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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
सनातन समाज की संरचना को समझने के लिए हमें वर्तमान के चश्मे से नहीं, बल्कि उसके अपने दार्शनिक आधार, ऐतिहासिक विकास, लोक परंपरा और सामाजिक व्यवहार के संदर्भ में देखना होगा। आज वर्ण, जाति, कौशल, परंपरा, शिक्षा और सामाजिक संगठन पर जो चर्चा हो रही है, वह नई नहीं है। इतिहास में बार-बार ऐसा हुआ है कि पहले किसी व्यवस्था को समाप्त किया गया, फिर जब उसके स्थान पर आई व्यवस्था से समस्याएँ उत्पन्न हुईं, तब उसी पुरानी व्यवस्था की ओर लौटने की बात कही गई। यही प्रक्रिया आज भी चल रही है।
सनातन धर्म में समाज को समान बनाने का प्रयास नहीं किया गया, बल्कि समरस बनाने का प्रयास किया गया। यह बहुत बड़ा अंतर है। समानता का अर्थ है सभी को एक जैसा बनाना, जबकि समरसता का अर्थ है विविधता को स्वीकार कर सम्मान देना। यही कारण है कि
भगवद्गीता (अध्याय 18, श्लोक 41) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं —
"ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥"
यहाँ स्वभाव से उत्पन्न गुणों के आधार पर कर्म विभाजन की बात कही गई है। स्वभाव जन्म से ही प्रकट होता है।
भगवद्गीता (3.33) में भी स्पष्ट कहा गया —
"सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि"
अर्थात् ज्ञानी व्यक्ति भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही कार्य करता है। यह प्रकृति जन्म से ही होती है।
सनातन धर्म में पुनर्जन्म का सिद्धांत भी इसी से जुड़ा है
बृहदारण्यक उपनिषद् (4.4.5) में कहा गया —
"यथाकर्म यथाश्रुतं"
अर्थात व्यक्ति अपने कर्मों के अनुसार जन्म प्राप्त करता है। इस प्रकार जन्म स्वयं पूर्व कर्मों का परिणाम है। इसलिए गुण, कर्म और स्वभाव जन्म से जुड़े माने गए।
इसी कारण सनातन समाज में वर्ण व्यवस्था जन्म आधारित मानी गई, क्योंकि जन्म स्वयं पूर्व कर्मों का फल है।
इतिहास भी यही दर्शाता है कि समाज में कार्य आधारित समूह बनते रहे हैं और समय के साथ नई जातियाँ बनती रही हैं। यूनानी यात्री मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तक इंडिका (चंद्रगुप्त मौर्य काल, लगभग 300 ईसा पूर्व) में भारतीय समाज के सात वर्गों का उल्लेख किया है — दार्शनिक, कृषक, सैनिक, शिल्पकार, पशुपालक, निरीक्षक और सलाहकार।
इसका अर्थ यह नहीं कि केवल सात जातियाँ थीं, बल्कि यह कि समाज कार्य आधारित समूहों में व्यवस्थित था। समय के साथ ये समूह बढ़ते गए। आज हजारों जातियाँ और लाखों उपजातियाँ हैं। समाजशास्त्रीय अध्ययनों में यह भी कहा गया है कि भारत में लगभग 4000 से अधिक जातियाँ और लाखों उपजातियाँ हैं।
यह दर्शाता है कि जाति व्यवस्था स्थिर नहीं, बल्कि गतिशील है। नई जातियाँ बनती हैं, पुरानी विलीन होती हैं।
आज भी यही प्रक्रिया चल रही है। आज आईएएस अधिकारी एक समूह है। आईएएस अधिकारी प्रायः आईएएस या समान प्रशासनिक पृष्ठभूमि में विवाह करते हैं। डॉक्टर डॉक्टर से विवाह करते हैं। इंजीनियर इंजीनियर से विवाह करते हैं। चार्टर्ड अकाउंटेंट अपने समुदाय में विवाह करते हैं।
इसे कोई जातिवाद नहीं कहता। लेकिन जब पारंपरिक समाज में समान वर्ण या जाति में विवाह होता है, तो उसे जातिवाद कहा जाता है।
यह स्वाभाविक सामाजिक प्रक्रिया है कि समान शिक्षा, समान जीवन शैली, समान सामाजिक पृष्ठभूमि वाले लोग एक दूसरे के निकट आते हैं।
समाज में समूह बनना प्राकृतिक प्रक्रिया है। भविष्य में भी नई जातियाँ बनेंगी। यदि आज जाति समाप्त भी कर दी जाए, तो कल नई पहचान बनेंगी — जैसे डिजिटल प्रोफेशनल, एआई विशेषज्ञ, स्टार्टअप उद्यमी आदि।
इसलिए जाति समाप्त करने की बात व्यावहारिक नहीं है।
वर्ण व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पहलू कौशल आधारित अर्थव्यवस्था भी था। पिता जो काम करता था, वही काम पुत्र सीखता था। यह बाध्यता नहीं, बल्कि व्यावहारिकता थी।
यदि किसी परिवार में पीढ़ियों से लोहार का काम हो रहा है, तो पुत्र बचपन से उस कार्य को देखता है, सीखता है, उपकरण उपलब्ध होते हैं, बाजार उपलब्ध होता है। इससे कौशल का विकास होता है।
आज भी यही होता है। डॉक्टर का बेटा डॉक्टर बनने की ओर झुकता है। व्यापारी का बेटा व्यापार सीखता है। कलाकार का पुत्र कला सीखता है।
लोक परंपरा में कहा जाता है —
"जैसा बाप वैसा बेटा"
"खून का असर दिखता है"
ये केवल कहावतें नहीं, सामाजिक अनुभव हैं।
आज AI के युग में फिर से कौशल आधारित रोजगार की मांग बढ़ रही है। भारत सरकार की नई शिक्षा नीति 2020 में कक्षा 6 से स्किल डेवलपमेंट शामिल किया गया है।दर्जी, लोहार, बढ़ई, कारीगर — अब इन्हें स्किल डेवलपमेंट कहा जा रहा है।
1986 के बाल श्रम कानून और बाद में राइट टू एजुकेशन कानून के बाद बच्चों को पारिवारिक व्यवसाय से दूर कर दिया गया।
सभी को स्कूल भेजा गया, सभी को सरकारी नौकरी की ओर प्रेरित किया गया।
रटने आधारित शिक्षा से प्रतिशत बढ़े, लेकिन कौशल कम हुआ।
आज स्थिति यह है कि बड़ी डिग्री लेने के बाद भी व्यक्ति छोटे काम करने में सक्षम नहीं होता।
इसी कारण अब फिर से कौशल आधारित शिक्षा की बात की जा रही है।
यह वही स्थिति है — पहले व्यवस्था समाप्त करो, फिर उसी की ओर लौटो।
अंग्रेजों ने गुरुकुल व्यवस्था समाप्त कर दी। बाद में महर्षि दयानंद सरस्वती ने "वेदों की ओर लौटो" का आह्वान किया।
लेकिन जब गुरुकुल समाप्त हो चुके थे, ब्राह्मणों से वेद अध्ययन छीन लिया गया था, तब वापस लौटना कठिन हो गया।
आज जाति समाप्त करने की बात हो रही है। यदि जाति समाप्त कर दी गई, तो भविष्य में फिर समूह बनेंगे ।
फिर कहा जाएगा — पारंपरिक व्यवस्था की ओर लौटो।
यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी को मांस का स्वाद लगा दिया जाए और फिर कहा जाए कि मांस मत खाओ।
या किसी को पारंपरिक कौशल से दूर कर दिया जाए और फिर कहा जाए कि परंपरागत कार्य सीखो।
यह व्यावहारिक नहीं है।
समाज विविध है। विविध रहेगा। समूह बनेंगे। नई जातियाँ बनेंगी।
सनातन समाज का उद्देश्य जाति समाप्त करना नहीं, बल्कि जातिवाद समाप्त करना था।
समरसता का अर्थ है — विविधता के साथ सम्मान।
यही सनातन समाज की विशेषता रही है।
जो प्राकृतिक है, वह समाप्त नहीं होता।
वर्ण और जाति की अवधारणा बदल सकती है, पर समाप्त नहीं हो सकती।
समाज बदलता है, स्वरूप बदलते हैं, पर मूल सिद्धांत स्थायी रहते हैं।
यही सनातन दृष्टि है, यही सामाजिक यथार्थ है, और यही भविष्य की दिशा भी है।
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