सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

परिस्थिति कुछ भी हो : न कहने का साहस रखें





भारतीय संस्कृति इतनी विराट है कि उसमें जीवन की प्रत्येक समस्या का समाधान है । टी सी एस एवं लेंसकार्ट जैसी कंपनियों द्वारा जब किसी व्यक्ति पर उसके धर्म, संस्कृति और पहचान को लेकर दबाव डाला जाता है, तब दबाव में आकर मौन रह कर हम हमारी गौरवशाली परंपरा और अपने आत्मविश्वास को विस्मृति करने का प्रमाण देते है। हमारा मौन असमाजिक तत्वों के साहस को बढ़ावा देता है। ऐसे समय में पीड़ित व्यक्ति द्वारा साहस के साथ “न” कहना ही सच्चा प्रतिकार है। यह प्रतिकार विरोध नहीं अपने अस्तित्व, मूल्यों और आत्मसम्मान की रक्षा का माध्यम है। हमारे धर्म ग्रंथों में भी इसके प्रमाण मिलते है।
भगवद्गीता में जब अर्जुन युद्ध से पीछे हटना चाहते हैं, तब श्रीकृष्ण उन्हें कर्तव्य से “न भागने” का बोध कराते हैं:-
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप॥ (गीता 2.3)
तात्पर्य है , कि अपने में कायरता लाकर तुम्हें माता की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करना चाहिये। 'क्लैब्यं मा स्म गमः'-- अर्जुन कायरता के कारण युद्ध करने में अधर्म और युद्ध न करने में धर्म मान रहे थे। अतः अर्जुन को चेताने के लिये भगवान् कहते हैं, कि युद्ध न करना धर्म की बात नहीं है, यह तो नपुंसकता (हिजड़ापन) है। इसलिये तुम इस नपुंसकता को छोड़ दो।
'नैतत्त्वय्युपपद्यते'-- तुम्हारें में यह हिजड़ापन नहीं आना चाहिये था, क्योंकि तुम कुन्ती-जैसी वीर क्षत्राणी माता के पुत्र हो और स्वयं भी शूरवीर हो। साथ यह है कि जन्म से और अपनी प्रकृति से भी यह नपुंसकता तुम्हारे में सर्वथा अनुचित है। यहाँ अधर्म को स्वीकार कर मौन रहना कायरता है ।
इसके लिए सबसे पहले व्यक्ति को अपने आत्मविश्वास का जागरण करना होगा। जो स्वयं पर विश्वास करता है, वही दृढ़ता से अपने पक्ष में खड़ा हो सकता है। क्योंकि आत्मविश्वास और धर्म का गहरा संबंध है, जहाँ धर्म (आस्था) व्यक्ति में आंतरिक शक्ति, सकारात्मकता और उच्च उद्देश्य की भावना पैदा कर आत्मविश्वास को बढ़ाता है। धार्मिक अभ्यास जैसे प्रार्थना, ध्यान और समुदाय का हिस्सा होना, आत्म-संदेह को कम कर आत्म-विश्वास (self-esteem) विकसित करने में सहायक साधन के रूप में कार्य करता है। यह साहस अपने धर्म के प्रति निष्ठा और समझ से जागृत होता है। जब व्यक्ति अपने धर्म और संस्कृति के मूल सिद्धांतों को जानता और मानता है, तब वह बाहरी दबावों से विचलित नहीं होता।
हमारे पवित्र ग्रंथ रामायण में भी साक्ष्य मिलते है...... भगवान श्री राम ने अधर्म को अस्वीकार कर अन्याय और अधर्म के विरुद्ध रावण के साथ युद्ध को स्वीकार किया।अन्याय के साथ समझौता नहीं ,,,,,,यह भी “न” है।

परिवार के सदस्यों द्वारा अपनी बेटियों और बेटों से आत्म सम्मान का व्यवहार किया जाना चाहिए। उनसे अपेक्षाएं न करके , अच्छे कार्यों के संस्कार देना चाहिए।

बच्चों को परिवार से दूर रहकर यदि अध्ययन करना पड़ रहा है तब माता-पिता को उनके साथ उनके किराय के घरों पर रहकर उन्हें मानसिक संबल देना चाहिए।
अपने गौरवशाली इतिहास, परंपराओं और पहचान पर स्वस्थ अभिमान होना भी आवश्यक है। यह अभिमान अहंकार नहीं आत्मगौरव का हो, जो व्यक्ति को झुकने नहीं देता।
माता-पिता और परिवार के प्रति अटूट स्नेह भी इस साहस का एक महत्वपूर्ण आधार है। परिवार से मिले संस्कार, मूल्य और जीवनदृष्टि व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में सही निर्णय लेने की शक्ति देते हैं। जब व्यक्ति अपने परिवार और समाज की मर्यादाओं को समझता है, तब वह अपने कर्तव्य के प्रति सजग रहता है।
इसके अतिरिक्त, जीवन में केवल आर्थिक लाभ को ही सर्वोपरि न मानकर अपने संस्कारों और संस्कृति को प्राथमिकता देना भी अत्यंत आवश्यक है। जब व्यक्ति यह निर्णय लेता है , कि वह अपने मूल्यों के साथ कोई समझौता नहीं करेगा, तब उसके भीतर एक आंतरिक दृढ़ता विकसित होती है। हमारे पवित्र ग्रंथ कठोपनिषद् के अनुसार- यमराज ने नचिकेता को भोग-विलासी जीवन की सुविधा प्रदान की, तब नचिकेता ने कहा: श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत्सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः।
अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥
अर्थात् सांसारिक भोग क्षणभंगुर (अस्थाई) हैं और इंद्रियों की शक्ति को नष्ट कर देते हैं। सबसे लंबा जीवन भी छोटा ही है, इसलिए नचिकेता मात्र आत्मज्ञान चाहते हैं, कोई भौतिक सुख नहीं। यहाँ “न” कहना क्षणिक सुखों को ठुकराकर सत्य को चुनना है।
सोशल मीडिया पर हमें भागीदारी कम करना है। हम सोशल मीडिया पर अपने जन्मदिन, अपने परिजनों के जन्मदिन पर , अपने किसी विशेष अवसर पर जो पोस्ट डालते हैं उसे पर अनारकी लोग आप पर नजर रखना प्रारंभ कर देते हैं । भले हम गृहणी है ,हम घर के बाहर सामाजिक कार्य, खरीददारी, बीसी- किटी पार्टी या मंदिर जाने हेतु निकलते है , हमारा मिलना एक सीमित लोगों से ही होता है, किंतु यदि हम अपनी प्रत्येक घटना को सोशल मीडिया पर शेयर करते हैं तो इससे षड्यंत्रकारी लोग हमारी प्रत्येक पोस्ट पर नजर रखना प्रारंभ कर देते हैं। वह हमारी दिनचर्या , हमारे विशेष दिनों का कैलेंडर बनाकर रख लेते है। हमारी पोस्ट पर कमेंट देना प्रारंभ कर देते हैं।अनचाहे ही हमारा रुझान उस ओर बढ़ता है जो हमेशा हमारी पोस्ट को कॉमेंट्स करते है । हमें नहीं पता कि वह व्यक्ति हमसे मन से जुड़ा है या षड्यंत्र के लिए.....। धीरे-धीरे हम उनके काकस में फंस जाते हैं और उनके षड्यंत्र का शिकार हो जाते हैं।
जीवन में समस्याएं तो आती है, किंतु इनका समाधान पूरे परिवार को साथ लेकर किया जाए। जिससे परिवार के कमजोर सदस्य को ,बाहर के लोगों के द्वारा छल बल से फसाने का अवसर न मिले।
भारतीय संस्कृति में “न” कहना नकारात्मकता नहीं साहसिक कदम है जहाँ- अधर्म को अस्वीकार करने, सत्य पर अडिग रहने, लालच और भय से ऊपर उठने के लिए "न" शस्त्र को उठाना श्रेष्ठ धर्म है।
हमें दबाव के सामने मौन नहीं, साहसपूर्ण प्रतिकार करना आवश्यक है।
आत्मविश्वास से ही सही निर्णय लेने की शक्ति मिलती है।
धर्म और संस्कृति की समझ व्यक्ति को स्थिर बनाती है।
आत्मगौरव, व्यक्ति को गलत के सामने झुकने से बचाता है।
परिवार और संस्कार कठिन समय में मार्गदर्शक बनते हैं।
आर्थिक लाभ से अधिक अपने मूल्यों को महत्व देना चाहिए।
अंततः, जब व्यक्ति अपने आत्मसम्मान, संस्कार और संस्कृति के प्रति सजग रहता है, तब वह किसी भी प्रकार के दबाव का डटकर सामना कर सकता है और अपने जीवन को गरिमा और स्वाभिमान के साथ जी सकता है।

डॉ नुपूर निखिल देशकर    
      20/04/2026

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