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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
भारतीय समाज जीवन को लेकर आज सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम अपने समाज को समझने का प्रयास कम करते हैं और उसके बारे में निष्कर्ष अधिक निकालते हैं। हम आवश्यकता से अधिक आदर्शवादी होते जा रहे हैं। हम चाहते हैं कि समाज एक झटके में रामराज्य जैसा बन जाए। हम चाहते हैं कि समाज में कोई भेदभाव न रहे, सब समान हो जाएँ, सबको समान अवसर मिल जाए, सब न्यायपूर्ण हो जाए। यह भावना अपने आप में गलत नहीं है, परन्तु समस्या तब उत्पन्न होती है जब हम आदर्श को व्यवहारिक यथार्थ के स्थान पर स्थापित करने लगते हैं। समाज हजारों वर्षों में विकसित होता है और उसमें परिवर्तन भी क्रमिक रूप से ही संभव होता है। भारत जैसा विशाल और बहुस्तरीय समाज जिसमें भाषा, क्षेत्र, परंपरा, जाति, जीवन शैली, आर्थिक स्तर और सांस्कृतिक विविधता अत्यधिक है उसे एक ही मानक में ढालने का प्रयास स्वाभाविक रूप से तनाव उत्पन्न करता है। यदि हम भारत की राजनीति और समाज का पिछले लगभग सौ वर्षों का अध्ययन करें विशेषकर 1920 के बाद के घटनाक्रमों को देखें तो स्पष्ट दिखाई देता है कि भारतीय समाज को समझने के बजाय उसे वैचारिक प्रयोगशाला बना दिया गया।
औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने केवल राजनीतिक शासन नहीं किया, बल्कि भारतीय समाज की संरचना को भी प्रभावित किया। 1871 में पहली बार ब्रिटिश जनगणना में भारतीय समाज को व्यवस्थित रूप से जातिगत श्रेणियों में बाँटा गया। इससे पहले जातियाँ थीं, परन्तु वे प्रशासनिक और राजनीतिक पहचान के रूप में कठोर रूप में स्थापित नहीं थीं। 1901 में ब्रिटिश प्रशासक हर्बर्ट रिस्ले ने जाति को नस्ल से जोड़ने का प्रयास किया और भारतीय समाज को नस्लीय आधार पर वर्गीकृत किया। रिस्ले का मानना था कि भारतीय समाज नस्लीय रूप से विभाजित है और जाति उसी का परिणाम है। यह सिद्धांत ऐतिहासिक रूप से विवादास्पद रहा, परन्तु इसका प्रभाव गहरा पड़ा। जाति जो पहले सामाजिक पहचान थी, धीरे-धीरे राजनीतिक और प्रशासनिक पहचान बन गई। इतिहासकार निकोलस डिर्क्स ने अपनी पुस्तक Castes of Mind में लिखा कि औपनिवेशिक शासन ने जाति को कठोर सामाजिक ढाँचे में बदल दिया।
ईसाई मिशनरियों ने भी भारतीय समाज को विभाजित करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। 19वीं सदी और 20वीं सदी के प्रारंभिक मिशनरी साहित्य में भारतीय समाज को अत्यधिक दमनकारी बताया गया। इससे धर्मांतरण को नैतिक औचित्य दिया गया। इसी समय 1835 में थॉमस बैबिंगटन मैकॉले की शिक्षा नीति लागू की गई। मैकॉले ने स्पष्ट कहा था कि ऐसी शिक्षा प्रणाली विकसित की जानी चाहिए जो भारतीयों को मानसिक रूप से अंग्रेज बना दे। परिणामस्वरूप पारंपरिक गुरुकुल प्रणाली कमजोर हुई और पश्चिमी शिक्षा प्रणाली विकसित हुई। इससे भारतीय समाज का बौद्धिक वर्ग अपनी परंपरा से दूर होने लगा और भारतीय समाज को पश्चिमी समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से देखने लगा।
किन्तु इन सबके बावजूद भारतीय समाज पूरी तरह विघटित नहीं हुआ। इसका कारण भारतीय समाज की चिति है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने 1965 में अपने एकात्म मानववाद के व्याख्यानों में “चिति” की अवधारणा स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि राष्ट्र केवल भौगोलिक इकाई नहीं होता, बल्कि उसकी एक आत्मा होती है। भारतीय समाज की चिति सनातन धर्म पर आधारित है। यहाँ धर्म का अर्थ रिलिजन नहीं है। धर्म का अर्थ है वह शाश्वत व्यवस्था जो सृष्टि को धारण करती है। भारतीय चिंतन में धर्म का आधार “ऋत” है। ऋग्वेद में “ऋत” को सृष्टि का मूल नियम बताया गया है “ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्।”
ऋत का अर्थ है कॉस्मिक ऑर्डर सृष्टि की शाश्वत व्यवस्था। भारतीय परंपरा में ब्रह्मा सृजन के प्रतीक हैं, विष्णु पालन के और महेश लय के। यही सृजन, पालन और लय का शाश्वत चक्र ऋत है। भारतीय समाज ने इस कॉस्मिक व्यवस्था को सामाजिक जीवन में उतारा। इसलिए कुलदेवता, ग्रामदेवता, स्थानदेवता, लोकदेवता की परंपरा विकसित हुई। राजस्थान में तेजाजी, रामदेवजी, महाराष्ट्र में खंडोबा, दक्षिण भारत में अय्यनार यह सब भारतीय समाज की स्थानीय चेतना के उदाहरण हैं।
भारतीय दर्शन में प्रकृति को त्रिगुणात्मक कहा गया है — सत्व, रज और तम। भगवद्गीता में कहा गया — “त्रिगुणमयी माया”। प्रकृति में विविधता स्वाभाविक है। सभी मनुष्यों का गुण, कर्म और स्वभाव अलग होता है। कोई सत्व प्रधान होता है, कोई रज प्रधान, कोई तम प्रधान। इसलिए समाज में विविधता स्वाभाविक है। पूर्ण समानता प्रकृति के विरुद्ध है। जैसे शेर और सियार समान नहीं हो सकते, नदी और समुद्र समान नहीं हो सकते, सूर्य और चंद्र समान नहीं हो सकते — वैसे ही समाज में सभी लोग समान नहीं हो सकते।
महर्षि अरविन्द ने 1911 में स्पष्ट कहा था कि भारत की आत्मा सनातन धर्म में निहित है। यह कथन उन्होंने किसी धार्मिक आग्रह से नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास और सभ्यता के गहन अध्ययन के आधार पर कहा था। महर्षि अरविन्द ने कहा था कि भारत का राष्ट्र धर्म सनातन है। भारत की अवनति होती है तो सनातन धर्म की अवनति होती है और भारत का उत्थान होता है तो सनातन धर्म का उत्थान होता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट कहा कि सनातन धर्म के बिना भारत के अस्तित्व की कल्पना संभव नहीं है। यदि हम भारतीय इतिहास को देखें तो यह बात स्पष्ट दिखाई देती है। जब-जब भारत की सांस्कृतिक चेतना मजबूत रही, भारत उन्नत रहा चाहे वह वैदिक काल हो, गुप्त काल हो या चोल साम्राज्य का समय। और जब-जब सांस्कृतिक चेतना कमजोर हुई, तब-तब भारत राजनीतिक रूप से भी कमजोर हुआ। यही कारण है कि महर्षि अरविन्द ने भारत को केवल एक राजनीतिक इकाई नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में देखा जिसकी आत्मा सनातन धर्म है।
भारतीय समाज में विकृतियाँ आईं, यह भी सत्य है, परन्तु भारतीय समाज की विशेषता यह रही कि समाज ने स्वयं अपने भीतर से सुधार आंदोलनों को जन्म दिया। 12वीं सदी में रामानुजाचार्य ने सामाजिक समरसता की बात की। 15वीं सदी में कबीर और रविदास ने जातिगत भेदभाव पर प्रश्न उठाए। गुरु नानक देव ने मानव एकता का संदेश दिया। महाराष्ट्र में संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम और एकनाथ ने समाज को जोड़ने का प्रयास किया। दक्षिण भारत में बसवन्ना ने सामाजिक सुधार का कार्य किया। इन सभी सुधार आंदोलनों की विशेषता यह थी कि ये समाज के भीतर से निकले, किसी बाहरी विचारधारा से प्रेरित नहीं थे। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय समाज की चिति जीवित थी और जब भी विकृतियाँ आईं, समाज ने स्वयं उन्हें सुधारने का प्रयास किया।
अब यदि इतिहास को नंद वंश से देखें तो यह कथन कि भारतीय समाज हजारों वर्षों तक शोषण आधारित रहा, पूरी तरह खंडित हो जाता है। महापद्म नंद, जिन्हें अनेक स्रोतों में शूद्र मूल का बताया गया है, मगध के सबसे शक्तिशाली शासक बने। पुराणों में उन्हें “सर्वक्षत्रान्तक” कहा गया अर्थात उन्होंने पारंपरिक क्षत्रिय राजाओं को समाप्त कर सत्ता स्थापित की। यह दर्शाता है कि सत्ता किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं थी।
नंद वंश के बाद मौर्य साम्राज्य आया। चंद्रगुप्त मौर्य ने विशाल साम्राज्य स्थापित किया। उसके बाद सातवाहन, चोल, पांड्य, राष्ट्रकूट, चालुक्य, काकतीय, यादव ये सभी राजवंश विभिन्न सामाजिक समूहों से आए। दक्षिण भारत के चोल साम्राज्य ने समुद्री व्यापार पर नियंत्रण स्थापित किया और दक्षिण-पूर्व एशिया तक भारतीय प्रभाव फैलाया।
मध्य भारत में गोंड राजवंश रहा। रानी दुर्गावती गोंड समाज से थीं और उन्होंने मुगल सेना का सामना किया। असम में अहोम साम्राज्य ने लगभग 600 वर्षों तक शासन किया। लचित बोरफुकन ने मुगलों को पराजित किया। मराठा शक्ति का उदय हुआ। छत्रपति शिवाजी महाराज ने मराठा साम्राज्य स्थापित किया। मराठा समाज आज ओबीसी वर्ग में आता है। जाट शासक महाराजा सूरजमल ने सशक्त राज्य बनाया। भील, नागा, कोल, गोंड इन सभी जनजातीय समाजों के स्थानीय शासन रहे।
यदि आर्थिक दृष्टि से देखें तो 1700 तक भारत विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था। एंगस मैडिसन के अनुसार भारत का वैश्विक अर्थव्यवस्था में लगभग 24 प्रतिशत हिस्सा था। वस्त्र उद्योग, धातु उद्योग, कृषि, हस्तकला — ये सभी विभिन्न सामाजिक समूहों द्वारा संचालित थे। उस समय व्यापार, कृषि और उद्योग पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं था। एक प्रकार से आर्थिक अवसर 100 प्रतिशत खुले थे। यदि समाज व्यापक रूप से शोषित होता तो भारत विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था कैसे बनता?
अब आधुनिक लोकतंत्र को देखें। स्वतंत्र भारत में सत्ता और प्रशासन में विविध सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व लगातार बढ़ा। केवल लालू यादव, मुलायम सिंह यादव या मायावती तक ही यह सीमित नहीं है, बल्कि उससे पहले भी अनेक उदाहरण हैं।
कर्पूरी ठाकुर बिहार के मुख्यमंत्री बने वे अत्यंत साधारण पृष्ठभूमि से थे। चौधरी चरण सिंह किसान पृष्ठभूमि से प्रधानमंत्री बने। देवीलाल हरियाणा में किसान समाज से मुख्यमंत्री बने। भजनलाल हरियाणा में गैर पारंपरिक पृष्ठभूमि से मुख्यमंत्री बने।
इसके बाद लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, मायावती, नीतीश कुमार — ये सभी सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों से आए नेतृत्व के उदाहरण हैं। मायावती दलित समाज से चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं यह लोकतंत्र में सामाजिक गतिशीलता का बड़ा उदाहरण है।
राष्ट्रपति पद पर भी सामाजिक विविधता दिखाई देती है। के. आर. नारायणन अनुसूचित जाति से राष्ट्रपति बने। रामनाथ कोविंद अनुसूचित जाति से राष्ट्रपति बने। द्रौपदी मुर्मू जनजातीय समाज से राष्ट्रपति बनीं यह भारतीय लोकतंत्र की ऐतिहासिक घटना है।
प्रशासनिक सेवाओं में भी बड़ी संख्या में एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग से आईएएस, आईपीएस अधिकारी बने। जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक, सचिव स्तर के अधिकारी सभी वर्गों से आए। यह दर्शाता है कि आधुनिक लोकतंत्र में अवसर व्यापक हुए हैं।
अब प्रश्न यह है यदि नंद वंश से लेकर आधुनिक लोकतंत्र तक सत्ता, प्रशासन, व्यापार और अर्थव्यवस्था में इन वर्गों की भागीदारी रही है, तो फिर तीन हजार वर्षों के व्यापक शोषण का कथन किस आधार पर खड़ा किया जा रहा है?
आज समाज को शोषक और शोषित में बाँटने का प्रयास किया जाता है। यह विचार भारतीय नहीं है। यह मार्क्सवादी विचारधारा से आया है। मार्क्सवाद ने समाज को दो वर्गों में बाँटा शोषक और शोषित। लेकिन यह विचार स्वयं भी मूल रूप से अब्राहमिक मजहबी सोच से प्रभावित है, जहाँ समाज को दो भागों में बाँटा गया मोमिन और काफिर, बिलीवर और नॉन-बिलीवर। अर्थात समाज को द्वैत में बाँटना यही विचार बाद में मार्क्सवाद में वर्ग संघर्ष के रूप में आया।
भारतीय समाज की प्रकृति इससे भिन्न है। भारतीय समाज का आधार समन्वय है। ऋग्वेद में कहा गया —
“संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।”
भारतीय समाज ने विविधता को स्वीकार किया, उसे संघर्ष का आधार नहीं बनाया।
भारतीय दर्शन में प्रकृति को त्रिगुणात्मक कहा गया है — सत्व, रज और तम। प्रत्येक व्यक्ति का स्वभाव अलग होता है। कोई सत्व प्रधान होता है, कोई रज प्रधान, कोई तम प्रधान। इसलिए समाज में विविधता स्वाभाविक है। पूर्ण समानता का आग्रह प्रकृति के विरुद्ध है।
क्या सूर्य और चंद्र समान हैं?
क्या समुद्र और नदी समान हैं?
क्या शेर और सियार समान हैं?
क्या बाज और गिद्ध समान हैं?
क्या आम और अमरूद समान हैं?
जब प्रकृति में समानता नहीं है, तो समाज में पूर्ण समानता का आग्रह क्यों? यह आग्रह आदर्शवाद है, और यही आदर्शवाद समाज को वास्तविकता से दूर ले जाता है।
महात्मा गांधी ने जिस रामराज्य की कल्पना की थी, वह भारतीय परंपरा से उद्भूत व्यवस्था की कल्पना थी। गांधीजी के लिए रामराज्य केवल राजनीतिक व्यवस्था नहीं था, बल्कि धर्म आधारित नैतिक राज्य था — यहाँ धर्म का अर्थ किसी मत, पंथ या रिलिजन से नहीं, बल्कि सनातन वैदिक धर्म के उस सिद्धांत से था जो समाज में संतुलन, न्याय और कर्तव्य का बोध कराता है। गांधीजी स्वयं कहते थे मेरे लिए रामराज्य का अर्थ हिंदू राज्य नहीं, बल्कि धर्म आधारित न्यायपूर्ण व्यवस्था है।” परन्तु यह भी उतना ही सत्य है कि गांधीजी की रामराज्य की अवधारणा भारतीय परंपरा, रामायण, ग्राम आधारित जीवन और धर्मनिष्ठ समाज पर आधारित थी।
गांधीजी ने हिंद स्वराज (1909) में स्पष्ट लिखा कि भारत की शक्ति उसके गांवों में है। गांधीजी केंद्रीकृत औद्योगिक मॉडल के विरोधी थे। वे मानते थे कि अत्यधिक केंद्रीकरण समाज को निर्जीव बना देता है। गांधीजी ने ग्राम स्वराज की कल्पना की — जहाँ प्रत्येक गांव आत्मनिर्भर हो, स्थानीय उत्पादन हो, स्थानीय शासन हो, समाज का संचालन नैतिक मूल्यों के आधार पर हो। गांधीजी ने कहा था कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है, और यदि भारत को सशक्त बनाना है तो गांवों को सशक्त करना होगा।
गांधीजी बड़े उद्योगों के विरोधी नहीं थे, लेकिन वे बड़े उद्योग आधारित अर्थव्यवस्था के विरोधी थे। वे लघु उद्योग, कुटीर उद्योग, हस्तकला, स्वदेशी उत्पादन, स्थानीय रोजगार और विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था के समर्थक थे। गांधीजी का मानना था कि जब उत्पादन स्थानीय होगा, तब समाज आत्मनिर्भर होगा और शोषण की संभावना कम होगी। गांधीजी ने यह भी कहा था कि राज्य जितना बड़ा होगा, व्यक्ति उतना कमजोर होगा। यह अत्यंत महत्वपूर्ण विचार था, क्योंकि गांधीजी केंद्रीकृत सत्ता को समाज के लिए खतरा मानते थे।
गांधीजी की राजनीति भी नैतिकता पर आधारित थी। वे सत्ता की राजनीति नहीं, सेवा की राजनीति चाहते थे। गांधीजी ने कांग्रेस को स्वतंत्रता के बाद समाप्त करने की भी बात कही थी, क्योंकि वे मानते थे कि सत्ता का केंद्रीकरण लोकतंत्र के लिए खतरनाक हो सकता है। गांधीजी ग्राम पंचायत आधारित शासन व्यवस्था चाहते थे, जहाँ निर्णय नीचे से ऊपर की ओर आएँ, न कि ऊपर से नीचे थोपे जाएँ।
परन्तु स्वतंत्रता के बाद गांधीजी के इन विचारों को पूरी तरह किनारे कर दिया गया। गांधीजी का नाम लिया गया, उनकी तस्वीरें सरकारी दफ्तरों में लगाई गईं, लेकिन उनके विचारों को नीतियों में स्थान नहीं मिला। इसके विपरीत भारत ने केंद्रीकृत समाजवादी मॉडल अपनाया। योजना आयोग बना, बड़े सार्वजनिक क्षेत्र बनाए गए, उद्योगों का राष्ट्रीयकरण हुआ, लाइसेंस-परमिट राज आया। यह गांधीजी की ग्राम स्वराज की अवधारणा के बिल्कुल विपरीत था।
स्वतंत्रता के बाद जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारत ने सोवियत संघ से प्रेरित समाजवादी मॉडल अपनाया। 1950 में योजना आयोग की स्थापना हुई। सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार हुआ। उद्योगों का राष्ट्रीयकरण हुआ। निजी क्षेत्र पर नियंत्रण लगाया गया। लाइसेंस-परमिट राज शुरू हुआ। परिणाम यह हुआ कि 1947 से 1990 तक भारत की आर्थिक वृद्धि दर लगभग 2.5 प्रतिशत रही। अर्थशास्त्री राज कृष्ण ने इसे “हिंदू ग्रोथ रेट” कहा। यह विडंबना थी कि हजारों वर्षों से व्यापार और समृद्धि के लिए प्रसिद्ध भारत, समाजवादी प्रयोगों के कारण धीमी वृद्धि वाली अर्थव्यवस्था बन गया। 1991 में भारत को गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा और देश को अपना सोना गिरवी रखना पड़ा। यह घटना बताती है कि आदर्शवादी समाजवादी मॉडल व्यवहार में सफल नहीं हुआ।
1976 में आपातकाल के दौरान 42वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान की प्रस्तावना में "समाजवादी" और "धर्मनिरपेक्ष" शब्द जोड़े गए। यह ध्यान देने योग्य है कि संविधान की मूल प्रस्तावना में ये शब्द नहीं थे। समाजवाद और सेकुलरिज्म दोनों विदेशी आयातित विचारधाराएँ थीं। इसके विपरीत गांधीजी के ग्राम स्वराज, रामराज्य, स्वदेशी और नैतिक राजनीति जैसे भारतीय विचारों को संविधान में स्थान नहीं दिया गया। यह अत्यंत गंभीर वैचारिक परिवर्तन था। गांधीजी का नाम लेने वाले राजनीतिक वर्ग ने ही गांधीजी के मूल विचारों को उपेक्षित कर दिया और विदेशी विचारधाराओं को संविधान का अंग बना दिया।
यह केवल गांधीजी के विचारों की उपेक्षा नहीं थी, बल्कि भारतीय चिंतन परंपरा की उपेक्षा थी। गांधीजी भारतीय सभ्यता की निरंतरता के प्रतिनिधि थे। उनका रामराज्य भारतीय समाज की चिति से निकला हुआ विचार था। जब उस विचार को किनारे किया गया, तब भारतीय समाज का मार्ग भी आयातित विचारधाराओं की ओर मुड़ गया।
आज जब भारतीय समाज अनेक सामाजिक, आर्थिक और वैचारिक संकटों से गुजर रहा है, तब गांधीजी की ग्राम स्वराज, स्वदेशी, विकेंद्रीकरण और नैतिक राजनीति की अवधारणा फिर से प्रासंगिक दिखाई देती है। क्योंकि भारतीय समाज का समाधान भारतीय चिंतन में ही निहित है, न कि आयातित विचारधाराओं में।
आज भारतीय समाज में भ्रष्टाचार, जातिगत विखंडन, भाषाई विभाजन, क्षेत्रीयता तथा अलगाववाद दिखाई देता है। इसके पीछे आदर्शवाद और व्यवहार के बीच का अंतर प्रमुख कारण है। हम बड़े-बड़े आदर्शों की बात करते हैं, परन्तु व्यवहार में उनका पालन नहीं करते।
जब कोई युवा प्रशासनिक सेवा की तैयारी करता है, तब वह सेवा-भावना की बात करता है; परन्तु पद प्राप्त होने के बाद वही व्यक्ति व्यवस्था का अंग बनकर संसाधनों का दुरुपयोग करने लगता है। हम नैतिकता और शुचिता की बात करते हैं, किन्तु व्यवहार में विपरीत आचरण करते हैं।
आदर्शवाद की बात करना और व्यवहार में उसके विपरीत चलना यही आज के समाज की सबसे बड़ी समस्या है। अतः आदर्शों को व्यवहार में उतारना आवश्यक है। तभी वास्तविक परिवर्तन संभव है; अन्यथा हम दोषारोपण करते रहेंगे, आपस में संघर्ष करते रहेंगे, और समाधान की दिशा में आगे नहीं बढ़ पाएँगे।
भारतीय समाज का समाधान संघर्ष में नहीं, समन्वय में है। भारतीय समाज का समाधान आयातित विचारधाराओं में नहीं, सनातन चिंतन में है।
भारत हजारों वर्षों से जीवित है क्योंकि उसकी चिति जीवित है। और जब तक यह चिति जीवित रहेगी भारत जीवित रहेगा।
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