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बंगाल और कानपुर के बाद, क्या अब नोएडा की बारी है?


✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

आज नोएडा नहीं जल रहा, उत्तर प्रदेश का भविष्य जल रहा है। यह केवल कुछ गाड़ियों में लगी आग नहीं है, यह उन सपनों में लगी आग है जिन्हें लेकर लाखों युवा उत्तर प्रदेश के औद्योगिक शहरों की ओर आते हैं। यह उन उद्यमियों की मेहनत पर हमला है जिन्होंने वर्षों की पूंजी, जोखिम और परिश्रम से उद्योग खड़े किए। यह उस भरोसे पर चोट है जो धीरे-धीरे उत्तर प्रदेश ने निवेशकों के बीच बनाया था। इस आग में कुछ नेताओं और राजनीतिक दलों की रोटियाँ जरूर सिकेंगी, लेकिन इसकी कीमत उत्तर प्रदेश का युवा, श्रमिक और मध्यम वर्ग चुकाएगा।

13 अप्रैल 2026 को नोएडा के औद्योगिक क्षेत्रों सेक्टर 63, फेज-2, होजरी कॉम्प्लेक्स और आसपास के इलाकों में हजारों की भीड़ सड़कों पर उतरी। न्यूनतम वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर शुरू हुआ प्रदर्शन अचानक हिंसक हो गया। गाड़ियों में आग लगा दी गई, औद्योगिक इकाइयों को निशाना बनाया गया, पुलिस पर पथराव हुआ और यातायात घंटों ठप रहा। जिस औद्योगिक क्षेत्र में रोज हजारों श्रमिक काम करने जाते हैं, वहीं उसी औद्योगिक क्षेत्र को हिंसा की आग में झोंक दिया गया।

यह पहला अवसर नहीं है। भारत का औद्योगिक इतिहास गवाह है कि श्रमिकों के नाम पर आंदोलन खड़े किए गए, उन्हें राजनीतिक रंग दिया गया और अंततः उद्योगों को नुकसान हुआ। स्वतंत्रता के बाद नेहरूवियन समाजवादी आर्थिक मॉडल लागू हुआ। 1951 का इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन एक्ट, लाइसेंस-कोटा-परमिट राज, उत्पादन पर सरकारी नियंत्रण इन नीतियों ने निजी उद्योगों को पहले ही सीमित कर दिया था। इसके बाद ट्रेड यूनियन राजनीति ने उद्योगों पर दबाव बढ़ाया।

ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC), सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (CITU), भारतीय राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (INTUC), हिंद मजदूर सभा ये संगठन श्रमिकों के अधिकारों के नाम पर सक्रिय हुए, लेकिन धीरे-धीरे यह आंदोलन राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का माध्यम बन गया। कम्युनिस्ट, समाजवादी और कांग्रेस से जुड़े कई नेता श्रमिक आंदोलनों से राजनीति में आगे बढ़े। श्रमिकों के अधिकारों की बात करते-करते वही नेता विधायक बने, सांसद बने, मंत्री बने, मुख्यमंत्री बने। लेकिन श्रमिक वहीं रह गया असुरक्षित, बेरोजगार और असंगठित।

पश्चिम बंगाल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। 1960 के दशक में पश्चिम बंगाल भारत का सबसे बड़ा औद्योगिक राज्य था। भारत के औद्योगिक उत्पादन में लगभग 20-25 प्रतिशत हिस्सेदारी बंगाल की थी। कोलकाता, हावड़ा, दुर्गापुर, आसनसोल ये भारत के प्रमुख औद्योगिक शहर थे। टाटा, बिड़ला, हिंदुस्तान मोटर्स, जूट उद्योग, इंजीनियरिंग उद्योग सब कुछ बंगाल में था।
लेकिन 1967 के बाद "घेराव" की राजनीति शुरू हुई। फैक्ट्री मालिकों को बंधक बनाना, उत्पादन रोकना, हिंसा करना यह आम हो गया। उद्योगपतियों को "पूंजीपति शोषक" कहा गया। टाटा और बिड़ला जैसे उद्योग समूहों को निशाना बनाया गया। परिणाम यह हुआ कि उद्योग धीरे-धीरे बंगाल छोड़कर गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत की ओर चले गए।

नंदीग्राम और सिंगूर की घटनाएं आज भी देश याद करता है। 2006 में पश्चिम बंगाल की बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार ने सिंगूर में टाटा नैनो प्लांट लगाने का प्रस्ताव दिया। लगभग ₹1500 करोड़ का निवेश था। 10,000 से अधिक रोजगार बनने वाले थे। लेकिन ममता बनर्जी के नेतृत्व में आंदोलन हुआ। 2006 से 2008 तक विरोध, धरना और हिंसा चली।

3 अक्टूबर 2008 को रतन टाटा ने सिंगूर से परियोजना हटाने की घोषणा कर दी। उन्होंने कहा — "हम उस स्थान पर काम नहीं कर सकते जहां काम करने का माहौल सुरक्षित न हो।" इसके बाद टाटा नैनो प्लांट गुजरात के साणंद चला गया।

गुजरात को उद्योग मिला, बंगाल को बेरोजगारी।
नंदीग्राम 2007 इंडोनेशिया के सलीम ग्रुप का केमिकल हब प्रस्तावित था। आंदोलन हुआ, हिंसा हुई, 14 मार्च 2007 को पुलिस फायरिंग में 14 लोगों की मौत हुई। परियोजना रद्द हो गई।

उत्तर प्रदेश का कानपुर भी इसी कहानी का हिस्सा है। कभी "भारत का मैनचेस्टर" कहा जाने वाला कानपुर कपड़ा और चमड़ा उद्योग का केंद्र था। एल्गिन मिल, लाल इमली, म्योर मिल लाखों लोग काम करते थे। लेकिन 1980 के दशक में लगातार यूनियन संघर्ष और राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण उद्योग बंद होते गए।
आज वही कहानी नोएडा में दोहराने की कोशिश दिखाई दे रही है।

समाजवाद और वामपंथ रोजगार नहीं देते। रोजगार हमारे उद्यमी भाई-बहन देते हैं। फैक्ट्री मालिक, छोटे उद्योगपति, स्टार्टअप शुरू करने वाला युवा यही लोग रोजगार पैदा करते हैं। लेकिन श्रमिकों को इन्हीं के खिलाफ भड़काया जाता है। जिस फैक्ट्री से मजदूर का घर चलता है, उसी फैक्ट्री को जलाने के लिए उसे उकसाया जाता है।

जब फैक्ट्री बंद हो जाती है, तब कोई नेता वापस नहीं आता यह पूछने कि उस मजदूर के बच्चों की पढ़ाई कैसे चलेगी। कोई नहीं पूछता कि उस परिवार की रसोई कैसे जलेगी।

आज उत्तर प्रदेश तेजी से औद्योगिक विकास की ओर बढ़ रहा है। 2018 में उत्तर प्रदेश निवेश सम्मेलन में 4.28 लाख करोड़ रुपये निवेश प्रस्ताव आए। 2023 ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में 33 लाख करोड़ रुपये से अधिक निवेश प्रस्ताव आए। नोएडा, ग्रेटर नोएडा, यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र इलेक्ट्रॉनिक्स और मैन्युफैक्चरिंग का केंद्र बन रहे हैं।

ऐसे समय में नोएडा में हुई हिंसा केवल एक घटना नहीं है यह उत्तर प्रदेश के औद्योगिक भविष्य को अस्थिर करने की कोशिश है।

आज नोएडा नहीं जल रहा, उत्तर प्रदेश का भविष्य जल रहा है। इस आग में कुछ नेताओं और राजनीतिक दलों की रोटियाँ सिकेंगी, लेकिन उत्तर प्रदेश के युवाओं का भविष्य जल जाएगा।

अगर फैक्ट्रियाँ नहीं रहेंगी, तो न्यूनतम वेतन कौन देगा? अगर निवेशक नहीं आएंगे, तो रोजगार कौन देगा?
भारत आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना देख रहा है। एक श्रमिक बेहतर वेतन चाहता है, एक उद्यमी उद्योग लगाना चाहता है, एक युवा रोजगार चाहता है। लेकिन जब हिंसा होती है, तो सबसे पहले सपना जलता है।
और हर बार नेता आगे बढ़ जाते हैं, श्रमिक पीछे छूट जाता है। यही सबसे बड़ी सच्चाई है, और यही सबसे बड़ी चेतावनी भी।

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