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भारत में पहचान की राजनीति वैचारिक निर्माण से सामाजिक संघर्ष तक






✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

भारत में पहचान की राजनीति कोई अचानक उत्पन्न हुई प्रवृत्ति नहीं है, बल्कि यह एक दीर्घकालिक वैचारिक प्रक्रिया का परिणाम है, जिसकी जड़ें औपनिवेशिक काल से लेकर आधुनिक अकादमिक विमर्श तक फैली हुई हैं। पिछले लगभग 90 से 100 वर्षों में पहचान आधारित संघर्ष धीरे-धीरे बढ़े हैं, परंतु पिछले 20 से 25 वर्षों में इनकी गति असाधारण रूप से तेज हुई है। इस दौरान न केवल नई जातियाँ और समूह इस विमर्श में शामिल हुए, बल्कि नई पृथक पहचान गढ़ने की प्रवृत्ति भी तेज हुई। यह केवल सामाजिक परिवर्तन नहीं बल्कि वैचारिक, अकादमिक और राजनीतिक स्तर पर विकसित की गई प्रक्रिया का परिणाम है।

पहचान की राजनीति के प्रभाव आने के बाद सामान्यतः दो परिस्थितियाँ निर्मित होती हैं। पहली पहचान का संकट और दूसरी मूल पहचान से पृथक नई पहचान की खोज। पहचान के संकट की स्थिति में अनेक जातिगत और सामाजिक समूह अपनी पारंपरिक पहचान को हीन समझने लगते हैं। वे स्वयं को किसी दूसरे समूह के संदर्भ में देखने लगते हैं। इस प्रक्रिया में इतिहास की नई व्याख्याएँ प्रस्तुत की जाती हैं और समूहों के बीच तुलना आधारित विमर्श तैयार किया जाता है। उदाहरण के रूप में कुछ क्षेत्रों में क्षत्रिय समाज के भीतर मूल निवासी बनाम बाहरी का विमर्श खड़ा किया गया। कुछ संगठनों ने यह स्थापित करने का प्रयास किया कि क्षत्रिय हिंदू नहीं बल्कि अलग मूल निवासी समूह हैं। इसी प्रकार ब्राह्मण बनाम दलित, ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय, एससी-एसटी-ओबीसी बनाम सामान्य वर्ग जैसे संघर्षों को भी वैचारिक रूप से प्रस्तुत किया गया।

दूसरी स्थिति में मूल पहचान से पृथक नई पहचान खड़ी की जाती है। इस प्रक्रिया में सबसे अधिक सामाजिक और राजनीतिक लाभ मिलता है क्योंकि पृथक पहचान के आधार पर नेतृत्व, संगठन और वैचारिक प्रभाव विकसित किया जा सकता है। उदाहरण के रूप में सिख बनाम हिंदू का विमर्श खड़ा करने के प्रयास, अनुसूचित समाज के भीतर नवबौद्ध पहचान को हिंदू पहचान से अलग स्थापित करने के प्रयास, सरना को अलग धर्म का दर्जा देने की मांग, लिंगायत को अलग धर्म बनाने की मांग, आदिवासी हिंदू नहीं बल्कि मूल निवासी हैं इस प्रकार का विमर्श, ये सभी पृथक पहचान निर्मित करने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं।

यह प्रक्रिया अचानक नहीं होती। इसके पीछे लंबी वैचारिक तैयारी होती है। कल्चरल मार्क्सवाद, पोस्ट मॉडर्नाइज्म थ्योरी, क्रिटिकल रेस थ्योरी और उसका भारतीय रूप कास्ट रेस थ्योरी जैसे वैचारिक ढाँचे अकादमिक स्तर पर विकसित किए गए। इन सिद्धांतों के आधार पर समाज को शोषक और शोषित की स्थायी श्रेणियों में बाँटकर देखा जाता है। इसके लिए वर्षों तक साहित्य तैयार किया जाता है, सेमिनार आयोजित होते हैं, शोध किए जाते हैं और धीरे-धीरे एक वैचारिक वातावरण निर्मित किया जाता है जिसमें कुछ व्यक्तियों को नायक और कुछ को विलेन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

पहचान की राजनीति का पहला औपचारिक हस्तक्षेप औपनिवेशिक काल में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। 1817 में जेम्स मिल ने History of British India प्रकाशित की। जेम्स मिल ने भारतीय समाज, विशेषकर हिंदू समाज, को अत्यंत नकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने हिंदुओं को अंधविश्वासी, सामाजिक रूप से पिछड़ा, दमनकारी और असभ्य बताया तथा यह तर्क दिया कि ब्रिटिश शासन भारत में सभ्यता, तर्क और प्रगति लाने वाला है। इस प्रकार उनकी पुस्तक ने औपनिवेशिक शासन को “सभ्य बनाने के मिशन” (Civilizing Mission) के रूप में वैधता प्रदान करने का प्रयास किया।

इसके बाद 1835 में थॉमस बैबिंगटन मैकॉले के शिक्षा संबंधी मिनट (Macaulay's Minute on Education) ने भारतीय समाज में पश्चिमी शिक्षा और विचारधारा के प्रसार का मार्ग प्रशस्त किया। अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से एक नए शिक्षित वर्ग का निर्माण हुआ, जिसने भारतीय समाज को यूरोपीय दृष्टिकोण से देखना शुरू किया। इस प्रक्रिया ने परंपरागत सामाजिक पहचान को आधुनिक राजनीतिक और सामाजिक श्रेणियों में बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

औपनिवेशिक शासन ने पहचान आधारित वर्गीकरण को और अधिक संस्थागत रूप 1871 से प्रारम्भ हुई जनगणना प्रक्रिया के माध्यम से दिया। 1871-72 की पहली व्यापक जनगणना में भारतीय समाज को जातियों, धर्मों और समुदायों के आधार पर वर्गीकृत किया गया। इससे पहले जाति एक सामाजिक वास्तविकता तो थी, लेकिन उसे प्रशासनिक और सांख्यिकीय श्रेणियों में व्यवस्थित रूप से दर्ज नहीं किया गया था। जनगणना ने इन पहचानों को स्थिर और आधिकारिक रूप प्रदान किया।

1901 की जनगणना इस प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण मोड़ थी। ब्रिटिश प्रशासक हर्बर्ट रिस्ले ने जातियों को नस्लीय आधार पर वर्गीकृत करने का प्रयास किया और नृवंशविज्ञान (Ethnography) तथा शारीरिक मापदंडों के आधार पर भारतीय समाज को विभाजित करने की कोशिश की। बाद में उनकी पुस्तक The People of India (1908) में उन्होंने आर्य-द्रविड़ नस्लीय सिद्धांत को और अधिक व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया। रिस्ले ने जाति को नस्ल (Race) से जोड़ने का प्रयास किया, जिससे भारतीय समाज में नस्लीय पहचान का विचार संस्थागत रूप से प्रवेश करने लगा।

इस प्रकार औपनिवेशिक काल में इतिहास लेखन, शिक्षा नीति, जनगणना और नृवंशविज्ञान संबंधी अध्ययनों के माध्यम से भारतीय समाज की विविधताओं को धार्मिक, जातीय और नस्लीय पहचान के रूप में व्यवस्थित किया गया। यही प्रक्रियाएँ आगे चलकर आधुनिक भारत में पहचान की राजनीति (Identity Politics) के विकास की महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि बनीं।

1871 से शुरू हुई ब्रिटिश जनगणना रिपोर्टों ने पहली बार भारतीय समाज को व्यवस्थित रूप से वर्गीकृत करने का प्रयास किया। विशेष रूप से 1901 की जनगणना में जाति को सामाजिक वर्गीकरण का प्रमुख आधार बनाया गया। 1931 की जनगणना भारत में अंतिम विस्तृत जातिगत जनगणना मानी जाती है। इस जनगणना में 4,147 जातियों का उल्लेख मिलता है, साथ ही अनेक उपजातियों और स्थानीय सामाजिक समूहों का भी विवरण दिया गया था। इस प्रकार औपनिवेशिक काल में भारतीय समाज की हजारों जातिगत पहचानें प्रशासनिक श्रेणियों में दर्ज की गईं।

स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक पूर्ण जातिगत जनगणना नहीं कराई गई। हालांकि 2011 में सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना (SECC-2011) कराई गई, जिसमें 46,73,034 (लगभग 46 लाख) जाति-सम्बन्धी प्रविष्टियाँ दर्ज हुईं। यह संख्या वास्तविक जातियों की नहीं थी, बल्कि जातियों, उपजातियों, उपनामों, गोत्रों और स्थानीय पहचान के विभिन्न रूपों की कुल प्रविष्टियाँ थीं। बाद में इन आंकड़ों को वर्गीकृत करना कठिन पाया गया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि भारतीय समाज की जातिगत संरचना अत्यंत जटिल और बहुस्तरीय है।

भारतीय समाज की विविधता केवल जातिगत संरचना तक सीमित नहीं रही, बल्कि धार्मिक-दार्शनिक परंपराओं में भी व्यापक बहुलता देखने को मिलती है। भारतीय बौद्धिक परंपरा में सामान्यतः नौ प्रमुख दर्शन परंपराएँ मानी जाती हैं सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, वेदांत, बौद्ध, जैन और चार्वाक। ये सभी परंपराएँ भारतीय विचार परंपरा की बहुलतावादी प्रकृति को दर्शाती हैं।

इसके अतिरिक्त भारतीय समाज में अनेक धार्मिक और सांस्कृतिक संप्रदाय भी विकसित हुए जैसे नाथ परंपरा, भक्ति परंपरा की विभिन्न शाखाएँ, शैव, वैष्णव, शाक्त, स्मार्त, लिंगायत, आर्य समाज, कबीरपंथ, रैदास पंथ, दादूपंथ आदि। इन सैकड़ों संप्रदायों ने एक व्यापक सांस्कृतिक ढाँचे में सहअस्तित्व की परंपरा को बनाए रखा।

इस प्रकार भारतीय समाज की ऐतिहासिक बहुलता जाति, पंथ, दर्शन और सांस्कृतिक परंपराओं की विविधता ने आधुनिक काल में पहचान आधारित राजनीतिक विमर्श के विकास की पृष्ठभूमि तैयार की। यही बहुस्तरीय पहचानें आगे चलकर लोकतांत्रिक राजनीति में प्रतिनिधित्व, सामाजिक न्याय और राजनीतिक लामबंदी का आधार बनीं, जिसे आज पहचान की राजनीति (Identity Politics) के रूप में देखा जाता है।

बीसवीं शताब्दी के मध्य में 1932 का पूना पैक्ट एक महत्वपूर्ण मोड़ था। डॉ. भीमराव आंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच समझौते के बाद Depressed Classes की राजनीतिक पहचान मजबूत हुई। 1956 में नागपुर में डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध दीक्षा ली। इस घटना में लाखों लोगों ने भाग लिया। 1972 में दलित पैंथर्स संगठन बना जिसने “दलित” शब्द को राजनीतिक पहचान के रूप में स्थापित किया।

1978 में कांशीराम ने BAMCEF की स्थापना की। 1981 में डीएस-4 और 1984 में बहुजन समाज पार्टी का गठन हुआ। कांशीराम ने “बहुजन बनाम मनुवादी” का नारा दिया। यह पहचान आधारित राजनीतिक लामबंदी का उदाहरण था।

बीसवीं शताब्दी में पहचान आधारित आंदोलनों की गति देने के लिए। ज्योतिबा फुले, ई.वी. रामासामी पेरियार जैसे नेताओं के विचारों को विशेष रूप से उभारा गया। इन नेताओं ने ब्राह्मण बनाम गैर-ब्राह्मण विमर्श को स्थापित किया। समय के साथ इन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक न्याय के प्रतीकों के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा। जबकि दूसरी ओर महर्षि दयानंद सरस्वती, वीर सावरकर, महात्मा गांधी, मदन मोहन मालवीय, डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, गुरुजी गोलवलकर, महंत दिग्विजय नाथ, महंत अवैद्यनाथ, बाला साहेब देवरस जैसे व्यक्तित्वों के सामाजिक योगदान पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है।

इसी प्रकार अनुसूचित जाति समाज के भीतर भी कई ऐसे व्यक्तित्व रहे जिन्होंने धार्मिक और सांस्कृतिक आधार पर समाज सुधार का कार्य किया, जैसे संत रविदास, नारायण गुरु, बिरसा मुंडा, कामेश्वर चौपाल, मधु पासवान, के.एन. गोविंदाचार्य जैसे नाम, लेकिन पहचान आधारित विमर्श में अक्सर बाहर से आयातित वैचारिक ढाँचे को अधिक महत्व दिया गया।

1990 में मंडल आयोग लागू होने के बाद जाति आधारित पहचान राजनीति तेज हुई। वी.पी. सिंह सरकार द्वारा 7 अगस्त 1990 को मंडल आयोग लागू किया गया। इसके बाद देश भर में आंदोलन हुए। इसी समय से ओबीसी पहचान मजबूत होने लगी।

1990 के दशक के बाद पहचान आधारित संघर्षों में वृद्धि हुई। 1980-1990 के दशक में पंजाब में खालिस्तान आंदोलन चला जिसमें हजारों लोग मारे गए। बिहार में 1990 के दशक में जातिगत नरसंहार हुए जिनमें 1996 का बथानी टोला, 1997 का लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार प्रमुख रहे। तमिलनाडु में पेरियारवादी आंदोलनों के दौरान हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तोड़े जाने की घटनाएँ दर्ज हुईं।

1996 में कांचा इलैया ने Why I am not a Hindu पुस्तक लिखी जिसमें हिंदू समाज को शोषक संरचना बताया गया। 2000 के बाद विश्वविद्यालयों में पहचान आधारित विमर्श तेज हुआ। 2010 के बाद सोशल मीडिया के विस्तार ने पहचान आधारित आंदोलन को नई गति दी।

पिछले 30 से 40 वर्षों में नई पहचान खड़ी करने के प्रयास और तेज हुए। झारखंड में सरना धर्म को अलग धर्म मानने की मांग 1990 के दशक से तेज हुई। 2011 और 2021 की जनगणना में सरना को अलग कॉलम देने की मांग उठी। कर्नाटक में लिंगायत को अलग धर्म घोषित करने की मांग 2017 में सिद्धारमैया सरकार के समय उठी थी। 

आदिवासी मूल निवासी बनाम हिंदू का विमर्श, क्षत्रिय मूल निवासी संघ जैसे संगठन, ये सभी पहचान निर्माण की प्रक्रिया के उदाहरण हैं।

इस प्रक्रिया में नायक और विलेन भी निर्मित किए जाते हैं। कुछ व्यक्तियों को समाज सुधारक के रूप में स्थापित किया जाता है जबकि अन्य को शोषक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसी प्रक्रिया में इतिहास की पुनर्व्याख्या की जाती है जैसे रावण को मूल निवासी, होलिका को मूल निवासी, प्रह्लाद को आर्य बताने जैसे विमर्श सामने आए।

भारत में चार हजार जातियाँ, 46 लाख उपजातियाँ, सैकड़ों पंथ और नौ दर्शन परंपराएँ एक व्यापक सांस्कृतिक ढांचे का हिस्सा रही हैं। यह विविधता भारतीय समाज की विशेषता रही है। लेकिन पहचान आधारित राजनीति इस विविधता को संघर्ष में बदलने की प्रवृत्ति पैदा करती है।

पिछले 30-40 वर्षों में पहचान आधारित संघर्षों की घटनाएँ बढ़ी हैं। जातिगत हिंसा, धार्मिक पहचान आधारित आंदोलन, पृथक धर्म की मांग, ये सभी पहचान राजनीति के प्रभाव के उदाहरण हैं।

इस प्रकार पहचान की राजनीति का आधुनिक संस्करण समाज को शोषक और शोषित की स्थायी श्रेणियों में बांटने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे सामाजिक समरसता को प्रभावित करती है और वर्ग संघर्ष को जन्म देती है।

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