सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

नव बौद्ध और ब्राह्मण विरोध धम्मपद के श्लोकों से सच्चाई का विश्लेषण

न ब्राह्मणस्स पहरेय्य, नास्स मुञ्चेथ ब्राह्मणो
धी ब्राह्मणस्स हन्तारं, ततो धी यस्स मुञ्चति।

भगवान बुद्ध धर्मपद (धम्मपद) के 26वें अध्याय श्लोक संख्या 390 में यह बात कहते हैं। अर्थात ब्राह्मण पर प्रहार नहीं करना चाहिए, और ब्राह्मण को भी उस (प्रहार करने वाले) पर
कोप नहीं करना चाहिए। धिक्कार है ब्राह्मण की हत्या करने वाले पर, और उससे भी अधिक धिक्कार है उस पर जो ब्राह्मण पर क्रोध करता है। 

वह आगे श्लोक संख्या 423 में कहते हैं

यस्स गतिं न जानन्ति, देवा गन्धब्बमानुसा
खीणासवं अरहन्तं, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं।

अर्थात जिसकी गति देव, गंघर्व और मनुष्य नहीं
जानते और जो क्षीणाश्रव अरहंत है, उसे मैं
ब्राह्मण कहता हूँ।

अब नव बौद्धों की भाषा देखिए, ब्राह्मणों के प्रति उनकी घृणा देखिए।

वास्तव में ये बौद्ध नही क्रिप्टो ख्रीस्त हैं। जिनके सम्बन्ध जोशुआ प्रोजेक्ट से है।

1989 में अमेरिकन एवलेन्जिकल संस्थाओं ने प्रोजेक्ट 10/40 विंडो बनाया जिसके अंतर्गत 10 से 40 अक्षांश वाले देशों को ईसाई बनाना है।पहले इस विंडो के अंदर दक्षिण कोरिया और फिलीपींस भी शामिल थे, परन्तु इन देशों की जनसंख्या 70% से अधिक ईसाई हो जाने के बाद उन्हें इस खिड़की से बाहर रख दिया गया है ।

 भारत मे प्रोजेक्ट 2000 AD लांच किया गया जिसका उद्देश्य कमज़ोर तबके पर अलहदा पहचान, अलहदा-इतिहास’ और एक ‘अलहदा-धर्म’ थोपना है। इस प्रकार की संस्थाओं के गठजोड़ में केवल चर्च समूह ही नहीं, सरकारी संस्थाएं तथा संबंधित संगठन, व्यक्तिगत प्रबुद्ध मंडल और बुद्धिजीवी तक शामिल हैं ।

सतही तौर पर वे सब एक दूसरे से अलग और स्वतंत्र दिखते हैं, लेकिन पाया गया है कि असल में उनका तालमेल आपस में बहुत गहरा है और उनकी गतिविधियाँ अमरीका तथा यूरोप से नियंत्रित की जाती हैं और वहीं से उनको काफी वित्तीय सहायता भी प्राप्त होती है । उनके सिद्धांत, दस्तावेज़, संकल्प और रणनीतियां बहुत सुलझी हुयी हैं और दलितों/पिछड़ों की मदद करने की आड़ में इनका उद्देश्य भारत की एकता और अखंडता को तोड़ना है । 

भारत में “घोषित रूप से” ईसाईयों की आबादी लगभग छह करोड़ है, जबकि अघोषित रूप से छद्म नामों से रह रही ईसाई आबादी का अंदाजा लगाना बेहद मुश्किल है ।

 भारत में वामपंथी शक्तियां राजनैतिक रूप से शीत युद्ध के बाद कमजोर हो गई तो ये वामपंथी आज ‘सेक्युलरिज्म’, ‘दलित मुक्ति’, ‘मानवाधिकार’ , ओबीसी चिंतन , पर्यावरणविद , स्त्रीवाद के गिरोहों में शामिल हो गए । अब वामपंथी साहित्य ने दलित साहित्य , ओबीसी साहित्य , स्त्री विमर्श , पर्यावरणविद , आदि का स्थान ले लिया और ये दोगले अमेरिका संचालित एवलिजलिस्ट की गोद मे जा बैठे है ।

जेशुआ वेबसाइट के अनुसार वनवासियों को एफ्रो दलिट्स प्रोजेक्ट्स , एससी की जातियो को क्रिप्टो अम्बेडक्राइस्ट प्रोजेक्ट , ओबीसी की अपर कास्ट यादव , कुर्मी , पटेल, पंजाबी आदि को 10/40 प्रोजेक्ट्स में उन्होंने कन्वर्ट करना है । ईसाई मिशनरियों ने ब्रिटिश , और वामपंथी इतिहास को आगे बढाया । अब जो पुस्तके कभी काल्पनिक कही जाती थी उससे अप्रमाणिक रूप से इतिहास लिखा जा रहा , हर जाति का इतिहास लेखन यादव , कुर्मी , ब्राह्मण , जाट , राजपूत , पटेल , ओबीसी, नक्सली साहित्य ने दलित साहित्य का रुप ले लिया और आदिवासी साहित्य अभी लेखन में है । भारत का मानवशास्त्री संगठन और तमाम समाजशास्त्री उनके टूल हैं। प्रो के एस सिंह जो बड़े समाजशास्त्री माने जाते हैं, मिशनरियों के लिए पीपुल्स ऑफ इंडिया का प्रोजेक्ट बनाया। कांचा इलैय्या , स्वप्न विस्वास जैसे प्रोफेसर ईसाई है और बीफ पार्टी देना विश्विद्यालयो में या महिषासुर मण्डन इन्ही की देन है और ये छुपे हुए नही ये महाशय विदेशों में खुले आम क्रिस्चियन कांफ्रेसेस में हिस्सा लेते है , फंडिंग भी लेते है। महिषासुर को बहुजन नेता के रूप में भी इसी कांचा इलैय्या ने प्रचारित किया था और जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी दिल्ली में वर्ष 2011 से महिषासुर परिनिर्वाण दिवस मनाने की शुरुआत भी इन्होंने ही की।शुरुआत में उसे यादव नेता , फिर दलित नेता उसके बाद आदिवासी गोंड नेता , उसके बाद बहुजन नेता कहके प्रचारित किया गया ।क्षेत्र के अनुसार लोगों को मूर्ख बनाने के लिए कभी बंगाल का , कभी कर्नाटक का मूलनिवासी राजा , कभी तमिल नेता बताया गया। । इस पर एक “महिषासुर : एक मिथक का अब्राहमणीकरण” नामक पुस्तक लेखन पर दलित-ईसाई प्रोफेसर बीपी महेश चंद्र गुरु की गिरफ्तारी भी हुई थी , और ‘महीखासुर : एक जननायक” , प्रमोद रंजन और गेल ओम्वेट ने लिखी । गेल ओम्वेट जोशुआ प्रोजेक्ट का भारत मे सशक्त टूल रही है जो अकादमिक जगत में समाजशास्त्री मानी जाती रही।“महिषासुर : पुनर्पाठ की जरूरत” नामक पुस्तिका को प्रेम कुमार मणी , अश्विनी पंकज , दिलीप मंडल ने लिखी और आयवन कोस्का संचालित फॉरवोर्ड प्रेस और दिलीप मंडल संचालित नेशनल दस्तक पर प्रचारित किया गया । लखनऊ और देवरिया से निकलने वाली यादव शक्ति पत्रिका मिशनरियों द्वारा ही फंडेड और संचालित है।

जोशुआ प्रोजेक्ट पंजाब में पगड़ीधारी सिख तैयार कर रहा है जिसे बाजिन्दर सिंह लीड कर रहा। उत्तरप्रदेश में बहराइच, बस्ती, अवध , जौनपुर से लेकर पश्चिम में मेरठ इनके प्रभाव क्षेत्र में हैं। हरियाणा का जींद इनका केंद्र है। कर्नाटक तमिल उड़ीसा और केरल में ये बेरोकटोक काम कर रहे हैं।

आखिर में एक बात और यह जो नव बौद्ध का खेला चल रहा है वह केवल और केवल प्रच्छन ईसाइयत के अलावा और कुछ नही। इस जहर को फैलने से न रोका गया तो भारत का अस्तित्व मिट जाएगा। उनके पास अथाह पैसा है,ताकत है, हमारी फूट और मानवीय दुर्बलताएँ उनकी राह आसान करती हैं याद रखियेगा। आपके पास राम नाम है जो अमोघ है इसके सहारे आप उन्हें परास्त कर सकते हैं।

(मेरी आने वाली पुस्तक में भारत से बाहर संस्कृत के इतिहास और छद्म वाम नरेटिव को तोड़ कर सत्य की स्थापना के प्रमाण दिए जाएंगे।)

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