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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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“
तमिलनाडु के कलपक्कम में स्थित परमाणु ऊर्जा संयंत्र से एक सुखद समाचार प्राप्त हुआ जिसमें वैज्ञानिकों ने यहां परमाणु ऊर्जा को लेकर जारी एक प्रयोग में परमाणु अभिक्रिया की संतुलित अवस्था (क्रिटिकैलिटी) प्राप्त कर ली।
भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में थोरियम एक “भविष्य का अमृत ईंधन” बनकर उभर रहा है। सामान्यतः यह कहा जाता है कि 1 टन थोरियम से उतनी ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है जितनी लगभग 35 लाख टन कोयले से मिलती है—यह तुलना इसके अत्यधिक ऊर्जा घनत्व को दर्शाती है। विश्व के सबसे बड़े थोरियम भंडारों में से भारत एक है, जो मुख्यतः केरल (अलप्पुझा, कोल्लम तट)
तमिलनाडु (कन्याकुमारी, मनावलकुरिची)
ओडिशा (चांदीपुर तट)
आंध्र प्रदेश के कुछ तटीय क्षेत्रों में मोनाज़ाइट रेत के रूप में पाया जाता है। इस दृष्टि से भारत के पास ऊर्जा का एक ऐसा भंडार है, जो आने वाले हजारों वर्षों तक देश की आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता रखता है।
थोरियम की इस अपार क्षमता को भारत ने बहुत पहले पहचान लिया था। यह विचार 1950 में न्यूक्लियर शोधकार्य के जन्मदाता महान वैज्ञानिक डॉ होमी जहांगीर भाभा जी लेकर आए थे। आपने भारत में यूरेनियम न होने के कारण थोरियम को चुना क्योंकि यह भारत में सहज उपलब्ध है। थोरियम का उपयोग सरल नहीं है यह सीधे ईंधन के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता इसे पहले यूरेनियम- 233 में परिवर्तित करना पड़ता है, जो एक जटिल और महंगी प्रक्रिया थी, इसलिए उस समय डॉ भाभा ने इसके लिए त्री-स्तरीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की परिकल्पना की थी, जिसमें अंतिम लक्ष्य थोरियम आधारित ऊर्जा उत्पादन था।
पहले स्तर में: बीज तैयार करना अर्थात यूरेनियम से प्लूटोनियम बनाओ
यूरेनियम → ऊर्जा + प्लूटोनियम
दूसरे स्तर में: उस बीज से खेत तैयार करना अर्थात प्लूटोनियम से थोरियम को बदलो
प्लूटोनियम + थोरियम → नया ईंधन (यूरेनियम-233)
तीसरे स्तर में: फसल काटकर उपयोग करना अर्थात् थोरियम से बनी ऊर्जा का उपयोग करेंगे।
थोरियम → (परिवर्तन के बाद) → ऊर्जा का बड़ा स्रोत
इसका उपयोग परमाणु रिएक्टरों में किसी राष्ट्र की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किया जा सकता है। रेडियोमेट्रिक डेटिंग मैग्नीशियम में मिश्रधातु तत्व के रूप में उपयोग किया जाता है (थोरियम = एक रेडियोएक्टिव धातु,
रेडियोमेट्रिक डेटिंग = चट्टानों या जीवाश्मों की आयु पता करने का वैज्ञानिक तरीका,
मैग्नीशियम + थोरियम = सशक्त और गर्मी सहने वाली मिश्रधातु)। इसी कारण आज इसका उपयोग विमान और उन्नत तकनीकी के क्षेत्रों में किया जाता है।
डा. भाभा के समय इस क्षेत्र में प्रशासन तंत्र की अनदेखी और 1974 के पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और तकनीकी चुनौतियों के कारण पिछले छह दशकों तक थोरियम कार्यक्रम अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पाया।
2004 के बाद निर्माणी क्षेत्र में प्रयोग करने के नाम पर पोस्ट एरिया में तस्करी और अवैध खनन तेजी से बढ़ने लगा न्यूक्लियर साइंटिस्ट के दावों की माने तो 2004 के बाद लगभग 2 मिलियन टन मटेरियल भारत के समुद्री क्षेत्रों से गायब हो चुके हैं । सुब्रमण्यम स्वामी के अनुसार 20 लाख टन थोरियम चीन को बेचा गया।जो बड़े पैमाने की तस्करी का संदेह पैदा करते हैं । आरोप है कि भारत से सबसे ज्यादा थोरियम चीन भेजे गया और अब चीन पावर स्टेशन बना रहा है।उसके पास आज इतना थोरियम है कि वह अगले 20 हजार वर्षों तक पावर एनर्जी बना सकता है।
वर्तमान समय में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इस दिशा में एक नया मोड़ आया है।थोरियम विद्युत उत्पादक करने का जो सपना डॉ भाभा ने 1950 में देखा था , वह भारत सरकार के प्रयासों से आज सफल होते दिख रहा है।
भारत के पास विश्व के थोरियम भंडार का 25% हिस्सा है। जो संपूर्ण विश्व की तुलना में बहुत अधिक है। चूंकि भारत अंतरराष्ट्रीय परमाणु व्यापार का हिस्सा नहीं था, इसलिए उसे परमाणु रिएक्टरों में ऊर्जा उत्पादन के लिए थोरियम का उपयोग करने वाली प्रौद्योगिकियों को विकसित करने पर निर्भर रहना पड़ा।
सरकार ने परमाणु ऊर्जा को स्वच्छ और दीर्घकालिक समाधान के रूप में प्राथमिकता देते हुए स्वदेशी तकनीकों के विकास पर बल दिया है। थोरियम को “कभी न खत्म होने वाला ईंधन” है यही कारण है इसलिए इसे भविष्य का “गेम-चेंजर” परमाणु ईंधन माना जा रहा है। इसके लिए सरकार ने स्वदेशी तकनीक के विकास, छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) और उन्नत भारी जल रिएक्टर (AHWR) जैसी परियोजनाओं पर जोर देकर थोरियम के उपयोग का मार्ग प्रशस्त किया है।
इस प्रकार थोरियम आधारित रिएक्टरों के डिज़ाइन को आगे बढ़ाया जा रहा है, जो भारत को विश्व में इस क्षेत्र में अग्रणी बनाता हैं। साथ ही,अंतरराष्ट्रीय सहयोग, नीतिगत सुधार और निवेश में वृद्धि ने इस क्षेत्र को नई गति दी है।
आज जब विश्व ऊर्जा संकट और जलवायु परिवर्तन से जूझ रहा है, तब भारत का थोरियम कार्यक्रम एक आशा की किरण बनकर उभर रहा है। कम रेडियोधर्मी कचरा, अधिक सुरक्षा और विशाल उपलब्धता के कारण थोरियम भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा का सुदृढ़ आधार बन सकता है।आज संपूर्ण विश्व भारत की ओर देख रहा है, क्योंकि भारत के पास संसाधन हैं और उन्हें उपयोग में लाने की दूरदर्शितापूर्ण क्षमता भी।
डॉ नुपूर निखिल देशकर
6/4/26
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