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क्या यह सचमुच जातिगत जनगणना है या केवल वर्गों की गिनती?

✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

भारत में जातिगत जनगणना को लेकर जो प्रक्रिया प्रारम्भ हुई है, उसे व्यापक रूप से जातिगत जनगणना कहा जा रहा है, किन्तु उपलब्ध प्रारूप, अधिसूचना और सामने आ रही जानकारी को देखें तो यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या यह वास्तव में जातिगत जनगणना है या वर्ग आधारित जनगणना। भारत सरकार द्वारा 16वीं जनगणना की अधिसूचना जारी की जा चुकी है। इसके अनुसार जनगणना दो चरणों में सम्पन्न होगी। पहला चरण 1 अप्रैल 2026 से प्रारम्भ होकर गृह सूचीकरण का होगा, जबकि दूसरा चरण फरवरी-मार्च 2027 में जनसंख्या गणना का होगा। यह जनगणना 2011 के बाद पहली जनगणना है क्योंकि 2021 की जनगणना कोविड-19 महामारी के कारण स्थगित हो गई थी।


पहले चरण में लगभग 30 से अधिक प्रश्न पूछे जा रहे हैं जिनमें घर का प्रकार, स्वामित्व, बिजली, पानी, शौचालय, इंटरनेट, परिवार संरचना, शिक्षा, रोजगार, संपत्ति, प्रवास स्थिति, आर्थिक सुविधाएँ आदि शामिल हैं। किन्तु मुख्य प्रश्न दूसरे चरण में सामाजिक पहचान से जुड़े होंगे। अभी तक जो संकेत सामने आए हैं, उनसे यह स्पष्ट होता है कि अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और सामान्य वर्ग (General) के आधार पर वर्गीकरण किया जाएगा।
यहीं से मूल प्रश्न खड़ा होता है कि यदि जाति, उपजाति, गोत्र, सामाजिक स्थिति और आर्थिक स्थिति नहीं पूछी जाएगी तो यह जातिगत जनगणना कैसे हुई। यह वस्तुतः वर्ग आधारित जनगणना अधिक प्रतीत होती है।


भारत की सामाजिक संरचना अत्यंत जटिल और बहुस्तरीय है। 1931 की जनगणना, जो भारत की अंतिम व्यापक जातिगत जनगणना मानी जाती है, में 4,147 जातियों का उल्लेख किया गया था। यह जनगणना ब्रिटिश भारत के जनगणना आयुक्त जे.एच. हट्टन के निर्देशन में सम्पन्न हुई थी। इसके बाद स्वतंत्र भारत में व्यापक जातिगत गणना नहीं की गई।


1979 में मोरारजी देसाई सरकार ने मंडल आयोग का गठन किया। आयोग के अध्यक्ष बी.पी. मंडल थे। मंडल आयोग ने 1931 के आंकड़ों के आधार पर 3,743 पिछड़ी जातियों की पहचान की और 1980 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। मंडल आयोग ने अनुमान लगाया कि भारत की लगभग 52 प्रतिशत जनसंख्या अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित है।



इसके बाद 2011 में सामाजिक-आर्थिक एवं जातिगत सर्वेक्षण (SECC-2011) कराया गया। जब इस सर्वेक्षण का डेटा सामने आया तो लगभग 46 लाख जाति-उपजाति प्रविष्टियाँ सामने आईं। 16 जुलाई 2015 को नीति आयोग के तत्कालीन उपाध्यक्ष डॉ. अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में विशेषज्ञ समिति गठित की गई ताकि इन 46 लाख प्रविष्टियों को व्यवस्थित किया जा सके। यह तथ्य स्पष्ट करता है कि भारत हजारों जातियों और लाखों उपजातियों का समाज है।



4,147 जातियों और 46 लाख उपजातियों को एक दूसरे के विरुद्ध खड़ा करना कठिन है। किन्तु जब इन्हें चार वर्गों एससी, एसटी, ओबीसी और सामान्य वर्ग में विभाजित कर दिया जाता है, तब इन्हें एक दूसरे के विरुद्ध खड़ा करना अत्यंत आसान हो जाता है। यही स्थिति वर्ग संघर्ष को जन्म दे सकती है।

जैसे ही आंकड़े सामने आएंगे, आरक्षण बढ़ाने की मांग उठेगी। "जितनी जिसकी आबादी उतनी उसकी हिस्सेदारी" की मांग उठेगी। इसके बाद संसाधनों के पुनर्वितरण यानी वेल्थ डिस्ट्रीब्यूशन की मांग उठेगी। यह स्थिति सामाजिक तनाव और संघर्ष को जन्म दे सकती है।

यदि वास्तव में जातिगत जनगणना करनी होती तो जाति और उपजाति की संख्या ज्ञात होती। किस उपजाति की संख्या कितनी है, कौन सी जाति आर्थिक रूप से पिछड़ी है, कौन सी सामाजिक रूप से पिछड़ी है इसका स्पष्ट डेटा सामने आता। इससे सरकारों के पास व्यापक सामाजिक डेटा उपलब्ध होता और उसी आधार पर नीतियाँ बनाई जा सकती थीं।

यह समस्या केवल सैद्धांतिक नहीं है। 2 अक्टूबर 2017 को केंद्र सरकार ने न्यायमूर्ति जी. रोहिणी आयोग का गठन किया। इस आयोग ने ओबीसी आरक्षण के असमान वितरण का अध्ययन किया। आयोग की अंतरिम रिपोर्ट में बताया गया कि ओबीसी वर्ग की लगभग 25 प्रतिशत जातियों को 97 प्रतिशत आरक्षण लाभ मिला जबकि 900 से अधिक जातियाँ लगभग वंचित रहीं। इससे स्पष्ट होता है कि वर्ग आधारित आरक्षण व्यवस्था में कुछ जातियाँ अधिक लाभ ले लेती हैं जबकि अनेक जातियाँ वंचित रह जाती है ।

यदि जातिगत जनगणना में जाति और उपजाति पूछी जाती तो यह स्पष्ट हो सकता था कि किस जाति को कितना लाभ मिला और कौन अब भी पिछड़ा है। किन्तु वर्ग आधारित जनगणना में यह संभव नहीं होगा ।


भारत की सामाजिक संरचना को समझने के लिए गोत्र परंपरा अत्यंत महत्वपूर्ण है। गोत्र शब्द संस्कृत के "गो" और "त्र" से बना है जिसका अर्थ वंश परंपरा से है। गोत्र का उल्लेख वैदिक साहित्य में मिलता है। ऋग्वेद, बृहदारण्यक उपनिषद, छांदोग्य उपनिषद, मनुस्मृति, महाभारत और विभिन्न पुराणों में गोत्र व्यवस्था का उल्लेख मिलता है।


वैदिक परंपरा में मूल ऋषि जिनसे गोत्र परंपरा विकसित हुई मानी जाती है —
अत्रि
भरद्वाज
गौतम
जमदग्नि
कश्यप
वशिष्ठ
विश्वामित्र
भृगु
अंगिरस
मारीचि
पुलस्त्य
पुलह
क्रतु

इन ऋषियों से अनेक गोत्र विकसित हुए।
उदाहरण के रूप में
कश्यप गोत्र — ब्राह्मण, राजपूत, जाट, वैश्य, निषाद सहित अनेक जातियों में मिलता है
भरद्वाज गोत्र — ब्राह्मण, जाट, गुर्जर, क्षत्रिय समुदायों में मिलता है

गौतम गोत्र — अनेक जातियों में मिलता है
वशिष्ठ गोत्र — विभिन्न जातियों में मिलता है
कौशिक (विश्वामित्र) गोत्र — अनेक समुदायों में मिलता है
लोक परंपराओं में भी यह स्पष्ट दिखाई देता है। हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मध्य भारत में जाट, गुर्जर, राजपूत और ब्राह्मणों में समान गोत्र पाए जाते हैं। विवाह में समान गोत्र निषिद्ध माना जाता है, भले ही जाति अलग हो। इससे स्पष्ट होता है कि गोत्र जाति से ऊपर की पहचान है।


इससे यह भी स्पष्ट होता है कि भारत की जातियाँ अलग-अलग नस्लें नहीं हैं बल्कि एक ही वैदिक परंपरा से विकसित समाज है और सभी किसी न किसी रूप में सप्त ऋषियों की परंपरा से जुड़े हुए हैं।

औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने भारतीय समाज को विभाजित करने की नीति अपनाई। 1871 में पहली औपनिवेशिक जनगणना हुई। 1901 की जनगणना में ब्रिटिश अधिकारी हर्बर्ट रिस्ले ने आर्य-द्रविड़ सिद्धांत प्रस्तुत किया। ईसाई मिशनरियों ने हिन्दू समाज को जाति आधारित विभाजित समाज के रूप में प्रस्तुत किया। भाषा, क्षेत्र, नस्ल और जाति के आधार पर समाज को विभाजित किया गया।



आज यदि वर्ग आधारित जनगणना होती है तो यह उसी औपनिवेशिक नीति का आधुनिक रूप बन सकती है।
यदि वास्तविक जातिगत जनगणना करनी है तो जाति, उपजाति, गोत्र, आर्थिक स्थिति और सामाजिक स्थिति का समग्र डेटा लिया जाना चाहिए। तभी यह स्पष्ट होगा कि कौन वास्तव में पिछड़ा है, किसे आरक्षण का लाभ मिला है और कौन अब भी वंचित है।

अन्यथा यह जातिगत जनगणना नहीं बल्कि वर्ग आधारित जनगणना बनकर रह जाएगी, जिससे सामाजिक संतुलन प्रभावित होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

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