- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
✍️दीपक कुमार द्विवेदी
पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर नेपाल और रवांडा के उदाहरणों के आधार पर भारत की शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक नया विमर्श खड़ा किया जा रहा है। नेपाल के नये प्रधानमंत्री बालेन शाह का नाम लेकर यह कहा जा रहा है कि वहाँ निजी विद्यालयों पर कठोर निर्णय लिये जा रहे हैं। इसी प्रकार रवांडा का उल्लेख करते हुए बताया जा रहा है कि वहाँ सरकारी विद्यालय इतने सशक्त हो गये कि निजी विद्यालयों की आवश्यकता ही समाप्त होने लगी। इसके आधार पर कुछ लोग यह निष्कर्ष निकाल रहे हैं कि भारत में भी निजी विद्यालयों को बंद कर दिया जाना चाहिए और शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में लाना चाहिए।
यह तर्क सुनने में आकर्षक लग सकता है, लेकिन भारत की वास्तविक परिस्थितियों को समझे बिना इस प्रकार के निष्कर्ष निकालना अत्यंत खतरनाक हो सकता है। नेपाल की कुल जनसंख्या लगभग तीन करोड़ के आसपास है, जबकि भारत की जनसंख्या 140 करोड़ से अधिक है। भारत में स्कूली शिक्षा से जुड़े विद्यार्थियों की संख्या ही लगभग 25 करोड़ से अधिक है, जो कई देशों की कुल जनसंख्या से भी अधिक है। भारत में लगभग 15 लाख से अधिक विद्यालय हैं, जिनमें सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी विद्यालय शामिल हैं।
इतनी विशाल और विविध शिक्षा व्यवस्था में नेपाल या रवांडा जैसे छोटे देशों के मॉडल को सीधे लागू करना न तो व्यावहारिक है और न ही संभव। नेपाल में यदि सरकार निजी विद्यालयों को सीमित करती है, तो वह अपेक्षाकृत कम संख्या के विद्यार्थियों और संस्थानों को प्रभावित करेगा, जबकि भारत में ऐसा कोई निर्णय करोड़ों छात्रों, लाखों शिक्षकों और हजारों संस्थानों को सीधे प्रभावित करेगा। इसलिए भारत की शिक्षा व्यवस्था को भावनात्मक तुलना के आधार पर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और व्यावहारिक दृष्टि से समझने की आवश्यकता है।
भारत की शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक समस्या निजी विद्यालय नहीं हैं। बल्कि वास्तविक समस्या शिक्षा का अत्यधिक केंद्रीकरण और सरकारी नियंत्रण है। भारत में निजी विद्यालय पाठ्यक्रम निर्धारित नहीं करते। निजी विद्यालय बोर्ड परीक्षाएँ आयोजित नहीं करते। निजी विद्यालय अंकसूची जारी नहीं करते। निजी विद्यालय डिग्री प्रदान नहीं करते।
पाठ्यक्रम राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद यानी एनसीईआरटी तैयार करती है। सीबीएसई, राज्य बोर्ड और अन्य बोर्ड परीक्षाएँ आयोजित करते हैं। विश्वविद्यालय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी के नियमों के तहत चलते हैं।
और अब हाल ही में शिक्षा के केंद्रीकरण को और मजबूत करने वाला एक बड़ा निर्णय लिया गया है। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद यानी एनसीईआरटी को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा देने का निर्णय लिया है। इसका अर्थ यह है कि जो संस्था अब तक पाठ्यक्रम निर्माण और शैक्षिक सामग्री तक सीमित थी, अब वह डिग्री और डिप्लोमा पाठ्यक्रम भी संचालित कर सकेगी।
यह निर्णय शिक्षा में विविधता बढ़ाने के बजाय केंद्रीकरण को और मजबूत करता है। पहले पाठ्यक्रम केंद्रीकृत थे, अब डिग्री देने की प्रक्रिया भी केंद्रीकृत होने की दिशा में बढ़ रही है। भारत जैसे विविध देश में शिक्षा का अत्यधिक केंद्रीकरण शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है।
भारत की शिक्षा व्यवस्था को समझने के लिए इतिहास की ओर देखना आवश्यक है। 1947 से पहले भारत में शिक्षा मुख्यतः समाज आधारित थी। गुरुकुल परंपरा थी। परिवार आधारित कौशल शिक्षा सामान्य बात थी। किसान का बेटा खेती सीखता था, कारीगर का बेटा शिल्प सीखता था, व्यापारी का बेटा व्यापार सीखता था। शिक्षा जीवन से जुड़ी थी और आत्मनिर्भरता उसका मूल उद्देश्य था।
भारत की पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था ने आत्मनिर्भर समाज तैयार किया। यही कारण था कि भारत लंबे समय तक विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्ति रहा। भारत का वस्त्र उद्योग, हस्तशिल्प, धातु उद्योग और कृषि विश्व में अग्रणी थे।
अंग्रेजों के आने के बाद 1835 में मैकॉले शिक्षा प्रणाली लागू की गई। इसका उद्देश्य प्रशासनिक कर्मचारी तैयार करना था। इसके बाद शिक्षा पुस्तकीय होती गई और कौशल आधारित शिक्षा कमजोर होने लगी।
स्वतंत्रता के बाद भारत ने सोवियत संघ से प्रेरित केंद्रीकृत समाजवादी शिक्षा मॉडल अपनाया। इस मॉडल में शिक्षा का उद्देश्य आत्मनिर्भर नागरिक बनाना नहीं बल्कि एक समान शिक्षा देकर सरकारी नौकरियों की ओर उन्मुख करना था।
पिछले 80 वर्षों का अनुभव बताता है कि शिक्षा का अत्यधिक केंद्रीकरण समाधान नहीं है। स्वतंत्रता के बाद भारत ने सोवियत संघ से प्रेरित केंद्रीकृत शिक्षा मॉडल अपनाया। 1947 से 1990 तक अधिकांश शिक्षा व्यवस्था सरकार के नियंत्रण में रही। उस समय निजी विद्यालय बहुत कम थे। लगभग पूरी शिक्षा व्यवस्था सरकारी विद्यालयों पर आधारित थी।
सबसे बड़ा कारण सरकारी विद्यालयों में शिक्षण के अतिरिक्त कार्यों का बढ़ना था। शिक्षकों को पढ़ाने के अलावा चुनाव ड्यूटी, जनगणना, सर्वेक्षण, सरकारी योजनाओं का प्रचार, दस्तावेज़ी कार्य जैसे अनेक गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाया जाने लगा। शिक्षक शिक्षण से अधिक प्रशासनिक कार्यों में व्यस्त रहने लगे।
सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता गिरने के कई कारण रहे। इनमें सबसे महत्वपूर्ण कारणों में से एक मध्यान्ह भोजन योजना भी रही। यह योजना मूल रूप से बच्चों को स्कूल तक लाने और कुपोषण दूर करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। उद्देश्य अच्छा था, लेकिन व्यवहार में कई स्थानों पर शिक्षा का केंद्र बदल गया।
मेरे पिता जी, जो एक सरकारी विद्यालय में शिक्षक रहे और बाद में सेवानिवृत्त हुए, वे अक्सर बताते थे कि जब मध्यान्ह भोजन योजना शुरू हुई, तब विद्यालय का बड़ा समय भोजन व्यवस्था में चला जाता था। शिक्षक को पढ़ाने से ज्यादा भोजन के अनाज की व्यवस्था, वितरण, गुणवत्ता, रिकॉर्ड, निरीक्षण जैसी जिम्मेदारियों में लगाया जाने लगा।
धीरे-धीरे कई विद्यालयों में शिक्षा गौण और भोजन मुख्य गतिविधि बन गया। कई जगह बच्चों की उपस्थिति भोजन के समय अधिक और पढ़ाई के समय कम होती गई।
वे बताते थे कि पहले विद्यालयों में पढ़ाई पर पूरा ध्यान रहता था, लेकिन मध्यान्ह भोजन योजना के बाद शिक्षण प्रभावित होने लगा। कई जगह बच्चों की उपस्थिति भोजन के समय बढ़ जाती थी और पढ़ाई के समय कम हो जाती थी।
तीसरा कारण निगरानी तंत्र का अभाव रहा। निजी विद्यालयों में प्रबंधन सीधे निगरानी करता है, जबकि सरकारी विद्यालयों में स्थानीय समाज की भूमिका लगभग समाप्त हो गई। पहले गाँवों में विद्यालय समाज का विषय होता था, लेकिन धीरे-धीरे यह पूरी तरह सरकारी विभाग का विषय बन गया। परिणामस्वरूप जवाबदेही कम होती गई।
चौथा कारण अधोसंरचना का अभाव रहा। कई सरकारी विद्यालयों में शिक्षक हैं लेकिन छात्र नहीं हैं। कई स्थानों पर भवन हैं लेकिन नियमित शिक्षण नहीं है।
इन परिस्थितियों में अभिभावकों ने निजी विद्यालयों की ओर रुख किया। निजी विद्यालयों ने बस सुविधा दी, नियमित कक्षाएँ दीं, अभिभावकों से संवाद बढ़ाया, अंग्रेजी माध्यम और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू की।
इसके साथ ही सभी बच्चों को स्कूल भेजने की नीति लागू की गई, लेकिन कौशल आधारित शिक्षा का विकल्प विकसित नहीं किया गया।
बाल श्रम प्रतिबंध कानून लागू किये गये। बच्चों को शिक्षा देना आवश्यक था, लेकिन पारंपरिक कौशल आधारित प्रशिक्षण समाप्त हो गया।
भारत में पीढ़ियों से चल रहे व्यवसायों में बच्चों को बचपन से प्रशिक्षण मिलता था। यह श्रम नहीं बल्कि कौशल आधारित शिक्षा थी।
जब यह व्यवस्था समाप्त हुई और कौशल आधारित शिक्षा विकसित नहीं की गई, तो पारंपरिक व्यवसाय कमजोर हो गये।
अब 2020 की नई शिक्षा नीति में वोकेशनल शिक्षा को शामिल किया गया है। कक्षा 6 से कौशल आधारित शिक्षा शुरू करने की बात कही गई है।
यह सकारात्मक कदम है, लेकिन यह वही व्यवस्था है जो भारत में हजारों लाखों वर्षों से थी। जिसे पहले समाप्त किया गया और अब पुनः लागू करने की कोशिश की जा रही है।
समाजवादी और केंद्रीकृत शिक्षा व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य आत्मनिर्भर नागरिक तैयार करना नहीं था, बल्कि एक समान शिक्षा देकर सरकारी नौकरियों की ओर उन्मुख करना था। परिणामस्वरूप शिक्षा का लक्ष्य रोजगार कौशल के बजाय डिग्री प्राप्त करना बन गया।
आज भारत में डिग्रियाँ बढ़ रही हैं, लेकिन कौशल और रोजगार के अवसर सीमित हैं। लाखों छात्र डिग्री लेकर निकलते हैं, लेकिन रोजगार नहीं मिलता।
इसी दौरान निजी विद्यालयों ने बेहतर अधोसंरचना, अंग्रेजी माध्यम, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी जैसी सुविधाएँ प्रदान कीं। परिणामस्वरूप निजी विद्यालयों की संख्या बढ़ती गई।
हालाँकि निजी विद्यालयों की फीस बढ़ना भी एक गंभीर समस्या है। लेकिन इसके पीछे भी कारण हैं भूमि की लागत, भवन निर्माण खर्च, नियमों का पालन, परिवहन सुविधा, डिजिटल अधोसंरचना, शिक्षक वेतन आदि।
भारत में समाज आधारित शिक्षा के सफल उदाहरण भी मौजूद हैं। विद्या भारती द्वारा संचालित सरस्वती शिशु मंदिर और सरस्वती विद्या मंदिर देशभर में हजारों की संख्या में संचालित हैं। सीमित संसाधनों में भी इन संस्थानों ने शिक्षा और संस्कार का संतुलित मॉडल प्रस्तुत किया है।
इसी प्रकार दयानंद एंग्लो वैदिक (डीएवी) संस्थान भी समाज आधारित शिक्षा का सफल उदाहरण हैं। इन संस्थानों ने शिक्षा को केवल व्यवसाय नहीं बल्कि सामाजिक दायित्व के रूप में विकसित किया।
विद्या भारती ने ग्रामीण और छोटे शहरों में शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया। परंतु समय के साथ संसाधनों की कमी के कारण कई स्थानों पर आधुनिक अधोसंरचना विकसित करना चुनौतीपूर्ण रहा। इसके बावजूद इन संस्थानों ने सीमित फीस में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का प्रयास जारी रखा।
यह अनुभव बताता है कि समाज आधारित शिक्षा मॉडल भारत में सफल हो सकता है।
समस्या यह है कि शिक्षा में अत्यधिक सरकारी नियंत्रण के कारण समाज आधारित संस्थानों के विस्तार में कई बाधाएँ आती हैं। मान्यता, नियम, प्रशासनिक प्रक्रियाएँ, भूमि से जुड़े नियम ये सभी छोटे समाज आधारित संस्थानों के लिए चुनौती बन जाते हैं।
यदि शिक्षा में वास्तविक सुधार करना है, तो सरकार और समाज के सहयोग से शिक्षा व्यवस्था विकसित करनी होगी। सरकार का कार्य नियमन और गुणवत्ता सुनिश्चित करना होना चाहिए, जबकि संचालन में समाज की भागीदारी बढ़ानी चाहिए।
भारत में स्कूली शिक्षा की स्थिति कुछ हद तक संतुलित है, लेकिन उच्च शिक्षा की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। भारत में विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की संख्या तेजी से बढ़ी है, लेकिन गुणवत्ता में सुधार नहीं हुआ।
उच्च शिक्षा की स्थिति और अधिक चिंताजनक है। भारत में डिग्रियाँ बढ़ रही हैं, लेकिन अनुसंधान कमजोर है।
भारत अनुसंधान पर लगभग 0.7 प्रतिशत खर्च करता है। चीन 2 प्रतिशत से अधिक खर्च करता है।
चीन छात्रों को विदेश भेजता है और अनुसंधान को बढ़ावा देता है।
भारत में प्रतिभाशाली छात्र विदेश जाते हैं और वहीं बस जाते हैं।
नई शिक्षा नीति 2020 सकारात्मक है, लेकिन शिक्षा को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की दिशा में स्पष्ट पहल नहीं है।
इसके विपरीत केंद्रीकरण बढ़ रहा है। एनसीईआरटी को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा देना इसी दिशा का उदाहरण है।
भारत जैसे विशाल देश में शिक्षा का राष्ट्रीयकरण समाधान नहीं है। समाधान शिक्षा को समाज आधारित बनाना है।
सरकार और समाज के सहयोग से शिक्षा व्यवस्था विकसित की जा सकती है। विद्या भारती और डीएवी जैसे मॉडल बताते हैं कि समाज आधारित शिक्षा भारत में सफल हो सकती है।
शिक्षा सुधार का मार्ग यही है सरकारी नियंत्रण कम हो, समाज की भागीदारी बढ़े, और शिक्षा को आत्मनिर्भर नागरिक तैयार करने का माध्यम बनाया जाए।
🎧 सिर्फ ₹299 में Wireless Headphones!
अब सुनिए शानदार म्यूज़िक बिना तारों की झंझट के 😍
✅ Bluetooth Wireless
✅ Built-in Mic (Calls के लिए)
✅ Foldable Design
✅ SD Card Support
✅ Lightweight & Comfortable
💥 Limited Time Offer — जल्दी करें!
🛒 Amazon पर Best Budget Headphones
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें