नहीं है कि नई शिक्षा नीति में कितने विषय बदले गए। असली प्रश्न यह है कि आने वाली पीढ़ी को भारत की सभ्यता से जोड़ा जाएगा या उसे वैश्विक वैचारिक प्रयोगशाला का हिस्सा बना दिया जाएगा।

निर्णय केवल सरकारों को नहीं लेना है। यह समाज, परिवार, शिक्षकों और जागरूक नागरिकों के सामने भी उतना ही बड़ा प्रश्न है। क्योंकि जब शिक्षा बदलती है, तब केवल किताबें नहीं बदलतीं  आने वाली पीढ़ियों की सोच बदलती है, समाज की दिशा बदलती है और अंततः राष्ट्र का चरित्र बदल जाता है।

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