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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
काल अन्तिम सत्य है। यह केवल दार्शनिक वाक्य नहीं, बल्कि सृष्टि की कार्यप्रणाली का मूल नियम है। काल के समक्ष किसी की नहीं चलती न व्यक्ति की, न समाज की, न साम्राज्यों की। यहाँ तक कि स्वयं ईश्वर भी जब अवतार लेते हैं तो उसी कालचक्र और सृष्टि-व्यवस्था के भीतर रहकर कार्य करते हैं। इसलिए यह मान लेना कि मनुष्य अपने प्रयासों से काल की दिशा बदल देगा, यह न तो शास्त्रीय है और न ही यथार्थ के अनुकूल। काल अपनी गति से चलता है और चलता रहेगा।
किन्तु इसी के साथ एक दूसरा पक्ष भी उतना ही स्पष्ट है, जिसे जानबूझकर भुला दिया जाता है। धर्म की रक्षा मनुष्य नहीं करता, धर्म की रक्षा स्वयं नारायण करते हैं। यह सनातन का मूल सिद्धान्त है “धर्मो रक्षति रक्षितः” का अर्थ यही है कि जब धर्म का आश्रय लिया जाता है, तब उसकी रक्षा की व्यवस्था स्वयं ईश्वरीय स्तर पर होती है। मनुष्य का कार्य इस व्यवस्था को संचालित करना नहीं, उसमें अपना कर्तव्य निभाना है।
आज राष्ट्रजीवन में हिन्दू समाज के समक्ष जो चुनौतियाँ दिखाई दे रही हैं, वे कोई आकस्मिक घटना नहीं हैं। इतिहास का प्रवाह देखिए महाभारत के महायुद्ध के पश्चात् एक दीर्घकाल तक अपेक्षाकृत शान्ति रही, किन्तु उसके बाद का कालखंड निरन्तर संघर्षों से भरा हुआ है। पिछले लगभग तीन सहस्र वर्षों का इतिहास ऐसा है जिसमें युद्ध, आक्रमण और अस्थिरता किसी न किसी रूप में बनी ही रही। यह केवल राजनीतिक घटनाएँ नहीं हैं, यह कालचक्र का स्वाभाविक उतार-चढ़ाव है।
इसी सन्दर्भ में पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी का प्रसंग भी देखा जाना चाहिए। पृथ्वीराज ने गौरी को अनेक बार पराजित किया, परन्तु उसे समाप्त नहीं कर सके। इसे केवल व्यक्तिगत दुर्बलता या सद्गुण-विकृति कह देना अधूरा विश्लेषण होगा। यह भी उसी कालप्रवाह का भाग था जिसमें आगे चलकर बाहरी प्रभावों को स्थान मिलना था। अर्थात् व्यक्ति की क्षमता होते हुए भी अन्तिम परिणाम कई बार काल की व्यापक योजना के अधीन होता है।
इसीलिए जब आज हम यह देखते हैं कि अनेक विषयों पर प्रयास होने के बावजूद अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आते, तो केवल यह कहना कि “हम और अधिक प्रयास करें, सब बदल जाएगा” यह भी अधूरा दृष्टिकोण है। और यह कहना कि “कुछ करना ही व्यर्थ है” यह तो और भी बड़ी भूल है। सत्य इन दोनों के बीच है।
मनुष्य न तो काल को रोक सकता है और न ही सम्पूर्ण परिणामों को नियंत्रित कर सकता है। परन्तु वह अपने कर्तव्य से विमुख भी नहीं हो सकता। उसका कार्य है—धर्म के बीज की रक्षा करना। यही एक ऐसा क्षेत्र है जो उसके अधिकार में है।
इसका अर्थ क्या है? इसका अर्थ केवल भावनात्मक आग्रह नहीं, बल्कि स्पष्ट आचरण है। वेद, उपनिषद्, पुराण, स्मृति और श्रुति की परम्परा को जीवित रखना; आत्मा, ब्रह्म, पुनर्जन्म और कर्मसिद्धान्त को समझना और समाज में पुनः स्थापित करना; हरिनाम का जप करना और उसे जीवन का अंग बनाना यही वह आधार है जिस पर धर्म टिकता है। यदि यह आधार कमजोर हो गया, तो बाहरी किसी भी प्रकार का संरक्षण स्थायी नहीं रह सकता।
इतिहास इस सत्य का प्रमाण है। इस्लामिक आक्रमणों के दीर्घकाल में केवल राजसत्ता के बल पर सनातन परम्परा नहीं बची। उस समय भक्ति की धारा प्रवाहित हुई। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस के माध्यम से राम को घर-घर पहुँचाया। यह कोई साधारण साहित्यिक कार्य नहीं था, यह धर्म के बीज को सुरक्षित रखने का प्रयास था, जो अन्ततः सफल हुआ। उसी प्रकार आदि शंकराचार्य ने दार्शनिक स्तर पर पुनः वैदिक परम्परा को संगठित किया। यह सब किसी मानवीय योजना का परिणाम नहीं था, बल्कि समयानुसार नारायण द्वारा कराया गया कार्य था।
इसी प्रकार जब-जब धर्म पर संकट आया, तब-तब विभिन्न रूपों में व्यक्तित्व खड़े हुए कभी शास्त्र के माध्यम से, कभी शस्त्र के माध्यम से। पर मूल कर्ता मनुष्य नहीं था; मनुष्य तो केवल निमित्त बना। यही समझना सबसे आवश्यक है।
आज जो संकट दिखाई दे रहा है, उसका एक बड़ा कारण वैचारिक भी है। आधुनिक विश्व में जीवन को एक रेखीय घटना के रूप में देखने की प्रवृत्ति कि एक ही जीवन है, उसके बाद सब समाप्त इसने मनुष्य को अत्यधिक भौतिक बना दिया है। परिणामस्वरूप उपभोग की अंधी दौड़, संसाधनों का अति-दोहन, परिवार और सम्बन्धों का विघटन ये सब सामान्य होते जा रहे हैं। इसके विपरीत वैदिक दृष्टि जीवन को एक सतत यात्रा मानती है, जिसमें कर्म का परिणाम अनिवार्य है और सृष्टि एक संतुलित व्यवस्था “ऋत” पर आधारित है। इस दृष्टि का पुनर्स्थापन केवल धार्मिक कार्य नहीं, बल्कि मानवता के संतुलन के लिए भी आवश्यक है।
परन्तु यहाँ भी वही बात लागू होती है—यह कार्य भी अहंकार से नहीं, कर्तव्यबोध से होना चाहिए। यह नहीं कि हम सम्पूर्ण विश्व को बदल देंगे; बल्कि यह कि हम अपने हिस्से का कार्य करेंगे।
यही कारण है कि धर्मरक्षा का वास्तविक प्रारम्भ किसी बड़े आन्दोलन से नहीं, अपने घर से होता है। अपने घर में धर्मदीप जलाना, अपने परिवार में संस्कार स्थापित करना, अपने जीवन में जप, स्वाध्याय और संयम को स्थान देना यही वह ठोस आधार है जिस पर आगे सब कुछ निर्मित होता है।
अन्ततः बात अत्यन्त सरल है, पर उतनी ही कठोर भी। काल अपनी गति से चलेगा, यह निश्चित है। धर्म की रक्षा नारायण करेंगे, यह भी उतना ही निश्चित है। पर हम उस प्रक्रिया में अपना स्थान ग्रहण करेंगे या नहीं यह हमारे ऊपर निर्भर है।
हमारा कार्य गिलहरी के समान है छोटा, सीमित, पर आवश्यक। सेतु का निर्माण हम नहीं कर रहे, पर बिना हमारे योगदान के वह पूर्ण भी नहीं होता। इसलिए न अहंकार का स्थान है, न निराशा का।
धर्म का बीज सुरक्षित रखिए, दीपक जलाए रखिए, अपना कर्तव्य करते रहिए शेष कार्य नारायण पर छोड़ दीजिए। यही इस काल में उचित दृष्टि है, यही आचरण है, और यही सनातन का मार्ग है।
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