सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

एकरूपता का आग्रह और हिन्दू समाज की बहुरंगी वास्तविकता






✍️दीपक कुमार द्विवेदी

हिन्दू समाज के परम्परावादी और अतिशुद्धतावादी वर्ग की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह हिन्दू समाज को उसकी वास्तविक प्रकृति में नहीं, बल्कि अपने बनाए हुए एक साँचे में देखना चाहता है। यह अपेक्षा की जाती है कि देश-विदेश में रहने वाला प्रत्येक हिन्दू वैष्णव हो, शाकाहारी हो और शंकराचार्य को ही सर्वोच्च धर्मगुरु माने। यह दृष्टि मूलतः एकरूपता (uniformity) पर आधारित है, जबकि हिन्दू धर्म का स्वभाव एकरूपता नहीं, बल्कि बहुरूपता (plurality) है।

ऋग्वेद में स्पष्ट कहा गया है—
“एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” (ऋग्वेद 1.164.46)
अर्थात सत्य एक है, परन्तु ज्ञानी उसे अनेक प्रकार से कहते हैं। यही हिन्दू दर्शन का मूल है। यहाँ विविध मतों का अस्तित्व न केवल स्वीकार्य है, बल्कि स्वाभाविक माना गया है।

अब यदि हम यह कहें कि हर हिन्दू वैष्णव ही हो, तो यह स्वयं शास्त्रों के विरुद्ध है। शैव, शाक्त, स्मार्त, तांत्रिक—ये सभी परम्पराएँ प्राचीन काल से समान रूप से विद्यमान हैं। महाभारत और पुराणों में शिव, विष्णु, शक्ति—सभी की उपासना के प्रमाण मिलते हैं। कश्मीर से लेकर तमिलनाडु तक शैव परम्परा का व्यापक प्रभाव रहा है, वहीं पूर्वी भारत में शक्ति उपासना प्रमुख रही है।
आहार के विषय में भी शास्त्र एकरेखीय नहीं हैं।
मनुस्मृति (5.30) में यज्ञ आदि सन्दर्भों में मांसाहार का उल्लेख है, वहीं महाभारत (अनुशासन पर्व) में अहिंसा को श्रेष्ठ बताया गया है—
“अहिंसा परमो धर्मः”
अर्थात अहिंसा सर्वोच्च धर्म है। इसका अर्थ यह नहीं कि सभी कालों, सभी परिस्थितियों और सभी समुदायों के लिए एक ही आहार नियम अनिवार्य है। भौगोलिक, सामाजिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों के अनुसार आचार-विचार बदलते रहे हैं।
भारत जैसे विशाल देश में यह विविधता स्वाभाविक है। इसलिए लोक में कहा गया—
“कोस-कोस पर बदले वाणी, चार कोस पर पानी।”
जब भाषा और जल तक में परिवर्तन है, तो जीवन-पद्धति में एकरूपता कैसे संभव हो सकती है?
हिन्दू समाज को बिना समझे उस पर विचार थोपने की प्रवृत्ति भी एक बड़ी समस्या है। “हिन्दू एकता” को यदि किसी एक राजनीतिक विकल्प से जोड़ दिया जाए, तो यह न तो ऐतिहासिक रूप से सही है और न ही सामाजिक रूप से। हिन्दू समाज कभी भी एकरूपी राजनीतिक इकाई नहीं रहा। प्राचीन भारत में भी विभिन्न जनपद, गणराज्य और राजतंत्र साथ-साथ अस्तित्व में थे—मगध, कुरु, पंचाल, वज्जि—सभी की अपनी व्यवस्था थी।

यह अपेक्षा भी अव्यावहारिक है कि हिन्दू समाज किसी बाहरी विचारधारा के विरुद्ध एक साथ सड़कों पर उतर आए। समाज का स्वभाव ऐसा नहीं होता। भगवद्गीता (3.35) में कहा गया है—
“स्वधर्मे निधनं श्रेयः”
अर्थात अपने स्वभाव और कर्तव्य के अनुसार कर्म करना ही श्रेष्ठ है। हिन्दू समाज में संघर्ष भी इसी प्रकार होता है—कोई सैनिक बनकर, कोई विचारक बनकर, कोई शिक्षक या लेखक बनकर। पूरा समाज एक साथ युद्ध नहीं करता; ऐसा कोई ऐतिहासिक उदाहरण नहीं मिलता।
एक और प्रवृत्ति आज दिखाई देती है—असहमति रखने वालों को खारिज कर देना और उन्हें “विदेशी एजेंट” कह देना। यह दृष्टिकोण समाज को भीतर से कमजोर करता है। उदाहरण के लिए, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को समाज का एक बड़ा वर्ग अत्यंत सम्मान देता है। उनके प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग करने से संवाद नहीं बनता, बल्कि दूरी और विरोध बढ़ता है।

हिन्दू परम्परा की शक्ति बहिष्कार में नहीं, बल्कि समावेश में है। इतिहास इसका साक्षी है। जब बौद्ध धर्म का प्रभाव बढ़ा, तो उसे पूरी तरह नकारा नहीं गया, बल्कि आत्मसात किया गया। आदि शंकराचार्य द्वारा बुद्ध को विष्णु का अवतार स्वीकार करना इसी प्रक्रिया का उदाहरण है। इसी प्रकार अनेक स्थानीय देवताओं और परम्पराओं को समय के साथ व्यापक हिन्दू परम्परा में स्थान मिला।

यह भी एक तथ्य है कि समाज समय के साथ संतुलन स्थापित करता है। जो विचार अत्यधिक आग्रह या अतिवाद पर आधारित होते हैं, वे टिकते नहीं हैं। वे या तो परिवर्तित होते हैं या समाज स्वयं उन्हें पीछे छोड़ देता है। यह प्रक्रिया स्वाभाविक है, इसे किसी के द्वारा नियंत्रित नहीं किया जा सकता।

सनातन परम्परा का मूल स्वर ही संतुलन है—
सृष्टि त्रिगुणात्मक है—सत्त्व, रज, तम।
जीवन के तीन आयाम माने गए हैं—आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक।
इन तीनों के संतुलन से ही जीवन और समाज चलता है।
इसलिए सबको एक जैसा बनाने का आग्रह न तो शास्त्रसम्मत है, न ही व्यावहारिक। आवश्यकता इस बात की है कि हम विविधता को स्वीकार करें, उसे समझें और उसके भीतर संतुलन बनाए रखें।
अंत में वही बात जो शास्त्रों में बार-बार कही गई है—
“धर्मो रक्षति रक्षितः”
अर्थात जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।

लेकिन यहाँ धर्म की रक्षा का अर्थ किसी एक रूप, एक पंथ या एक जीवन-पद्धति को थोपना नहीं है, बल्कि इस व्यापक और संतुलित व्यवस्था को बनाए रखना है।

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