सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

मनुष्य का जन्म और सृष्टि का संतुलन

कभी-कभी जीवन के प्रारम्भिक वर्षों की छोटी-सी घटनाएँ ऐसी होती हैं जो उस समय साधारण लगती हैं, लेकिन समय बीतने के साथ वही घटनाएँ चिंतन की दिशा तय कर देती हैं। बचपन का मन निष्कपट होता है, उसमें न वैचारिक आग्रह होते हैं, न सामाजिक पूर्वाग्रह, न वैचारिक संघर्ष। जो भीतर से आता है वही सहज सत्य बनकर बाहर निकलता है। शायद इसी कारण बचपन में कही गई बातें कई बार जीवन की सबसे गहरी अनुभूति बन जाती हैं। मेरे जीवन में भी ऐसी ही एक घटना है, जो समय के साथ मेरे चिंतन का आधार बन गई।

मुझे आज भी वह दिन उतनी ही स्पष्टता से याद है। मेरी उम्र लगभग छह या सात वर्ष रही होगी। गाँव का वातावरण था खुला आकाश, कच्चा आँगन, मिट्टी की सोंधी खुशबू, दूर कहीं बैलों की घंटियों की धीमी आवाज, और घर के सामने खड़ा एक बड़ा नीम का पेड़ जिसकी छाया में दोपहर का समय बीतता था। जीवन उस समय बहुत सरल था, न कोई भागदौड़, न कोई कृत्रिमता। प्रकृति से सीधा जुड़ा हुआ जीवन था। बच्चे मिट्टी में खेलते थे, पेड़ों पर चढ़ते थे, और बड़े बुजुर्ग उसी वातावरण में बैठकर जीवन की सहज बातें करते थे।
उस दिन भी ऐसा ही एक शांत दोपहर का समय था। मेरे फूफा जी चारपाई पर बैठे थे। उनके चेहरे पर सहज गंभीरता थी, जैसे वे भीतर ही भीतर किसी विचार में डूबे हों। मैं पास ही मिट्टी में कुछ रेखाएँ बना रहा था, कभी गोल, कभी सीधी, कभी अपने ही बनाए आकारों को मिटाकर फिर से बनाता। बचपन की दुनिया इतनी ही होती है  मिट्टी में खेलते हुए भी मन किसी गहरी शांति में होता है।


अचानक उन्होंने मेरी ओर देखा और बिना किसी भूमिका के एक प्रश्न किया “मनुष्य का जन्म क्यों हुआ है?”
उस समय न मुझे दर्शन की कोई समझ थी, न शास्त्रों का ज्ञान, न समाज की जटिलताओं का कोई अनुभव। उस उम्र में जीवन बहुत सरल होता है। एक बच्चे का संसार सीमित होता है घर, आँगन, पेड़, मिट्टी, पशु-पक्षी और परिवार के लोग। न वैचारिक आग्रह होते हैं, न किसी विचारधारा का प्रभाव, न इतिहास का बोझ, न भविष्य की चिंता। मन पूरी तरह सहज होता है और जो भी अनुभव होता है, वह सीधे भीतर उतरता है। उसी सहजता में मैंने बिना सोचे उत्तर दिया प्रकृति की रक्षा के लिए।”

उस समय यह उत्तर मेरे लिए किसी गहरे चिंतन का परिणाम नहीं था। मैंने न कभी धर्म पर विचार किया था, न प्रकृति और मनुष्य के संबंध पर सोचा था। लेकिन गाँव का जीवन स्वयं प्रकृति के साथ जुड़ा हुआ था। खेतों की हरियाली, वर्षा का इंतज़ार, पशुओं की देखभाल, पेड़ों की छाया, जल का महत्व यह सब जीवन का हिस्सा था। शायद उसी जीवन अनुभव ने बालमन में यह भाव बैठा दिया था कि मनुष्य प्रकृति से जुड़ा है और उसका कर्तव्य प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना है।

उस समय मुझे यह भी नहीं पता था कि इस उत्तर का कोई दार्शनिक अर्थ हो सकता है। मेरे लिए यह केवल सहज अनुभव था, जैसे कोई बच्चा आकाश को देखकर कह दे कि यह बहुत विशाल है, या नदी को देखकर कह दे कि यह बहती है। लेकिन बाद में जब जीवन के अनुभव बढ़े, तब यह एहसास हुआ कि उस सहज उत्तर में जीवन की गहरी अनुभूति छिपी हुई थी, जो बिना पढ़े-समझे भी संस्कृति के माध्यम से भीतर उतर जाती है।
बचपन का मन किसी तर्क से नहीं चलता, वह अनुभव से चलता है। वही अनुभव उस समय शब्द बनकर बाहर आया था। उस उत्तर में न कोई विचारधारा थी, न कोई दार्शनिक भाषा, लेकिन उसमें जीवन के साथ जुड़ा हुआ एक सहज सत्य था, जो उस समय केवल एक उत्तर था, पर बाद में एक गहरे चिंतन का आधार बन गया।



वैदिक व्यवस्था में सृष्टि को केवल भौतिक रूप में नहीं देखा गया, बल्कि उसे तीन आयामों में समझा गया है — आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक। यह तीनों आयाम मिलकर सृष्टि की संपूर्ण व्यवस्था को समझाते हैं। यदि केवल भौतिक रूप से सृष्टि को देखा जाए तो समझ अधूरी रह जाती है, और यदि केवल आध्यात्मिक रूप से देखा जाए तो भी पूर्णता नहीं आती। वैदिक दृष्टि इन तीनों को एक साथ जोड़कर सृष्टि को समझती है।
आधिभौतिक आयाम वह है जो प्रत्यक्ष दिखाई देता है। यह प्रकृति का भौतिक स्वरूप है पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। पर्वत, नदियाँ, समुद्र, वनस्पतियाँ, पशु-पक्षी, मनुष्य यह सब आधिभौतिक जगत का भाग हैं। सूर्य का उदय होना, ऋतुओं का परिवर्तन, वर्षा होना, बीज का अंकुरित होना यह सब आधिभौतिक स्तर पर दिखाई देने वाली घटनाएँ हैं। यह वह संसार है जिसे मनुष्य अपनी इंद्रियों से अनुभव करता है।


लेकिन सृष्टि केवल भौतिक नहीं है। इसके पीछे एक अदृश्य व्यवस्था भी कार्य करती है, जिसे आधिदैविक आयाम कहा गया है। आधिदैविक का अर्थ है  प्रकृति के पीछे कार्य करने वाली सूक्ष्म शक्तियाँ। सूर्य केवल एक अग्नि पिंड नहीं है, बल्कि जीवन का स्रोत है। वर्षा केवल जल का गिरना नहीं है, बल्कि जीवन के संतुलन की प्रक्रिया है। ऋतुओं का परिवर्तन केवल तापमान का बदलाव नहीं है, बल्कि सृष्टि के संतुलन की व्यवस्था है। वैदिक परंपरा में इन शक्तियों को देव कहा गया सूर्य देव, वायु देव, वरुण देव, अग्नि देव। इसका अर्थ यह नहीं कि वे केवल प्रतीक हैं, बल्कि यह स्वीकार है कि प्रकृति के पीछे सूक्ष्म शक्तियाँ कार्य करती हैं जो संतुलन बनाए रखती हैं। यही आधिदैविक आयाम है।


तीसरा आयाम आध्यात्मिक है। यह सृष्टि का चेतन पक्ष है। मनुष्य केवल शरीर नहीं है, उसमें चेतना है। जीवन केवल भौतिक प्रक्रियाओं का परिणाम नहीं है, बल्कि चेतना का प्रकट रूप है। यह चेतना ब्रह्म से जुड़ी है। ब्रह्म वह मूल चेतना है जिससे सृष्टि उत्पन्न होती है। मनुष्य उसी चेतना का अंश है। यही आध्यात्मिक आयाम है।
इन तीनों आयामों को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। आधिभौतिक जगत दिखाई देता है, आधिदैविक व्यवस्था उसे संचालित करती है, और आध्यात्मिक चेतना उसे अर्थ देती है। सूर्य भौतिक रूप से दिखाई देता है, उसके पीछे आधिदैविक शक्ति है, और उससे उत्पन्न जीवन आध्यात्मिक चेतना से जुड़ा है।

यही कारण है कि वैदिक व्यवस्था में सृष्टि को एक समग्र रूप में देखा गया। यह केवल भौतिक विज्ञान नहीं है, केवल दर्शन नहीं है, बल्कि जीवन की संपूर्ण व्यवस्था है। यही ऋत है सृष्टि का संतुलन, जिसमें आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक तीनों आयाम समाहित हैं।

ऋत सृष्टि का शाश्वत नियम है और धर्म उसी ऋत का मानवीय, सामाजिक और व्यवहारिक रूप है। वैदिक साहित्य में ऋत को ब्रह्मांडीय व्यवस्था कहा गया है, जो सृष्टि को संतुलित रखती है। ऋग्वेद में “ऋत” शब्द का अनेक स्थानों पर प्रयोग हुआ है, जहाँ ऋत को सूर्य की गति, ऋतुओं के क्रम, प्रकृति के संतुलन और ब्रह्मांडीय व्यवस्था से जोड़ा गया है। अर्थात्‌ जो व्यवस्था ब्रह्मांड को संचालित करती है, वही ऋत है।

जब यही व्यवस्था मनुष्य के जीवन में लागू होती है, तब वह धर्म कहलाती है। इसलिए धर्म कोई मनुष्य निर्मित नियम नहीं है, बल्कि सृष्टि की व्यवस्था का सामाजिक रूप है। धर्म शब्द की व्युत्पत्ति “धृ” धातु से मानी जाती है, जिसका अर्थ है धारण करना। “धारणात् धर्म इत्याहुः”  अर्थात्‌ जो धारण करता है, वही धर्म है। यह शास्त्रीय परिभाषा स्पष्ट करती है कि धर्म वह है जो लोक और जगत को धारण करे, जो समाज को स्थिर रखे, जो जीवन को संतुलित बनाए।

मनुस्मृति में धर्म के दस लक्षण बताए गए हैं  धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्य और अक्रोध। यह धर्म की शास्त्रीय परिभाषा है। इसका अर्थ है कि धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं है, बल्कि जीवन का संतुलन है। यदि व्यक्ति सत्य का पालन करता है, संयम रखता है, दूसरों के अधिकारों का सम्मान करता है, तो वह धर्म का पालन कर रहा है।

महाभारत में भी धर्म को व्यापक रूप में परिभाषित किया गया है “धर्मो रक्षति रक्षितः” अर्थात्‌ जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। यह केवल आध्यात्मिक कथन नहीं है, बल्कि सामाजिक सत्य है। यदि समाज धर्म के आधार पर चलता है तो संतुलन बना रहता है, अन्यथा अराजकता उत्पन्न होती है।

उदाहरण के रूप में देखें तो प्रकृति का संतुलन ऋत है। वर्षा का समय पर होना, नदियों का बहना, वनस्पतियों का उगना  यह सब ऋत है। यदि यह संतुलन बिगड़ जाए तो जीवन संकट में पड़ जाता है। इसी प्रकार समाज में धर्म संतुलन बनाए रखता है। परिवार में माता-पिता का दायित्व, संतान का कर्तव्य, गुरु और शिष्य का संबंध  यह सब धर्म के आधार पर चलता है। यदि ये संबंध टूट जाएँ तो समाज असंतुलित हो जाता है।

इसलिए धर्म केवल आध्यात्मिक अवधारणा नहीं है, बल्कि जीवन का व्यवहारिक आधार है। धर्म का अर्थ है संतुलन, कर्तव्य और मर्यादा। यही कारण है कि वैदिक व्यवस्था में धर्म को ऋत का सामाजिक रूप कहा गया है। जब मनुष्य ऋत के अनुसार जीवन जीता है, तब वह धर्म का पालन करता है। यही धर्म सृष्टि और समाज दोनों को संतुलित रखता है।


संस्कृति को समझने के लिए यह समझना आवश्यक है कि संस्कृति धर्म से अलग कोई स्वतंत्र तत्व नहीं है, बल्कि धर्म का ही व्यवहारिक और जीवंत रूप है। धर्म सृष्टि का सिद्धांत है, जीवन का आधार है, जबकि संस्कृति उसी धर्म का जीवन में प्रकट होने वाला स्वरूप है। जब धर्म जीवन के व्यवहार में उतरता है, परंपराओं में दिखाई देता है, परिवार व्यवस्था में जीवित रहता है, लोकाचार और आचार-विचार में प्रकट होता है, वही संस्कृति बन जाता है। इसलिए संस्कृति केवल परंपराओं का संग्रह नहीं है, बल्कि जीवन की निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।

संस्कृति शब्द की व्युत्पत्ति “संस्कार” से जुड़ी मानी जाती है। संस्कारों से निर्मित जीवन ही संस्कृति का निर्माण करता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य के जीवन में जो संस्कार होते हैं नामकरण, उपनयन, विवाह, श्राद्ध  ये केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं हैं, बल्कि संस्कृति के अंग हैं। परिवार में बड़ों का सम्मान करना, अतिथि को देवता मानना, भोजन से पहले अन्न को प्रणाम करना, वृक्षों को पूजनीय मानना, नदियों को माता कहना — यह सब संस्कृति का हिस्सा है। यह व्यवहार केवल परंपरा नहीं है, बल्कि धर्म का व्यवहारिक रूप है, जो जीवन में संतुलन और मर्यादा स्थापित करता है।

संस्कृति जीवन की शैली है। भाषा संस्कृति का अंग है, क्योंकि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि विचार और संवेदना की अभिव्यक्ति होती है। परिवार व्यवस्था संस्कृति का महत्वपूर्ण आधार है, क्योंकि परिवार ही संस्कारों का पहला केंद्र होता है। लोकाचार संस्कृति का व्यवहारिक पक्ष है, जैसे त्योहार मनाने की परंपरा, ऋतुओं के अनुसार जीवन पद्धति, सामूहिक उत्सव, ग्राम जीवन की परंपराएँ। आचार-विचार संस्कृति का मानसिक पक्ष है, जैसे बड़ों का सम्मान, परस्पर सहयोग, प्रकृति के प्रति श्रद्धा।

संस्कृति समाज को पहचान देती है। यही कारण है कि अलग-अलग सभ्यताओं की पहचान उनकी संस्कृति से होती है। भारतीय संस्कृति की पहचान परिवार व्यवस्था, प्रकृति के प्रति सम्मान, विविधता में एकता और आध्यात्मिक दृष्टि से होती है। यह पहचान किसी एक समय में नहीं बनी, बल्कि हजारों वर्षों में विकसित हुई।
सभ्यता संस्कृति का बाहरी रूप है। भवन, नगर, तकनीक, परिवहन, वस्त्र, जीवन की सुविधाएँ — यह सब सभ्यता का भाग हैं। सभ्यता समय के साथ बदलती रहती है। कभी कच्चे घर थे, आज बहुमंजिला भवन हैं। पहले बैलगाड़ी थी, आज आधुनिक परिवहन है। पहले ग्राम आधारित व्यवस्था थी, आज नगर आधारित जीवन है। यह सब सभ्यता का परिवर्तन है।


लेकिन संस्कृति इन परिवर्तनों के बावजूद बनी रहती है। तकनीक बदल जाती है, लेकिन परिवार का महत्व बना रहता है। जीवन की सुविधाएँ बदल जाती हैं, लेकिन संस्कार बने रहते हैं। सभ्यता परिवर्तनशील है, संस्कृति शाश्वत है। यही कारण है कि हजारों वर्षों के परिवर्तन के बाद भी भारतीय संस्कृति का मूल स्वरूप बना रहा। यही संस्कृति धर्म का व्यवहारिक रूप है और यही सभ्यता को दिशा देती 


वैदिक व्यवस्था में संस्कृति, धर्म और सभ्यता को अलग-अलग खंडों में नहीं देखा गया, बल्कि इन्हें एक ही जीवन प्रवाह के परस्पर पूरक आयाम माना गया है। यहाँ धर्म कोई अलग अवधारणा नहीं है, संस्कृति कोई स्वतंत्र तत्व नहीं है और सभ्यता कोई अलग संरचना नहीं है। यह तीनों एक ही मूल से विकसित होते हैं और एक-दूसरे को पोषित करते हैं। वैदिक दृष्टि में संस्कृति आधार है, धर्म उसका जीवन तत्व है और सभ्यता उसका बाहरी विस्तार है।


संस्कृति को भूमि के रूप में समझना इसलिए उचित है क्योंकि भूमि ही वह आधार होती है जिसमें बीज अंकुरित होता है और वृक्ष विकसित होता है। यदि भूमि उपजाऊ और संतुलित हो तो उसमें विविध प्रकार के वृक्ष उगते हैं, लेकिन यदि भूमि बंजर हो तो कोई वृक्ष विकसित नहीं हो सकता। इसी प्रकार संस्कृति समाज की वह आधारभूमि है जिसमें जीवन के मूल्य, परंपराएँ, आचार-विचार और जीवन पद्धतियाँ विकसित होती हैं। परिवार व्यवस्था, लोक परंपराएँ, भाषा, आचार, उत्सव, ऋतु आधारित जीवन, प्रकृति के प्रति सम्मान यह सब संस्कृति की भूमि को पोषित करते हैं।


इसी संस्कृति रूपी भूमि में धर्म रूपी वटवृक्ष उगता है। वटवृक्ष का उदाहरण वैदिक परंपरा में अत्यंत सार्थक माना गया है। वटवृक्ष एक ऐसा वृक्ष है जो केवल ऊपर की ओर नहीं बढ़ता, बल्कि उसकी शाखाएँ फैलती हैं, और उन्हीं शाखाओं से नई जड़ें नीचे उतरकर पुनः भूमि में जुड़ जाती हैं। धीरे-धीरे वह वृक्ष एक विस्तृत छाया का रूप ले लेता है। वटवृक्ष केवल एक वृक्ष नहीं रहता, बल्कि वह एक विस्तृत जीवंत व्यवस्था बन जाता है।
धर्म का स्वरूप भी इसी प्रकार है। धर्म किसी एक व्यक्ति, एक पुस्तक या एक समय में सीमित नहीं रहा। वह संस्कृति की भूमि से विकसित होकर समय के साथ विस्तार करता रहा। धर्म के मूल सिद्धांत ऋत, संतुलन, सहअस्तित्व, प्रकृति के प्रति सम्मान, कर्तव्य और मर्यादा यह मूल तना हैं। लेकिन समय के साथ इनसे अनेक शाखाएँ विकसित हुईं।

इन शाखाओं के रूप में मत, पंथ, संप्रदाय और विविध जीवन पद्धतियाँ विकसित हुईं। वैदिक परंपरा में कोई शिव का उपासक बना, कोई विष्णु का, कोई शक्ति का, कोई सूर्य का, कोई निराकार का साधक बना। कोई योग मार्ग पर चला, कोई भक्ति मार्ग पर, कोई ज्ञान मार्ग पर, कोई कर्म मार्ग पर। यह विविधता किसी संघर्ष का कारण नहीं बनी क्योंकि इन सबकी जड़ एक ही थी धर्म रूपी वटवृक्ष।

इसी प्रकार लोक परंपराएँ भी धर्म की शाखाएँ हैं। कहीं नदियों को माता माना गया, कहीं पर्वत पूजनीय बने, कहीं वृक्षों को देवत्व दिया गया, कहीं पशु-पक्षियों के प्रति श्रद्धा विकसित हुई। यह सब धर्म का विस्तार था। यह विविधता इस बात का प्रमाण है कि धर्म स्थिर नहीं रहा, बल्कि जीवंत रहा, समय के साथ विकसित हुआ, लेकिन उसके मूल सिद्धांत नहीं बदले।

सभ्यता इस वटवृक्ष की छाया में विकसित होने वाली व्यवस्था है। जब संस्कृति भूमि बनती है और धर्म वटवृक्ष बनकर फैलता है, तब उसके नीचे समाज की सभ्यता विकसित होती है नगर, व्यवस्था, व्यापार, शिक्षा, ज्ञान परंपरा, कला और विज्ञान।

इस प्रकार वैदिक व्यवस्था में संस्कृति आधार है, धर्म जीवन शक्ति है और सभ्यता उसका विस्तार है। यही कारण है कि भारतीय समाज में विविधता होने के बावजूद मूल एकता बनी रही। यह एकता किसी बाहरी व्यवस्था से नहीं, बल्कि संस्कृति रूपी भूमि में विकसित धर्म रूपी वटवृक्ष से उत्पन्न हुई, जिसने हजारों वर्षों तक समाज को संतुलित और जीवंत बनाए 


इसी कारण भारतीय समाज में हजारों परंपराएँ विकसित हुईं, लेकिन इन विविधताओं के बावजूद समाज विखंडित नहीं हुआ। इसका कारण यह था कि विविधता के ऊपर मूल एकता थी। उपासना के रूप भिन्न हो सकते थे, जीवन पद्धतियाँ अलग हो सकती थीं, लोक परंपराएँ क्षेत्र के अनुसार बदल सकती थीं, लेकिन जीवन का आधार एक ही था वैदिक धर्म और ऋत पर आधारित जीवन व्यवस्था। यही कारण था कि कोई शिव का उपासक था, कोई विष्णु का, कोई शक्ति का, कोई सूर्य का, कोई निराकार ब्रह्म का साधक था, फिर भी यह भिन्नता विरोध का कारण नहीं बनी।

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग परंपराएँ विकसित हुईं। कहीं ग्राम देवता की पूजा होती थी, कहीं कुलदेवता की परंपरा थी, कहीं नदी को माता माना गया, कहीं पर्वत को पूजनीय माना गया, कहीं वृक्षों को देवत्व दिया गया। उत्तर भारत की परंपराएँ दक्षिण भारत से भिन्न थीं, पूर्व की परंपराएँ पश्चिम से अलग थीं, लेकिन इन सबके बावजूद समाज में टकराव नहीं हुआ क्योंकि यह विविधता मूल सिद्धांतों के भीतर विकसित हुई थी।
वेदों ने किसी एक उपासना पद्धति को अनिवार्य नहीं बनाया, बल्कि जीवन के मूल सिद्धांत दिए  ऋत, सत्य, संतुलन, सहअस्तित्व, प्रकृति के प्रति सम्मान। इन्हीं मूल सिद्धांतों के भीतर विभिन्न उपासना पद्धतियाँ विकसित होती रहीं। यही कारण है कि भारतीय समाज में मतभेद थे, लेकिन वैमनस्य नहीं था; विविधता थी, लेकिन विखंडन नहीं था।

यह व्यवस्था इसलिए संभव हुई क्योंकि वैदिक दृष्टि सृष्टि को स्थिर नहीं मानती। वैदिक परंपरा के अनुसार सृष्टि निरंतर परिवर्तनशील है। सृष्टि उत्पन्न होती है, विकसित होती है, फिर प्रलय में लीन होती है और पुनः प्रकट होती है। यह सृष्टि, स्थिति और प्रलय का चक्र निरंतर चलता रहता है। यह केवल दार्शनिक कल्पना नहीं है, बल्कि सृष्टि की चक्रीय व्यवस्था को समझाने का वैदिक दृष्टिकोण है।

इस चक्र के भीतर एक महत्वपूर्ण बात यह कही गई कि सृष्टि बदलती है, लेकिन ज्ञान का मूल समाप्त नहीं होता। जब प्रलय होता है, तब भौतिक सृष्टि समाप्त हो जाती है, लेकिन वेद का ज्ञान नष्ट नहीं होता। वह समाहित रहता है और सृष्टि के पुनः प्रकट होने पर पुनः प्रकट होता है। यही कारण है कि वेद को अपौरुषेय और सनातन कहा गया।

वेदों को किसी एक समय में रचित ग्रंथ नहीं माना गया, बल्कि सृष्टि के मूल ज्ञान के रूप में स्वीकार किया गया। वैदिक परंपरा कहती है कि सृष्टि के प्रारंभ में ऋषियों को वेद का ज्ञान प्रकट हुआ। यह ज्ञान किसी व्यक्ति की रचना नहीं था, बल्कि सृष्टि के मूल सिद्धांतों का अनुभव था। इसलिए वेद को अंतिम प्रमाण माना गया, क्योंकि वे मूल सिद्धांत बताते हैं और मूल सिद्धांत कभी नहीं बदलते।

इसी कारण वैदिक व्यवस्था में परिवर्तन को स्वीकार किया गया, लेकिन मूल सिद्धांतों को स्थिर माना गया। उपासना पद्धतियाँ बदल सकती हैं, समाज की संरचना बदल सकती है, जीवन शैली बदल सकती है, लेकिन सत्य, ऋत, संतुलन और सहअस्तित्व जैसे मूल सिद्धांत नहीं बदलते। यही कारण है कि हजारों वर्षों के परिवर्तन के बावजूद भारतीय समाज की मूल संरचना बनी रही।
विविधता का यह विस्तार उसी वटवृक्ष की शाखाओं की तरह था, जिसकी जड़ें गहराई में एक ही स्थान पर जुड़ी रहती हैं। शाखाएँ फैलती हैं, नई शाखाएँ विकसित होती हैं, लेकिन मूल तना और जड़ें स्थिर रहती हैं। यही वैदिक व्यवस्था की विशेषता रही, जिसने विविधताओं को स्वीकार किया और फिर भी समाज को विखंडित होने से बचाए रखा।


वेद सृष्टि के मूल ज्ञान माने गए हैं, क्योंकि वैदिक परंपरा के अनुसार वेद किसी व्यक्ति, किसी समूह या किसी विशेष समय में रचित ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि सृष्टि के साथ प्रकट होने वाला ज्ञान हैं। इसी कारण वेदों को अपौरुषेय कहा गया है। अपौरुषेय का अर्थ है  जो पुरुष अर्थात्‌ मनुष्य द्वारा निर्मित न हो। इसका तात्पर्य यह है कि वेद किसी ऋषि द्वारा लिखे गए विचार नहीं हैं, बल्कि ऋषियों ने उस ज्ञान का साक्षात्कार किया जो सृष्टि में पहले से विद्यमान था। ऋषि वेदों के रचयिता नहीं माने गए, बल्कि वेदद्रष्टा माने गए  अर्थात्‌ जिन्होंने उस ज्ञान को देखा, अनुभव किया और प्रकट किया।

वैदिक परंपरा यह मानती है कि जब सृष्टि का प्रारम्भ होता है, तब परम चेतना से ज्ञान का प्रादुर्भाव होता है। यही ज्ञान वेद के रूप में प्रकट होता है। जब प्रलय होता है, तब भौतिक सृष्टि लीन हो जाती है, लेकिन ज्ञान समाप्त नहीं होता। वह समाहित रहता है और सृष्टि के पुनः प्रारम्भ होने पर पुनः प्रकट होता है। इस दृष्टि से वेद समय से परे हैं। वे किसी ऐतिहासिक कालखंड तक सीमित नहीं हैं। इसी कारण वेदों को सनातन कहा गया जो सृष्टि की आदि से है और सृष्टि के अंत तक रहेगा।
वेदों में जो सिद्धांत दिए गए हैं, उन्हें मूल सिद्धांत माना गया, क्योंकि वे सृष्टि के शाश्वत नियमों पर आधारित हैं। वेद केवल धार्मिक अनुष्ठानों का ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि सृष्टि, प्रकृति, मनुष्य, समाज, ज्ञान और जीवन की संपूर्ण व्यवस्था का आधार हैं। वेदों में ऋत का सिद्धांत है, प्रकृति के संतुलन का सिद्धांत है, सहअस्तित्व का सिद्धांत है, सत्य और कर्तव्य का सिद्धांत है। यह सिद्धांत किसी विशेष समय या समाज के लिए नहीं हैं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि के लिए हैं।

इसी कारण यह कहा गया कि मूल सिद्धांत कभी नहीं बदलते। समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, समाज की संरचना बदलती है, जीवन शैली बदलती है, लेकिन सृष्टि के मूल नियम नहीं बदलते। सूर्य आज भी उसी प्रकार उदित होता है, पृथ्वी उसी प्रकार घूमती है, ऋतुएँ उसी क्रम से आती हैं, जीवन और मृत्यु का क्रम आज भी वैसा ही है जैसा पहले था। यह सब ऋत है, और यही वेदों में वर्णित शाश्वत व्यवस्था है।

इसका अर्थ यह नहीं कि समाज में परिवर्तन नहीं होता। परिवर्तन सृष्टि का स्वभाव है। लेकिन परिवर्तन व्यवहार में होता है, मूल सिद्धांतों में नहीं। उदाहरण के लिए जीवन शैली बदल सकती है, साधन बदल सकते हैं, समाज की व्यवस्था बदल सकती है, लेकिन सत्य का महत्व नहीं बदलता, संतुलन का महत्व नहीं बदलता, कर्तव्य का महत्व नहीं बदलता। यही मूल सिद्धांत हैं जो वेदों में बताए गए और जो सृष्टि के साथ जुड़े हुए हैं।

इसी दृष्टि से वेद केवल प्राचीन ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि सृष्टि के शाश्वत ज्ञान का स्रोत हैं। वेदों में वर्णित सिद्धांत समय के साथ अप्रासंगिक नहीं होते, क्योंकि वे किसी विशेष कालखंड के लिए नहीं, बल्कि सृष्टि के मूल नियमों पर आधारित हैं। यही कारण है कि वेदों को अंतिम प्रमाण माना गया और यही कारण है कि कहा गया — मूल सिद्धांत नहीं बदलते, क्योंकि वे सृष्टि के शाश्वत नियमों पर आधारित हैं।


यदि हम प्रकृति को ध्यानपूर्वक देखें तो सबसे पहले जो बात स्पष्ट होती है, वह यह है कि प्रकृति में समानता नहीं है, बल्कि विविधता है। कहीं ऊँचे पर्वत हैं, कहीं गहरी घाटियाँ हैं, कहीं विशाल समुद्र हैं, कहीं बहती नदियाँ हैं, कहीं घने वन हैं, तो कहीं मरुस्थल हैं। पर्वत और नदी समान नहीं हैं, समुद्र और वन समान नहीं हैं, आकाश और पृथ्वी समान नहीं हैं, फिर भी यह संपूर्ण सृष्टि संतुलित रूप से चल रही है। यही प्रकृति की विशेषता है कि विविधता के भीतर संतुलन है।

यदि प्रकृति में सब समान होता, तो जीवन संभव ही नहीं होता। यदि केवल पर्वत ही होते और नदियाँ न होतीं, तो जल का प्रवाह समाप्त हो जाता। यदि केवल समुद्र ही होते और भूमि न होती, तो जीवन का विस्तार संभव नहीं होता। यदि केवल वर्षा ही होती और सूर्य का ताप न होता, तो संतुलन बिगड़ जाता। इसी प्रकार प्रकृति का प्रत्येक तत्व अलग है, लेकिन एक-दूसरे के पूरक हैं। यही संतुलन सृष्टि को बनाए रखता है। यही ऋत है — वह शाश्वत व्यवस्था जिसमें विविधता के भीतर संतुलन स्थापित रहता है।

प्रकृति का यह संतुलन केवल भौतिक जगत तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन के स्तर पर भी उतना ही लागू होता है। मनुष्य भी उसी प्रकृति का भाग है। वैदिक दर्शन में प्रकृति को त्रिगुणात्मक कहा गया है सत्त्व, रजस और तमस। यह तीनों गुण प्रकृति के मूल तत्व हैं। सत्त्व का संबंध संतुलन, ज्ञान और शांति से है; रजस का संबंध गति, क्रिया और परिवर्तन से है; तमस का संबंध स्थिरता, जड़ता और विश्राम से है।

इन तीनों गुणों के बिना सृष्टि का संचालन संभव नहीं है। केवल सत्त्व हो तो गति समाप्त हो जाएगी, केवल रजस हो तो स्थिरता समाप्त हो जाएगी, केवल तमस हो तो चेतना समाप्त हो जाएगी। इसलिए प्रकृति इन तीनों गुणों के संतुलन से चलती है। यही त्रिगुणात्मक व्यवस्था है।
मनुष्य भी इसी त्रिगुणात्मक प्रकृति का हिस्सा है। हर व्यक्ति में सत्त्व, रजस और तमस का अनुपात अलग-अलग होता है। किसी में सत्त्व अधिक होता है, किसी में रजस अधिक होता है, किसी में तमस अधिक होता है। यही कारण है कि सभी मनुष्यों की प्रकृति, स्वभाव, क्षमता और प्रवृत्ति अलग होती है। कोई चिंतनशील होता है, कोई कर्मशील होता है, कोई स्थिर और धैर्यवान होता है। कोई नेतृत्व करता है, कोई अनुसरण करता है, कोई सृजन करता है, कोई संरक्षण करता है।


इस दृष्टि से देखें तो स्पष्ट होता है कि सभी मनुष्यों को एक समान बनाना संभव नहीं है, क्योंकि प्रकृति स्वयं समान नहीं है। विविधता प्रकृति का नियम है और संतुलन उसका आधार है। यही कारण है कि वैदिक व्यवस्था में समानता की अपेक्षा संतुलन को महत्व दिया गया। समाज में सभी का स्थान है, सभी की भूमिका है, लेकिन सभी समान नहीं हो सकते।
इस प्रकार प्रकृति की विविधता और त्रिगुणात्मक व्यवस्था यह स्पष्ट करती है कि सृष्टि संतुलन पर चलती है, समानता पर नहीं। यही ऋत है, यही प्रकृति का नियम है, और मनुष्य भी उसी नियम का भाग है।


रामराज्य इसी संतुलन की व्यवस्था का जीवंत उदाहरण था। रामराज्य का अर्थ यह नहीं था कि सभी मनुष्य समान स्थिति में थे, सबके कार्य एक जैसे थे या सभी के पास समान साधन थे। रामराज्य की मूल भावना समानता नहीं, बल्कि धर्म आधारित संतुलन थी। समाज का प्रत्येक वर्ग अपनी प्रकृति, गुण और कर्म के अनुसार कार्य करता था और उसी के आधार पर समाज का संचालन होता था। कोई कृषि करता था, कोई व्यापार करता था, कोई ज्ञान परंपरा का संरक्षण करता था, कोई शिल्प और सेवा कार्य करता था। यह व्यवस्था प्रतिस्पर्धा की नहीं, बल्कि परस्पर पूरकता की थी।

रामचरितमानस में तुलसीदास जी रामराज्य का वर्णन करते हुए लिखते हैं 
सब नर करहिं परस्पर प्रीती।
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति॥”

यह पंक्ति रामराज्य की मूल भावना को स्पष्ट करती है। लोग एक-दूसरे से प्रेम करते थे और अपने-अपने स्वधर्म का पालन करते थे। यहाँ स्वधर्म का अर्थ अपने गुण, कर्म और स्वभाव के अनुसार कर्तव्य निभाना है। जब हर व्यक्ति अपना कर्तव्य निभाता है, तब समाज में संतुलन बनता है।

रामराज्य में राजा सर्वोच्च नहीं था, धर्म सर्वोच्च था। राजा धर्म के अधीन था। श्रीराम ने स्वयं को कभी निरंकुश शासक नहीं माना। उन्होंने मर्यादा का पालन किया, लोकमत का सम्मान किया और न्याय को सर्वोपरि रखा। यही कारण है कि राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया। शासन का उद्देश्य सत्ता नहीं, बल्कि लोककल्याण था।

रामराज्य में अर्थतंत्र भी संतुलन पर आधारित था। समाज श्रम आधारित था। प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्म से जीवन यापन करता था। कृषि, व्यापार, पशुपालन, शिल्प सभी कार्य सम्मानित थे। कोई कार्य छोटा या बड़ा नहीं माना जाता था। परिश्रम जीवन का आधार था।
दान की व्यवस्था भी रामराज्य का महत्वपूर्ण भाग थी। समाज में जो संपन्न थे, वे दान देते थे। राजा भी दान देता था और समाज भी दान देता था। यह दान केवल धार्मिक कर्म नहीं था, बल्कि सामाजिक संतुलन का माध्यम था। इससे समाज के कमजोर वर्गों को सहारा मिलता था, लेकिन उन्हें परिश्रम से दूर नहीं किया जाता था।
वाल्मीकि रामायण में रामराज्य का वर्णन करते हुए कहा गया है कि उस समय कोई व्यक्ति दुःखी नहीं था, कोई असमय मृत्यु नहीं होती थी, लोग सुरक्षित थे और समाज संतुलित था। इसका अर्थ यह नहीं कि सभी समान थे, बल्कि यह कि समाज में असंतुलन नहीं था।

रामचरितमानस में भी कहा गया 
“दैहिक दैविक भौतिक तापा।
रामराज नहिं काहुहि ब्यापा॥”

अर्थात दैहिक, दैविक और भौतिक कष्ट न्यूनतम थे। इसका कारण यह था कि समाज धर्म और संतुलन के आधार पर चल रहा था।

रामराज्य में कोई भूखा नहीं था क्योंकि उत्पादन संतुलित था, दान की परंपरा थी और समाज परस्पर सहयोग पर आधारित था। कोई भयभीत नहीं था क्योंकि न्याय व्यवस्था सुदृढ़ थी और शासन धर्म के अधीन था।
इस प्रकार रामराज्य समानता आधारित समाज नहीं था, बल्कि संतुलन आधारित समाज था। वहाँ विविधता थी, लेकिन विखंडन नहीं था। भिन्नता थी, लेकिन संघर्ष नहीं था। प्रत्येक व्यक्ति का स्थान था, प्रत्येक कार्य का सम्मान था, और यही संतुलन रामराज्य को आदर्श बनाता है।


पिछले लगभग तीन सौ वर्षों में भारतीय समाज पर ऐसे अनेक वैचारिक प्रयोग किए गए जिनका जन्म भारतीय सभ्यता की स्वाभाविक प्रक्रिया में नहीं हुआ था, बल्कि यूरोप की ऐतिहासिक परिस्थितियों में हुआ था। यह केवल राजनीतिक शासन परिवर्तन का विषय नहीं था, बल्कि समाज को देखने की दृष्टि को ही बदलने का प्रयास था। भारतीय समाज, जो हजारों वर्षों से संतुलन, समन्वय और सहअस्तित्व पर आधारित था, उसे धीरे-धीरे संघर्ष और विभाजन के ढाँचे में समझने की प्रवृत्ति विकसित हुई।

यूरोप का इतिहास भारतीय समाज से मूलतः भिन्न रहा है। वहाँ क्रिश्चियनिटी का विस्तार केवल आस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समाज को दो वर्गों में देखने की प्रवृत्ति भी विकसित हुई। एक वर्ग वह जो उस मत को स्वीकार करता है और दूसरा वह जो स्वीकार नहीं करता। “पैगन” और “नॉन-बिलीवर” जैसे शब्द इसी विभाजनकारी सोच को दर्शाते हैं। इस दृष्टि में सत्य एक ही माना गया और उससे भिन्न विचार रखने वालों को अलग वर्ग में रखा गया। यह सोच स्वाभाविक रूप से समाज को द्वैत में बाँटने वाली थी  एक सही, दूसरा गलत; एक स्वीकार्य, दूसरा अस्वीकार्य।

भारतीय परंपरा इससे भिन्न रही। यहाँ कभी यह नहीं कहा गया कि जो किसी विशेष मत को नहीं मानता उसे जीने का अधिकार नहीं है। यहाँ विविधता को स्वाभाविक रूप से स्वीकार किया गया। कोई शिव का उपासक है, कोई विष्णु का, कोई शक्ति का, कोई सूर्य का, कोई निराकार का — फिर भी समाज विभाजित नहीं हुआ। यहाँ अनेक दर्शन विकसित हुए  सांख्य, योग, वेदांत, न्याय, मीमांसा  लेकिन यह विविधता संघर्ष में नहीं बदली। इसका कारण यही था कि भारतीय समाज को द्वैत में नहीं, बल्कि समन्वय और संतुलन के रूप में देखा गया।

यूरोप में विकसित यही द्वैतवादी सोच आगे चलकर राजनीतिक और आर्थिक विचारों में भी दिखाई दी। कार्ल मार्क्स ने समाज को शोषक और शोषित वर्गों में बाँटकर देखा। यह विचार यूरोप की औद्योगिक क्रांति की परिस्थितियों से निकला था, लेकिन इसकी संरचना भी द्वैत पर आधारित थी। समाज को संघर्ष के आधार पर देखने की प्रवृत्ति विकसित हुई।

जब पारंपरिक मार्क्सवाद अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाया, तब उसके नए रूप सामने आए। 1923 में फ्रैंकफर्ट स्कूल की स्थापना हुई। इसके बाद समाज को संस्कृति, शिक्षा, भाषा, परंपरा और सामाजिक संरचनाओं के माध्यम से प्रभावित करने की अवधारणा विकसित हुई। अंतोनियो ग्राम्सी ने सांस्कृतिक वर्चस्व की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसमें समाज को धीरे-धीरे वैचारिक रूप से बदलने की रणनीति दी गई।

इसके बाद कल्चरल मार्क्सवाद के विभिन्न रूप सामने आने लगे। 1930 के दशक में क्रिटिकल थ्योरी विकसित हुई। 1960 के दशक में पहचान आधारित राजनीति और क्रिटिकल रेस थ्योरी सामने आई। आगे चलकर पोस्ट-मॉडर्न विचारधारा, पहचान आधारित विमर्श, DEI, लैंगिक पहचान आधारित सिद्धांत और अनेक नए वैचारिक ढाँचे सामने आए। इन सभी में एक समान तत्व दिखाई देता है  समाज को विभिन्न पहचान समूहों में विभाजित करके देखना।

कहीं समाज को शोषक और शोषित में बाँटा गया, कहीं बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक में, कहीं विशेषाधिकार प्राप्त और वंचित में। समय के साथ इन विचारों के नए-नए रूप सामने आते रहे, लेकिन मूल ढाँचा वही रहा — समाज को द्वैत में देखना।

भारतीय समाज की परंपरा इससे भिन्न रही है। यहाँ समाज को स्थायी रूप से दो विरोधी वर्गों में नहीं बाँटा गया। यहाँ गुण, कर्म और स्वभाव के आधार पर विविधता स्वीकार की गई। यहाँ समन्वय, संतुलन और सहअस्तित्व की परंपरा रही। व्यक्ति को अपने मत, विचार और साधना का मार्ग चुनने की स्वतंत्रता रही। धर्म का अर्थ भी यही रहा  जो जीवन और जगत को धारण करे और संतुलन बनाए रखे।

स्वतंत्रता के बाद भारत के संविधान में समानता को मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया गया। यह आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण सिद्धांत था। लेकिन व्यवहार में समानता पूरी तरह स्थापित नहीं हो सकी, क्योंकि प्रकृति और समाज दोनों विविधता पर आधारित हैं। समान अवसर संभव है, लेकिन पूर्ण समानता व्यवहार में कठिन होती है।

स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक भारत में समाजवादी नीति अपनाई गई। राज्य की भूमिका बढ़ती गई और राज्य समाज को नियंत्रित करने वाली सबसे बड़ी शक्ति बनता गया। 1990 के दशक तक राज्य आधारित अर्थव्यवस्था प्रमुख रही। बाद में आर्थिक उदारीकरण हुआ, लेकिन पहचान आधारित राजनीति और वर्ग आधारित सोच समाज में बनी रही।

आज भी समाज को विभिन्न समूहों में बाँटकर देखने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। यह प्रक्रिया समय के साथ नए-नए रूप लेती रहती है। भारतीय समाज की मूल संरचना संतुलन और सहअस्तित्व पर आधारित रही है, जबकि पश्चिम से आए विचार कई बार समाज को संघर्ष के आधार पर देखने का प्रयास करते हैं।

यही कारण है कि पिछले तीन सौ वर्षों में भारतीय समाज पर हुए पश्चिमी प्रयोगों ने समाज को नए ढाँचे में देखने की प्रवृत्ति पैदा की। प्रश्न आज भी वही है — समाज को विभाजन के आधार पर समझा जाए या संतुलन के आधार पर। यही वर्तमान समय का सबसे बड़ा वैचारिक विमर्श है।

बचपन का वह प्रश्न आज भी मेरे भीतर कहीं गूंजता रहता है मनुष्य का जन्म क्यों हुआ है? उस समय दिया गया उत्तर सहज था, बिना किसी अध्ययन के, बिना किसी दार्शनिक विचार के, लेकिन जीवन के अनुभवों ने धीरे-धीरे उस उत्तर को गहराई दे दी। जैसे-जैसे समाज को देखा, इतिहास को पढ़ा, परंपरा को समझा, प्रकृति को देखा, वैसे-वैसे यह स्पष्ट होता गया कि मनुष्य का जन्म केवल अपने लिए नहीं हुआ है। मनुष्य का जन्म सृष्टि के संतुलन की रक्षा के लिए हुआ है।

जब प्रकृति को देखते हैं तो यह बात सहज समझ में आती है। सूर्य समय पर उदित होता है, ऋतुएँ क्रम से आती हैं, नदी बहती है, वृक्ष फल देते हैं, धरती धारण करती है। प्रकृति कहीं भी समान नहीं है, लेकिन संतुलित है। यही संतुलन सृष्टि को चलाता है। यही ऋत है। जब संतुलन बना रहता है तो जीवन चलता है, और जब संतुलन टूटता है तो संकट आता है। आज पर्यावरण संकट हो, जल संकट हो, सामाजिक विघटन हो  सबका मूल यही है कि संतुलन टूट रहा है।

मनुष्य भी इसी प्रकृति का अंग है, उससे अलग नहीं। लेकिन जब मनुष्य स्वयं को प्रकृति का स्वामी मानने लगता है, तब असंतुलन शुरू होता है। वैदिक दृष्टि ने मनुष्य को कभी स्वामी नहीं माना, बल्कि संरक्षक माना। इसलिए यहाँ पृथ्वी माता है, नदियाँ माताएँ हैं, वृक्ष पूजनीय हैं, पशु भी जीवन का हिस्सा हैं। यह केवल आस्था नहीं है, यह जीवन की संतुलन आधारित दृष्टि है।
यही धर्म है। धर्म का अर्थ पूजा-पद्धति नहीं है, धर्म का अर्थ है धारण करने वाली व्यवस्था। जो समाज को धारण करे, जो प्रकृति को धारण करे, जो जीवन को संतुलित रखे  वही धर्म है। जब मनुष्य संतुलन बनाए रखता है, तब धर्म जीवित रहता है। जब मनुष्य संतुलन तोड़ता है, तब अधर्म बढ़ता है।

इसी से संस्कृति विकसित होती है। संस्कृति कोई अलग चीज नहीं है, संस्कृति वही है जो जीवन को संतुलित बनाए। परिवार व्यवस्था, परंपराएँ, प्रकृति के प्रति सम्मान, समाज में समन्वय  यही संस्कृति है। सभ्यता बदलती रहती है, लेकिन संस्कृति का मूल संतुलन बना रहता है।

आज जब समाज को देखते हैं तो लगता है कि हम धीरे-धीरे उसी संतुलन से दूर होते जा रहे हैं। मनुष्य अधिकार की बात करता है, कर्तव्य भूलता जा रहा है। प्रकृति संसाधन बन गई है, समाज पहचान में बंट रहा है, परिवार कमजोर हो रहे हैं। यह सब संतुलन के टूटने के संकेत हैं।

इसलिए बचपन का वह प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है। मनुष्य का जन्म केवल भोग के लिए नहीं हुआ है, न सत्ता के लिए, न संसाधनों के संग्रह के लिए। मनुष्य का जन्म सृष्टि के संतुलन की रक्षा के लिए हुआ है। यही ऋत है। यही धर्म है। यही संस्कृति है। यही सभ्यता है। यही वैदिक व्यवस्था है। यही सनातन है।
और शायद यही वह सरल सत्य है, जो बचपन में सहज लगा था, लेकिन जीवन ने उसे धीरे-धीरे अनुभव में बदल दिया।

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