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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
हिंदू कौन है यह प्रश्न आज केवल दार्शनिक जिज्ञासा भर नहीं रह गया है, बल्कि सांस्कृतिक अस्तित्व का प्रश्न बन गया है। जब तक ‘हिंदू’ शब्द का आधार शास्त्र, परंपरा और सनातन दर्शन पर टिका रहा, तब तक यह शब्द स्पष्ट, सुसंगत और आत्मविश्वासपूर्ण था; परंतु जब से इसे संख्या, भूगोल और राजनीतिक सुविधा के आधार पर परिभाषित करने का प्रयास हुआ, तब से इसमें भ्रम उत्पन्न होने लगा। आज समय की आवश्यकता है कि इस विषय पर पुनः शास्त्रीय स्पष्टता स्थापित की जाए।
भारतीय परंपरा में वेदों को अपौरुषेय माना गया है। वेद किसी मनुष्य की रचना नहीं हैं। ऋषियों को वेदों का कर्ता नहीं, अपितु ‘मंत्रद्रष्टा’ कहा गया है। उन्होंने सत्य का साक्षात्कार किया और जो श्रुति में सुना, उसी को व्यक्त किया। इसीलिए वेदों को ‘श्रुति’ कहा गया।
मुण्डकोपनिषद् में वेदों के दिव्य स्रोत का वर्णन करते हुए कहा गया
यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च
यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति।
यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि
तथाक्षरात्सम्भवतीह विश्वम्॥ (मुण्डकोपनिषद् १.१.७)
अर्थात् जैसे मकड़ी अपने से जाल उत्पन्न करती है, जैसे पृथ्वी से औषधियाँ उत्पन्न होती हैं, वैसे ही अक्षर ब्रह्म से यह समस्त विश्व प्रकट हुआ है। उसी परम सत्य से वेदों का प्राकट्य हुआ है।
मनुस्मृति में स्पष्ट कहा गया
वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्।
आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च॥ (मनुस्मृति २.६)
अर्थात् वेद समस्त धर्म का मूल हैं। स्मृति, सदाचार और आत्मतुष्टि—ये सब वेद से ही उत्पन्न हैं। इससे स्पष्ट है कि सनातन धर्म की जड़ वेदों में है।
महाभारत में भी धर्म के आधार को बताते हुए कहा गया।
वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।
एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद् धर्मस्य लक्षणम्॥
वेद धर्म का प्रथम आधार हैं। इसी कारण भारतीय दर्शन में आस्तिक और नास्तिक का भेद भी वेद-प्रामाण्य के आधार पर किया गया। जो वेदों को प्रमाण मानता है, वह आस्तिक है; जो वेदों को प्रमाण नहीं मानता, वह नास्तिक है।
सनातन धर्म का संपूर्ण ज्ञान वेदों में निहित है। वेदांत, मीमांसा, पूर्व मीमांसा, उत्तर मीमांसा, उपनिषद, पुराण—ये सब वेदों की ही व्याख्या हैं। वेदांत वेद का अंतिम निष्कर्ष है, उपनिषद वेद का दार्शनिक विस्तार हैं, पुराण सृष्टि का इतिहास और धर्म का व्यावहारिक रूप हैं। इसीलिए वेदों को अंतिम प्रमाण कहा गया है।
उपनिषदों में आत्मा और ब्रह्म की एकता का प्रतिपादन करते हुए कहा गया
अहं ब्रह्मास्मि
तत्त्वमसि
अयमात्मा ब्रह्म
ये महावाक्य स्पष्ट करते हैं कि आत्मा ही ब्रह्म है। यही सनातन दर्शन का मूल है।
भगवद्गीता में पुनर्जन्म का सिद्धांत स्पष्ट करते हुए कहा गया
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्
अन्यानि संयाति नवानि देही॥ (गीता २.२२)
यह पुनर्जन्म का सिद्धांत है। कर्म सिद्धांत भी गीता में स्पष्ट किया गया
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
इस प्रकार आत्मा, ब्रह्म, कर्म और पुनर्जन्म—ये सनातन धर्म के मूल तत्त्व हैं।
हिंदू वही है जो वेदों को प्रमाण मानता है, आत्मा और ब्रह्म की एकता को स्वीकार करता है, कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धांत को मानता है, वर्णाश्रम व्यवस्था को समझता है, सृष्टि के त्रिगुणात्मक स्वरूप—सत्त्व, रजस और तमसको जानता है और जीवन में संतुलन स्थापित करता है। जो प्रकृति को माता मानता है, उसकी रक्षा को अपना धर्म समझता है, कुल, वंश और परंपरा पर गर्व करता है
वही हिंदू है।
हिंदू किसी भूगोल का नाम नहीं है। वह संसार में कहीं भी रह सकता है। हिंदू उस सनातन सत्य की अभिव्यक्ति है जो परमब्रह्म से प्रकट हुआ है। वेद काल, देश और परिस्थिति से परे हैं। वे सृष्टि के आरंभ से लेकर आज तक सत्य के प्रमाण हैं।
आधुनिक समय में ‘हिंदू’ शब्द की व्यापक परिभाषाएँ प्रस्तुत की गईं, जैसे
आसिन्धोः सिन्धुपर्यन्ता यस्य भारतभूमिका।
पितृभूः पुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरिति स्मृतः॥
यह परिभाषा भूगोल पर आधारित है, जो शास्त्रीय दृष्टि से पर्याप्त नहीं है। इसी प्रकार
गोषु भक्तिर्भवेद्यस्य प्रणवे च दृढा मतिः।
पुनर्जन्मनि विश्वासः स वै हिन्दुरिति स्मृतः॥
यह परिभाषा भी अनेक परंपराओं पर लागू हो जाती है। इसलिए वेद-प्रामाण्य ही हिंदुत्व का मूल आधार है।
यह भी एक ऐतिहासिक सत्य है कि वेदों को प्रमाण न मानने वाले मत-पंथ और सम्प्रदाय समय-समय पर सनातन धर्म की मूल संरचना से दूर होते गए और अनेक बार वे सनातन संस्कृति के लिए चुनौती बने। इतिहास में अनेक आक्रमण हुए, अनेक विचार आए, परंतु सनातन धर्म वेदों के कारण ही स्थिर रहा।
संस्कृति भूमि है और धर्म उस भूमि में उगा हुआ वटवृक्ष है। उस वृक्ष की अनंत शाखाएँ हैं, परंतु जड़ वेद ही हैं। यदि जड़ से संबंध टूट जाए, तो शाखाएँ सूख जाती हैं। यही कारण है कि वेदों को अंतिम प्रमाण माना गया है।
संस्कृति अनुभवजन्य है। सभ्यता परिवर्तनशील है। संस्कृति नित्य है क्योंकि वह खोज है, किसी मानव की रचना नहीं। संस्कृति का सम्मान विकास का कारण है, और उसका निरादर पतन का कारण है।
संस्कृति रूपी भूमि में धर्म रूपी वृक्ष विकसित होता है। सम्प्रदाय उस वृक्ष की शाखाएँ हैं। धर्म सार्वभौम है, सम्प्रदाय व्यक्तिगत साधन हैं। धर्म-विज्ञान, अध्यात्म-विज्ञान और योग-विज्ञान ये सनातन परंपरा के तीन प्रमुख अंग हैं।
धर्म जीवन को संतुलित करता है, अध्यात्म मुक्ति देता है, योग शक्ति देता है। यही हिंदुत्व का स्वरूप है।
अतः स्पष्ट है कि हिंदू वही है जो वेदों को प्रमाण मानता है, आत्मा, ब्रह्म, कर्म और पुनर्जन्म को स्वीकार करता है, प्रकृति को माता मानता है, धर्म का पालन करता है, वर्णाश्रम व्यवस्था को समझता है, त्रिगुणात्मक सृष्टि को संतुलित करता है और सनातन संस्कृति पर गर्व करता है। जो वेदों को प्रमाण नहीं मानता, वह हिंदू नहीं है और न ही हिंदू संस्कृति का अंग है। यही शास्त्रीय और दार्शनिक स्पष्टता है, और आज इसी स्पष्टता की आवश्यकता है।
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