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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
मध्यप्रदेश सरकार 24 वर्ष पुराने दो-संतान नियम को बदलने जा रही है। मुख्यमंत्री इसकी सैद्धांतिक मंजूरी दे चुके हैं। यह साधारण प्रशासनिक निर्णय नहीं है। यह उस मानसिकता को चुनौती देने वाला निर्णय है जो पिछले तीन दशकों में समाज के भीतर धीरे-धीरे बैठाई गई “छोटा परिवार ही आदर्श परिवार”।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत कई बार इस विषय पर स्पष्ट रूप से कह चुके हैं कि हिंदू समाज को कम से कम तीन बच्चे करने चाहिए। उनका तर्क केवल संख्या बढ़ाने का नहीं है, बल्कि जनसंख्या संतुलन और समाज की निरंतरता का है। उनका यह भी कहना रहा है कि जब समाज के सक्षम, शिक्षित और संस्कारित परिवार कम बच्चे करते हैं, तब समाज की गुणवत्ता और संतुलन दोनों प्रभावित होते हैं।
भारत की जनसंख्या संरचना पर नजर डालें तो चिंता के संकेत स्पष्ट दिखाई देते हैं। 1951 में हिंदू आबादी 84.1 प्रतिशत थी, जो 2011 में घटकर 79.8 प्रतिशत रह गई। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार हिंदुओं की प्रजनन दर 1.94 तक आ चुकी है, जो 2.1 की प्रतिस्थापन दर से नीचे है। प्रतिस्थापन दर का अर्थ है जितनी जनसंख्या है, उसे बनाए रखने के लिए आवश्यक न्यूनतम जन्म-दर। जब यह इससे नीचे जाती है तो धीरे-धीरे समाज की संख्या घटने लगती है।
इसके विपरीत कुछ अन्य समुदायों की जन्म-दर अभी भी अधिक है, भले ही अंतर पहले की तुलना में कम हुआ हो। लेकिन जनसंख्या परिवर्तन दशकों में प्रभाव दिखाता है। 20-30 वर्षों तक भी यदि जन्म-दर में अंतर बना रहता है, तो जनसंख्या संतुलन बदलना स्वाभाविक है।
1951 की जनगणना में हिंदू 84.1 प्रतिशत थे। 2011 में यह घटकर 79.8 प्रतिशत रह गए। लगभग 4.3 प्रतिशत की गिरावट। यह कोई छोटा परिवर्तन नहीं है। जनसंख्या विज्ञान में 3-4 प्रतिशत का बदलाव भी दीर्घकाल में बहुत बड़ा प्रभाव डालता है।
इसके विपरीत मुस्लिम आबादी 1951 में 9.8 प्रतिशत थी जो 2011 में 14.2 प्रतिशत हो गई। यह वृद्धि भी अचानक नहीं हुई, बल्कि धीरे-धीरे हुई। इसके विपरीत कुछ अन्य समुदायों की जन्म-दर अभी भी अधिक है, भले ही अंतर पहले की तुलना में कम हुआ हो। लेकिन जनसंख्या परिवर्तन दशकों में प्रभाव दिखाता है।
लेकिन वास्तविकता केवल इतनी नहीं है। 79 प्रतिशत का जो आंकड़ा बताया जाता है, उसमें भी वास्तविक हिंदू समाज की तस्वीर पूरी नहीं दिखती। पूर्वोत्तर राज्यों में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जिन्हें जनगणना में हिंदू के रूप में दर्ज किया गया, लेकिन वे स्वयं को ईसाई पहचान से जोड़ चुके हैं। इसी तरह देश के कई हिस्सों में ऐसे समुदाय भी हैं जिन्हें सामाजिक रूप से क्रिस्टो-क्रिश्चियन” कहा जाता है नाम हिंदू, परंपरा हिंदू, लेकिन मजहबी पहचान और सामाजिक व्यवहार ईसाई या अन्य मज़हब और रिलिजन से प्रभावित। इस स्थिति में 79 प्रतिशत का आंकड़ा वास्तविक सामाजिक शक्ति को पूरी तरह नहीं दर्शाता। कई विश्लेषक मानते हैं कि प्रभावी रूप से हिंदू समाज का अनुपात 60-65 प्रतिशत के आसपास ही माना जाना चाहिए, खासकर तब जब क्षेत्रीय वितरण को भी ध्यान में रखा जाए।
नागालैंड का उदाहरण सामने है। 1901 में नागालैंड में ईसाई आबादी बहुत कम थी। आज 90 प्रतिशत से अधिक है। मिजोरम में 87 प्रतिशत से अधिक। मेघालय में 70 प्रतिशत से अधिक। यह परिवर्तन केवल जन्म-दर से नहीं हुआ। यह संगठित मिशनरी गतिविधियों से हुआ।
यह भी समझना होगा कि सनातन परंपरा में धर्म जीवन-पद्धति है, लेकिन क्रिश्चियनिटी एक रिलिजन है संगठित, संस्थागत और विस्तारवादी संरचना वाला। इस्लाम मज़हब है और मज़हबी विस्तार को मजहबी कर्तव्य माना जाता है। इसलिए इन दोनों का विस्तार योजनाबद्ध तरीके से होता है।
असम में जनसंख्या परिवर्तन का उदाहरण भी सामने है। 1951 में असम के कई जिलों में हिंदू स्पष्ट बहुमत में थे। 2011 तक कई जिलों में जनसंख्या संतुलन बदल गया। धुबरी, बारपेटा, करीमगंज जैसे जिलों में पिछले दशकों में बड़ा परिवर्तन दर्ज हुआ।
पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में भी यही स्थिति है। मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में पिछले 40 वर्षों में जनसंख्या संरचना बदली है। यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ, बल्कि धीरे-धीरे हुआ।
केरल का उदाहरण और स्पष्ट है। 1951 में केरल में हिंदू लगभग 68 प्रतिशत थे। 2011 तक यह घटकर लगभग 54 प्रतिशत रह गए। यह गिरावट केवल जन्म-दर से नहीं, बल्कि धर्मांतरण और अलग-अलग समुदायों की भिन्न जन्म-दर के कारण हुई।
इतिहास इससे भी अधिक स्पष्ट है। अफगानिस्तान कभी गांधार था। वैदिक संस्कृति का केंद्र था। आज वहां हिंदू नाम मात्र को नहीं हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश कभी भारत का हिस्सा थे।
1947 में बांग्लादेश (पूर्वी पाकिस्तान) में हिंदू लगभग 22 प्रतिशत थे। आज 8 प्रतिशत के आसपास रह गए हैं। पाकिस्तान में 12-15 प्रतिशत से घटकर लगभग 2 प्रतिशत रह गए।
इतिहास की यह पंक्ति बार-बार सामने आती है — जहां सनातन वैदिक धर्म के अनुयायी घटे, वहां हिंदू समाप्त हुए, और भूगोल बदला।
भारत के भीतर कश्मीर इसका उदाहरण है। 1989-90 से पहले कश्मीरी हिंदुओं की उपस्थिति घाटी में थी। लेकिन संख्या कम हुई, परिस्थितियां बदलीं, और एक पूरी सभ्यता को पलायन करना पड़ा।
आज भारत में एक और प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है परिवार व्यवस्था को तोड़ने की।
नारीवाद के नाम पर विवाह को पिछड़ी व्यवस्था बताया जा रहा है। मातृत्व को बोझ कहा जा रहा है। परिवार को “ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक संरचना” कहा जा रहा है।
कुछ अल्ट्रा-लेफ्ट विचारधाराएं खुलकर कहती हैं कि परिवार सामाजिक नियंत्रण का साधन है और इसे कमजोर होना चाहिए।
दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, पुणे जैसे शहरों में “चाइल्ड-फ्री मैरिज” की प्रवृत्ति बढ़ रही है। कई शिक्षित दंपत्ति एक भी बच्चा नहीं चाहते। यह प्रवृत्ति 1990 के दशक में भारत में लगभग न के बराबर थी, लेकिन आज यह शहरी वर्ग में तेजी से बढ़ रही है।
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार शहरी शिक्षित परिवारों में बच्चों की औसत संख्या 1.6 से 1.8 के बीच है।
यह स्थिति विशेष रूप से हिंदू शिक्षित वर्ग में अधिक दिखाई देती है।
यही वर्ग प्रशासन में जाता है, शिक्षा में जाता है, उद्योग में जाता है, मीडिया में जाता है। यदि यही वर्ग संख्या में घटेगा, तो समाज का नेतृत्व भी बदलेगा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत कई बार कह चुके हैं कि हिंदू समाज को तीन बच्चे करने चाहिए। उनका तर्क स्पष्ट है — समाज की निरंतरता और संतुलन बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि समाज के सक्षम वर्ग बच्चे कम करेंगे तो आने वाले समय में समाज की गुणवत्ता भी प्रभावित होगी।
1970-80 के दशक में चार-पांच बच्चों वाले परिवार सामान्य थे। उसी पीढ़ी ने देश को प्रशासनिक अधिकारी, वैज्ञानिक, सैनिक और उद्यमी दिए।
आज वही समाज एक या दो बच्चों तक सीमित हो गया है।
भारत का इतिहास कहता है — हिंदू घटा तो देश बंटा।
सनातन वैदिक धर्म के अनुयायी जहां घटे, वहां हिंदू साफ हो गया।
भारत का आधार केवल भूगोल नहीं है। भारत की चित्ति उसकी आत्मा सनातन वैदिक परंपरा में निहित है।
यदि यह आधार कमजोर हुआ तो भारत उसी रूप में नहीं रहेगा जैसा आज है।
मध्यप्रदेश सरकार का यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस मानसिकता को तोड़ सकता है जो पिछले तीन दशकों में बनी है।
अब आवश्यकता केवल नीति बदलने की नहीं, समाज की सोच बदलने की है।
हर सक्षम हिंदू तीन बच्चे करे।
हर समर्थ हिंदू चार बच्चे करे।
यह केवल परिवार का निर्णय नहीं होगा यह आने वाले भारत की दिशा तय करेगा।
संख्या ही सब कुछ नहीं होती, लेकिन संख्या के बिना सभ्यता भी नहीं टिकती।
और इतिहास बार-बार यही कहता है जो समाज अपनी अगली पीढ़ी को सीमित करता है, वह धीरे-धीरे इतिहास में सीमित हो जाता है।
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