सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

राष्ट्रीय चेतना का उभार और बदलते सांस्कृतिक पाला



--कैलाश चन्द्र

देश का परिवेश—और उसके साथ दरवेश—इन दिनों अद्भुत रूपांतरण से गुजर रहा है। चारों ओर जो अनुभूति और अनुभाव दिखाई दे रहा है, वह किसी राजनीतिक घटना का परिणाम भर नहीं, बल्कि एक गहरे सांस्कृतिक जागरण की प्रतिध्वनि है। यह वही राष्ट्र है, जिसकी आत्मा हजार वर्षों के संघर्ष के बाद भी नहीं टूटी, जिसकी सांस्कृतिक स्मृति सदियों की धूल के बावजूद अक्षुण्ण रही। आज वही स्मृति पुनः जागृत होकर समाज के विविध वर्गों—कलाकारों, फिल्मकारों, लेखक-विचारकों, कवियों, पत्रकारों और प्रभावशाली जन-चेहरों—को राष्ट्रीय शक्तियों की ओर आकर्षित कर रही है।
यह कहना कि “ये लोग बदल गए” हल्का-सा आरोप है; सच्चाई यह है कि परिवेश बदलते ही चेतना की दिशा स्वाभाविक रूप से बदलती है। हजारों वर्षों से इस भूमि की आत्मा में प्रवाहित भारतीयता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की भावना जब प्रबल होती है, तो कलाकार से लेकर कवि तक—संवेदनशील हृदय सबसे पहले उसी दिशा में आकृष्ट होते हैं।

बदलता भारतीय परिवेश: एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण
आज देश का माहौल राष्ट्रीय विचारों से ओतप्रोत है। यह परिवर्तन किसी “सरकारी” प्रचार का परिणाम नहीं, बल्कि सामाजिक मन में उठ रहे लहरों का विस्तार है। जो लोग पहले हिंदुत्व से युक्त राष्ट्रीयत्व को एक तरह का राजनीतिक आग्रह मानते थे, वे अब स्वयं स्वीकार कर रहे हैं कि यह भारत के सांस्कृतिक जीवन-मूल्यों का सहज प्रस्फुटन है।
लंबे समय तक भगवा को गरियाने वाले “बेशर्म रंग” तक फिल्माने वाले समूहों ने देखा कि समाज की चेतना बदलते ही यह रंग और विचार राष्ट्रीय गर्व का प्रतीक बन गया। ऐसा नहीं कि कलाकारों या बुद्धिजीवियों ने दबाव में दिशा बदली है—बल्कि भारतीय समाज का मानस बदलने लगा और वही प्रवाह उन्हें अपने साथ बहा ले गया। आज भगवा किसी दल का नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना का रंग बनकर उभरा है।

फिल्म जगत: खिलता राष्ट्रीय दृष्टिकोण
कई दशक तक भारतीय फिल्मों में राष्ट्र, धर्म, इतिहास और भारतीय परंपरा को संकुचित रूप में प्रस्तुत किया गया। “विलेन” की छवि अक्सर हिंदू प्रतीकों से जोड़ दी जाती, और परंपराएँ पिछड़ेपन की निशानी बताई जातीं।
लेकिन अब परिदृश्य बदला है—
• फिल्मकार भारतीय इतिहास और सभ्यतागत वैभव की ओर लौटे हैं।
• नायक अब विदेशी मॉडल नहीं, भारतीय पुराण, वीर-पुरुष और सत्य-घटनाओं से प्रेरित हो रहे हैं।
• बड़े प्रोडक्शन हाउस यह समझ चुके हैं कि भारत का दर्शक अब अपनी जड़ों से जुड़े कथानक देखना चाहता है।
इस बदलाव के पीछे बाजार की मजबूरी नहीं, बल्कि समाज की चेतना में आया परिवर्तन है। जब देश स्वयं अपनी कहानी सुनना चाहता है, तो सिनेमा कैसे पीछे रह सकता है?

कलाकारों और पावर हाउस का झुकाव: सत्य की ओर
कलाकार, लेखक, गायक, नाटककार, या सोशल-मीडिया इन्फ्लुएंसर—ये सभी समाज के “सेंटिमेंट सेंसर” होते हैं। वे हवा की दिशा में नहीं चलते, बल्कि हवा की बदलती दिशा को सबसे पहले महसूस करते हैं।
आज वे खुलकर—
• भारतीय आध्यात्मिकता,
• परंपरागत मूल्यों,
• धर्म-संस्कृति,
• राष्ट्रभक्ति
की चर्चा कर रहे हैं।
यह सांस्कृतिक धारा इतनी शक्तिशाली है कि पहले की पीढ़ियों के वैचारिक बंधन स्वतः ढहते जा रहे हैं। कोई इसे “यू-टर्न” कहे या “पाला बदलना”—वास्तविकता यह है कि ये सभी भारतीय मूल्यों के स्वाभाविक केंद्र की ओर लौट रहे हैं।

लेखन और साहित्य: भारतीय मूल की पुनर्स्थापना
जो साहित्यिक मंडल लंबे समय तक भारतीयता के प्रतिपक्ष में खड़ा दिखता था, वहाँ भी परिवर्तन स्पष्ट है।
कई लेखक अब—
• हिंदू दार्शनिक परंपराओं,
• भारतीय इतिहास,
• महाकाव्य परंपरा,
• और सभ्यतागत विमर्श
पर केन्द्रित कृतियाँ लिख रहे हैं। साहित्य में अब संकोच नहीं, गर्व झलकता है। युवा साहित्यकार भारतीय भाषाओं में अपनी सांस्कृतिक पहचान खोज रहे हैं। जो स्वर पहले हाशिए पर थे, आज वही मुख्यधारा में दिखाई देते हैं।

पत्रकारिता: भारतीय दृष्टि का पुनरुत्थान
भारतीय मीडिया लंबे समय तक पश्चिम-केंद्रित नैरेटिव के बोझ तले रहा। राष्ट्रगत गौरव को ‘कट्टरता’ कहकर खारिज करने की प्रवृत्ति आम थी।
लेकिन अब—
• युवा पत्रकार तथ्यात्मक इतिहास को सामने ला रहे हैं,
• ग्राउन्ड रिपोर्टिंग में भारतीय समाज की वास्तविक छवि दिखने लगी है,
• संवाद और बहस में “भारत-केंद्रित दृष्टि” शामिल हुई है।
पत्रकारिता धीरे-धीरे उस दिशा में लौट रही है जहाँ से वह कॉलोनियल काल में विचलित हुई थी।

सांस्कृतिक पुनर्जागरण में संघ की भूमिका
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य केवल राजनीतिक विमर्श तक सीमित नहीं है। उसकी असली शक्ति सामाजिक संचेतना, सेवा, संघटन, और चरित्र-निर्माण में निहित है। दशकों से गाँव-गाँव, बस्ती-बस्ती चले कार्यक्रमों ने भारतीय समाज की गहरी परतों में राष्ट्रीय चेतना का बीज रोपा। आज जो सांस्कृतिक उभार दिख रहा है, वह इन्हीं प्रयासों का उद्भवित परिणाम है।
संघ ने किसी कलाकार या लेखक पर विचार थोपे नहीं—
बल्कि समाज में भारतीयता की लौ प्रज्वलित की।
कलाकारों और बुद्धिजीवियों ने केवल उसी प्रकाश को अनुभव किया।

 भारत लौट रहा है अपनी जड़ों की ओर
आज के सामाजिक बदलाव को किसी राजनीतिक जीत या हार से नहीं आँकना चाहिए। यह भारत के सांस्कृतिक पुनर्जन्म का समय है। समाज का मन जब बदलता है, तो कलाकार से लेकर पत्रकार तक—सभी उसी दिशा में चलते हैं। और आज दिशा स्पष्ट है— भारतीयता, हिंदुत्व से युक्त राष्ट्रीयत्व, और सांस्कृतिक स्वाभिमान। यह परिवर्तन किसी एक वर्ग का नहीं, पूरे राष्ट्र का है। और यही कारण है कि फिल्मकार, कलाकार, पावर हाउस, लेखक, कवि, पत्रकार— सब देश की बदलती चेतना के साथ कदम मिलाकर राष्ट्रीय शक्तियों के पाले में आ खड़े हुए हैं।

--कैलाश चन्द्र

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