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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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।।ॐ।।
*
-डॉ. नितिन सहारिया ,महाकौशल
" आज का विज्ञान अध्यात्म के बिना एकांगी तथा अपूर्ण है। सद्रविचारों एवं सद्भावनाओं को विकसित करने का माध्यम अध्यात्म है। इसके बिना विज्ञान निरंकुश हो चला है। उसे मनमानी करने एवं बरतने की खुली छूट मिल गई है। अपने इन दोषों को दूर करने के लिए विज्ञान को अध्यात्म से मिलने के लिए अपने कदम आगे बढ़ाने होंगे।"
(- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य , लेख- विज्ञान को अध्यात्म के साथ मिलना होगा, अखंड ज्योति, जनवरी 1983 ,पृष्ठ -18 )
अखिल विश्व गायत्री परिवार के प्रमुख डॉ. प्रणव पंडया अपने ग्रंथ- "क्रांति की करवट" में पृष्ठ 108 पर लेख - "होगा मिलन विज्ञान और अध्यात्म का" में लिखते हैं कि -
"अध्यात्म से मिलने के लिए बढ़ते विज्ञान ने अब अपनी सीमाएं जान ली हैं। यह बात डेविड स्टीवेन ने गंभीरता पूर्वक कहीं। वह इस समय अपनी पत्नी लीजा के साथ घर के लान में बैठे हुए थे। उनका घर काफी बड़ा था। उनके घर के बड़े होने का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके घर के सत्तरह कमरों में उनका पुस्तकालय था। घर के लगभग इतने ही हिस्से में प्रयोगशाला थी। शेष हिस्सा स्वयं के और मेहमानों के रहने के लिए सुरक्षित था। नौकरों और कर्मचारियों का निवास घर के पीछे की ओर था। काफी हिस्सा खुला था, जिसमें घास का मैदान ,फलदार पेड़ों एवं फूल वाले पौधों से सुसज्जित बगीचा था। बगीचे के पास ही सुंदर सरोवर था, जिसमें जल पक्षी विहार करते थे।
उनके इस निवास में प्राकृतिक सौंदर्य ,वैज्ञानिक अनुसंधान एवं आध्यात्मिक साधना का अपूर्व सम्मिश्रण था। डेविड स्टीवेन एवं लीजा प्रख्यात भौतिकविद्व होने के साथ पर्याप्त आध्यात्मिक अभिरुचि रखते थे। बाइबल एवं अन्य ईसाइ ग्रंथों के साथ स्वामी विवेकानंद, महात्मा बुद्ध एवं उपनिषदों से वह अभिप्रेरित थे। उपनिषदों के बारे में उनका कहना था कि यह विश्व की श्रेष्ट्तम एवं मौलिक रचना है। वह इस सत्य को नि: संकोच भाव से स्वीकार करते थे कि उपनिषद मनुष्य को चिंतन एवं चेतना की उच्चतम कक्षा तक ले जाने में समर्थ है।
कल रात यह दोनों देर तक प्रयोगशाला में काम करते रहे थे। इनके साथ इनके दो रिसर्च एसोसिएट स्टिच स्टीफेन और जो मैकलाउड़ भी साथ थे। देर रात तक काम करने के कारण इन सबके चेहरे पर हल्की थकान थी। लेकिन सुबह की सुहानी हवा में यह थकान धुलती-घुलती और दूर होती जा रही थी। अभी ये सब आज के विज्ञान एवं वैज्ञानिकों की स्थिति तथा आज हो रहे वैज्ञानिक शोधकार्य के स्वरूप पर चर्चा कर रहे थे। प्रो. डेबिड़ स्टीवेन का कहना था की उन्नत एवं उत्कृष्ट शोधकार्य के लिए वैज्ञानिकों के व्यक्तित्व का भी उन्नत एवं उत्कृष्ट होना जरूरी है। इसके बिना मानव हित एवं लोकहित के लिए शोध कार्य किए जाने संभव नहीं।
प्रखर प्रतिभाएं तो विज्ञान के क्षेत्र में पहले से ही हैं। इसमें नया क्या करना होगा? उनकी शोध सहयोगी जो मैकलाउड ने जिज्ञासु भाव से कहा ।आज केवल प्रतिभाओं से काम नहीं चलने वाला, परिष्कृत एवं पवित्र प्रतिभाओं की जरूरत है। *प्रखर प्रतिभाओं ने सुविधा के साधनों के अनुसंधान के साथ उनका व्यवसायीकरण किया है। इसी तरह इन्होंने ही विनाश के साधनों का अन्वेषण और उनका विस्तारीकरण किया है।* *आज की आवश्यकता प्रखर मस्तिष्क एवं पवित्र ह्रदय वाले व्यक्तित्व हैं।* क्यों प्रोफेसर? लीजा ने अपनी बात कहते हुए अपने पति स्टीवेन की ओर देखा। वह कुछ कह पाते इससे पहले जो ने पूछ लिया- *लेकिन यह होगा कैसे ? "वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं आध्यात्मिक संवेदना के सम्मिलन से।"*
स्टीवेन ने यह बात सूत्र के रूप में कहीं। लेकिन स्टिच स्टीफेन संभवत: इसे थोड़ा विस्तार से जानना चाहते थे। हालांकि इसके लिए उन्होंने कहा तो कुछ भी नहीं, परंतु उनके चेहरे के भाव कुछ ऐसा दर्शा रहे थे। प्रोफेसर स्टीवेन ने इस स्थिति को समझ कर कहा- *वैज्ञानिक दृष्टिकोण का मतलब है यथार्थ व गहन जिज्ञासा, सत्यान्वेषण की सच्ची वृत्ति, आग्रह मुक्त विचार शैली, धैर्यपूर्वक व निरंतर प्रयोग करने की कर्म निष्ठा। जबकि आध्यात्मिक संवेदना में निहित है- स्वार्थरहित निष्कपट भाव, निरंहकारिता ,उदारता ,लोकहित, सर्वहित में निष्ठा , अन्तर्ज्ञान की क्षमता, व्यक्तित्व की असीम व्यापकता।*
प्रोफेसर स्टीवेन जो कह रहे थे, उसे सभी सुन रहे थे। उन्हें लग रहा था कि यदि विज्ञान जगत में ऐसे व्यक्तित्व क्रियाशील हो तो विज्ञान एवं विनाश का संबंध विच्छेद संभव है। कोई कुछ अधिक सोच पाता इससे पहले प्रोफेसर की पत्नी लीजा जो स्वयं एक भौतिक विज्ञानी थी, उन्होंने कहा विज्ञान के क्षेत्र में कुछ लोगों ने ऐसा किया भी है। *वारनर हाइजेनवर्ग का 'अनिश्चितता का सिद्धांत' वेदांत दर्शन से प्रेरित है।* *इसी तरह 'बूट स्ट्रेपथ्योरी' की प्रेरणा जिओ फेरिचियू को बौद्ध महायान से मिली।* यह ठीक है ,पर मानव हित के लिए इसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता। इसे विज्ञान का अध्यात्म की ओर बढ़ा हुआ पहला कदम कहा जा सकता है, पर उसे अपने कदम इस ओर और बढ़ाने हैं।
आपके अनुसार विज्ञान के अध्यात्म की ओर बढ़ने वाले अगले कदम क्या होंगे या क्या होने चाहिए? यह सवाल स्वयं लिजा ने किया था। इस पर प्रोफेसर *स्टीवेन ने कहा- अगले दिनों विज्ञान को अपनी खोज विचारों की पवित्रता एवं प्रखरता पर केंद्रित करनी होगी। जिस विज्ञान ने अब तक कामुकता के चरणों में होने वाली रासायनिक क्रियाओं की खोज की है, उसे ही अब भक्ति का रसायन विज्ञान खोजना पड़ेगा। उसे इस बात का अन्वेषण करना होगा कि ईसा मसीह, स्वामी विवेकानंद एवं मीरा के व्यक्तित्व किस विधि से बनते हैं। इसके लिए जो आध्यात्मिक क्रियाएं अपनाई गई, उनकी वैज्ञानिकता क्या है?*
लिजा ने प्रोफेसर की इस बात का समर्थन करते हुए कहा- हां यह ठीक है। विज्ञान ने अभी तक प्रकृति के रहस्य खोजे हैं। उसकी शक्तियों का परिचय पाया है, इनका उपयोग सीखा है। लेकिन सच यह भी है कि इनका दुरुपयोग ज्यादा हुआ है, क्योंकि इनका प्रयोग करने वाले मानव व्यक्तित्व अनगढ़ थे। अब ठीक यही होगा *विज्ञान को मानव को शक्ति बनाने की विधियों खोजने की बजाय उसके सदगुण संपन्न बनाने का विज्ञान खोजना होगा। आस्था एवं श्रद्धा के विषयों को भी अब प्रयोग एवं अनुसंधान के दायरे में लाया जाना चाहिए।*
लिजा कि इस बात का जो मैकलाउड़ ने समर्थन करते हुए कहा- इससे अध्यात्म के क्षेत्र में मूढ़र्ताओं, भ्रांतियों,ठगी एवं अंधविश्वास का निराकरण होगा। वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं वैज्ञानिक प्रयोग अध्यात्म को ज्यादा लोकहितकारी एवं लोकोपयोगी बना सकेंगे। साथ ही आध्यात्मिक संवेदना के संस्पर्श से वैज्ञानिकों में भी सदाशयता एवं जनहित की भावनाएं विकसित होगी। लेकिन इसके लिए करना क्या होगा? जो का यह सवाल महत्वपूर्ण था, जिसने प्रो स्टीवेन की चेतना को कुरेदा।
उन्होंने कहा, *इसके लिए आग्रह मुक्त होकर उपनिषदों ,बौद्ध दर्शन, सांख्य, वेदांत एवं योग का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अध्ययन करना चाहिए। इनकी बातें केवल विचार नहीं है ,बल्कि अनेकों रहस्यमय प्रयोगों का अनुभवात्मक निष्कर्ष है। इस निष्कर्ष पर आज के युग में वैज्ञानिक शोध विधि से प्रयोग किए जाने चाहिए। यदि 20वीं सदी के प्रारंभ में वार्नर हाइजेनवर्ग एवं मैक्स प्लांक ऐसे प्रयोग कर सकते हैं ,तो 21वीं सदी के प्रारंभ में आज के भौतिक विज्ञानी, चिकित्सा शास्त्री, मनोवैज्ञानिक एवं रसायनवेत्ता, अनुवांशिकी के क्षेत्र में काम करने वाले वैज्ञानिक ऐसा क्यों नहीं कर सकते? यदि आज ऐसा करने की कोशिश होगी तो ज्ञान व अनुभव के नवीन आयाम तो खुलेंगे ही, साथ ही सभ्यताओं का संघर्ष उनके मिलन का समारोह बन जाएगा। "*
" लखनऊ के चंद्रसेन द्विवेदी रेलवे स्टेशन अधीक्षक थे। मिशन की शुरुआत से ही उनका परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा जी से जुड़ाव रहा। इस बार जब उनका शांतिकुंज आना हुआ ,तब उन्होंने परम पूज्य गुरुदेव से मिलने पर पूछा- गुरुदेव! पहले हम लोगों को केवल गायत्री उपासना समझाया करते थे, लेकिन अब 'वैज्ञानिक अध्यात्म' की बात अखंड ज्योति में छपने लगी है। लोग इसके बारे में पूछते हैं, सरल भाषा में उन्हें इसको कैसे समझाएं। उनकी इस बात पर गुरुदेव बोले- द्विवेदी जी! *विज्ञान ने अब तक बहुत सारे अनुसंधान किए हैं, अब उसे यह अनुसंधान करना है कि इंसान को अच्छा कैसे बनाया जाए? जैसे ही वह यह काम करेगा, उसका अध्यात्म से मिलन हो जाएगा।* इसी तरह *जब अध्यात्म मूढ़ताओं एवं अंधविश्वासों से पीछा छुड़ाकर अपने प्रयोगों एवं प्रक्रियाओं में वैज्ञानिक शोध विधि अपना लेगा, उसका विज्ञान से मिलन हो जाएगा। विज्ञान एवं आध्यात्म का यही मिलन 'वैज्ञानिक अध्यात्म' है। "*
- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
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